ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
२६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-१ क्रमते, अनुमानमप्येवं, नहि यद्यदस्ति तत्र तत्र लिङ्गव्याप्त्यादिग्रहणसंभवः । आगमस्त्वपरि- च्छिन्नप्रकाशात्मकमाहेश्वरविमर्शपरमार्थः किं न पश्येत्, —इति तदनुसारेण पदार्थनिर्णयं विश्वं- प्रमेयीकरणप्रतिलब्धतद्विश्वोत्तीर्णप्रमातृपदहृदयङ्गमीकरणाभिप्रायेण निरूपयितुमाचार्य आगमा- धिकारं तृतीयमारभते । तत्र श्लोकैकादशकेन 'एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः' इत्यादिना 'स्थूलसूक्ष्मत्वभेदतः' इत्यन्तेनागमसिद्धं शिवादिधरणोपान्तमेकैकाभासरूपतात्मकं दर्शनान्तरे 'सामान्यम्' इति यद्वयव- हृतं, यस्य सामानाधिकरण्ययोगादनन्तस्वलक्षणावभासनव्यूहविशेषपूर्वकंः समस्तोऽयं शरीर- भुवनादिविभवः, तं परमेश्वरागमसिद्धं युक्त्याप्यनुगतं प्रतीकस्तस्तत्त्वग्रामं दर्शयति, — इत्याह्निक- तात्पर्यम् । तत्राधिकारसंगतिं योजयन् पूर्वपक्षप्रतिक्षेपं चोपसंहरन् शिवतत्त्वस्वरूपमेव दर्शयितुमाह— नहीं है और न तो अनुमान प्रमाण से भी उसका ग्रहण हो सकता है, जो जो वस्तु है उस उसमें हेतु और व्याप्तिज्ञान संभव नहीं हो सकता है। किन्तु आगमशास्त्र तो अपरिच्छन्न प्रकाशात्मक, माहेश्वर विमर्शरूप, परमार्थ होने के कारण क्या नहीं देख लेता है ? इसलिए आगम के अनुसार पदार्थों के निर्णय करने के लिए आचार्य आगमाधिकार नामक तृतीय अधिकार प्रारम्भ करते हैं; क्योंकि सभी पदार्थों का ज्ञान हो जाने पर ही पदार्थों के ऊपर जो प्रमातृपद है उसका हृदयङ्गम होना संभव है । इस आह्निक में ग्यारह श्लोकों के द्वारा 'एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः' यहाँ से लेकर 'स्थूलसूक्ष्मत्व- भेदतः' वहाँ तक आगमशास्त्र में सिद्ध पदार्थतत्त्व जो शिव आदि से लेकर पृथिवी पर्यन्त हैं, वे सब के सब आभासरूप से ही मात्र झलकते हैं जब कि अन्य दर्शन में इसे 'सामान्यम्' ऐसा कह कर व्यवहार किया गया है; जिसका यह सारा का सारा शरीर, भुवनादि ऐश्वर्य-वैभव माना जाता है । जो कि सामानाधिकरण्य [ घट-पटादि ] रूपों में असंख्य प्रकार से विशेषता को लिए हुए स्वलक्षणसमुदाय के रूप में अवभासित होते हैं, परमेश्वर आगम से सिद्ध होता हुआ भी युक्ति के द्वारा अनुगत होता है, प्रतीकरूप से उस तत्त्वसमूह को दिखाते हैं, इस आह्निक का इतना ही तात्पर्य है । अधिकार सङ्गति को जोड़ते हुए पूर्वपक्ष के द्वारा दिये गये आक्षेप का निराकरण और उपसंहार करते हुए शिवतत्त्व के स्वरूप को दिखाने के लिए अब कहते हैं— १. प्रकृत प्रसंग के अनुसार प्रत्यभिज्ञा के स्वरूप के विषय में विवेचन करना चाहिए, और विश्व को प्रमेयरूप में प्रकाशित करना इस स्थल में उपयोगी नहीं दिखता इसी कारण 'विश्व' ऐसा कहा जाता है; क्योंकि विश्व को प्रमेयीकरण करने में प्रमेय पद से उत्तीर्ण होकर, अन्तःकरण में पूर्णभाव प्राप्त कर लेना ही सत्य प्रमातृत्ता को हृदयङ्गम किया हुआ माना जायेगा । इस विषय में स्पन्द शास्त्र भी कह रहा है— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ॥ किसी भी वस्तु-पदार्थ को देखने की उत्कट इच्छा का होना ही 'दिदृक्षा' कहा जाता है । इस देखनेवाली उत्कट इच्छा की दशा में अवस्थित होकर, जब साधक समस्त भाव-पदार्थों में अपने स्वरूप से व्याप्त होकर स्थित होता है तब अपने स्वभाव स्वरूप [ तत्त्व ] स्पन्द की अनुभूति कर लेता है । इस विषय में विशेष कहने की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती है ।
अ.-३, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६३ एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः क्रिया कालक्रमानुगा । मातुरेव तदन्योन्यावियुक्ते ज्ञानकर्मणी ॥ १ ॥ एवमिति, यतः परदर्शनोक्तः कार्यकारणभावो जडरूपप्रतिष्ठो न कथंचिदुपपन्नः, किन्तु चिद्रूप एवान्तर्बहिरात्मना प्रकाशपरमार्थेनापि वपुषा तदाभासरूपेण वर्तमानः कालक्रममाक्षिपन् क्रियाभिधीयते तस्य प्रमातुरेव ज्ञानशक्तिवपुषो धर्मः; 'तत्' इति तस्मादवियुक्तं ज्ञानं क्रिया च । इस प्रकार बाह्य और आन्तरवृत्ति ही क्रमिक अवभास [ कालक्रम ] का आक्षेप करती हुई क्रिया कही गयी है । इसीलिए परस्पर अवियुक्त ज्ञान और क्रिया ज्ञान-शक्तिवपु प्रमाता का धर्म माना जाता है ॥ १ ॥ 'एवमिति' यह जो श्लोक में दिया गया है इससे द्योतित होता है कि अन्य दर्शन में कहा गया कार्य-कारणभाव जडरूप होने के कारण किसी तरह भी उपपन्न नहीं होता, किन्तु भीतर और बाहर में चिद्रूप ही सर्वत्र व्याप्त है, परमार्थ प्रकाश उस धर्मिरूप आभास से विद्यमान रहता है जो क्रमिक अवभास कालक्रम का आक्षेप करता हुआ क्रियारूप बन जाता है अर्थात् उसीको क्रिया कहा जाता है उस ज्ञान-शक्तिवपु प्रमाता का ही धर्म है, 'तत्' शब्द जो श्लोक में दिया है यह बताता है कि इसलिए ज्ञान और क्रिया ये दोनों परस्पर एक दूसरे अविभक्त मिले हुए रहते हैं । १. परम शिव ही दूसरों को प्रकाशित करनेवाले होते हैं उनकी उन्मुखरूपता इच्छा ही क्रिया शुद्ध विद्या विमर्शमयी है जब वे शिव ज्ञान मात्र से, बिना किसी अन्तर किये भी विश्व का अपने आप में ही अपने से निर्माण कर सर्जन करते हैं तब अन्तर भाव के उद्रेक से ज्ञान-शक्तिरूप सदाशिव में अवस्थित हो जाते हैं, किन्तु जब बाहर में सृष्टि की रचना की प्रधानता से सर्जन करते हैं तब बहिर्भाव के उद्रेक से क्रिया-शक्तिरूप ईश्वर में क्रिया-शक्तिरूप से अवस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार विवेचन किया भी गया है— उत्तरोत्तरमवग्रहग्रहैः पश्यतोऽप्यधरमुत्तरस्य यः । साधनस्य निजभावनामहो हेतुरत्र भवतो मरीचयः ॥ जो उत्तरोत्तर पृथक्ता को द्योतन करनेवाली अवग्रह-शक्ति के द्वारा ऊपर नीचे देखनेवाले साधक की अपनी भावना से ग्रहण करने पर आपकी रश्मियों का ही इसमें कारण दिखता है । इस प्रकार आगम शास्त्र में भी इस पर उल्लेख किया गया है— तस्मिन्नैश्वरे तत्त्वे संस्थितः परमेश्वरः । शिवेच्छानुमता सर्वे जगतः प्रभविष्णवः ॥ परमेश्वर उसी ईश्वर तत्त्व में अवस्थित रहते हैं । शिव की इच्छा-शक्ति से ही अनुमत होकर वे सभी जगत् के उत्पादक बनते हैं । २. ज्ञान और क्रिया का सम्बन्ध अवियुक्त रहता है; क्योंकि वह आन्तर तत्त्व का प्रकाश करनेवाली होने से ज्ञान-शक्ति कहलाती है और बाह्यरूप से पदार्थों का क्रमशः विस्तार करती है इसलिए क्रिया-शक्ति है इस विषय में आगम शास्त्र का भी प्रमाण है—
२६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-२ ज्ञानं विमर्शानुप्राणितं, विमर्श एव च क्रियेति । न च ज्ञानशक्तिविहीनस्य क्रियायोगः,—इति तदेतदवियुक्तज्ञानक्रियारूपं, क्रियाद्वारेण सकलतत्त्वराशीगतसृष्टिसंहारशतप्रतिबिम्बनसहिष्णु यत् तदुपदेशभावनादिषु तथाभासमानमनाभासरूपमपि वस्तुतः, शिवतत्त्वम्,--इत्युक्तं भवति ॥ १ ॥ नन्वेवंभूतं शिवतत्त्वं चेत् तर्हि ततोऽनतिरिच्यमानमिदं विश्वम्,—इति किमन्यत् तत्त्वं स्यात् । एकवित्तत्त्वविश्रान्तौ च तत्त्वानां कथं क्रमो भवेत्, देशकालाभेदात् ? एवमेवैतत्— किन्त्वान्तरदशोद्रेकात्सादाख्यं तत्त्वमादितः । बहिर्भावपरत्वे तु परतः पारमेश्वरम् ॥ २ ॥ यद्यप्येकमेव शिवतत्त्वं तथापि तदीयमेव स्वातन्त्र्यं स्वात्मनि स्वरूपभेदं तावत्प्रतिबिम्ब- कल्पतया दर्शयति । स्वरूपवैचित्र्यमयो हि असौ; ततश्चान्तरी ज्ञानरूपा या दशा तस्या उद्रेका- ज्ञान तो विमर्श से अनुप्राणित अर्थात् जीवित है और विमर्श ही क्रिया है । इससे सिद्ध होता है कि ज्ञान-शक्ति से रहित क्रियायोग नहीं बन सकता है, ज्ञान और क्रियारूप का अवियुक्तरूप से बना रहना ही सभी पदार्थों का पारमार्थिकवपु कहा जाता है, जो क्रिया द्वारा सम्पूर्ण तत्त्वराशि से होनेवाले सृष्टि-संहार सैकड़ों प्रतिबिम्ब का सहिष्णु है वही उपदेश भावनादि में तथा भासमान- रूप भी वस्तुतः शिव तत्त्व ही है—ऐसा कहा है ॥ १ ॥ 'ननु' कह कर शङ्का की जाती है कि यदि ऊपर में कहा गया है—ऐसा ही शिवतत्त्व है तब तो यह सारा का सारा विश्व शिवतत्त्व से भिन्न ही नहीं हुआ, अपितु अभिन्नरूप से इस तत्त्व में रह गया, इससे भिन्न अन्य तत्त्व क्या होगा ? एक चिद्रूप तत्त्व में विश्रान्ति हो जाने पर पदार्थों का क्रम कैसे बैठेगा ? क्योंकि इसमें तो देश-काल का अभेद हो जाता है, यह तो ऐसा ही दिखायो देता है— किन्तु आन्तर अवस्था के उद्रेक होने से पूर्व अवस्था में सदाशिव तत्त्व रहता है । बाहर में पदार्थ तत्त्वों का विस्तार होने पर तो ईश्वर तत्त्व कहलाता है ॥ २ ॥ यद्यपि शिवतत्त्व एक ही रहता है तथापि भिन्न-भिन्न विशेषताएँ लिये हुए, उन्हीं की स्वातन्त्र्य-शक्ति अपने आत्मस्वरूप में स्वरूपों का भेद संपादन करती हुई प्रतिबिम्ब के समान उन उन रूपों के भेदों को अभिव्यक्त करती है । जिसमें स्वरूप का वैचित्र्यभाव झलकता हो, वही देश-काल क्रम कहलाता है; क्योंकि मूर्त्ति क्रिया का वैचित्र्यभाववाला तो यह है; इसलिए भीतरी ज्ञानरूपा जो दशा है उस दशा के उद्रेक होने पर सादाख्य तत्त्व रहता है अर्थात् सदाशिव एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् । ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ॥ एवं भूतमिदं वस्तु भवत्विति यदा पुनः । जाता तदेव तत्तत्कुर्वत्यत्र क्रियोच्यते ॥ इस प्रकार यह ज्ञेय पदार्थ है, इससे भिन्न किसी रूप में नहीं भासित होता, इस प्रकार निश्चित बोध हो जाता है। जगत् का ज्ञान कराती है इसलिए ज्ञान-शक्ति कहलाती है । यह वस्तु ऐसी ही स्वरूपवाली है और जब पुनः प्रकाशित हो जाती है तब वही उस उस प्रकार से क्रिया बन जाती है ।
अ.-३, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २६५ भासने 'सादाख्यं' सदाख्यायां भवम्; यतः प्रभृति सैदिति प्रख्या, सदाख्यायाञ्च सदाशिवशब्द- रूपाया इदं वाच्यं तत्त्वम् । सृष्टिक्रमोपदेशादौ प्रथममुचितं तत्सादाख्यं तत्त्वम् । 'बहिर्भावस्य' क्रियाशक्तिमयस्य 'परत्वे' उद्रेक.भासे सति 'पारमेश्वरं' परमेश्वरशब्दवाच्यमीश्वरतत्त्वं नाम । ततश्च सादाख्यस्य पश्चादुचितावभासनम् । एतदुक्तं भवति-इह तस्य भावस्तत्त्वम्, - इति भिन्नानां वर्गाणां वर्गीकरणनिमित्तं यदेकमविभक्तं भाति तत्तत्त्वं, यथा गिरिवृक्षपुरप्रभृतीनां तत्त्व में होनेवाले भावतत्त्व को सादाख्य तत्त्व से कहा जाता है; क्योंकि इन सभी पदार्थों की सत्ता सदा प्रतिज्ञापन होती है इसी कारण वे सभी तत्त्व सदाशिव शब्द का वाच्य हो जाते हैं । इदन्ता के उन्मेष अवस्था में भी इनकी शिवरूपता सदा बनी रहती है, चाहे फिर स्फुट होकर बाहर में अभिव्यक्त हो गये हो इससे क्या होता है ? इसी कारण 'सदा' शब्द से कहा गया है । सृष्टि क्रम के उपदेशादि देने में प्रथम तत्त्व तो सदाशिव ही रहता है-ऐसा कहना युक्तियुक्त बैठता भी है । 'बहिर्भावस्य' इस वाक्य से द्योतित होता है कि 'इदम्' अंश क्रिया-शक्ति से युक्त होकर बाहर की ओर प्रस्फुट होता है; क्योंकि इसमें क्रिया-शक्ति की प्रधानता है-ऐसा अवभासन होने पर 'पारमेश्वरं' परमेश्वर शब्द का वाच्य ईश्वर तत्त्व कहलाता है अर्थात् बाहर में तत्त्व की अभिव्यक्ति होने पर ईश्वर तत्त्व प्रधान हो जाता है । इसलिए सदाशिव तत्त्व के बाद ठीक भासित होनेवाला ईश्वर तत्त्व है, यह कहा जाता है कि उसका भाव रहता है और उसका रहना ही तत्त्व माना जाता है, भिन्न-भिन्न वर्गों के वर्गीकरण में जो निमित्त है, जो कि एक ही में अवियुक्तरूप से मिला हुआ भासता है वस्तुतः उसीका नाम तत्त्व है । जैसा कि पर्वत, वृक्ष, नगर १. इदंभाव के प्रतिबोध करने की इच्छा सदाशिव तत्त्व व सादाख्य तत्त्व में रहती है । इस सदाशिव तत्त्व की अवस्था में इच्छा का प्राधान्य रहता है । इस अवस्था में 'अहम्' 'मैं हूँ' ऐसा प्रतिज्ञापन होता है इसीलिए यह सादाख्य तत्त्व कहा जाता है । सद् शब्द का अर्थ है होना तथा होने में इदंभाव की प्रतीति होती है इस अवस्था में 'अहम् इदम्' 'मैं यह हूँ' ऐसा निश्चित एक अनुभव हृदय में होता है किन्तु इदमंश अभी अस्फुट दशा में पड़ा हुआ है । 'अहम्' में इसकी प्रधानता बनी हुई है । सदाशिव में उन्मेष का अभाव है किन्तु निमेष अवस्थावाले सदाशिव तत्त्व है, इस विषय में कहा भी गया है कि 'ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः' किन्तु इदम् अंश को अपना ही अंश मानता है । प्रधानता तो अहम् की रहती है जैसे कुंभकार के मन में छोटे-बड़े आकार-प्रकारवाले अनेक प्रकार के मृत्पात्र निर्माण करते समय एक अस्फुट धुँधलो प्राथमिक अवस्था विशेष रहती है उसी प्रकार सदाशिव तत्त्व में भी विश्व अस्फुट अवस्था में अवस्थित रहता है । २. जिसका मतङ्ग संहिता में भी उल्लेख किया गया है- तत्त्वं यद्वस्तुरूपं स्यात्स्वधर्मप्रकटात्मकम् । तत्त्वं वस्तुपदं व्यक्तं स्फुटमाम्नायदर्शने ॥ यदच्युतं स्वकाद्वृत्तात्तत्तं चात्मवशं गतम् । ततमन्थेन नो तस्मात्तत्तत्त्वं तत्त्वसंततौ ॥ जो अपने धर्म को प्रकट करनेवाला पदार्थरूप तत्त्व है वही आम्नाय-वेद में प्रत्यक्ष स्फुटरूप से व्यक्त वस्तु तत्त्व कहलाता है । जो अपने वृत्त से च्युत नहीं होता है तथा अपने में प्रतिष्ठित भी है और किसी अन्य से प्रकाशित नहीं है, वही तत्त्वसंतति में तत्त्व कहलाता है । ३४
२६६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-२ नदीसरःसागरादीनां च पृथिवीरूपत्वमब्रूपत्वं चेति । ततश्च शुद्धचैतन्यवर्गो यो मन्त्रमहेश्वराख्यः, तस्य प्रथमसृष्टावस्माकमन्तःकरणैकवेद्यमिव ध्यामलप्रायमुन्मीलितमात्रचित्रकल्पं यद्भावचक्रं, संहारे च ध्वंसोन्मुखतया तथाभूतमेव चकास्ति प्रतिबिम्बप्रायतया, तस्य चैतन्यवर्गस्य तादृशि भावराशौ तथाप्रथनं नाम यच्चिद्विशेषत्वं तत्सदाशिवतत्त्वम् । मन्त्रेश्वरादिरूपस्य तु चैतन्यराशेः स्फुटीभूतमस्मद्बहिष्करणसरणिसंप्राप्तभाववर्गप्रतिमं विश्वं प्रतिबिम्बतया भाति, तस्य तु तत् तथाप्रथनमेश्वरतत्त्वम् । यस्तु सदाशिवभट्टारक ईश्वरभट्टारकश्च ध्येयोपास्यादिरूपतया स इत्यादिकों का तथा सरिता, सरोवर, सागर आदि की पृथिवीरूपता और जलरूपता होना । इसलिए जो शुद्ध चैतन्यवर्ग मन्त्र महेश्वर है, उसकी पहले-पहल सृष्टि हम लोगों के अन्तःकरण द्वारा वेद्य के जैसी अस्फुटरूप में, चित्रकार के मन में चित्र खींचने के पूर्व रूपरेखा धुँधली-सी रहती है, उसी प्रकार सदाशिव तत्त्व में ध्यामल अर्थात् हल्की सी धुँधली रूपरेखा अव्यक्तरूप से रहती है । संहार काल में भी पदार्थों की ध्वंस उन्मुखता हो जाने से उसी प्रकार प्रायः प्रतिबिम्ब- रूप से भासते हैं उस चैतन्यवर्ग का वैसा पदार्थ राशि में भासित होनारूप जो वैशिष्ट्य है वही सदाशिव तत्त्व है । किन्तु मन्त्रेश्वररूप चैतन्यराशि का स्फुट दशा में हम लोगों की बाहरी इन्द्रियों के मार्ग से संप्राप्त जो पदार्थसमूह के सदृश जगत् है उसमें प्रतिबिम्बरूप से भासता है उसका वैसा फैलाव होना ही तो ईश्वर तत्त्व कहलाता है । किन्तु सदाशिवभट्टारक और ईश्वरभट्टारक तो ध्येय-उपास्यादिरूपता से प्रकाशित होते हैं । ब्रह्मा, विष्णु के तुल्य सदाशिव भट्टारक एवं ईश्वरभट्टारक को भिन्न भिन्न ही समझना चाहिए । इनमें नाम की समानता को लेकर भ्रमित नहीं होना होगा । [ सदाशिव भट्टारक और ईश्वर भट्टारक अर्थात् भट्टारक, भट्ट और भट्टार ये शब्द परस्पर एकार्थक होते हैं, भट् धातु से तन् प्रत्यय होकर भट्ट शब्द निष्पन्न हुआ है । भ्वादिगण में पठित भट् धातु का पोषण अर्थ होता है [ भट् भृतौ ] । भट्ट का अर्थ है पोषण करनेवाला स्वामी अर्थात् ईश्वर । इन शब्दों का प्रयोग प्रायः श्रेष्ठ लोगों के लिए अथवा ब्राह्मण और राजा-महाराजाओं के लिए आदर देने के रूप में आते हैं यहाँ प्रकृत प्रसङ्ग में भट्टारक शब्द अपने से जो पूज्य है उसके लिए लगाया गया है और सदाशिव सब के पूज्य एवं स्वामी भी है । कुछ लोगों का कहना १. संहार दशा में तो प्रायः जैसे चित्रकार के मन में प्रदर्शित चित्र की प्रथम एक धुँधली सी रूपरेखा रहती है, अनन्तर उसका अधिक स्पष्टरूप उभरने लगता है और रंग देने पर इससे भी अधिक चित्र अभिव्यक्त होने लगता है, उसी प्रकार सदाशिव दशा में भी सारा का सारा विश्व अस्फुट दशा में अवस्थित रहता है और ईश्वररूप उन्मेष अवस्था में विकसित हो जाता है । जैसा कि सरोवर का कमल । 'अहम् इदम्' यह सदाशिव का प्रत्यवमर्श है तथा ईश्वर का प्रत्यवमर्श है 'इदम् अहम्' है । २. इस विषय में आगम भी कहता है— तस्मिन्नेवेश्वरे तत्त्वे संस्थितः परमेश्वरः । शिवेच्छानुगताः सर्वे जगतः प्रभविष्णवः ॥ उसी ईश्वर तत्त्व में बैठा हुआ परमेश्वर है । शिव की इच्छा-शक्ति से अनुगत होकर जगत् के उत्पादक, पालक इत्यादि होते हैं ।
अ.-३, आ.-१, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६७ ब्रह्मविष्णुतुल्यः पृथगेव मन्तव्यो न तु नामसारूप्याद्भ्रमितव्यम् । यदाहुरेके 'ब्रह्मविष्णुरुद्रा अपि तत्त्वमध्ये किं न गणिताः' इति ॥ २ ॥ नामधेयान्तरमप्यत्र तत्त्वद्वये दर्शयति— ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः । यस्योन्मेषादुदयो जगतः, —इत्यत्र ईश्वरतत्त्वमेवोन्मेषशब्देनोक्तम् । विश्वस्य हि स्फुटत्वं बाह्यत्वमुन्मेषणं, निमेषणं त्वस्फुटत्वापादनमन्तरूपतोद्रेचनम्, —इति निमेषः सदाशिवतत्त्वं यतो जगतः प्रलयः, —इति शुद्धोऽयं स्पन्दः परमेश्वरस्याचलस्याप्यप्ररूढरूपान्तरापत्तिलक्षणः किञ्चिच्चलनात्मकतया स्फुटैकरूपत्वात् । परमेश्वरस्य हि परमार्थत एताः शक्तयो यस्तत्त्वग्रामः, है कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को भी इन तत्त्वों के बीच में क्यों नहीं गिन लेते हो ? ॥ २ ॥ दूसरे नाम भी इन्हीं दोनों तत्त्वों में गतार्थ होते हैं— बाहर का उन्मेष ईश्वरतत्त्व है और भीतर का निमेष सदाशिवतत्त्व है । जिसके उन्मेष से इस जगत् की उत्पत्ति होती है । इस स्थल में ईश्वरतत्त्व को ही उन्मेष शब्द से कहा गया है; क्योंकि विश्व का बाहर में स्फुटरूप से व्यक्त होना ही उन्मेष माना जाता है । एवं अस्फुटरूप से अन्त.करण में सम्मिलित कर लेने का नाम ही निमेष है, निमेष ही सदा- शिव तत्त्व कहलाता है जिससे जगत् का प्रलय होता है । इस प्रकार यह शुद्ध स्पन्द है जो अचल परमेश्वर का दूसरा रूप न होना स्वरूप माना जाता है किञ्चित् चलनात्मकरूप से स्फुरित होने १. गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभा सततं स्युर्जंस्यापरिपन्थिनः ॥ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण इन तीनों गुणों की साम्यावस्था प्रकृतितत्त्व हैं इससे निकले हुए नील-सुखादि-गुण-स्पन्दों अनन्त प्रवाह सामान्य-स्पन्द पर ही आश्रित रहते हैं ऐसी परिस्थिति में वे निरन्तररूप में प्रवाहमान होते रहने पर भी उस योगी के लिए प्रतिद्वन्द्वी नहीं बन सकता है; क्योंकि चिति-शक्ति को हृदयंगम करनेवाले के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाता है चिद्रूप का आवरण न कोई है और न कोई हो ही सकता है । प्रतिष्ठित एवं अप्रतिष्ठितरूप से स्पन्द दो प्रकार के होते हैं । प्रतिष्ठित स्पन्द सारे विश्व वैचित्र्य का एकमात्र कारण है एवं विराट्-चेतना होने के कारण, नामरूपात्मक सारे पदार्थों के भी मूल कारण हैं । अप्रतिष्ठित स्पन्दन माया तत्त्व से लेकर पृथिवी तत्त्व तक अनेक भेदों से मिला हुआ रहता है यद्यपि अनेक भेद-उपभेद से युक्त होते हुए भी एकत्व में ही अवस्थित रहते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि विश्व का कोई भी पदार्थ, चाहे प्रस्तर खण्ड ही क्यों न हो, वस्तुतः उसका सम्बन्ध विराट् स्वरूप के प्रवाह से ही रहता है, शैवाद्वैत दर्शन में स्पन्दों की प्रवाहमानता की प्रक्रिया इस प्रकार है— तेन आहुः किल संवित् प्राक् प्राणे परिणता......। बाहर में उन्मुख होकर, सर्वप्रथम, प्राण अर्थात् सूक्ष्म प्राणना अर्थात् विश्वचेतनता के रूप में परिणत हो जाती है । संवित् प्रकाश स्वरूपवाली तो है ही परन्तु इसका विमर्शरूप भी रहता है । शास्त्रीय भाषा में इस विमर्शमय प्रकाश को आनन्द-शक्ति से कहा गया है । जैसा कि—आनन्द शक्ति सैवोक्ता यतो विश्वं विसृज्यते । संविन्मात्रं हि यच्छुद्धं प्रकाश परमार्थ कम् । तन्मेयमात्मनः प्रोज्झ्य विविक्तं भासते नभः ॥ ( तं० ) संवित् वेद्य-विषय को अपने से भिन्न कर गगन सदृश स्वयं अवस्थित रहती है ।
२६८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-३ काचित् तु शक्तिरन्यबहुतरशक्तिक्रोडीकारं कुर्वती निकटत्वादुपास्या घटस्येव घटत्वात्मिका, काचिदन्यापेक्षिणी स्वरूपमात्रनिष्ठा दूरा घटस्येव सत्तात्मिका । एवं निमेषोन्मेषशक्ती एव सदाशिवेश्वरौ तयोस्त्वधिष्ठातृदेवते अपि तथानामे । अथ तदधिष्ठातृदेवताद्वयगतं करणं विद्यातत्त्वमाह— सामानाधिकरण्यं च सद्विद्याहमिदन्धियोः ॥ ३ ॥ प्रकाशस्य यदात्ममात्रविश्रान्तमनन्योन्मुखस्वात्मप्रकाशताविश्रान्तिलक्षणो विमर्शः सोऽ'हम्' इति उच्यते; यस्त्वन्योन्मुखः स 'इदम्' इति स च स्वप्रकाशमात्रे पुनरनन्योन्मुखरूपे विश्राम्यति परमार्थतः । तत्राद्ये विमर्शोऽपि शिवतत्त्वं, द्वितीये विद्येशता, मध्यमे तु रूपे 'अहमिदम्' इति समधृततुलापुटन्यायेन यो विमर्शः स सदाशिवनाथ ईश्वरभट्टारके च, इदंभावस्य तु ध्यामला- ध्यामलतातकृतो विशेषः । ये एते 'अहम्' इति 'इदम् इति धियौ तयोर्मायाप्रमातरि पृथगधिकरण- त्वम् 'अहम्' इति ग्राहके 'इदम्' इति च ग्राह्ये, तन्निरासेनै कस्मिन्नेवाधिकरणे यत्संगमनं संबन्ध- के कारण । परमार्थतः जितने भी तत्त्वसमूह हैं वे सब के सब परमेश्वर की ही सारी शक्तियाँ हैं । कोई शक्ति तो दूसरी अनेकों शक्तियों को अपने में सम्मिलित करके निकटवर्ती होने के कारण उपासना करने योग्य बन जाती है । जैसे घट की घटत्वात्मिका-शक्ति । कोई तो किसी अन्य की अपेक्षा रखती हुई केवल स्वरूप में ही रहनेवाली होती है जबकि अत्यन्त दूर में रहने के कारण घट की सत्तारूप शक्ति के समान होती है । इस प्रकार निमेषरूप और उन्मेषरूप ये ही दो शक्तियाँ सदाशिव और ईश्वर हैं उनकी अधिष्ठातृदेवता-शक्ति भी दो नाम रूपवाली कहलाती है । अब उसके अधिष्ठातृ देवता दोनों के कारण विद्यातत्त्व कहते हैं— 'अहम् और इदम्' इन दोनों प्रकार की बुद्धियों का सामानाधिकरण्य सद्विद्या तत्त्व में होता है ॥ ३ ॥ प्रकाश का अपने स्वरूप में केवल विश्राम लेना और किसी अन्य की ओर उन्मुखता न रखता हुआ अपने स्वात्मरूप मात्र में विश्रान्ति लेनेवाला स्वभाव विमर्श का है उसे 'अहम्' विमर्श से कहा जाता है; किन्तु जो किसी अन्य की अपेक्षा रखता है वह तो 'इदम्' है, परमार्थतः उसकी भी विश्रान्ति अनन्योन्मुख स्वरूपवाले स्वप्रकाश मात्र में हो जाती है । प्रथम 'अहम्' विमर्श में शिवतत्त्व रहता है, द्वितीय में विद्येश्वरता, किन्तु मध्यमरूप में तो 'अहमिदम्' 'सम- धृततुलापुटन्यायेन' विमर्श होता है, वह सदाशिव भट्टारक और ईश्वर भट्टारक इन दोनों में रहते हैं, इदम् अंश का तो कुछ ध्यामल [ धुँधला ] और अध्यामल रूपता को लिए हुए वैशिष्ट्य रहता है । जो 'अहमिदम्' ये दो तत्त्व हैं इनमें अहम् अंश एक तत्त्व है, दूसरा इदम् अंश है { इन दोनों तत्त्वों की बुद्धि माया प्रमाता में भिन्न-भिन्न अधिकरणता को रखती हुई दो भागों में -विभक्त हो जाती है, 'अहम्' अंश का ग्राहक [ प्रमाता ] में विमर्श होता है और 'इदम्' अंश का १. जब मध्यमकोटि में विश्रान्ति लेते हैं तब 'अहमिदम्' ग्राहक [ प्रमाता ] में ग्राह्य [ प्रमेय ] का प्रक्षेप होता है इसलिए ध्यामल ग्राह्य अंश का विमर्श सदाशिवनाथ में 'अहमिदम्' इस रूप से होता है, 'इदमहम्' इस का ग्राह्य [ प्रमेय ] में प्रस्फुटित होने पर 'अहम्' इस अंश के प्रक्षेप से सामानाधिकरण्य विमर्श ईश्वरभट्टारक में होता है ।
अ.-३, आ.-१, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६९ स्वरूपप्रथनं तत् सती शुद्धा विद्या; अतोऽशुद्धविद्यातो माया प्रमातृगताया अन्यैव । तत्र यदा 'अहम्' इत्यस्य यदधिकरणं चिन्मात्ररूपं तत्रैवेदमंशमुल्लासयति तदा तस्यास्फुटत्वात् सदाशिवता 'अहमिदम्' इति । 'इदमहम्' इति तु इदमित्यंशे स्फुटीभूतेऽधिकरणे यदाहमंशविमर्शं निषिञ्चति तदेश्वरता, — इति विभागः ॥ ३ ॥ ननु कस्मादियं शुद्धा विद्या ? इत्याह— इदं भावोपपन्नानां वेद्यभूमिमुपेयुषाम् । भावानां बोधसारत्वाद्यथावस्तवलोकनात् ॥ ४ ॥ अवलोकनं प्रथनं वेदनं विद्या, यथावस्तुत्वं वस्त्वनुसारित्वं च; तस्याः शुद्धिरविपरीतता । वेद्यदशां चोपगतवतामङ्गीकृतवताम्, अत एवेदमित्येवंभूतेनोचितेन परामर्शेनोपपन्नानां परामृश्य- मानानां भावानां 'बोध' एव प्रकाशात्मा साररूपं वस्तु, प्रकाशश्चानन्योन्मुखविमर्शात्माहमिति । तदेषां यदेव पारमार्थिकं रूपं तत्रैव प्ररूढत्वात् अहमित्यस्य शुद्धवेदनरूपत्वम् ॥ ४ ॥ ग्राह्य [ प्रमेय ] में विमर्श होता है । इद दोनों तत्त्वों के द्वित्व को छोड़ देने पर एक ही अधिकरण [ स्व-स्वरूपाख्य ] में जिसका सम्बन्ध स्वरूप फैलता है—ऐसी अवस्था में विद्यातत्त्व की प्रधानता रहती है; इसलिए माया प्रमाता में रहनेवाली अशुद्ध विद्या से तो इस तत्त्व को सर्वथा भिन्न ही समझना चाहिए । शुद्धविद्या में जब 'अहम्' इस अंश का, जो अधिकरण चिन्मात्ररूप है उसीमें 'इदम्' इस अंश को उल्लसित करता है तब उसको अस्फुटता रहने के कारण सदाशिवता, 'अहमिदम्' यह विमर्श होता है । 'इदमहम्' इसरूप में तो इदन्तांश के प्रस्फुटित होने पर जब अहम् अंश के विमर्श को सींचता है तब ईश्वरता होती है, 'इदमहम्' इस अवस्था में ईश्वर तत्त्व रहता है, इन दोनों तत्त्वों का यही विभाग है ॥ ३ ॥ अब शङ्का होती है कि यह कैसे शुद्ध विद्या कही जाती है ? इस आशङ्का का समाधान करते हैं— इदन्ता परामर्श से उपपन्न वेद्यदशा को स्वीकार किये गये परामृश्यमान पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का बोध-ज्ञान हो जाने के कारण शुद्ध विद्या कहलाती है ॥ ४ ॥ वस्तु के अनुसार अवलोकन करना, प्रथन करना और ज्ञान करना ही विद्या कहा जाता है, जैसी वस्तु है उसके अनुरूप उसे जान लेना, उससे विपरीत अर्थ में न समझना ही विद्यातत्त्व है । वेद्यभूमि को प्राप्त हुए अर्थात् अङ्गीकार किये गये, अत एव इदंभाव के समुचित प्रत्यवमर्श से उपपन्न परामृश्यमान पदार्थों का 'बोध' ज्ञान ही प्रकाश स्वरूप वस्तुतत्त्व है, वह प्रकाश ही किसी अन्य की अपेक्षा न रखनेवाला विमर्शात्मा 'अहम्' कहलाता है । जो इनका पारमार्थिकरूप है उसी में बढ़ जाने के कारण 'अहम्' इस अंश की शुद्ध संवेदनरूपता मानी जाती है ॥ ४ ॥ १. 'अहम् और इदम्' इन दोनों तत्त्वों का परामर्श अर्थात् प्रत्यवमर्श शुद्धविद्या में एक समानरूप से होता है । यथा 'समधृततुलापुटन्यायेन' जैसे तराजू के दोनों पलड़े बराबर रहते हैं । इस में क्रिया-शक्ति की प्रधानता रहती है और इस अवस्था में अहम् एवं इदम् दोनों का विमर्श इस तरह समानरूप से अभि- व्यक्त होता है कि यद्यपि इस समय में भी अहम् और इदम् दोनों एक समान हैं फिर भी दोनों की
२७० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-५ अधिष्ठातृरूपाद्देवताद्वयात् तत्त्वद्वयं विभक्तम्,—इत्येतद्भङ्ग्या प्रतिपादयत्यागमव्यव- हारेण— अत्रापरत्वं भावानामनात्मत्वेन भासनात् । परताहन्तयाच्छादात्परापरदशा हि सा ॥ ५ ॥ परत्वं पूर्णत्वमनन्यापेक्षाहमिति, ‘अपरत्वम्’ अपूर्णतान्यापेक्षेदमिति; अत्र च तत्त्वद्वये भावानां ध्यामलाध्यामलरूपाणामुभयांशस्पर्शात् परापरत्वमिति । वेद्यभावनिष्ठा दशा तत्त्वस्वरूपा तदवभासयितृमन्त्रेश्वरादिशुद्धप्रमातृसंवेद्यवस्तुसारा । या तु तन्निष्ठसंवेदनदशा सा शुद्धा विद्या, तत्प्रमातृवर्गाधिष्ठातृत्वं श्रीसदाशिवेश्वरभट्टारकरूपता,—इति संक्षेपः ॥ ५ ॥ अधिष्ठातृरूप से दोनों देवताओं के दोनों तत्त्व विभाजित कर दिये गये, [ समान नामवाले होते हुए भी दो तत्त्वों में विभक्त रहना ही है ] अब आगम व्यवहार से प्रतिपादन करते हैं— अपरत्व पदार्थों को अनात्मकरूप से प्रकाशित करता है । परत्व अर्थात् प्रकृष्ट स्वतन्त्रदशा अहन्तारूप से आच्छादित करने के कारण परदशा और अपरदशा में भासित करता है ॥ ५ ॥ परत्व परिपूर्णभाव का नाम है, अपने आपको प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रखनेवाला अहम् परामर्श है; ‘अपरत्वम्’ परापेक्षी इदंभाव को अपरत्व कहते हैं, जिसको सदैव दूसरे की अपेक्षा रखनी पड़ती है, इसी कारण यह इदंभाव अपूर्ण रहता हुआ परापेक्षी सर्वदा बना रहता है । ये दोनों तत्त्व ध्यामल एवं अध्यामल रूपों में पदार्थों का उभय अंश स्पर्श करते हुए परत्व एवं अपरत्वरूप से रहते हैं; वेद्यभाव में रहनेवाली अवस्था यथार्थरूप से उन-उन पदार्थभावों को अवभासित करनेवाले मन्त्रेश्वर इत्यादि शुद्धप्रमाताओं के रूप में संवेद्य वस्तुसार अर्थात् अपरत्व है । किन्तु उन संवेदनरूप ज्ञानों में रहनेवाली अवस्था है वही शुद्धविद्या कहलाती है, उन-उन प्रमातृवर्ग के अधिष्ठातृदेव श्री सदाशिवभट्टारक और ईश्वर- भट्टारकरूप ही है । इसका इतना ही मात्र सार है ॥ ५ ॥ भिन्नता एक प्रकार से विशेषता को लेती हुई प्रतीत होती है । उस अवस्था में विमर्श भेदाभेदरूप से होता है । जैसा कि इदम् अंश का अहम् अंश से भेद प्रतीत होता है, तथापि अहम् अंश इदम् को अपना एक भाग मानता है । इससे अहम् और इदम् का सामानाधिकरण्य दिखायी देता है । शिवतत्त्व ‘अहम्’ इस अंश का प्रत्यवमर्श है; सदाशिव तत्त्व में ‘अहमिदम्’ प्रत्यवमर्श है; ईश्वरतत्त्व में ‘इदमहम्’ प्रत्यवमर्श रहता है । इन सभी में ‘अहम्’ शिवतत्त्व की प्रधानता मानी जाती है । शुद्धविद्या में दोनों तत्त्वों के प्रत्यवमर्श समानरूप से [ अहं च इदं च ] यह प्रत्यवमर्श भेददशा और अभेददशा के मध्य का है । इसी कारण इसे परदशा एव अपरदशा से भी कहते हैं । इसे शुद्धविद्या अथवा सद्विद्या के नाम से भी कहते हैं; क्योंकि ‘इदंभावोपन्नानां वेद्यभूमिपेयुषाम् । भावानां बोधसारत्वात्......’ ॥ इस अवस्था में समस्त वस्तुओं के वास्तविक सम्बन्ध का विमर्श हो जाता है और सब विमर्श भी मानसिक होता है, इसी कारण शुद्धध्वा कहा जाता है; क्योंकि इस अवस्था में परमेश्वर का स्वरूप स्वच्छ ही रहता है अर्थात् माया से धूसरित नहीं होता ।
अ.-३, आ.-१, का-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७१ एवमेकेषां मते 'अहम्' इत्याच्छादको यो भागः, तत्प्रथाप्रधाना शुद्धविद्या । अन्ये तु मन्यन्ते, —योऽसाविदंभाग आच्छादनीयस्तस्य यदवभासनं तत्प्रधाना शुद्धविद्या । अन्यथा हि स इदमंशः केन भास्यतां मायायास्तत्राभावात् भावे वा प्ररोहप्रसङ्गात्; अत एवैयं प्ररोहासहिष्णुं यत इदन्तां भासयति ततः शुद्धाभासनाच्च विद्येति । तत एवाप्ररूढमायाकल्पत्वात् महामायेयं श्रीरौरवादिगुरुभिरुपदिष्टा, तदेतदाह— भेदधीरेव भावेषु कर्तुर्बोधात्मनोऽपि या । मायाशक्त्येव सा विद्येत्यन्ये विद्येश्वरा यथा ॥ ६ ॥ मायाप्रमातरि शून्यादिरूपेऽप्यनुल्लसिते, चिन्मात्र एव प्रमातरि कर्तरि च सति चिदेक- रूपेष्वपि भावेषु यदचिद्रूपतया तदप्रकाशनलक्षणं स्वातन्त्र्यं सा शुद्धविद्या माया शक्त्या तुल्या, वेद्यभागे भेदप्रकाशनात् । न च मायैव, ग्राहकस्य चिन्मात्रभागे तावद्विपर्यासनात्, येन प्रकारेण विद्येश्वरा भगवन्तोऽनन्ताद्या वर्तन्ते । ते हि शुद्धचिन्मात्रगृहीताहंभावाः स्वतस्तु भिन्नं वेद्यं पश्यन्ति, यथा द्वैतवादिनामीश्वरः । एवं ग्राहकेऽशतश्चैतन्यरूपात् परमार्थरूपे ग्राह्यविपर्यासिनशक्तिः इस प्रकार कोई तो कहते हैं कि 'अहम्' यह जो आच्छादक भाग है, [ समस्त वेद्यपदार्थों को अपने में आत्मसात् कर लेना और दूसरों की आकांक्षा न रखने के कारण अद्वैतरूप से पूर्ण रहना ही आच्छादक 'अहम्' परामर्श है।] उसको विस्तार करनेवाली शुद्धविद्या कहलाती है । किन्तु इस विषय में दूसरे लोग भी कहते हैं—जो वह इदंभाग आच्छादनीय है उसका आभासन करना है जिसमें शुद्धविद्या का प्राधान्य माना जाता है। नहीं तो, शुद्धविद्या के बिना उस इदंभाग किससे आभासित होगा; क्योंकि मायाप्रमाता का उसमें रहना संभव नहीं है जिससे इदंभाग भासित हो सके । यदि वह रहता तो उसीका विस्तार होता इसलिए विस्तार को न सहनेवाली इदन्ता को जिससे आभासित करती है अर्थात् इदन्ता को प्रकाशित करनेवाली होने से और शुद्ध आभास से आभासित होनेवाली होने के कारण शुद्धविद्या है। इसलिए अप्ररूढ माया के सदृश होने के कारण इसको श्री रौरवादि गुरुजनों ने भी महामाया कहा है, इसको दिखाते हैं— बोधात्मा कर्ता को भेदबुद्धि हो पदार्थों में माया-शक्ति के जैसी भासती है। वही शुद्धविद्या है जैसे कुछ विद्येश्वर लोग [ विद्येश्वर-शक्ति ] शुद्धविद्या मानते हैं ॥ ६ ॥ माया प्रमाता में शून्यादिरूप प्रमाता अनुल्लसित होते हैं, चिन्मात्र ही प्रमाता के कर्ता रहने पर चिद्रूप के साथ पदार्थों की एकता भी हो जाती है जिसका अचिद्रूप से प्रकाशन नहीं होता है वही स्वातन्त्र्यरूप [ भेद प्रकाशरूप माया-शक्ति के जैसा ] शुद्धविद्या है जो कि माया- शक्ति के जैसी रहती है, इससे वेद्य अंश में भेद का प्रकाश होता है। वह माया नहीं है; क्योंकि ग्राहक [ प्रमाता ] के चिन्मात्र भाग में कुछ भी तो उलटा-पलटा नहीं कर सकती, जिस प्रकार से भगवान् विद्येश्वर अनन्तादि हैं, वे लोग शुद्ध संविद्रूप चिन्मात्र में अहंभाव को गृहीत किये हुए अपने से भिन्न वेद्य वस्तु को देखते हैं। जैसे द्वैतवादियों का ईश्वर अर्थात् द्वैत सिद्धान्त को माननेवाले अपने से सर्वथा भिन्न ही ईश्वर को मानते हैं। इस प्रकार ग्राहक [ ज्ञाता ] में चैतन्य अंश से परमार्थरूप ग्राह्य में जो विपरीत भाव का भर देनेवाली शक्ति है वही विद्येश्वरों की
२७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-७ शुद्धविद्या विद्येश्वराणाम् ॥ ६ ॥ परे प्राहुः—भगवतः परमशिवस्याप्ररूढभेदावभासनं सदाशिवेश्वरता । तत्रास्फुटत्वे इच्छाशक्तिरीश्वरस्य व्यापार्यते, स्फुटत्वे ज्ञानशक्तिः, प्ररूढे तु भेदे ग्राह्यविपर्यासैऽपि ग्राहक- चिन्मात्रतायां विद्येश्वरेषु क्रियाशक्तिः, ग्राहकग्राह्यविपर्यासद्वयप्ररूढौ तु मायाशक्तिः, सा च पशुप्रमातृषु, ग्राहकग्राह्योभयविपर्याससंस्कारे तु अविनिवृत्तेऽपि यदेतत् वस्तुपरमार्थप्रथनं तत्र विद्याशक्तिव्यापारो योगिज्ञानिप्रभृतिष्वपशुप्रमातृषु; तदेतद्दर्शयति— तस्यैश्वर्यस्वभावस्य पशुभावे प्रकाशिका । विद्याशक्तिः..................................... 'पशुभावे' विपर्यासैकरसत्वलक्षणे पाशनीयत्वेऽस्वतन्त्रे दृश्यद्रष्टृदर्शनभेदे सत्यपि जाते शुद्धविद्या है ॥ ६ ॥ दूसरे लोगों का कहना है कि भगवान् परम् शिव का अप्ररूढरूप से भेदपूर्वक भासित होना ही सदाशिवता और ईश्वरता मानी जाती है। उसमें अस्फुट दशा रहने पर ईश्वर की इच्छा- शक्ति व्यापार करती है तथा स्फुट होने पर ज्ञान-शक्ति व्यापार करती है, भेद की प्ररूढदशा में तो ग्राह्य [ प्रमेय ] का विपर्यास हो जाने पर भी ग्राहक [ प्रमाता ] की शुद्धचिन्मात्रता में विद्येश्वर लोगों की क्रिया-शक्ति का व्यापार रहता है, ग्राह्य और ग्राहक इन दोनों का विपर्यास प्ररूढ हो जाने पर तो माया-शक्ति व्यापार करती है और वह विशेषरूप से पशुप्रमाताओं में, ग्राह्य एवं ग्राहक इन दोनों के विपर्यास संस्कार में तो अविनिवृत्त होने पर भी, जिस वस्तु परमार्थ का फैलाव अर्थात् प्रकाश, उन पशुप्रमाताओं से व्यतिरिक्त योगिजनों में विद्या-शक्ति व्यापार करती है, इसको दिखाते हैं— उस ऐश्वर्य स्वभाववाले परम शिव का पशुरूप में प्रकाश करनेवाली विद्या-शक्ति मानी जाती हैं............। 'पशुभावे' जो श्लोक में निर्देश है इससे यह व्यक्त होता है कि जिसका विपर्यास कर देना मात्र स्वरूप है जो कि पाश बद्ध एवं अस्वतन्त्र है उसमें दृश्य, द्रष्टा के भेद दिखाने पर भी पहले १. परमेश्वर के स्वातन्त्र्य से उपजीवित होनेवाली विद्येश्वर-शक्ति शुद्धविद्या कहलाती है। इसलिए विद्येश्वर लोगों ने दीक्षा-दान अर्चनादि से ही इसकी प्राप्ति की है। जिसमें 'अहम्' और 'इदम्' अंश इन दोनों का ज्ञान भिन्न-भिन्न रहता है। यद्यपि भेद का आरम्भ यहाँ से हो होता है तथापि भेद के भीतर अभेद अवस्थित रहता है। इस तत्त्व में क्रिया की प्रधानता होती है। 'मन्त्र' इस तत्त्व का प्रमाता है। इसमें प्रत्यवमर्श 'इदं च अहं च' इस रूप से होता है। विश्व भिन्न है, किन्तु सर्वथा भिन्न नहीं है। इसी कारण इस दशा को 'शुद्धविद्या' कहते हैं। जब कि विद्येश्वर लोग साक्षात् प्रमाता हो होते हैं। इस पर कहा भी है—अधिकारं न चेत्कुर्याद्विद्येशः स्यात्तनुक्षये। यदि अधिकार न करे, तो विद्येश्वर लोग शरीर के क्षीण हो जाने पर शिवस्वरूप हो जाते हैं विद्यातत्त्व में रहने के कारण ईश्वर, सर्वज्ञ इत्यादि विद्येश्वरों को समझे जाते हैं। जैसे पार्थिव ब्रह्माण्ड के अधिपत्ति ब्रह्मा, प्राकृत में विष्णु, मायोय में रुद्र ये कोई दूसरे-दूसरे तत्त्व नहीं हैं तथा परस्पर भिन्न-भिन्न तत्त्व हैं—ऐसा समझना भी नहीं चाहिए।
अ.-३, आ.-१, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७३ पूर्वोक्तयुक्तिबलेन यदेतदैश्वर्यमुक्तं तस्य या प्रकाशिका परमेश्वरशक्तिः—यद्वशात् केचिदेव ता युक्तीरादृत्य तदाश्वस्तहृदयाः कृतिनो भवन्ति—सा विद्याशक्तिः । अयमेव षडर्धसारादिदृष्टोऽप्य- स्याचार्यस्य हृदयमावर्जयति पक्षः, 'अन्ये' इत्यनुक्तेः । एतदानन्तर्यौचित्येन च मायातत्त्वनिरू- पणात् । तदाह— ・・・・・・・・・・・・तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः ॥ ७ ॥ मायाशक्तिः पुनरचिद्रूपे शून्यादौ प्रमातृताभिमानं प्ररूढं दधती भावानपि चिन्मयान् भेदेनाभिमानयन्ती सर्वथैव स्वरूपं तिरोधत्ते आवृणुते विमोहिनी सा । तिरोधानमत्र न विलय- रूपं मन्तव्यं, यत् कृत्यपञ्चकमध्य आगमेषु गण्यते, दीक्षितस्यापि गुरुमन्त्रादिनिन्दनप्रायमपि त्वावरणमेव ॥ ७ ॥ तिरोधानमावरणरूपं स्फुटयति— भेदे त्वेकरसे भातेऽहंतयानात्मनीक्षिते । शून्ये बुद्धौ शरीरे वा मायाशक्तिर्विजृम्भते ॥ ८ ॥ कही हुई युक्ति के बल से ऐश्वर्य कहा गया है । उसका प्रकाश करनेवाली पारमेश्वरी-शक्ति है, जिसके सामर्थ्य से कोई-कोई जन ही उन युक्तियों का आदर कर, आश्वस्त हृदय होकर कृतकृत्य [ निष्कल-प्रमाता ] हो जाते हैं—वही विद्या-शक्ति है । यही पक्ष त्रिक शास्त्र के द्वारा देखा गया है जो कि आचार्य के हृदय को अत्यधिक आकर्षित करनेवाला है जिस कारण से 'अन्ये' ऐसा कहा नहीं है । इसके अनन्तर ही मायातत्त्व का निरूपण करना उचित माना जाता है । इसके लिए कहते हैं— ・・・・・'इसी को तिरोधान करनेवाली माया-शक्ति के नाम से कहा जाता है ॥ ७ ॥ अचिद्रूप शून्यादि में प्ररूढरूप से प्रमातृता का अभिमान बढ़ाती हुई, भाव-पदार्थों को भी भेदपूर्वक चिन्मयरूप में करती हुई सब प्रकार से संवित् स्वरूप को आवृत्त कर देनेवाली माया- शक्ति समस्त-प्रपञ्चजाल को विमुग्ध कर डालती है । इसमें तिरोधान कर देने का अर्थ विलयरूप नहीं लेना होगा कि जिसमें समस्त वस्तु-पदार्थ क्षत-विक्षत हो जायें, किन्तु विशेषरूप में जिस परम चिद्रूप में लय अर्थात् अपने स्वरूप में आत्मसात् कर लेना है, जिसकी गणना आगमों में कृत्यपञ्चक के मध्य संहार शब्द से की गयी है । दीक्षा से दीक्षित हुए लोगों का भी गुरु मन्त्रादि के विषय में निन्दादि करना केवल आवरण ही माना जाता है ॥ ७ ॥ उसी आवरणरूप तिरोधान को स्पष्ट करते हैं— किन्तु एकरस चिद्रूप में भेदपूर्वक बोध होने पर अनात्मतत्त्व में अहंरूप से प्रतीति होने लगती है । शून्य, प्राण, बुद्धि अथवा शरीरादि प्रमाताओं में माया-शक्ति का उल्लास उद्गम होता है ॥ ८ ॥ ३५
२७४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-८ सुषुप्ते प्रलये 'न' इत्यभावसमाधौ च तावच्छून्यमाकाशकल्पमनात्मरूपं वेद्यभावोचितम् 'अहम्' इत्यात्मत्वेन वीक्ष्यते; उच्छ्वसननिःश्वसनादौ वा अहमुच्छ्वसिमि,—इति प्राणो वायु- कल्पः, स्थावरजङ्गमजिघत्सामन्युप्रज्वलनादौ वा प्राण एव तेजः समुपबृंहितः, स्वच्छोदकाशयकल्पा सुषुप्ति दशा, प्रलयदशा और 'न' नकारात्मक जिसमें कुछ भी नहीं है—ऐसी अभावरूप समाधिदशा में शून्य आकाश के सदृश स्मर्यमाण होने कारण परमार्थतः अनात्मरूप वेद्यभाव ही 'अहम्' आत्मरूप होने से भासता है । १. नाभावो भाव्यतामेति न च तन्नास्त्यमूढता । यतोऽभियोगसंस्पर्शात्तदासीदितिनिश्चयः ॥ भावना का विषय अभाव तीनों कालों में भी नहीं हो सकता है, अभाव भावना की स्थिति तो जडता की ही स्थिति है जिससे कि योगी को समाधि से उठने के बाद अभिलाप भाषण के साथ संपर्क हो जाने पर मन में ज्ञान होने लगता है कि मेरी अवस्था थी वह तो शून्य सी निश्चय होने लगती है । चिति-शक्ति का उसी प्रकार का स्वभाव नहीं है; क्योंकि चिति-शक्ति तो सर्वोदिता स्वभाववाली होती है उसमें मूढता की स्थिति की भाँति स्मरण नहीं होता । वह तो सदैव एकरस, अखण्ड, देदीप्य- मान रूप में रहनेवाली होने के कारण प्रति समय अनुभव करनेवाला अनुभव स्मरण स्वातन्त्र्य-शक्ति के रूप में करता रहता है । अभाव भावना का विषय है । इस प्रकार कि अभाव ब्रह्मवादियों का मानना है । तथा माध्यमिक शाखा के बौद्धों का सर्वाभाव अर्थात् •सर्वशून्यरूप है । जब कि इस अवस्था में रहनेवाला आत्मतत्त्व अभाव में मिल जाता है—ऐसा मानना युक्ति युक्त नहीं है । यदि अभाव ब्रह्मवाद के अनुसार आत्मा का वास्तविक स्वरूप अभाव मान कर उससे किसी भी प्रकार की सत्ता के अनस्तित्व का सिद्धान्त स्वीकारलिया जाये तो एक बाधा उपस्थित होती है । वह यह है कि अभाव अवस्था में किसी की वेदन सत्ता का अस्तित्व शेष न रहने के कारण उस अभाव अवस्था का अनुभव कौन करेगा ? ऐसे अभाव से कारणरूप सत् जगत् का उदय कैसे हो सकेगा; क्योंकि असत् तो जड आकाश पुष्प के समान है उससे फिर उत्पत्ति कैसे बन पायेगी अर्थात् असत् से सत् की उत्पत्ति होना कदापि संभव नहीं है और न ऐसा तर्क करना ही ठीक है । 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ २।१६ गीता सद्रूप का अभाव कभी भी नहीं हो सकता एवं असद्रूप का भाव ही होता है; क्योंकि तत्त्व- दर्शी लोगों ने दोनों को बड़ी सूक्ष्मता से देख कर प्रतिपादन किया है कि 'इदमित्थम्' यह ऐसा ही है । अतस्तत्कृत्रिमं सेयं सौषुप्तपदवत्सदा । न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥ जो पशु प्रमाताओं को अभाव की भावना समाधि होती है वह तो मात्र [ सुषुप्ति ] तामसिक निद्रा के सदृश कृत्रिम ही है । वह तत्त्व [ चिद्रूप ] इस जडभावना के समान कदापि स्मर्यमाण का विषय नहीं हो सकता है—अर्थात् अभाव भावना का साक्षात्कार करनेवाले किसी को इस भूमिका का लाभ हो जायें, तो भी अनुभूति तो तन्द्रा जैसी ही होती है । इसलिए अनित्य, कृत्रिम उसे मानना चाहिए । एवं आत्मा का स्वरूप अनवच्छिन्न 'त्रिकाल बाध्यत्वम्' अर्थात् जिसका तीनों कालों में भी बाध नहीं हो सकता है, इस युक्ति से सिद्ध है । इस स्वरूप की सतत गुरु परम्पराक्रमपूर्वक उपासना करते रहना चाहिए ।
अ.-३, आ.-१, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७५ वेद्यप्रतिबिम्बनवती वा बुद्धिरभिनिविश्यते । अन्तरहं वेद्मि दुःख्यहमिति चिन्ताद्यवस्थासु, शरीरमेव पृथिवीप्रायं कृशोऽहमित्यादिदशासु अहमित्यात्मतया भाति । सर्वं चैवेदं शून्यादि वस्तुतश्चिन्मात्रसारमेव माययैव तावदचिद्रूपतया भासितम् । तथाविधमेव तु सत् अहमिति संविद्रूपताभिनिवेशस्थानं संपादितमप्रशान्तजडभावमेव, - इति दुष्करतमवस्तुसंपादनाप्रतिघात- रूपा परमेश्वरस्य मायाशक्तिः, - इत्येतत् 'विजृम्भते' इत्यनेन दर्शितम् । वाग्रहणेन वेद्यरूपाणां सुतधनदारादीनामप्यहंताभिनिवेशविषयत्वमसंख्यातं सूचयति ॥ ८ ॥ नन्वचिद्रूपत्वादनात्मा यदि शून्यादिस्तदात्मतयाऽसौ अभिनिविश्यमानश्चिद्रूप एव, - इति सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वादिविशुद्धैश्वर्यधर्मैव स्यात्, - इत्याशङ्क्याह- श्वास अर्थात् प्राण वायु लेने में और श्वास निकालने में अथवा तो मैं स्वयं श्वास को लेता हूँ और स्वयं ही श्वास को बाहर की ओर निकालता हूँ,- मानो कि वायु के समान प्राणतत्त्व ही रहता है, जड-जीवजङ्गम को खा डालने के लिए क्रोध की अभिव्यक्ति होने पर तेजपुञ्ज से बढा हुआ प्राण ही रहता है, स्वच्छ निर्मल जलाशय के समान वेद्यभावों में प्रतिबिम्बित होनेवाली बुद्धि का अभिनिवेश देखा जाता है। मैं भीतर जानता हूँ, मैं दुःखी हूँ इस तरह चिन्तादि अवस्थाओं में, जब कि शरीर प्रायः पृथिवी तत्त्व से बना हुआ है; उसी में भी मैं गौरवर्ण हूँ, मैं स्थूल-सुन्दर हूँ इत्यादि अवस्थाओं में 'अहम्' आत्मरूप से भासता है यह सब शून्यादि तत्त्ववस्तु का चिन्मात्र सार ही है जो माया के द्वारा अचिद्रूप अर्थात् वेद्यभाव से भासता है,-"तद्विहीनं किञ्चित्" इस न्याय से शुद्ध चिन्मात्र का ही यह सारा का सारा विलास-उल्लास दृष्टिगोचर होता है, समस्त वेद्यगत भाव तो माया का स्वरूप है। अचिद्रूप का तिरस्कार न करना, मैं सद्रूप हूँ- ऐसे संविद्रूपता का अभिमान करना मायीय अप्रशान्त जडभाव ही तो है, इस प्रकार दुष्करतम अवस्तुरूप के सम्पादन करने में कभी कहीं भी न रुकनेवाली परमेश्वर की माया-शक्ति कहलाती है। [मायातत्त्व स्वरूप का गोपन कर देती है और अपरिमेय भेदों की जननी है। जिसमें परमेश्वर का स्वरूप तिरोहित हो जाता है। यह तिरोभाव माया और उसके पञ्च कञ्चुकों द्वारा होता है। 'मा' धातु से माया शब्द सिद्ध हुआ है जिसका आशय यह है कि मापना अर्थात् मापकर अलग कर देना एक निर्धारित सीमा में सीमित कर देना। पदार्थों को एक दूसरे से पृथक् कर देती है 'अहम्' अंश को इदमंश से एवं इदमंश को अहमंश से भिन्न कर देती है, नाना भेदों के सर्जन करनेवाली होने के कारण माया-शक्ति कहलाती है ।] यह कारिका में दिया गया 'विजृम्भते' क्रियापद से अवगत होता है। 'वा' शब्द के ग्रहण से द्योतित होता है कि पुत्र, कलत्र, कनक इत्यादि वेद्य-पदार्थों में असंख्य प्रकार से अहन्ता का अभिमान करना भी तो माया-शक्ति का सब व्यापार है ॥ ८ ॥ अब शङ्का की जाती है कि शून्यादि प्रमातृवर्ग अचिद्रूप होने के कारण अनात्मा होते हुए भी आत्मरूप से जाने जाते हैं। इसी कारण वे सब के सब अभिनिविश कर लेने से चिद्रूप ही हो गये, जिससे उनमें सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्वादि विशुद्ध ऐश्वर्यधर्म भी मिल जायेंगे, -इस आशङ्का का उत्तर देते हैं-
२७६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-९ यश्च प्रमाता शून्यादिः प्रमेये व्यतिरेकिणि । माता स मेयः सन्कालादिकपञ्चकवेष्टितः ॥ ९ ॥ स्यादैश्वर्यधर्मयोगः शून्यादेः, यदि अहमित्याभिनिविश्यमानोऽपि नेयतां जह्यात्; तथा हि सति प्रमेयमध्यस्य नीलादिव्यतिरिक्ततया नैव भासेत । यावता यः शून्यादिः प्रमाता कथितः, स यावदेव स्वरूपाद्व्यतिरेकाभिमते नीलादौ प्रमेये माता तावदेव स्वयमपि मेयभूत एव सन् माता । मेयं हि मीयमानत्वाव परिमितम्,—इति तादृशादेव मेयान्तरादुपपन्नव्यतिरेकं, न त्वेवं चिद्रू- पमपरिमितत्वात् । परिमितत्वं च शून्यादेरहंभावस्य यत् तदेव कालादिपञ्चकम् । तथा हि कालः क्रममासूत्रयन् प्रमातरि विजृम्भमाणस्तदनुसारेण प्रमेयेऽपि प्रसरति, योऽहं कृशोऽभवं स स्थूलो वर्ते भविष्यामि स्थूलतरः,—इत्येवमात्मानं देहरूपं क्रमवन्तमिव परामृशंस्तत्सहचारिणि प्रमेयेऽपि भूतादिरूपं क्रमं प्रकाशयति । अस्य शून्यादेर्जडस्य विद्या किंचिज्ज्ञत्वोन्मीलनरूपा बुद्धिदर्पणसंक्रान्तं भावराशिं नीलसुखादिं विविनक्ति । कला किंचित्कर्तृत्वोपोहलनमयी कार्य- मुद्भावयति, किंचिज्जानामि किंचित्करोमि,—इति । अत्र चांशे तुल्ये किंचित्त्वे कस्मादिदमेव किंचित्,—इत्यत्रार्थेऽभिष्वङ्गरूपः प्रमातरि देहादौ प्रमेये च गुणारोपणमय इव रागो व्याप्रियते । जो शून्यादि प्रमाता हैं उनसे भिन्न प्रमेय के रहने पर, वह प्रमाता प्रमेयरूप होकर ये कालादि पञ्च कञ्चुकों के द्वारा आवेष्टित हो जाता है ॥ ९ ॥ विशुद्ध ऐश्वर्य सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्वदि धर्म का योग, शून्यादि प्रमाताओं में भले ही होवें 'अहम्' इस अभिनिवेश से युक्त होकर यदि वह प्रमेयता को छोड़ दे, ऐसा रहने पर ही प्रमेय भी इसका नीलादि-पदार्थों से भिन्न होकर नहीं भासित हो सकेगा । इसलिए यह सब शून्यादि प्रमाता कहा जाता है, जब तक वही स्वरूप से भिन्नरूप नीलादि प्रमेय में प्रमाता बनता है तब तक ही प्रमेय बना हुआ कहलाता है, प्रमेय भी सीमित होने के कारण परिमित अर्थात् संकुचित हो जाता है, इसलिए उसी प्रकार के दूसरे घटादि प्रमेयों से भिन्नरूप में प्राप्त होने के कारण, वह चिद्रूप नहीं हो सकता, चिद्रूप का स्वरूप तो अपरिमित-अपरिच्छन्न होता है । परिमितरूपता शून्यादि प्रमाताओं में अहंभाव का प्राप्त होना है वही कालादि पञ्चक है। देखिये—कालक्रम को दिखाता हुआ प्रमाता में प्रकाशित होकर उसके अनुसार प्रमेय में भी फैल जाता है, तब वह कहने लगता है कि मैं कृश था, वही अभी मैं स्थूल हो गया हूँ तथा आगे इससे भी अधिक स्थूलता को प्राप्त हो जाऊँगा । इस प्रकार देहरूप आत्मा को क्रमवाले के समान मानता हुआ एवं उसका सहचारी प्रमेय में भी भूतादिरूप से क्रम को प्रकाशित करता है। इसी कारण इस शून्यादि जड़ की विद्या जो [ प्रमाता में आरोप करती है ] किञ्चित् ज्ञत्व उन्मीलनरूप बुद्धि दर्पण में संक्रान्त नील- सुखादि भावराशि के पृथग्रूप से विवेक करती है। कला-महेश्वर का स्वरूप तिरोहित कर देने पर, अणुरूप में ढल जाने पर जिससे उसका सर्वकर्तृत्व संकुचित होकर एक सीमा में सीमित हो जाता है, किञ्चित् कर्तृत्व में विनिमय हो जाता है वही कला है अर्थात् किञ्चित् कर्तृत्व को प्रकाशित करती हुई कार्य को उद्बुद्ध करती है, जिससे कि मैं जानता हूँ—ऐसा अनुभव होता है और किञ्चित् मैं सम्पादन भी करता हूँ । इसी अंश में किञ्चिद्रूप से समानता होने पर ही क्यों इतना ही किञ्चित् है, इस अर्थ में अभिष्वङ्गरूप प्रमाता, देहादि और प्रमेय में गुण का आरोप
अ.-३, आ.-१, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७७ न च तद्बुद्धिगतमवैराग्यमेव, तद्धि स्थूलं वृद्धस्य प्रमदायां न भवेदपि रागस्तु भवत्येव । बुद्धि- धर्मष्टकेऽपि च दृष्टोऽभिष्वङ्गः । अत्रैव कस्मादभिष्वङ्ग, — इत्ययमर्थो नियत्या नियम्यते इति । एवं कलाविद्याकालरागनियतिभिरोतप्रोतो माययापहृतैश्वर्यसर्वस्वः सन् पुनरपि प्रतिवितीर्णतत्सर्व- स्वराशिवमद्ध्यगतभागमात्र एवंभूतोऽयं मितः प्रमाता भाति—इदानीमिदं किंचिज्जानानः, इदं कुर्वाणोऽत्र रक्तोऽत्रैव च यः सोऽहम्—इति । एषां च भिन्नविषयत्वमपि भवति कदाचित्— यथान्यत्र रक्तोऽपि नियत्यान्यत् कार्यते—इति । एते च प्रमातृलग्नतयैव भान्ति,—इति तस्यैव शक्तिरूपाः प्रतिप्रमातृभिन्ना एव, कदाचित् तु नटमल्लप्रेक्षादावीश्वरेच्छया एकीभवेयुरपि । न ह्येषामीश्वरेच्छातिरिक्तं निजं किमपि जीवितमस्ति,—इत्यसकृदुक्तं वक्ष्यते च ॥ ९ ॥ यदुक्तमिदमित्यत्र प्रमेये व्यतिरेकिणि माता,—इति तत्र तत्प्रमेयं दर्शयति— त्रयोविंशतिधा मेयं यत्कार्यकरणात्मकम् । तस्याविभागरूप्येकं प्रधानं मूलकारणम् ॥ १० ॥ यत् कार्यकारणरूपं त्रयोविंशतिप्रकारं, यच्च तस्य मूलभूतं कारणं सर्वकार्यकरणाविभागरूपं प्रधानं नाम तत्सर्वं मेयम्,—इति सम्बन्धः । योगिमन्त्रतदीश्वरप्रभृतीनां हि भूततन्मात्रकरण- कर देने के समान राग होता है और वह बुद्धि में होनेवाली आसक्ति नहीं है; क्योंकि वह स्थूल है, वृद्धजन की कामिनी में आसक्ति बढ़ती ही जाती है चाहे काम करने की शक्ति भले ही न हो इस प्रकार वृद्धावस्था न भी हो किन्तु अनुराग तो देखा जाता है । अभिष्वङ्ग बुद्धि ऐश्वर्यादि धर्म अष्टक में भी देखा गया है । इसीमें क्यों आसक्ति होती है ? इसलिए यह अर्थ नियति से नियमित होता है एवं कला, विद्या, काल, राग और नियति से ओतप्रोत होकर, जिसका ऐश्वर्य माया के द्वारा अपहृत हो जाता है अर्थात् समस्त ऐश्वर्य लूट जाने पर भी उसमें कुछ अंश को लेकर ऐसा ही परिमित प्रमाता के रूप में भासित होता हुआ, मैं इस समय कुछ जानता हुआ, कुछ करता हुआ संसक्त होकर इसीमें जो कि वह मैं स्वयं हूँ । इनकी भिन्न विषयता भी कभी-कभी हुआ करती है—जैसे जिससे अन्यत्र आसक्त होता हुआ भी नियति के कारण दूसरा कार्य कराया जाता है । ये सभी प्रमाताओं में ही संलग्न होकर भासित होते हैं, उसीकी शक्तिरूपवाले प्रत्येक प्रमाताओं में भिन्न-भिन्न रूपों में भासित होते हैं, कदाचित् नट-मल्ल इत्यादि की कला देखने के समान ईश्वर की इच्छा से दर्शकों की दृष्टि एकत्र हो जाती है । इनकी ईश्वर की इच्छा से भिन्न अपनी निजी इच्छा विशेष नहीं रहती है, इस विषय में हम अनेक बार कह चुके हैं, आगे भी कहेंगे ॥ ९ ॥ प्रमेय में भिन्नरूप से प्रमाता रहता है—इस विषय में कह दिया गया है । अब उस प्रमेय को दिखाते हैं— जो कार्य-कारणात्मक तैइस प्रकार के प्रमेय तत्त्व हैं । उनका संमिलितरूप एक प्रधान तत्त्व ही मूल कारण माना गया है ॥ १० ॥ जो कार्य-कारणरूप तैइस प्रकार के प्रमेय तत्त्व हैं जो कि समस्त कार्य-कारणभाव के अविभागरूप प्रधान ही उन प्रमेयों का मूलभूत कारण हैं यही इन सबका सम्बन्ध है । योगी, मन्त्र अर्थात् विद्येश्वर, ईश्वर-मन्त्रेश्वर और मन्त्र महेश्वर इत्यादिकों में प्रमेय तत्त्व ही रहते हैं; क्योंकि भूत तन्माएँ, इन्द्रियवर्ग, प्रधान-प्रकृति के वशीभूत हो जाने के कारण ये सब के सब प्रमेय कह-
२७८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-११ प्रधानवशीकारयोगित्वात् सर्वमेव प्रमेयम् । संसारिणामप्यनुमानागमादिविशा प्रमेयमेव, — इतीयत् प्रमेयम् । कालादयस्तु प्रमेया अपि प्रमातर्येव लग्नाः, —इति प्रमातृशक्तिस्वभावत्वात् न प्रमेयत्वेनेहावसरे मायाप्रमातृव्यतिरिक्तप्रमेयप्रस्तावात्मनि गणिताः । वस्तुतो हि अत्र योऽयं प्रमातापि स प्रमेय एव, स तु प्रमात्रीक्रियमाण आच्छादितप्रमेयताक इहोच्यते ॥ १० ॥ नन्वत्र त्रयोविंशतौ किं कार्यं किं करणम् ? इत्याशङ्क्याह— त्रयोदशविधा चात्र बाह्यान्तःकरणावली । कार्यवर्गश्च दशधा स्थूलसूक्ष्मत्वभेदतः ॥ ११ ॥ प्रमातुः पूर्वं करणोपयोगः, —इत्यत्रादौ त्रयोदश करणानि; तत्र बुद्धिरध्यवसायसामान्य- मात्ररूपा, ग्राह्यग्राहकाभिमानरूपोऽहंकारः, सङ्कल्पादिकारणं मनः, —इत्यन्तःकरणं त्रिधा । बुद्धौ शब्दाद्यध्यवसायरूपायामुपयोगीनि बुद्धीन्द्रियाणि पञ्च—श्रोत्रं, त्वक्, चक्षुः, जिह्वा, घ्राणम्, —इति । कर्मणि तूपयोगीनि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि । तथा हि—त्यागो ग्रहणं द्वयम्, —इति बहिर्विषयं यत् तत्र पाणिः पायुः पादः, —इति करणानि । एतद्देवान्तः प्राणे येन क्रियते तद्वा- लाते हैं । सांसारिक जीवों की भी अनुमान एवं आगम शास्त्र के द्वारा प्रमेयता सिद्ध होती है, इतने तक प्रमेय तत्त्व की सीमा है । कालादि भी तो प्रमेय तत्त्व के अन्तर्गत हैं किन्तु प्रमाता में मिले हुए रहते हैं, इसलिए वे सभी प्रमातृ-शक्ति के स्वभाववाले होने के कारण प्रमेयरूप से इस माया प्रमाता से व्यतिरिक्त प्रमेय के प्रस्ताव में नहीं गिने गये हैं । वस्तुतः इसमें जो प्रमाता है वह भी प्रमेय ही है, प्रमेयता से आच्छादित कर देने के कारण उसे प्रमाता बना दिया जाता है ॥ १० ॥ अब शङ्का करते हैं कि इन तेइस प्रकार के प्रमेय तत्त्वों में कौन कार्य है और कौन करण कहलाते हैं ? इस आशङ्का के समाधान के लिए कहते हैं— पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रि, मन, बुद्धि और अहङ्कार इन तेरह को करण कहते हैं । पञ्चमहाभूत, पञ्चतन्मात्राएँ स्थूल-सूक्ष्म के भेद से ये दस प्रकार के कार्य हैं ॥ ११ ॥ सर्वप्रथम प्रमाता करण अर्थात् इन्द्रियों का उपयोग करता है; इसी कारण इसमें पहले तेरह प्रकार के करण का ही निरूपण किया गया है । निश्चय करना बुद्धि का धर्म माना जाता है, ग्राह्य [ प्रमेय और ग्राहक प्रमाता ] में अभिमान करना अहङ्कार का लक्षण है, संकल्प-विकल्प करना मन का धर्म है, इस प्रकार इन तीनों को लेकर अन्तःकरण कहा जाता है । बुद्धि में शब्दादि ज्ञान का निश्चय करनेवाली पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ हैं इनका नाम जैसे श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, रसना और घ्राण हैं । कर्म में उपयोगी होने के कारण कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच प्रकार की होती हैं । देखिये—त्याग करना एवं ग्रहण करना ये दोनों बाहरी विषय कहलाते हैं जो हस्त, पायु और पाद १. इस प्रकार पुरुष की दो करणेन्द्रियाँ रहती हैं ज्ञान में विद्या और क्रियायें कला । अत एव अन्धे व्यक्ति में ज्ञान नहीं रहता और पङ्गु में क्रिया का अभाव रहता है । विद्यातत्त्व के बिना इन्द्रियवर्ग की अपनी स्वयं की कार्य इत्यादि संपादन में कुछ भी गति नहीं हो सकती है और कला के बिना उसमें कर्तृत्व-शक्ति एवं ज्ञातृत्व-शक्ति का भी उद्भव नहीं हो सकता । इसलिए पुरुषों में मुख्यरूप से तो विद्या और कला को ही इन्द्रियकरण माना गया है ।
अ.-३, आ.-१, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७९ गिन्द्रियम् । तत्प्रक्षोभप्रशान्त्या विश्रान्तिक्रियोपयोगी उपस्थः । सर्वदेहव्यापकानि च कर्मेन्द्रियाण्य- हङ्कारविशेषात्मकानि । तेन च्छिन्नहस्तो बाहुभ्यामादधानः पाणिनेवादत्ते, एवमन्यत् । केवलं तत्तत्स्फुटपूर्णवृत्तिलाभस्थानत्वात् पञ्चाङ्गुलिरूपमधिष्ठानमस्योच्यते, —इत्येवं करणानि त्रयोदश । एषां च कार्यत्वेऽप्यसाधारणेन कारणत्वेन व्यपदेशः । स्थूलं कार्यं पृथिवी, आपः, तेजो, वायुः, नभः, —इति पञ्च भूतानि । सूक्ष्ममेषामेव रूपं, गन्धो, रसो, रूपं, स्पर्शः, शब्द, —इति । तत्रैकैक- गुणमाकाशादि, एकैकवृद्धगुणं वा, —इति दर्शनभेदः, —इति न विवेचितोऽनुपयोगात् । तत्र स्थूलं विभक्तमविभागस्यानुमापकम्, —इति स्थूलरूपोपक्रममुक्तम् । तत्र पृथिव्याद्याभासा एव मिश्रीभूय घटादिस्वलक्षणभूताः कर्मेन्द्रियैरुपसर्पिता, बुद्धीन्द्रियैरालोचिता, अन्तःकरणेन सङ्कल्पिताभिमत- निश्चितरूपा, विद्यया विवेचिताः, कलादिभिरनुरञ्जिताः, प्रमातरि विश्राम्यन्ति, —इति तात्पर्यम् । एतच्च विस्तरतस्तत्प्रधानेषु तन्त्रालोकसारादिषु मया निर्णीतम्, —इतीहानुपयोगान्न वितानितम्, — इति शिवम् ॥ ११ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीम- दाचार्यभिनवगुप्तविरचितविमर्शिनीनाख्यटीकोपेतायामाग- माधिकारे तत्त्वनिरूपणाख्यं प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥ हैं वे तीनों इन्द्रियाँ करण कही जाती हैं। इसीको दिखाते हैं—भीतर प्राण को रोक कर जिससे बोला जाता है वही वागिन्द्रिय है। जिसके द्वारा प्रक्षोभ और प्रशान्त क्रिया होती हो उसे उपस्थ इन्द्रिय कहा जाता है और सारे शरीर में व्यापकरूप से रहनेवाली अहङ्कार से युक्त कर्मेन्द्रियाँ कहलाती हैं। इसलिए हस्त के कट जाने पर भी बाहु से लेनेवाला हाथ से ही लिया है—ऐसा कहा जाता है। स्पष्टरूप से ग्रहण तो पाँच अङ्गुलियों के रहने पर ही होता है अतः इसका अधिष्ठान पञ्च अङ्गुलीरूप माना जाता है, इस प्रकार ये तेरह करण कहे जाते हैं। इनमें कार्यता रहने पर भी असाधारणतया कारणरूप से व्यपदेश किया जाता है। इसका स्थूल कार्य पृथिवी, जल, तेज, वायु और गगन है इस प्रकार पञ्च महाभूत हुए, इनके सूक्ष्मरूप को कहते हैं— यथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द हैं। इनमें आकाशादि एक गुणवाले हैं किसी-किसी दर्शन में क्रमशः एक-एक बढ़ते भी जाते हैं। यथा आकाश में एक शब्द ही मात्र गुण रहता है, वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, तथा तेज में शब्द, स्पर्श और रूप ये तीन गुण रहते हैं, जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण रहते हैं। पृथिवी में शब्द, स्पर्श; रूप, रस और गन्ध ये पाँच गुण रहते हैं। इस सम्बन्ध में यहाँ पर अधिक विवेचन अनुपयोगी होने के कारण नहीं किया गया है। इसमें स्थूलरूप का विवेचन इसलिए किया गया है कि इसका विभाग करना अविभाग का अनुमापक होता है, इसी कारण स्थूलरूप का उपक्रम बता दिया है। पृथिवीरूप स्थूल भाग आपस में मिल करके घटादिरूप वस्तु का निर्माण करता है जो कि कर्मेन्द्रिय से होकर ज्ञानेन्द्रियों से समझ कर, अन्तःकरण से संकल्प किया हुआ अभीष्ट निश्चितरूपवाला, विद्या से विवेचन किया हुआ, कलाओं से अनुरञ्जित, प्रमाता में परम विश्रान्ति लेते हैं, यही इसका आशय है। इसका अधिक विस्तारपूर्वक विवेचन मैंने तन्त्रालोकसार आदि ग्रन्थों में किया है, अतः इस स्थल में विस्तार के साथ वर्णन करना अनुपयोगी होने से नहीं किया है। शिवम् ॥ ११ ॥ प्रथम आह्निक समाप्त
अथ तृतीये आगमाधिकारे प्रमातृतत्त्वनिरूपणाख्यं द्वितीयमाह्निकम् अखण्डितस्वभावोऽपि विचित्रां मातृकल्पनाम्। स्वहृन्मण्डलचक्रे यः प्रथयेत्तं स्तुमः शिवम्॥ एवं तत्त्वराशौ निर्णीते एतदन्तर्भाविनोक्तमपि मुख्यतया निर्णेतव्यं प्रमातृतत्त्वं वितत्य निर्णेतुं 'तत्रैतन्मातृतानात्र' इत्यादि 'व्यानो विश्वात्मकः परः' इत्यन्तैर्विंशतिश्लोकैराह्निकान्तरं प्रस्तूयते। तथाहि—प्रमातुरत्र स्वरूपप्रत्यभिज्ञानमुपदिश्यते शास्त्रे। स हि हेयमुपादेयं च स्वं स्वभावं विद्वान् परमोपादेयरूपं शिवस्वभावं स्वात्मनमभेदेनाविशन् जीवन्नेव मुक्तो भवति, -इति। तत्र श्लोकेन ब्रह्मादित्रयस्वरूपम्, ततोऽपि द्वयेन हेयोपादेयप्रमातृतत्त्वम्, ततस्तदुपयोगिमलस्वरूपं, तत्कृतं च प्रमातृभेदं श्लोकसप्तकेन, द्वयेन समावेश स्वरूपं श्लोक पञ्चकेन प्रमातुरेव सुषुप्ताद्यवस्थाः, त्रयेण तासां हेयोपादेयविभागं निरूपयति, —इत्याह्निकतात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते— तत्रैतन्मातृतानात्रस्थितौ रुद्रोऽधिदैवतम् । भिन्नप्रमेयप्रसरे ब्रह्मविष्णू व्यवस्थितौ ॥ १ ॥ तत्रेति, एवंभूतेऽस्मिन्नागमसिद्धे युक्त्यनुगते च तत्त्वस्वरूपे सति यदेतत् कालादिपञ्चक- वेष्टितं प्रमातृत्तारूपं, तदेव यस्यां शुद्धमुपसंवृतप्रमेयजातं भवति दशायां संहाराख्यायां तस्यामधि- जो हृदय कमल चक्र [ परावाग्रूप ] में अखण्डित स्वभाववाले परम शिव विचित्र-विचित्ररूप से प्रमाताओं की भाँति प्रकट हो जाते हैं, हम उस शिव की स्तुति करते हैं। इस प्रकार तत्त्वराशि प्रमेयरूप से निर्णय कर लेने पर इसके अन्तर्भाव में कहा गया भी मुख्यरूप से निर्णय करना चाहिए, प्रमातृतत्त्व का भी विस्तारपूर्वक निर्णय करने के लिये 'तत्रैतन्मातृतानात्र' इत्यादि से लेकर 'व्यानो विश्वात्मकः परः' यहाँ तक बीस श्लोकों से दूसरे आह्निक का प्रस्ताव करते हैं। जैसा कि इस प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में प्रमाता के अपने स्वरूप की पहचान करने के लिए उपदेश दिया जाता है; क्योंकि वह हेय एवं उपादेयरूप अपने-अपने स्वभाव को जानता हुआ, परम उपादेयरूप शिवभाव को अपने में अभेदपूर्वक समझता हुआ जीवन्मुक्त हो जाता है। प्रथम श्लोक से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन तीनों देवों के स्वरूप का वर्णन किया जायेगा, इसके पश्चात् दो श्लोकों से हेय-उपादेयरूप से प्रमातृतत्त्व के विषय में कहेंगे। इसके बाद सात श्लोकों से उस प्रमातृतत्त्व में जो उपयोगी मल का स्वरूप और उसके द्वारा होनेवाले प्रमाताओं में भेदों का विवेचन किया जायगा। अनन्तर दो श्लोकों से समावेश अर्थात् समाधि अवस्था का स्वरूप बतायेंगे। इसके बाद पाँच श्लोकों से प्रमाता की सुषुप्ति अवस्थाओं अर्थात् उन अवस्थाओं के विषय में विवेचन करेंगे। इसके पश्चात् तीन श्लोकों से हेय-उपादेयता का विभाग प्रस्तुत किया जायेगा, यही इस आह्निक का आशय है। अब ग्रन्थ के अर्थ का निरूपण करते हैं— इस प्रकार केवल प्रमातृत्ता की स्थिति में भगवान् रुद्ररूप से अधिष्ठातृदेव रहते हैं। भिन्न- भिन्न रूपों में प्रमेयतत्त्व के विस्तार होने पर तो ब्रह्मा और विष्णु की व्यवस्था की जाती है ॥ १ ॥ 'तत्रेति' इससे यह अर्थ प्रकट होता है कि आगमसिद्ध तत्त्व स्वरूप की युक्तिपूर्वक सिद्धि हो जाने पर जो यह कालादि पञ्चक से प्रमाता का स्वरूप आवेष्टित है, वही जिसमें प्रमेयरूप
अ.-३, आ.-२, का.-१] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८१ ष्ठातृदेवतात्वं तद्दशासंपादनेन स्वोपासकलोकस्य तद्दशाध्यानावेशसमापन्नस्य स्वाभिमुख्यसंपादनेन च भजमानो भट्टारक ईश्वर एव रुद्रो भगवान्, यो मायापदेऽपि प्राणापानात्मकधर्माधर्मसूर्येन्दु- दिननिशाविमुक्तमध्यमज्योतीरूपप्रमातृस्वरूपस्पर्शाद् उन्मीलिततृतीयनेत्रो, भिन्नस्य तु प्रमेयस्य ‘प्रसरे’ संपादनेऽधिष्ठातृदेवतात्वं भजन् ब्रह्मा, प्रसृते भिन्ने प्रमेये तत्संतानप्रवहणलक्षणे प्रसरेऽधि- ष्ठातृदेवता विष्णुः, अत एव तयोः प्रमेयप्रसररूपस्य ‘इदं नीलम्’ इत्येवं प्रकाशात्मनः प्राधान्यात् ‘अहम्’ इति प्रमातृदशावेशशून्यत्वात् न तृतीयनेत्रोन्मीलनम् । देवतैव दैवतम् । ‘प्रसर’ उत्पत्तिः संतानश्च ॥१॥ शुद्धरूप से उपसंहृत रहता है और संहार अवस्था में अधिष्ठातृदेवता तत्त्व अपनी अवस्थिति के सम्पादन से अपने उपासक लोगों को उस समावेश-समाधि अवस्था की प्राप्ति करने के लिए और अपनी ओर उन्मुख करने से तो सेव्य भट्टारक ईश्वर ही रुद्ररूप से अधिष्ठाता हैं। जो कि मायापद में भी प्राण एवं अपानरूप, सूर्य-चन्द्ररूप, धर्म-अधर्मरूप, रात्रि-दिनरूप इत्यादि से विभाग रहित रहते हैं। उस महाव्योम स्वरूप में प्रमाताओं का अनुप्रवेश कर लेने मात्र से तृतीय नेत्र का उन्मीलन हो जाता है, प्रमेयतत्त्व का भिन्न रूप में विस्तार हो जाने पर तो इसके सम्पादन करने के लिए ब्रह्मा अधिष्ठातृदेव के रूप में रहते हैं, प्रमेयतत्त्व के प्रसृत हो जाने पर भिन्न भिन्नरूप से, उसके समूह बढ़ने लगते हैं तब अधिष्ठातृदेव विष्णु होते हैं। अत एव उन दोनों का प्रमेय विस्तार ‘इदं नीलम्’ इसमें प्रकाशरूप के प्राधान्य होने के कारण, ‘अहम्’ इस प्रमातृ दशा की समावेशता में शून्यरूपता होने के कारण तृतीय नेत्र का विकास नहीं होता है। देवता का भाव ही दैवत है। ‘प्रसर’ शब्द को उत्पत्ति एवं सन्तान अर्थ में लिया गया है॥१॥ १. अत एव प्रपञ्च के गल जाने पर बुद्धि गुण का परम ऐश्वर्य विनष्ट हो जाता है; विनष्ट हो जाने का अर्थ यह है कि उसका दब जाना है न कि अत्यन्त अभाव हो जाना है— तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे । सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्थानावृतः ॥ उस महा आकाश में पहुँचने पर चन्द्रमा और सूर्य ये दोनों ही उसमें प्रलीन हो जाते हैं, प्रबुद्ध साधक को उस दशा में कुछ भी विक्षेप-आवरणादि नहीं होते हैं, किन्तु अज्ञानी लोगों के लिए तो उस अवस्था में भी सुषुप्त-पद के समान अत्यन्त गाढ अन्धकार अवस्था में पड़े हुए जैसी स्थिति रहती है। २. जैसे जाग्रर अवस्था में ब्रह्मा हृदयकमल नाल से उत्पन्न होने के कारण कमलासन कहे जाते हैं इसलिए प्रथम क्षण में उस भाव का आभास रहता है। विष्णु तो स्मृति अवस्था में एवं स्वप्न अवस्था में भी रहते हैं इसलिए पालक कहे जाते हैं। मध्यमा-वैखरीरूप का उल्लासपद, परमेश्वर से लेकर पशु प्रमाता तक प्रामातृवर्ग कण्ठभूमि में वर्तमान रहता है; क्योंकि हृदय में प्रथम पश्यन्ती प्रसरात्मक के प्रतिभास- रूप होने के कारण प्रथम सृष्टि होती है। इसका स्पन्द शास्त्र में उल्लेख किया है— यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् । जिसकी अभी अपने स्वरूप की पूर्ण भाव से अभिव्यक्ति नहीं हुई है, जाग्रत दशा में अपनी इच्छा के अनुकूल, कोई विशेष अभीष्ट वस्तु नहीं दिखायी देती है, फिर क्यों न उसके सामने पदार्थों का ढेर ही हो ? इसीलिए अन्तर्हृदय में विद्यमान धाता चिद्रूप उस साधक के हृदय में सोम एवं सूर्य का ३६