भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२६६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-२ नदीसरःसागरादीनां च पृथिवीरूपत्वमब्रूपत्वं चेति । ततश्च शुद्धचैतन्यवर्गो यो मन्त्रमहेश्वराख्यः, तस्य प्रथमसृष्टावस्माकमन्तःकरणैकवेद्यमिव ध्यामलप्रायमुन्मीलितमात्रचित्रकल्पं यद्भावचक्रं, संहारे च ध्वंसोन्मुखतया तथाभूतमेव चकास्ति प्रतिबिम्बप्रायतया, तस्य चैतन्यवर्गस्य तादृशि भावराशौ तथाप्रथनं नाम यच्चिद्विशेषत्वं तत्सदाशिवतत्त्वम् । मन्त्रेश्वरादिरूपस्य तु चैतन्यराशेः स्फुटीभूतमस्मद्बहिष्करणसरणिसंप्राप्तभाववर्गप्रतिमं विश्वं प्रतिबिम्बतया भाति, तस्य तु तत् तथाप्रथनमेश्वरतत्त्वम् । यस्तु सदाशिवभट्टारक ईश्वरभट्टारकश्च ध्येयोपास्यादिरूपतया स इत्यादिकों का तथा सरिता, सरोवर, सागर आदि की पृथिवीरूपता और जलरूपता होना । इसलिए जो शुद्ध चैतन्यवर्ग मन्त्र महेश्वर है, उसकी पहले-पहल सृष्टि हम लोगों के अन्तःकरण द्वारा वेद्य के जैसी अस्फुटरूप में, चित्रकार के मन में चित्र खींचने के पूर्व रूपरेखा धुँधली-सी रहती है, उसी प्रकार सदाशिव तत्त्व में ध्यामल अर्थात् हल्की सी धुँधली रूपरेखा अव्यक्तरूप से रहती है । संहार काल में भी पदार्थों की ध्वंस उन्मुखता हो जाने से उसी प्रकार प्रायः प्रतिबिम्ब- रूप से भासते हैं उस चैतन्यवर्ग का वैसा पदार्थ राशि में भासित होनारूप जो वैशिष्ट्य है वही सदाशिव तत्त्व है । किन्तु मन्त्रेश्वररूप चैतन्यराशि का स्फुट दशा में हम लोगों की बाहरी इन्द्रियों के मार्ग से संप्राप्त जो पदार्थसमूह के सदृश जगत् है उसमें प्रतिबिम्बरूप से भासता है उसका वैसा फैलाव होना ही तो ईश्वर तत्त्व कहलाता है । किन्तु सदाशिवभट्टारक और ईश्वरभट्टारक तो ध्येय-उपास्यादिरूपता से प्रकाशित होते हैं । ब्रह्मा, विष्णु के तुल्य सदाशिव भट्टारक एवं ईश्वरभट्टारक को भिन्न भिन्न ही समझना चाहिए । इनमें नाम की समानता को लेकर भ्रमित नहीं होना होगा । [ सदाशिव भट्टारक और ईश्वर भट्टारक अर्थात् भट्टारक, भट्ट और भट्टार ये शब्द परस्पर एकार्थक होते हैं, भट् धातु से तन् प्रत्यय होकर भट्ट शब्द निष्पन्न हुआ है । भ्वादिगण में पठित भट् धातु का पोषण अर्थ होता है [ भट् भृतौ ] । भट्ट का अर्थ है पोषण करनेवाला स्वामी अर्थात् ईश्वर । इन शब्दों का प्रयोग प्रायः श्रेष्ठ लोगों के लिए अथवा ब्राह्मण और राजा-महाराजाओं के लिए आदर देने के रूप में आते हैं यहाँ प्रकृत प्रसङ्ग में भट्टारक शब्द अपने से जो पूज्य है उसके लिए लगाया गया है और सदाशिव सब के पूज्य एवं स्वामी भी है । कुछ लोगों का कहना १. संहार दशा में तो प्रायः जैसे चित्रकार के मन में प्रदर्शित चित्र की प्रथम एक धुँधली सी रूपरेखा रहती है, अनन्तर उसका अधिक स्पष्टरूप उभरने लगता है और रंग देने पर इससे भी अधिक चित्र अभिव्यक्त होने लगता है, उसी प्रकार सदाशिव दशा में भी सारा का सारा विश्व अस्फुट दशा में अवस्थित रहता है और ईश्वररूप उन्मेष अवस्था में विकसित हो जाता है । जैसा कि सरोवर का कमल । 'अहम् इदम्' यह सदाशिव का प्रत्यवमर्श है तथा ईश्वर का प्रत्यवमर्श है 'इदम् अहम्' है । २. इस विषय में आगम भी कहता है— तस्मिन्नेवेश्वरे तत्त्वे संस्थितः परमेश्वरः । शिवेच्छानुगताः सर्वे जगतः प्रभविष्णवः ॥ उसी ईश्वर तत्त्व में बैठा हुआ परमेश्वर है । शिव की इच्छा-शक्ति से अनुगत होकर जगत् के उत्पादक, पालक इत्यादि होते हैं ।