भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२६८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-३ काचित् तु शक्तिरन्यबहुतरशक्तिक्रोडीकारं कुर्वती निकटत्वादुपास्या घटस्येव घटत्वात्मिका, काचिदन्यापेक्षिणी स्वरूपमात्रनिष्ठा दूरा घटस्येव सत्तात्मिका । एवं निमेषोन्मेषशक्ती एव सदाशिवेश्वरौ तयोस्त्वधिष्ठातृदेवते अपि तथानामे । अथ तदधिष्ठातृदेवताद्वयगतं करणं विद्यातत्त्वमाह— सामानाधिकरण्यं च सद्विद्याहमिदन्धियोः ॥ ३ ॥ प्रकाशस्य यदात्ममात्रविश्रान्तमनन्योन्मुखस्वात्मप्रकाशताविश्रान्तिलक्षणो विमर्शः सोऽ'हम्' इति उच्यते; यस्त्वन्योन्मुखः स 'इदम्' इति स च स्वप्रकाशमात्रे पुनरनन्योन्मुखरूपे विश्राम्यति परमार्थतः । तत्राद्ये विमर्शोऽपि शिवतत्त्वं, द्वितीये विद्येशता, मध्यमे तु रूपे 'अहमिदम्' इति समधृततुलापुटन्यायेन यो विमर्शः स सदाशिवनाथ ईश्वरभट्टारके च, इदंभावस्य तु ध्यामला- ध्यामलतातकृतो विशेषः । ये एते 'अहम्' इति 'इदम् इति धियौ तयोर्मायाप्रमातरि पृथगधिकरण- त्वम् 'अहम्' इति ग्राहके 'इदम्' इति च ग्राह्ये, तन्निरासेनै कस्मिन्नेवाधिकरणे यत्संगमनं संबन्ध- के कारण । परमार्थतः जितने भी तत्त्वसमूह हैं वे सब के सब परमेश्वर की ही सारी शक्तियाँ हैं । कोई शक्ति तो दूसरी अनेकों शक्तियों को अपने में सम्मिलित करके निकटवर्ती होने के कारण उपासना करने योग्य बन जाती है । जैसे घट की घटत्वात्मिका-शक्ति । कोई तो किसी अन्य की अपेक्षा रखती हुई केवल स्वरूप में ही रहनेवाली होती है जबकि अत्यन्त दूर में रहने के कारण घट की सत्तारूप शक्ति के समान होती है । इस प्रकार निमेषरूप और उन्मेषरूप ये ही दो शक्तियाँ सदाशिव और ईश्वर हैं उनकी अधिष्ठातृदेवता-शक्ति भी दो नाम रूपवाली कहलाती है । अब उसके अधिष्ठातृ देवता दोनों के कारण विद्यातत्त्व कहते हैं— 'अहम् और इदम्' इन दोनों प्रकार की बुद्धियों का सामानाधिकरण्य सद्विद्या तत्त्व में होता है ॥ ३ ॥ प्रकाश का अपने स्वरूप में केवल विश्राम लेना और किसी अन्य की ओर उन्मुखता न रखता हुआ अपने स्वात्मरूप मात्र में विश्रान्ति लेनेवाला स्वभाव विमर्श का है उसे 'अहम्' विमर्श से कहा जाता है; किन्तु जो किसी अन्य की अपेक्षा रखता है वह तो 'इदम्' है, परमार्थतः उसकी भी विश्रान्ति अनन्योन्मुख स्वरूपवाले स्वप्रकाश मात्र में हो जाती है । प्रथम 'अहम्' विमर्श में शिवतत्त्व रहता है, द्वितीय में विद्येश्वरता, किन्तु मध्यमरूप में तो 'अहमिदम्' 'सम- धृततुलापुटन्यायेन' विमर्श होता है, वह सदाशिव भट्टारक और ईश्वर भट्टारक इन दोनों में रहते हैं, इदम् अंश का तो कुछ ध्यामल [ धुँधला ] और अध्यामल रूपता को लिए हुए वैशिष्ट्य रहता है । जो 'अहमिदम्' ये दो तत्त्व हैं इनमें अहम् अंश एक तत्त्व है, दूसरा इदम् अंश है { इन दोनों तत्त्वों की बुद्धि माया प्रमाता में भिन्न-भिन्न अधिकरणता को रखती हुई दो भागों में -विभक्त हो जाती है, 'अहम्' अंश का ग्राहक [ प्रमाता ] में विमर्श होता है और 'इदम्' अंश का १. जब मध्यमकोटि में विश्रान्ति लेते हैं तब 'अहमिदम्' ग्राहक [ प्रमाता ] में ग्राह्य [ प्रमेय ] का प्रक्षेप होता है इसलिए ध्यामल ग्राह्य अंश का विमर्श सदाशिवनाथ में 'अहमिदम्' इस रूप से होता है, 'इदमहम्' इस का ग्राह्य [ प्रमेय ] में प्रस्फुटित होने पर 'अहम्' इस अंश के प्रक्षेप से सामानाधिकरण्य विमर्श ईश्वरभट्टारक में होता है ।