भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-३, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २६५ भासने 'सादाख्यं' सदाख्यायां भवम्; यतः प्रभृति सैदिति प्रख्या, सदाख्यायाञ्च सदाशिवशब्द- रूपाया इदं वाच्यं तत्त्वम् । सृष्टिक्रमोपदेशादौ प्रथममुचितं तत्सादाख्यं तत्त्वम् । 'बहिर्भावस्य' क्रियाशक्तिमयस्य 'परत्वे' उद्रेक.भासे सति 'पारमेश्वरं' परमेश्वरशब्दवाच्यमीश्वरतत्त्वं नाम । ततश्च सादाख्यस्य पश्चादुचितावभासनम् । एतदुक्तं भवति-इह तस्य भावस्तत्त्वम्, - इति भिन्नानां वर्गाणां वर्गीकरणनिमित्तं यदेकमविभक्तं भाति तत्तत्त्वं, यथा गिरिवृक्षपुरप्रभृतीनां तत्त्व में होनेवाले भावतत्त्व को सादाख्य तत्त्व से कहा जाता है; क्योंकि इन सभी पदार्थों की सत्ता सदा प्रतिज्ञापन होती है इसी कारण वे सभी तत्त्व सदाशिव शब्द का वाच्य हो जाते हैं । इदन्ता के उन्मेष अवस्था में भी इनकी शिवरूपता सदा बनी रहती है, चाहे फिर स्फुट होकर बाहर में अभिव्यक्त हो गये हो इससे क्या होता है ? इसी कारण 'सदा' शब्द से कहा गया है । सृष्टि क्रम के उपदेशादि देने में प्रथम तत्त्व तो सदाशिव ही रहता है-ऐसा कहना युक्तियुक्त बैठता भी है । 'बहिर्भावस्य' इस वाक्य से द्योतित होता है कि 'इदम्' अंश क्रिया-शक्ति से युक्त होकर बाहर की ओर प्रस्फुट होता है; क्योंकि इसमें क्रिया-शक्ति की प्रधानता है-ऐसा अवभासन होने पर 'पारमेश्वरं' परमेश्वर शब्द का वाच्य ईश्वर तत्त्व कहलाता है अर्थात् बाहर में तत्त्व की अभिव्यक्ति होने पर ईश्वर तत्त्व प्रधान हो जाता है । इसलिए सदाशिव तत्त्व के बाद ठीक भासित होनेवाला ईश्वर तत्त्व है, यह कहा जाता है कि उसका भाव रहता है और उसका रहना ही तत्त्व माना जाता है, भिन्न-भिन्न वर्गों के वर्गीकरण में जो निमित्त है, जो कि एक ही में अवियुक्तरूप से मिला हुआ भासता है वस्तुतः उसीका नाम तत्त्व है । जैसा कि पर्वत, वृक्ष, नगर १. इदंभाव के प्रतिबोध करने की इच्छा सदाशिव तत्त्व व सादाख्य तत्त्व में रहती है । इस सदाशिव तत्त्व की अवस्था में इच्छा का प्राधान्य रहता है । इस अवस्था में 'अहम्' 'मैं हूँ' ऐसा प्रतिज्ञापन होता है इसीलिए यह सादाख्य तत्त्व कहा जाता है । सद् शब्द का अर्थ है होना तथा होने में इदंभाव की प्रतीति होती है इस अवस्था में 'अहम् इदम्' 'मैं यह हूँ' ऐसा निश्चित एक अनुभव हृदय में होता है किन्तु इदमंश अभी अस्फुट दशा में पड़ा हुआ है । 'अहम्' में इसकी प्रधानता बनी हुई है । सदाशिव में उन्मेष का अभाव है किन्तु निमेष अवस्थावाले सदाशिव तत्त्व है, इस विषय में कहा भी गया है कि 'ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः' किन्तु इदम् अंश को अपना ही अंश मानता है । प्रधानता तो अहम् की रहती है जैसे कुंभकार के मन में छोटे-बड़े आकार-प्रकारवाले अनेक प्रकार के मृत्पात्र निर्माण करते समय एक अस्फुट धुँधलो प्राथमिक अवस्था विशेष रहती है उसी प्रकार सदाशिव तत्त्व में भी विश्व अस्फुट अवस्था में अवस्थित रहता है । २. जिसका मतङ्ग संहिता में भी उल्लेख किया गया है- तत्त्वं यद्वस्तुरूपं स्यात्स्वधर्मप्रकटात्मकम् । तत्त्वं वस्तुपदं व्यक्तं स्फुटमाम्नायदर्शने ॥ यदच्युतं स्वकाद्वृत्तात्तत्तं चात्मवशं गतम् । ततमन्थेन नो तस्मात्तत्तत्त्वं तत्त्वसंततौ ॥ जो अपने धर्म को प्रकट करनेवाला पदार्थरूप तत्त्व है वही आम्नाय-वेद में प्रत्यक्ष स्फुटरूप से व्यक्त वस्तु तत्त्व कहलाता है । जो अपने वृत्त से च्युत नहीं होता है तथा अपने में प्रतिष्ठित भी है और किसी अन्य से प्रकाशित नहीं है, वही तत्त्वसंतति में तत्त्व कहलाता है । ३४