ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयः आगमाधिकारः अथ तृतीये आगमाधिकारे तत्त्वनिरूपणाख्यं प्रथममाह्निकम् यं प्राप्य सर्वागमसिन्धुसङ्घः पूर्णत्वमभ्येति कृतार्थतां च । तं नौम्यहं शांभवतत्त्वचिन्तारत्नौघसारं परमागमब्धिम् ॥ श्रीमत्सदाशिवोदारप्रारम्भं वसुधान्तकम् । यदन्तर्भाति तत्त्वानां चक्रं तं संस्तुमः शिवम् ॥ एवमधिकारद्वयेन ज्ञानक्रियास्वरूपं वितत्य निर्णीतम्, अथेद्ं वक्तव्यं क्रिया नाम विश्वपदार्थावभासनलक्षणा,—इत्युक्तं समनन्तरमेव, के च ते विश्वे पदार्थाः,—इति । तत्राभास- रूपा एव जडचेतनलक्षणाः पदार्थास्ते च कियता रूपेण संगृह्यन्ते, नहि प्रत्यक्षं मायाप्रमातुः सर्वत्र समस्त आगमशास्त्ररूपो नदी समूह जिसको प्राप्त होकर पूर्णता और कृतार्थता का अनुभव करने लगता है उस शाम्भवतत्त्व चिन्तामणिरत्नों के सारभूत परम आगमरूप सागर महेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ । जिसके गर्भ में सदाशिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त तत्त्वों का समुदाय झलकता है, उस परमशिव की हम स्तुति करते हैं । इस प्रकार ज्ञानाधिकार और क्रियाधिकार इन दोनों के द्वारा ज्ञान का स्वरूप तथा क्रिया का स्वरूप विस्तारपूर्वक बता दिया गया । अब यह कहना होगा कि क्रिया विश्व के समस्त पदार्थ- तत्त्व को अवभासित करनेवाली होती है, इसलिए यह ‘विश्ववैचित्र्यचित्रस्य समभित्तिलोपमे’ इत्यादि (२।३।१५) में कह भी दिया गया है । वे पदार्थतत्त्व कितने और कौन-कौन से हैं, ये आभास- रूप जड-चेतनलक्षणवाले पदार्थ हैं वे किस रूप से संगृहीत किये गये हैं, माया प्रमाता देहादि अहंभाववाले होने के कारण सर्वत्र प्रत्यक्षरूप में ग्रहण नहीं कर सकते हैं अर्थात् प्रत्यक्ष का विषय १. यान्युक्तानि पुराण्यमूनि विविधैर्भेदैर्देहेष्वन्वितं रूपं भाति परप्रकाशनिबिडं देवः स एकः शिवः । तत्स्वातन्र्त्त्यवशात्पुनः शिवपदाद्भेदे विभाते परं यद्रूपं बहुधानुगामि तदिदं तत्त्वं विभोः शासने ॥ जिसके भीतर तृण से लेकर ब्रह्मपर्यन्त तत्त्वसमूह भासित होता है। यह सारा का सारा संसार ही परम शिव का प्रकाश है। इस प्रकार विविध भेदों से युक्त प्राणियों के अनेक शरीर कहे हुए हैं, उन सबों में जो सर्वोत्तम निबिड घनरूप पर प्रकाश भासित होता है उसी के [ परम स्वातन्त्र्य के कारण ] उस परम शिव तत्त्व से भेद दिखने पर भी उन सबों में भी जो सामान्यरूप से तत्त्व भासता है । वही परम शिव तत्त्व है यही प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का सिद्धान्त है ।