भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

अ.-३, आ.-२, का.-१] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८१ ष्ठातृदेवतात्वं तद्दशासंपादनेन स्वोपासकलोकस्य तद्दशाध्यानावेशसमापन्नस्य स्वाभिमुख्यसंपादनेन च भजमानो भट्टारक ईश्वर एव रुद्रो भगवान्, यो मायापदेऽपि प्राणापानात्मकधर्माधर्मसूर्येन्दु- दिननिशाविमुक्तमध्यमज्योतीरूपप्रमातृस्वरूपस्पर्शाद् उन्मीलिततृतीयनेत्रो, भिन्नस्य तु प्रमेयस्य ‘प्रसरे’ संपादनेऽधिष्ठातृदेवतात्वं भजन् ब्रह्मा, प्रसृते भिन्ने प्रमेये तत्संतानप्रवहणलक्षणे प्रसरेऽधि- ष्ठातृदेवता विष्णुः, अत एव तयोः प्रमेयप्रसररूपस्य ‘इदं नीलम्’ इत्येवं प्रकाशात्मनः प्राधान्यात् ‘अहम्’ इति प्रमातृदशावेशशून्यत्वात् न तृतीयनेत्रोन्मीलनम् । देवतैव दैवतम् । ‘प्रसर’ उत्पत्तिः संतानश्च ॥१॥ शुद्धरूप से उपसंहृत रहता है और संहार अवस्था में अधिष्ठातृदेवता तत्त्व अपनी अवस्थिति के सम्पादन से अपने उपासक लोगों को उस समावेश-समाधि अवस्था की प्राप्ति करने के लिए और अपनी ओर उन्मुख करने से तो सेव्य भट्टारक ईश्वर ही रुद्ररूप से अधिष्ठाता हैं। जो कि मायापद में भी प्राण एवं अपानरूप, सूर्य-चन्द्ररूप, धर्म-अधर्मरूप, रात्रि-दिनरूप इत्यादि से विभाग रहित रहते हैं। उस महाव्योम स्वरूप में प्रमाताओं का अनुप्रवेश कर लेने मात्र से तृतीय नेत्र का उन्मीलन हो जाता है, प्रमेयतत्त्व का भिन्न रूप में विस्तार हो जाने पर तो इसके सम्पादन करने के लिए ब्रह्मा अधिष्ठातृदेव के रूप में रहते हैं, प्रमेयतत्त्व के प्रसृत हो जाने पर भिन्न भिन्नरूप से, उसके समूह बढ़ने लगते हैं तब अधिष्ठातृदेव विष्णु होते हैं। अत एव उन दोनों का प्रमेय विस्तार ‘इदं नीलम्’ इसमें प्रकाशरूप के प्राधान्य होने के कारण, ‘अहम्’ इस प्रमातृ दशा की समावेशता में शून्यरूपता होने के कारण तृतीय नेत्र का विकास नहीं होता है। देवता का भाव ही दैवत है। ‘प्रसर’ शब्द को उत्पत्ति एवं सन्तान अर्थ में लिया गया है॥१॥ १. अत एव प्रपञ्च के गल जाने पर बुद्धि गुण का परम ऐश्वर्य विनष्ट हो जाता है; विनष्ट हो जाने का अर्थ यह है कि उसका दब जाना है न कि अत्यन्त अभाव हो जाना है— तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे । सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्थानावृतः ॥ उस महा आकाश में पहुँचने पर चन्द्रमा और सूर्य ये दोनों ही उसमें प्रलीन हो जाते हैं, प्रबुद्ध साधक को उस दशा में कुछ भी विक्षेप-आवरणादि नहीं होते हैं, किन्तु अज्ञानी लोगों के लिए तो उस अवस्था में भी सुषुप्त-पद के समान अत्यन्त गाढ अन्धकार अवस्था में पड़े हुए जैसी स्थिति रहती है। २. जैसे जाग्रर अवस्था में ब्रह्मा हृदयकमल नाल से उत्पन्न होने के कारण कमलासन कहे जाते हैं इसलिए प्रथम क्षण में उस भाव का आभास रहता है। विष्णु तो स्मृति अवस्था में एवं स्वप्न अवस्था में भी रहते हैं इसलिए पालक कहे जाते हैं। मध्यमा-वैखरीरूप का उल्लासपद, परमेश्वर से लेकर पशु प्रमाता तक प्रामातृवर्ग कण्ठभूमि में वर्तमान रहता है; क्योंकि हृदय में प्रथम पश्यन्ती प्रसरात्मक के प्रतिभास- रूप होने के कारण प्रथम सृष्टि होती है। इसका स्पन्द शास्त्र में उल्लेख किया है— यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् । जिसकी अभी अपने स्वरूप की पूर्ण भाव से अभिव्यक्ति नहीं हुई है, जाग्रत दशा में अपनी इच्छा के अनुकूल, कोई विशेष अभीष्ट वस्तु नहीं दिखायी देती है, फिर क्यों न उसके सामने पदार्थों का ढेर ही हो ? इसीलिए अन्तर्हृदय में विद्यमान धाता चिद्रूप उस साधक के हृदय में सोम एवं सूर्य का ३६