ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-२, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८५
स्वातन्त्र्यलक्षणाया 'अत्ययात्' अभावात्; परमेश्वरस्य तूत्तमस्वातन्त्र्यावियुक्तबोधरूपत्वम्, — ] इत्यभिप्रायशेषः ॥ ६ ॥ नन्वस्माद्धेतोर्भवतु परमेश्वरात् तेषां भिन्नत्वमन्योन्यतस्तु कथं भेदो बोधरूपस्य व्यापकत्व- नित्यत्वकृतस्य च देशकालाभेदस्य समानत्वात्; अन्योन्यभेदाभावे च 'निर्मितास्ते' इति कथं बहुवचनम् ? इत्याशङ्कां व्यपोहति— बोधादिलक्षणैक्येऽपि तेषामन्योन्यभिन्नता । तथेश्वरेच्छाभेदेन ते च विज्ञानकेवलाः ॥ ७ ॥ इह हि सर्वत्राप्रतिहतशक्तिः परमेश्वर एव तथाबुभूषुस्तथा तथा भवति, नत्वन्यः कश्चित् परमार्थतोऽस्ति,—इत्यसकृदुक्तम्; ततश्च व्यापकनित्यबोधस्वभावोऽपि 'अहं भेदेन निर्भासे' इत्येवं- भूतेनेश्वरेच्छाविशेषेण तेषां शरीरादिशून्यान्तप्रमातृपदोत्तीर्णानां बोधत्वनित्यत्वविभुत्वादिधर्मजा- तस्यैक्येऽप्यन्योन्यं भेदः, ते च शास्त्रे विज्ञानकेवला उक्ताः । तत्र विज्ञानकेवलो मलैकयुक्तः,— किन्तु परमेश्वर में उत्तम कर्तृत्वरूप स्वातन्त्र्य अवियुक्त सदैव बना रहता है, यही इसका आशय है ॥ ६ ॥ इस प्रकार शङ्का होती है कि इस हेतु को लेकर भले ही परस्पर उनकी परमेश्वर से भिन्नता रहे, किन्तु ज्ञानरूप के व्यापकत्व-नित्यत्व तथा देश-काल के अभेद की समानता होने के कारण कैसे भेद रहेगा अर्थात् देश-काल के भेद का बोधस्वभाव के प्रति अभेदरूपता होने से और उनका आपस में परस्पर भेद न रहने पर 'निर्मितास्ते' इस पद में क्यों बहुवचन का प्रयोग किया हुआ है ? इस आशङ्का का निराकरण करते हैं— बोधादिरूप की एकता रहने पर भी परमेश्वर की इच्छा भेद से वैसा ठीक होने की रहती है, इससे परस्पर उन प्रमाताओं की भिन्नता भासती हैं और वे विज्ञानाकल कहलाते हैं ॥ ७ ॥ इसमें तो सर्वत्र अप्रतिहत-शक्ति संपन्न परमेश्वर ही वैसे-वैसे अनेकरूपों में अपनी स्वयं की इच्छा से हो जाते हैं। उससे भिन्न कोई अन्य परमार्थ नहीं दिखता, ऐसा हमने अनेक बार कहा है, इसलिए यह व्यापक नित्य बोध स्वभाववाला होने पर भी 'अहं भेदेन निर्भासे' अहं भेदपूर्वक निर्भासित होता है, इस प्रकार ईश्वर की इच्छाविशेष रहने के कारण उन शरीरादि से लेकर शून्यान्त प्रमातृपद से उत्तीर्ण होनेवालों का बोधरूपत्व, व्यापकत्वादि धर्मसमूह के ऐक्यरूप रहने पर भी परस्पर भेद रहता है, उन्हें शास्त्र में विज्ञानाकल शब्द से पुकारते हैं । इन विज्ञाना- १. जब 'अहम्' प्रत्यवमर्श नित्य, व्यापक, बोधसार स्वभाववाले होते हुए भी भेद से भासते हैं तब तो विज्ञानाकल इत्यादि प्रमाताओं का तो भेद पूर्वक भासना स्वाभाविक ही है; क्योंकि वे परस्पर ग्राह्यों से और ग्राहकान्तरों से भिन्न होकर रहते हैं इसलिए शास्त्र में इन्हीं को विज्ञानाकल कहा है । इस शब्द की व्युत्पत्ति है कि विज्ञान + अकल इसमें विज्ञान मात्र रहता है, कर्तृत्व-शक्ति से शून्य है, पूर्व अवस्थावाला जो सकल प्रमाता और प्रलयाकल प्रमाता का प्रमेय क्षेत्र था वही प्रमेय क्षेत्र इस विज्ञाना- कल में कुछ विकसित हो जाता है, शेष तो पूर्ववत् ही रहता है। इसमें अपना अभेद देखता है; क्योंकि इसमें से मायीय और कार्ममल का अभाव रहता है, मात्र आणवमल रह जाता है। इससे सिद्ध हुआ कि कर्तृत्व से शून्य इन विज्ञानाकल आदि का स्वभाव है ।