ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-१, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६९ स्वरूपप्रथनं तत् सती शुद्धा विद्या; अतोऽशुद्धविद्यातो माया प्रमातृगताया अन्यैव । तत्र यदा 'अहम्' इत्यस्य यदधिकरणं चिन्मात्ररूपं तत्रैवेदमंशमुल्लासयति तदा तस्यास्फुटत्वात् सदाशिवता 'अहमिदम्' इति । 'इदमहम्' इति तु इदमित्यंशे स्फुटीभूतेऽधिकरणे यदाहमंशविमर्शं निषिञ्चति तदेश्वरता, — इति विभागः ॥ ३ ॥ ननु कस्मादियं शुद्धा विद्या ? इत्याह— इदं भावोपपन्नानां वेद्यभूमिमुपेयुषाम् । भावानां बोधसारत्वाद्यथावस्तवलोकनात् ॥ ४ ॥ अवलोकनं प्रथनं वेदनं विद्या, यथावस्तुत्वं वस्त्वनुसारित्वं च; तस्याः शुद्धिरविपरीतता । वेद्यदशां चोपगतवतामङ्गीकृतवताम्, अत एवेदमित्येवंभूतेनोचितेन परामर्शेनोपपन्नानां परामृश्य- मानानां भावानां 'बोध' एव प्रकाशात्मा साररूपं वस्तु, प्रकाशश्चानन्योन्मुखविमर्शात्माहमिति । तदेषां यदेव पारमार्थिकं रूपं तत्रैव प्ररूढत्वात् अहमित्यस्य शुद्धवेदनरूपत्वम् ॥ ४ ॥ ग्राह्य [ प्रमेय ] में विमर्श होता है । इद दोनों तत्त्वों के द्वित्व को छोड़ देने पर एक ही अधिकरण [ स्व-स्वरूपाख्य ] में जिसका सम्बन्ध स्वरूप फैलता है—ऐसी अवस्था में विद्यातत्त्व की प्रधानता रहती है; इसलिए माया प्रमाता में रहनेवाली अशुद्ध विद्या से तो इस तत्त्व को सर्वथा भिन्न ही समझना चाहिए । शुद्धविद्या में जब 'अहम्' इस अंश का, जो अधिकरण चिन्मात्ररूप है उसीमें 'इदम्' इस अंश को उल्लसित करता है तब उसको अस्फुटता रहने के कारण सदाशिवता, 'अहमिदम्' यह विमर्श होता है । 'इदमहम्' इसरूप में तो इदन्तांश के प्रस्फुटित होने पर जब अहम् अंश के विमर्श को सींचता है तब ईश्वरता होती है, 'इदमहम्' इस अवस्था में ईश्वर तत्त्व रहता है, इन दोनों तत्त्वों का यही विभाग है ॥ ३ ॥ अब शङ्का होती है कि यह कैसे शुद्ध विद्या कही जाती है ? इस आशङ्का का समाधान करते हैं— इदन्ता परामर्श से उपपन्न वेद्यदशा को स्वीकार किये गये परामृश्यमान पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का बोध-ज्ञान हो जाने के कारण शुद्ध विद्या कहलाती है ॥ ४ ॥ वस्तु के अनुसार अवलोकन करना, प्रथन करना और ज्ञान करना ही विद्या कहा जाता है, जैसी वस्तु है उसके अनुरूप उसे जान लेना, उससे विपरीत अर्थ में न समझना ही विद्यातत्त्व है । वेद्यभूमि को प्राप्त हुए अर्थात् अङ्गीकार किये गये, अत एव इदंभाव के समुचित प्रत्यवमर्श से उपपन्न परामृश्यमान पदार्थों का 'बोध' ज्ञान ही प्रकाश स्वरूप वस्तुतत्त्व है, वह प्रकाश ही किसी अन्य की अपेक्षा न रखनेवाला विमर्शात्मा 'अहम्' कहलाता है । जो इनका पारमार्थिकरूप है उसी में बढ़ जाने के कारण 'अहम्' इस अंश की शुद्ध संवेदनरूपता मानी जाती है ॥ ४ ॥ १. 'अहम् और इदम्' इन दोनों तत्त्वों का परामर्श अर्थात् प्रत्यवमर्श शुद्धविद्या में एक समानरूप से होता है । यथा 'समधृततुलापुटन्यायेन' जैसे तराजू के दोनों पलड़े बराबर रहते हैं । इस में क्रिया-शक्ति की प्रधानता रहती है और इस अवस्था में अहम् एवं इदम् दोनों का विमर्श इस तरह समानरूप से अभि- व्यक्त होता है कि यद्यपि इस समय में भी अहम् और इदम् दोनों एक समान हैं फिर भी दोनों की