भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२७० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-५ अधिष्ठातृरूपाद्देवताद्वयात् तत्त्वद्वयं विभक्तम्,—इत्येतद्भङ्ग्या प्रतिपादयत्यागमव्यव- हारेण— अत्रापरत्वं भावानामनात्मत्वेन भासनात् । परताहन्तयाच्छादात्परापरदशा हि सा ॥ ५ ॥ परत्वं पूर्णत्वमनन्यापेक्षाहमिति, ‘अपरत्वम्’ अपूर्णतान्यापेक्षेदमिति; अत्र च तत्त्वद्वये भावानां ध्यामलाध्यामलरूपाणामुभयांशस्पर्शात् परापरत्वमिति । वेद्यभावनिष्ठा दशा तत्त्वस्वरूपा तदवभासयितृमन्त्रेश्वरादिशुद्धप्रमातृसंवेद्यवस्तुसारा । या तु तन्निष्ठसंवेदनदशा सा शुद्धा विद्या, तत्प्रमातृवर्गाधिष्ठातृत्वं श्रीसदाशिवेश्वरभट्टारकरूपता,—इति संक्षेपः ॥ ५ ॥ अधिष्ठातृरूप से दोनों देवताओं के दोनों तत्त्व विभाजित कर दिये गये, [ समान नामवाले होते हुए भी दो तत्त्वों में विभक्त रहना ही है ] अब आगम व्यवहार से प्रतिपादन करते हैं— अपरत्व पदार्थों को अनात्मकरूप से प्रकाशित करता है । परत्व अर्थात् प्रकृष्ट स्वतन्त्रदशा अहन्तारूप से आच्छादित करने के कारण परदशा और अपरदशा में भासित करता है ॥ ५ ॥ परत्व परिपूर्णभाव का नाम है, अपने आपको प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रखनेवाला अहम् परामर्श है; ‘अपरत्वम्’ परापेक्षी इदंभाव को अपरत्व कहते हैं, जिसको सदैव दूसरे की अपेक्षा रखनी पड़ती है, इसी कारण यह इदंभाव अपूर्ण रहता हुआ परापेक्षी सर्वदा बना रहता है । ये दोनों तत्त्व ध्यामल एवं अध्यामल रूपों में पदार्थों का उभय अंश स्पर्श करते हुए परत्व एवं अपरत्वरूप से रहते हैं; वेद्यभाव में रहनेवाली अवस्था यथार्थरूप से उन-उन पदार्थभावों को अवभासित करनेवाले मन्त्रेश्वर इत्यादि शुद्धप्रमाताओं के रूप में संवेद्य वस्तुसार अर्थात् अपरत्व है । किन्तु उन संवेदनरूप ज्ञानों में रहनेवाली अवस्था है वही शुद्धविद्या कहलाती है, उन-उन प्रमातृवर्ग के अधिष्ठातृदेव श्री सदाशिवभट्टारक और ईश्वर- भट्टारकरूप ही है । इसका इतना ही मात्र सार है ॥ ५ ॥ भिन्नता एक प्रकार से विशेषता को लेती हुई प्रतीत होती है । उस अवस्था में विमर्श भेदाभेदरूप से होता है । जैसा कि इदम् अंश का अहम् अंश से भेद प्रतीत होता है, तथापि अहम् अंश इदम् को अपना एक भाग मानता है । इससे अहम् और इदम् का सामानाधिकरण्य दिखायी देता है । शिवतत्त्व ‘अहम्’ इस अंश का प्रत्यवमर्श है; सदाशिव तत्त्व में ‘अहमिदम्’ प्रत्यवमर्श है; ईश्वरतत्त्व में ‘इदमहम्’ प्रत्यवमर्श रहता है । इन सभी में ‘अहम्’ शिवतत्त्व की प्रधानता मानी जाती है । शुद्धविद्या में दोनों तत्त्वों के प्रत्यवमर्श समानरूप से [ अहं च इदं च ] यह प्रत्यवमर्श भेददशा और अभेददशा के मध्य का है । इसी कारण इसे परदशा एव अपरदशा से भी कहते हैं । इसे शुद्धविद्या अथवा सद्विद्या के नाम से भी कहते हैं; क्योंकि ‘इदंभावोपन्नानां वेद्यभूमिपेयुषाम् । भावानां बोधसारत्वात्......’ ॥ इस अवस्था में समस्त वस्तुओं के वास्तविक सम्बन्ध का विमर्श हो जाता है और सब विमर्श भी मानसिक होता है, इसी कारण शुद्धध्वा कहा जाता है; क्योंकि इस अवस्था में परमेश्वर का स्वरूप स्वच्छ ही रहता है अर्थात् माया से धूसरित नहीं होता ।