ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 307, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वरूपान्तरस्य निमीलनं विपर्ययो वा, — इत्युभयथाप्याणवं मलं स्वरूपापहानिरूपमेकमेव । अत्रैवेति, सत्याणवे मले द्विप्रकारे स्वरूपसंकोचे वृत्ते भिन्नस्य यत्प्रथनं तस्य 'मायीयम्' इति संज्ञामात्रम् । मायाकृतत्वेन मायीयता मलत्रयस्यापि । तत्र कर्तुर्बोधरूपस्य देहादेर्भिन्नवेद्यप्रथने सति धर्माधर्मरूपं कार्मं मलं, यतो जन्म भोगश्च स च नियतावधिकः, — इति 'जात्यायुर्भागफलं कर्म' इत्युक्तं भवति ॥ ४-५ ॥ अथैषां मलानां विविक्तविषयनिरूपणात् स्वरूपं स्फुटीकर्तुं 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इत्यस्य तावद्विषयमाह— शुद्धबोधात्मकत्वेऽपि येषां नोत्तमकर्तृता । निर्मिताः स्वात्मनो भिन्ना भर्त्रा ते कर्तृतात्ययात् ॥ ६ ॥ येषां चिन्मात्रमेव परमार्थो न तु 'अहम्' इति स्वात्मविश्रान्त्यानन्दरूपं परमं स्वातन्त्र्यं, ते परमेश्वरेण तथा निर्मिताः स्वात्मनः सकाशाद्व्यतिरिक्ताः । अत्र हेतुः—'कर्तृताया' उत्तम- है, जीव को अपने स्वातन्त्र्य का ज्ञान जिसमें नहीं होता, इसी कारण संकुचितता की सीमा में रह जाता है। उसी बोधरूप अवस्थिति में कर्तृत्वरूप अपने स्वातन्त्र्यरूपता का स्वरूपान्तर हो जाना अथवा विपरीत रूप में भान होने लगना, इस प्रकार उभयथा आणव मल स्वरूप को छिपानेवाला ही होता है। 'अत्रैव' जो कारिका में दिया गया है उससे ज्ञात होता है कि दो प्रकार के आणवमल के रहते हुए, स्वरूप की संकुचितता होने पर जो भिन्नता भासती है उसी का नाम 'मायीय' मल है अर्थात् जिसमें जीव-अणु संकुचितता को प्राप्त हो जाता है। जब कि माया के द्वारा किया हुआ होने के कारण इन तीनों मलों को भी मायीय ही कहा जाता है। देहादि की भिन्नता का फैलाव होने पर तो धर्माधर्मरूप कार्ममल रहता है। जिसमें कि कर्त्ता को अज्ञानता रहती है; क्योंकि यह जन्म और भोग देनेवाला है और वह नियत-निर्धारित अवधि तक ही रहता है, जिसका निरूपण पातञ्जल योग दर्शन में 'जात्यायुर्भागफलं कर्म' इस रूप से किया गया है ॥ ४-५ ॥ अब इन मलों के भिन्न-भिन्न विषयों के निरूपण से स्वरूप की स्पष्टता करने के लिए 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इस पद का पहले विषय दिखाते हैं— जिनमें शुद्ध बोधता रहने पर भी उत्तम कर्तृता नहीं रहती । परमेश्वर ने अपने से भिन्न कर्तृत्व से शून्य उन प्रमाताओं का निर्माण किया है ॥ ६ ॥ जिन प्रमाताओं का केवल चिन्मयरूप ही परमार्थ है उनमें 'अहम्' स्वात्मविश्रान्ति आनन्दरूप प्रत्यवमर्श का अभाव रहता है अर्थात् अहं विमर्श की स्वतन्त्रता नहीं रहती, वे तो परमेश्वर के द्वारा उसी प्रकार अपने स्वरूप से व्यतिरिक्त निर्मित हुए हैं। इसमें हेतु देते हैं— 'कर्तृताया' उन प्रमाताओं में उत्तम स्वातन्त्र्यरूपता का 'अत्ययात्' अभाव होने के कारण; १. जब कि विज्ञानाकल इत्यादि प्रमातृ वर्ग परमेश्वर शिव से अभिन्नरूप ही हैं, इससे किसका स्वातन्त्र्य माना जाय, क्या भगवान् शिव का है अथवा उन विज्ञानाकल प्रमातृ वर्ग का ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं कि जिसमें वैसी-वैसी इच्छा से होने की अप्रतिहत स्वभावता है वही स्वतन्त्र कहलाता है । और वैसी तो भगवान् शिव की ही हो सकती है; क्योंकि अपने आप में परिपूर्ण हैं ।