ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-१, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६७ ब्रह्मविष्णुतुल्यः पृथगेव मन्तव्यो न तु नामसारूप्याद्भ्रमितव्यम् । यदाहुरेके 'ब्रह्मविष्णुरुद्रा अपि तत्त्वमध्ये किं न गणिताः' इति ॥ २ ॥ नामधेयान्तरमप्यत्र तत्त्वद्वये दर्शयति— ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः । यस्योन्मेषादुदयो जगतः, —इत्यत्र ईश्वरतत्त्वमेवोन्मेषशब्देनोक्तम् । विश्वस्य हि स्फुटत्वं बाह्यत्वमुन्मेषणं, निमेषणं त्वस्फुटत्वापादनमन्तरूपतोद्रेचनम्, —इति निमेषः सदाशिवतत्त्वं यतो जगतः प्रलयः, —इति शुद्धोऽयं स्पन्दः परमेश्वरस्याचलस्याप्यप्ररूढरूपान्तरापत्तिलक्षणः किञ्चिच्चलनात्मकतया स्फुटैकरूपत्वात् । परमेश्वरस्य हि परमार्थत एताः शक्तयो यस्तत्त्वग्रामः, है कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को भी इन तत्त्वों के बीच में क्यों नहीं गिन लेते हो ? ॥ २ ॥ दूसरे नाम भी इन्हीं दोनों तत्त्वों में गतार्थ होते हैं— बाहर का उन्मेष ईश्वरतत्त्व है और भीतर का निमेष सदाशिवतत्त्व है । जिसके उन्मेष से इस जगत् की उत्पत्ति होती है । इस स्थल में ईश्वरतत्त्व को ही उन्मेष शब्द से कहा गया है; क्योंकि विश्व का बाहर में स्फुटरूप से व्यक्त होना ही उन्मेष माना जाता है । एवं अस्फुटरूप से अन्त.करण में सम्मिलित कर लेने का नाम ही निमेष है, निमेष ही सदा- शिव तत्त्व कहलाता है जिससे जगत् का प्रलय होता है । इस प्रकार यह शुद्ध स्पन्द है जो अचल परमेश्वर का दूसरा रूप न होना स्वरूप माना जाता है किञ्चित् चलनात्मकरूप से स्फुरित होने १. गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभा सततं स्युर्जंस्यापरिपन्थिनः ॥ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण इन तीनों गुणों की साम्यावस्था प्रकृतितत्त्व हैं इससे निकले हुए नील-सुखादि-गुण-स्पन्दों अनन्त प्रवाह सामान्य-स्पन्द पर ही आश्रित रहते हैं ऐसी परिस्थिति में वे निरन्तररूप में प्रवाहमान होते रहने पर भी उस योगी के लिए प्रतिद्वन्द्वी नहीं बन सकता है; क्योंकि चिति-शक्ति को हृदयंगम करनेवाले के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाता है चिद्रूप का आवरण न कोई है और न कोई हो ही सकता है । प्रतिष्ठित एवं अप्रतिष्ठितरूप से स्पन्द दो प्रकार के होते हैं । प्रतिष्ठित स्पन्द सारे विश्व वैचित्र्य का एकमात्र कारण है एवं विराट्-चेतना होने के कारण, नामरूपात्मक सारे पदार्थों के भी मूल कारण हैं । अप्रतिष्ठित स्पन्दन माया तत्त्व से लेकर पृथिवी तत्त्व तक अनेक भेदों से मिला हुआ रहता है यद्यपि अनेक भेद-उपभेद से युक्त होते हुए भी एकत्व में ही अवस्थित रहते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि विश्व का कोई भी पदार्थ, चाहे प्रस्तर खण्ड ही क्यों न हो, वस्तुतः उसका सम्बन्ध विराट् स्वरूप के प्रवाह से ही रहता है, शैवाद्वैत दर्शन में स्पन्दों की प्रवाहमानता की प्रक्रिया इस प्रकार है— तेन आहुः किल संवित् प्राक् प्राणे परिणता......। बाहर में उन्मुख होकर, सर्वप्रथम, प्राण अर्थात् सूक्ष्म प्राणना अर्थात् विश्वचेतनता के रूप में परिणत हो जाती है । संवित् प्रकाश स्वरूपवाली तो है ही परन्तु इसका विमर्शरूप भी रहता है । शास्त्रीय भाषा में इस विमर्शमय प्रकाश को आनन्द-शक्ति से कहा गया है । जैसा कि—आनन्द शक्ति सैवोक्ता यतो विश्वं विसृज्यते । संविन्मात्रं हि यच्छुद्धं प्रकाश परमार्थ कम् । तन्मेयमात्मनः प्रोज्झ्य विविक्तं भासते नभः ॥ ( तं० ) संवित् वेद्य-विषय को अपने से भिन्न कर गगन सदृश स्वयं अवस्थित रहती है ।