भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 285

२६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-१ क्रमते, अनुमानमप्येवं, नहि यद्यदस्ति तत्र तत्र लिङ्गव्याप्त्यादिग्रहणसंभवः । आगमस्त्वपरि- च्छिन्नप्रकाशात्मकमाहेश्वरविमर्शपरमार्थः किं न पश्येत्, —इति तदनुसारेण पदार्थनिर्णयं विश्वं- प्रमेयीकरणप्रतिलब्धतद्विश्वोत्तीर्णप्रमातृपदहृदयङ्गमीकरणाभिप्रायेण निरूपयितुमाचार्य आगमा- धिकारं तृतीयमारभते । तत्र श्लोकैकादशकेन 'एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः' इत्यादिना 'स्थूलसूक्ष्मत्वभेदतः' इत्यन्तेनागमसिद्धं शिवादिधरणोपान्तमेकैकाभासरूपतात्मकं दर्शनान्तरे 'सामान्यम्' इति यद्वयव- हृतं, यस्य सामानाधिकरण्ययोगादनन्तस्वलक्षणावभासनव्यूहविशेषपूर्वकंः समस्तोऽयं शरीर- भुवनादिविभवः, तं परमेश्वरागमसिद्धं युक्त्याप्यनुगतं प्रतीकस्तस्तत्त्वग्रामं दर्शयति, — इत्याह्निक- तात्पर्यम् । तत्राधिकारसंगतिं योजयन् पूर्वपक्षप्रतिक्षेपं चोपसंहरन् शिवतत्त्वस्वरूपमेव दर्शयितुमाह— नहीं है और न तो अनुमान प्रमाण से भी उसका ग्रहण हो सकता है, जो जो वस्तु है उस उसमें हेतु और व्याप्तिज्ञान संभव नहीं हो सकता है। किन्तु आगमशास्त्र तो अपरिच्छन्न प्रकाशात्मक, माहेश्वर विमर्शरूप, परमार्थ होने के कारण क्या नहीं देख लेता है ? इसलिए आगम के अनुसार पदार्थों के निर्णय करने के लिए आचार्य आगमाधिकार नामक तृतीय अधिकार प्रारम्भ करते हैं; क्योंकि सभी पदार्थों का ज्ञान हो जाने पर ही पदार्थों के ऊपर जो प्रमातृपद है उसका हृदयङ्गम होना संभव है । इस आह्निक में ग्यारह श्लोकों के द्वारा 'एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः' यहाँ से लेकर 'स्थूलसूक्ष्मत्व- भेदतः' वहाँ तक आगमशास्त्र में सिद्ध पदार्थतत्त्व जो शिव आदि से लेकर पृथिवी पर्यन्त हैं, वे सब के सब आभासरूप से ही मात्र झलकते हैं जब कि अन्य दर्शन में इसे 'सामान्यम्' ऐसा कह कर व्यवहार किया गया है; जिसका यह सारा का सारा शरीर, भुवनादि ऐश्वर्य-वैभव माना जाता है । जो कि सामानाधिकरण्य [ घट-पटादि ] रूपों में असंख्य प्रकार से विशेषता को लिए हुए स्वलक्षणसमुदाय के रूप में अवभासित होते हैं, परमेश्वर आगम से सिद्ध होता हुआ भी युक्ति के द्वारा अनुगत होता है, प्रतीकरूप से उस तत्त्वसमूह को दिखाते हैं, इस आह्निक का इतना ही तात्पर्य है । अधिकार सङ्गति को जोड़ते हुए पूर्वपक्ष के द्वारा दिये गये आक्षेप का निराकरण और उपसंहार करते हुए शिवतत्त्व के स्वरूप को दिखाने के लिए अब कहते हैं— १. प्रकृत प्रसंग के अनुसार प्रत्यभिज्ञा के स्वरूप के विषय में विवेचन करना चाहिए, और विश्व को प्रमेयरूप में प्रकाशित करना इस स्थल में उपयोगी नहीं दिखता इसी कारण 'विश्व' ऐसा कहा जाता है; क्योंकि विश्व को प्रमेयीकरण करने में प्रमेय पद से उत्तीर्ण होकर, अन्तःकरण में पूर्णभाव प्राप्त कर लेना ही सत्य प्रमातृत्ता को हृदयङ्गम किया हुआ माना जायेगा । इस विषय में स्पन्द शास्त्र भी कह रहा है— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ॥ किसी भी वस्तु-पदार्थ को देखने की उत्कट इच्छा का होना ही 'दिदृक्षा' कहा जाता है । इस देखनेवाली उत्कट इच्छा की दशा में अवस्थित होकर, जब साधक समस्त भाव-पदार्थों में अपने स्वरूप से व्याप्त होकर स्थित होता है तब अपने स्वभाव स्वरूप [ तत्त्व ] स्पन्द की अनुभूति कर लेता है । इस विषय में विशेष कहने की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती है ।