ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीये आगमाधिकारे प्रमातृतत्त्वनिरूपणाख्यं द्वितीयमाह्निकम् अखण्डितस्वभावोऽपि विचित्रां मातृकल्पनाम्। स्वहृन्मण्डलचक्रे यः प्रथयेत्तं स्तुमः शिवम्॥ एवं तत्त्वराशौ निर्णीते एतदन्तर्भाविनोक्तमपि मुख्यतया निर्णेतव्यं प्रमातृतत्त्वं वितत्य निर्णेतुं 'तत्रैतन्मातृतानात्र' इत्यादि 'व्यानो विश्वात्मकः परः' इत्यन्तैर्विंशतिश्लोकैराह्निकान्तरं प्रस्तूयते। तथाहि—प्रमातुरत्र स्वरूपप्रत्यभिज्ञानमुपदिश्यते शास्त्रे। स हि हेयमुपादेयं च स्वं स्वभावं विद्वान् परमोपादेयरूपं शिवस्वभावं स्वात्मनमभेदेनाविशन् जीवन्नेव मुक्तो भवति, -इति। तत्र श्लोकेन ब्रह्मादित्रयस्वरूपम्, ततोऽपि द्वयेन हेयोपादेयप्रमातृतत्त्वम्, ततस्तदुपयोगिमलस्वरूपं, तत्कृतं च प्रमातृभेदं श्लोकसप्तकेन, द्वयेन समावेश स्वरूपं श्लोक पञ्चकेन प्रमातुरेव सुषुप्ताद्यवस्थाः, त्रयेण तासां हेयोपादेयविभागं निरूपयति, —इत्याह्निकतात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते— तत्रैतन्मातृतानात्रस्थितौ रुद्रोऽधिदैवतम् । भिन्नप्रमेयप्रसरे ब्रह्मविष्णू व्यवस्थितौ ॥ १ ॥ तत्रेति, एवंभूतेऽस्मिन्नागमसिद्धे युक्त्यनुगते च तत्त्वस्वरूपे सति यदेतत् कालादिपञ्चक- वेष्टितं प्रमातृत्तारूपं, तदेव यस्यां शुद्धमुपसंवृतप्रमेयजातं भवति दशायां संहाराख्यायां तस्यामधि- जो हृदय कमल चक्र [ परावाग्रूप ] में अखण्डित स्वभाववाले परम शिव विचित्र-विचित्ररूप से प्रमाताओं की भाँति प्रकट हो जाते हैं, हम उस शिव की स्तुति करते हैं। इस प्रकार तत्त्वराशि प्रमेयरूप से निर्णय कर लेने पर इसके अन्तर्भाव में कहा गया भी मुख्यरूप से निर्णय करना चाहिए, प्रमातृतत्त्व का भी विस्तारपूर्वक निर्णय करने के लिये 'तत्रैतन्मातृतानात्र' इत्यादि से लेकर 'व्यानो विश्वात्मकः परः' यहाँ तक बीस श्लोकों से दूसरे आह्निक का प्रस्ताव करते हैं। जैसा कि इस प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में प्रमाता के अपने स्वरूप की पहचान करने के लिए उपदेश दिया जाता है; क्योंकि वह हेय एवं उपादेयरूप अपने-अपने स्वभाव को जानता हुआ, परम उपादेयरूप शिवभाव को अपने में अभेदपूर्वक समझता हुआ जीवन्मुक्त हो जाता है। प्रथम श्लोक से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन तीनों देवों के स्वरूप का वर्णन किया जायेगा, इसके पश्चात् दो श्लोकों से हेय-उपादेयरूप से प्रमातृतत्त्व के विषय में कहेंगे। इसके बाद सात श्लोकों से उस प्रमातृतत्त्व में जो उपयोगी मल का स्वरूप और उसके द्वारा होनेवाले प्रमाताओं में भेदों का विवेचन किया जायगा। अनन्तर दो श्लोकों से समावेश अर्थात् समाधि अवस्था का स्वरूप बतायेंगे। इसके बाद पाँच श्लोकों से प्रमाता की सुषुप्ति अवस्थाओं अर्थात् उन अवस्थाओं के विषय में विवेचन करेंगे। इसके पश्चात् तीन श्लोकों से हेय-उपादेयता का विभाग प्रस्तुत किया जायेगा, यही इस आह्निक का आशय है। अब ग्रन्थ के अर्थ का निरूपण करते हैं— इस प्रकार केवल प्रमातृत्ता की स्थिति में भगवान् रुद्ररूप से अधिष्ठातृदेव रहते हैं। भिन्न- भिन्न रूपों में प्रमेयतत्त्व के विस्तार होने पर तो ब्रह्मा और विष्णु की व्यवस्था की जाती है ॥ १ ॥ 'तत्रेति' इससे यह अर्थ प्रकट होता है कि आगमसिद्ध तत्त्व स्वरूप की युक्तिपूर्वक सिद्धि हो जाने पर जो यह कालादि पञ्चक से प्रमाता का स्वरूप आवेष्टित है, वही जिसमें प्रमेयरूप