भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२८२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-२-३ यदेतन्मातृतामात्रमुक्तं तस्य विभागमागमकिं च संज्ञाभेदं निरूपयति— एष प्रमाता मायान्धः संसारी कर्मबन्धनः । विद्याभिज्ञापितैश्वर्यश्चिद्धनो मुक्त उच्यते ॥ २ ॥ स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः । मायातो भेदिषु क्लेशकर्मादिक्लुषः पशुः ॥ ३ ॥ मायान्धो विमोहितः, अत एव कर्माणि स्वात्मनो बन्धकान्यभिमन्यमान 'एष' इति कालादिवेष्टितः शून्यादिप्रमाता संसरति, —इत्यतः संसारी । देहोऽपि हि स्वरूपसादृश्यं बाल्य- यौवनादिष्वनुवर्तयन् संसरतीव । बुद्ध्यादेस्तु जन्मान्तरेऽपि संसरणम् । विद्यया तु स्वरूपप्रकाशन- शक्त्या प्रत्यभिज्ञापदं प्रापितमैश्वर्यं यस्य, अत एव शरीराद्यपि विश्वमपि संवेदनमेवाभिमन्य- मानोऽत एव चिदेव घना अन्याचिद्रूपव्यामिश्रणशून्या यस्य रूपं, स पुनर्जन्मबन्धविरहात् देहेऽपि स्थिते 'मुक्त' इति व्यपदेशयोग्यः पतिते तु शिव एकघनः,—इति कः कुतो मुक्तः । भूतपूर्वगत्या तु यह जिसमें प्रमातृरूपता मात्र कह दिया गया है उसका आगमिक विभाग और संज्ञाभेद से निरूपण करते हैं— यह माया से अन्धा होकर प्रमाता कर्म-बन्धन में बद्ध जाता है अतः संसारी जीव हो जाता है । जब विद्या के द्वारा अपने आत्मरूप ऐश्वर्य के समझ लेने पर तो चिद्रूप जीवन् मुक्त कहलाता है ॥ २ ॥ वही प्रमाता अपने अङ्गरूप पदार्थों का स्वामी कहलाता है । माया के द्वारा इन पदार्थों के भेद हो जाने पर क्लेश-कर्मादि से कलुषित होकर पशु [ जीव ] बन जाता है ॥ ३ ॥ माया से अन्धा होकर यह प्रमाता विमोहित हो जाता है, इसीलिए कर्मों को बन्धनरूप मानता हुआ । 'एष' यह प्रमाता कालादि पञ्च कञ्चुकों से आवेष्टित होकर शून्यादि संकुचितरूप में संसरण करता है, इसी कारण यह संसारी जीव हो जाता है; क्योंकि शरीर भी स्वरूप- सादृश्यता को ग्रहण करता हुआ, बाल्य, यौवनादि अवस्थाओं में रहता हुआ संसरण-विचरण करता सा दिखायी देता है । स्वरूप को प्रकाशित करनेवाली विद्या-शक्ति के द्वारा जिसने प्रत्यभिज्ञारूप ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया है, इसी कारण शरीरादि विश्वमात्र को संवेदनमय मानता हुआ, अतः चिद्रूप में ही स्थिर रहता हुआ जिसका स्वरूप अचिद्रूप के मिश्रण से शून्य हो गया है, वह तो जन्म-मृत्यु से रहित होकर देहादि में रहता हुआ भी 'जीवन्मुक्त' कहलाता है । शरोर पात उदय करा देता है अर्थात् उसकी ज्ञानेन्द्रियों में जो वधनात्मक नहीं है ऐसी तीव्र गतिशील शक्ति का प्राकट्य करा देते हैं तथा अपने अभीष्ट वस्तुओं के दर्शन जाग्रत काल में भी करा देते हैं जिसको देखने की साधक को तीव्र इच्छा बनी है । रुद्र अवस्था तो समस्तवाद के उपसंहारात्मक अनाहत परावाग्रूप के अनुप्रवेश करने पर प्रारम्भ भूमि तालु में सब का उपसंहार करनेवाली होने से सुषुप्त अवस्था कही जाती है, इसी कारण ब्रह्मा का हृदय स्थान है, विष्णु का कण्ठ स्थान है, रुद्र का तालु में निवास स्थान है, ईश्वर का भ्रूमध्य भाग में निवास स्थान है तथा सदाशिव का ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर निवास है, अनाश्रितात्मक-शक्ति सोपान के ऊपरी भाग में इन छः कारण धारी परमेश्वर के पद हैं ।