ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६३ एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः क्रिया कालक्रमानुगा । मातुरेव तदन्योन्यावियुक्ते ज्ञानकर्मणी ॥ १ ॥ एवमिति, यतः परदर्शनोक्तः कार्यकारणभावो जडरूपप्रतिष्ठो न कथंचिदुपपन्नः, किन्तु चिद्रूप एवान्तर्बहिरात्मना प्रकाशपरमार्थेनापि वपुषा तदाभासरूपेण वर्तमानः कालक्रममाक्षिपन् क्रियाभिधीयते तस्य प्रमातुरेव ज्ञानशक्तिवपुषो धर्मः; 'तत्' इति तस्मादवियुक्तं ज्ञानं क्रिया च । इस प्रकार बाह्य और आन्तरवृत्ति ही क्रमिक अवभास [ कालक्रम ] का आक्षेप करती हुई क्रिया कही गयी है । इसीलिए परस्पर अवियुक्त ज्ञान और क्रिया ज्ञान-शक्तिवपु प्रमाता का धर्म माना जाता है ॥ १ ॥ 'एवमिति' यह जो श्लोक में दिया गया है इससे द्योतित होता है कि अन्य दर्शन में कहा गया कार्य-कारणभाव जडरूप होने के कारण किसी तरह भी उपपन्न नहीं होता, किन्तु भीतर और बाहर में चिद्रूप ही सर्वत्र व्याप्त है, परमार्थ प्रकाश उस धर्मिरूप आभास से विद्यमान रहता है जो क्रमिक अवभास कालक्रम का आक्षेप करता हुआ क्रियारूप बन जाता है अर्थात् उसीको क्रिया कहा जाता है उस ज्ञान-शक्तिवपु प्रमाता का ही धर्म है, 'तत्' शब्द जो श्लोक में दिया है यह बताता है कि इसलिए ज्ञान और क्रिया ये दोनों परस्पर एक दूसरे अविभक्त मिले हुए रहते हैं । १. परम शिव ही दूसरों को प्रकाशित करनेवाले होते हैं उनकी उन्मुखरूपता इच्छा ही क्रिया शुद्ध विद्या विमर्शमयी है जब वे शिव ज्ञान मात्र से, बिना किसी अन्तर किये भी विश्व का अपने आप में ही अपने से निर्माण कर सर्जन करते हैं तब अन्तर भाव के उद्रेक से ज्ञान-शक्तिरूप सदाशिव में अवस्थित हो जाते हैं, किन्तु जब बाहर में सृष्टि की रचना की प्रधानता से सर्जन करते हैं तब बहिर्भाव के उद्रेक से क्रिया-शक्तिरूप ईश्वर में क्रिया-शक्तिरूप से अवस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार विवेचन किया भी गया है— उत्तरोत्तरमवग्रहग्रहैः पश्यतोऽप्यधरमुत्तरस्य यः । साधनस्य निजभावनामहो हेतुरत्र भवतो मरीचयः ॥ जो उत्तरोत्तर पृथक्ता को द्योतन करनेवाली अवग्रह-शक्ति के द्वारा ऊपर नीचे देखनेवाले साधक की अपनी भावना से ग्रहण करने पर आपकी रश्मियों का ही इसमें कारण दिखता है । इस प्रकार आगम शास्त्र में भी इस पर उल्लेख किया गया है— तस्मिन्नैश्वरे तत्त्वे संस्थितः परमेश्वरः । शिवेच्छानुमता सर्वे जगतः प्रभविष्णवः ॥ परमेश्वर उसी ईश्वर तत्त्व में अवस्थित रहते हैं । शिव की इच्छा-शक्ति से ही अनुमत होकर वे सभी जगत् के उत्पादक बनते हैं । २. ज्ञान और क्रिया का सम्बन्ध अवियुक्त रहता है; क्योंकि वह आन्तर तत्त्व का प्रकाश करनेवाली होने से ज्ञान-शक्ति कहलाती है और बाह्यरूप से पदार्थों का क्रमशः विस्तार करती है इसलिए क्रिया-शक्ति है इस विषय में आगम शास्त्र का भी प्रमाण है—