ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-२ ज्ञानं विमर्शानुप्राणितं, विमर्श एव च क्रियेति । न च ज्ञानशक्तिविहीनस्य क्रियायोगः,—इति तदेतदवियुक्तज्ञानक्रियारूपं, क्रियाद्वारेण सकलतत्त्वराशीगतसृष्टिसंहारशतप्रतिबिम्बनसहिष्णु यत् तदुपदेशभावनादिषु तथाभासमानमनाभासरूपमपि वस्तुतः, शिवतत्त्वम्,--इत्युक्तं भवति ॥ १ ॥ नन्वेवंभूतं शिवतत्त्वं चेत् तर्हि ततोऽनतिरिच्यमानमिदं विश्वम्,—इति किमन्यत् तत्त्वं स्यात् । एकवित्तत्त्वविश्रान्तौ च तत्त्वानां कथं क्रमो भवेत्, देशकालाभेदात् ? एवमेवैतत्— किन्त्वान्तरदशोद्रेकात्सादाख्यं तत्त्वमादितः । बहिर्भावपरत्वे तु परतः पारमेश्वरम् ॥ २ ॥ यद्यप्येकमेव शिवतत्त्वं तथापि तदीयमेव स्वातन्त्र्यं स्वात्मनि स्वरूपभेदं तावत्प्रतिबिम्ब- कल्पतया दर्शयति । स्वरूपवैचित्र्यमयो हि असौ; ततश्चान्तरी ज्ञानरूपा या दशा तस्या उद्रेका- ज्ञान तो विमर्श से अनुप्राणित अर्थात् जीवित है और विमर्श ही क्रिया है । इससे सिद्ध होता है कि ज्ञान-शक्ति से रहित क्रियायोग नहीं बन सकता है, ज्ञान और क्रियारूप का अवियुक्तरूप से बना रहना ही सभी पदार्थों का पारमार्थिकवपु कहा जाता है, जो क्रिया द्वारा सम्पूर्ण तत्त्वराशि से होनेवाले सृष्टि-संहार सैकड़ों प्रतिबिम्ब का सहिष्णु है वही उपदेश भावनादि में तथा भासमान- रूप भी वस्तुतः शिव तत्त्व ही है—ऐसा कहा है ॥ १ ॥ 'ननु' कह कर शङ्का की जाती है कि यदि ऊपर में कहा गया है—ऐसा ही शिवतत्त्व है तब तो यह सारा का सारा विश्व शिवतत्त्व से भिन्न ही नहीं हुआ, अपितु अभिन्नरूप से इस तत्त्व में रह गया, इससे भिन्न अन्य तत्त्व क्या होगा ? एक चिद्रूप तत्त्व में विश्रान्ति हो जाने पर पदार्थों का क्रम कैसे बैठेगा ? क्योंकि इसमें तो देश-काल का अभेद हो जाता है, यह तो ऐसा ही दिखायो देता है— किन्तु आन्तर अवस्था के उद्रेक होने से पूर्व अवस्था में सदाशिव तत्त्व रहता है । बाहर में पदार्थ तत्त्वों का विस्तार होने पर तो ईश्वर तत्त्व कहलाता है ॥ २ ॥ यद्यपि शिवतत्त्व एक ही रहता है तथापि भिन्न-भिन्न विशेषताएँ लिये हुए, उन्हीं की स्वातन्त्र्य-शक्ति अपने आत्मस्वरूप में स्वरूपों का भेद संपादन करती हुई प्रतिबिम्ब के समान उन उन रूपों के भेदों को अभिव्यक्त करती है । जिसमें स्वरूप का वैचित्र्यभाव झलकता हो, वही देश-काल क्रम कहलाता है; क्योंकि मूर्त्ति क्रिया का वैचित्र्यभाववाला तो यह है; इसलिए भीतरी ज्ञानरूपा जो दशा है उस दशा के उद्रेक होने पर सादाख्य तत्त्व रहता है अर्थात् सदाशिव एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् । ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ॥ एवं भूतमिदं वस्तु भवत्विति यदा पुनः । जाता तदेव तत्तत्कुर्वत्यत्र क्रियोच्यते ॥ इस प्रकार यह ज्ञेय पदार्थ है, इससे भिन्न किसी रूप में नहीं भासित होता, इस प्रकार निश्चित बोध हो जाता है। जगत् का ज्ञान कराती है इसलिए ज्ञान-शक्ति कहलाती है । यह वस्तु ऐसी ही स्वरूपवाली है और जब पुनः प्रकाशित हो जाती है तब वही उस उस प्रकार से क्रिया बन जाती है ।