ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-१, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७९ गिन्द्रियम् । तत्प्रक्षोभप्रशान्त्या विश्रान्तिक्रियोपयोगी उपस्थः । सर्वदेहव्यापकानि च कर्मेन्द्रियाण्य- हङ्कारविशेषात्मकानि । तेन च्छिन्नहस्तो बाहुभ्यामादधानः पाणिनेवादत्ते, एवमन्यत् । केवलं तत्तत्स्फुटपूर्णवृत्तिलाभस्थानत्वात् पञ्चाङ्गुलिरूपमधिष्ठानमस्योच्यते, —इत्येवं करणानि त्रयोदश । एषां च कार्यत्वेऽप्यसाधारणेन कारणत्वेन व्यपदेशः । स्थूलं कार्यं पृथिवी, आपः, तेजो, वायुः, नभः, —इति पञ्च भूतानि । सूक्ष्ममेषामेव रूपं, गन्धो, रसो, रूपं, स्पर्शः, शब्द, —इति । तत्रैकैक- गुणमाकाशादि, एकैकवृद्धगुणं वा, —इति दर्शनभेदः, —इति न विवेचितोऽनुपयोगात् । तत्र स्थूलं विभक्तमविभागस्यानुमापकम्, —इति स्थूलरूपोपक्रममुक्तम् । तत्र पृथिव्याद्याभासा एव मिश्रीभूय घटादिस्वलक्षणभूताः कर्मेन्द्रियैरुपसर्पिता, बुद्धीन्द्रियैरालोचिता, अन्तःकरणेन सङ्कल्पिताभिमत- निश्चितरूपा, विद्यया विवेचिताः, कलादिभिरनुरञ्जिताः, प्रमातरि विश्राम्यन्ति, —इति तात्पर्यम् । एतच्च विस्तरतस्तत्प्रधानेषु तन्त्रालोकसारादिषु मया निर्णीतम्, —इतीहानुपयोगान्न वितानितम्, — इति शिवम् ॥ ११ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीम- दाचार्यभिनवगुप्तविरचितविमर्शिनीनाख्यटीकोपेतायामाग- माधिकारे तत्त्वनिरूपणाख्यं प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥ हैं वे तीनों इन्द्रियाँ करण कही जाती हैं। इसीको दिखाते हैं—भीतर प्राण को रोक कर जिससे बोला जाता है वही वागिन्द्रिय है। जिसके द्वारा प्रक्षोभ और प्रशान्त क्रिया होती हो उसे उपस्थ इन्द्रिय कहा जाता है और सारे शरीर में व्यापकरूप से रहनेवाली अहङ्कार से युक्त कर्मेन्द्रियाँ कहलाती हैं। इसलिए हस्त के कट जाने पर भी बाहु से लेनेवाला हाथ से ही लिया है—ऐसा कहा जाता है। स्पष्टरूप से ग्रहण तो पाँच अङ्गुलियों के रहने पर ही होता है अतः इसका अधिष्ठान पञ्च अङ्गुलीरूप माना जाता है, इस प्रकार ये तेरह करण कहे जाते हैं। इनमें कार्यता रहने पर भी असाधारणतया कारणरूप से व्यपदेश किया जाता है। इसका स्थूल कार्य पृथिवी, जल, तेज, वायु और गगन है इस प्रकार पञ्च महाभूत हुए, इनके सूक्ष्मरूप को कहते हैं— यथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द हैं। इनमें आकाशादि एक गुणवाले हैं किसी-किसी दर्शन में क्रमशः एक-एक बढ़ते भी जाते हैं। यथा आकाश में एक शब्द ही मात्र गुण रहता है, वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, तथा तेज में शब्द, स्पर्श और रूप ये तीन गुण रहते हैं, जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण रहते हैं। पृथिवी में शब्द, स्पर्श; रूप, रस और गन्ध ये पाँच गुण रहते हैं। इस सम्बन्ध में यहाँ पर अधिक विवेचन अनुपयोगी होने के कारण नहीं किया गया है। इसमें स्थूलरूप का विवेचन इसलिए किया गया है कि इसका विभाग करना अविभाग का अनुमापक होता है, इसी कारण स्थूलरूप का उपक्रम बता दिया है। पृथिवीरूप स्थूल भाग आपस में मिल करके घटादिरूप वस्तु का निर्माण करता है जो कि कर्मेन्द्रिय से होकर ज्ञानेन्द्रियों से समझ कर, अन्तःकरण से संकल्प किया हुआ अभीष्ट निश्चितरूपवाला, विद्या से विवेचन किया हुआ, कलाओं से अनुरञ्जित, प्रमाता में परम विश्रान्ति लेते हैं, यही इसका आशय है। इसका अधिक विस्तारपूर्वक विवेचन मैंने तन्त्रालोकसार आदि ग्रन्थों में किया है, अतः इस स्थल में विस्तार के साथ वर्णन करना अनुपयोगी होने से नहीं किया है। शिवम् ॥ ११ ॥ प्रथम आह्निक समाप्त