ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 306, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-२, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८३ प्रमात्रन्तरापेक्षया मुक्तः शिवः, —इति व्यवहारः । यश्चासौ मुक्तः स भगवान् स्वाङ्गवदभिमन्य- मानः प्रमिमीते, —इति स तेषां स्वामी स्वरूपपरमार्थसमर्पणाच्च पालकः, —इति पतिरुपदिष्टः शास्त्रे । मायाशक्तिकृतभेदान् व्यतिरिक्तानेव सतो यदा मिमीते तदा तैरेव मेयैः पाशरूपैः पाशितः, —इति पशुरुक्तः । तथाहि वेद्यराशिवशादेवास्याविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशादयः क्लेशाः, धर्माधर्मादिरूपाणि कर्माणि, आदिपदादाशयरूपा वासना, फलभोगरूपो विपाकः, —इति कालुष्यमनन्तप्रकारं, यतः पाशितत्वात् 'पशुः, इत्युक्तः ॥ ३ ॥ यदेवैतत्पशुरूपं तदेवागमेषु त्रिविधं मलम्, —इत्याह— स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । द्विधाणवं मलमिदं स्वस्वरूपापहानितः ॥ ४ ॥ भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम् । कर्तर्यबोधे कार्मं तु मायाशक्त्यैव तत्त्रयम् ॥ ५ ॥ इह ज्ञातृकर्तृरूपं तावच्चित्तत्त्वस्य स्वरूपं, तस्यापहारो नामाणवं मलं येनासावणुः संकु- चितो जातः । तत्र स्वरूपस्य निमीलनं संकोचः, तत्स्थिते बोधरूपे कर्तृत्वलक्षणस्य स्वातन्त्र्यात्मनः जाने पर तो परम शिव में मिल ही जाता है, इस प्रकार कौन किस से मुक्त होता है ? भूतपूर्वगति के अनुसार तो अन्य प्रमाता की अपेक्षा से मुक्त दशावाले परम शिव की स्थिति में ही रहता है—इस प्रकार व्यवहार होता है । अब द्वितीय श्लोक की व्याख्या करते हैं। जो मुक्त दशा में रहनेवाले साधक पदार्थों को अपने अङ्ग स्वरूप मानते हुए, उन्हीं सब का स्वामी हो जाता है और अपने स्वरूप को परमार्थ- रूप से समर्पित कर देने पर तो पालन-पोषण करनेवाला हो जाता है इसी से शास्त्र में पति कहा गया है। माया-शक्ति के द्वारा किये हुए पदार्थों में भेद जब अपने स्वरूप से व्यतिरिक्त मानते हैं तब तो उन्हीं पाशरूप प्रमेयों से पाशित होकर पशु [ जीव ] हो जाता है । इसीलिए इसे पशु कहा गया है । देखिये—वेद्यराशिव शात् अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश आदि क्लेश इनमें होते हैं, धर्म और अधर्मरूप कर्म होते हैं, आदि पद से आशयरूप वासना भी होती है, एव फल भोगरूप विपाक भी होता है, इस प्रकार जीव में असंख्य प्रकार के कालुष्य है; क्योंकि पाश में पाशित होने के कारण पशु बन जाता है इसी कारण शास्त्र में इसे पशु कहा गया है ॥ ३ ॥ यह जो पशुरूप जीव है उसे आगम शास्त्रों में त्रिविध मल से युक्त कहा जाता है,—इस विषय में कहते हैं— स्वातन्त्र्य की हानि और बोधरूप स्वातन्त्र्य का भी ज्ञान न होने देना । यह दो प्रकार का मल है जिसमें कि अपने स्वरूप छिप जाता है ॥ ४ ॥ भिन्न-भिन्न वेद्य प्रथा के फैलाव होने पर माया नामक मल जन्म और भोग को देनेवाला होता है। माया-शक्ति के द्वारा कर्त्ता को अबोधता में तो कार्ममल रहता है ये ही आणव, कार्म और मायीक मल हैं ॥ ५ ॥ इसमें चित्तत्त्व का स्वरूप ज्ञातृत्व और कर्तृत्वरूप से ही माना जाता है, उसके ज्ञान- स्वरूप को छिपा देनेवाला आणव मल है जिस वजह से जीव अणु संकुचितरूप को प्राप्त हो जाता