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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-३, आ.-२, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८५

स्वातन्त्र्यलक्षणाया 'अत्ययात्' अभावात्; परमेश्वरस्य तूत्तमस्वातन्त्र्यावियुक्तबोधरूपत्वम्, — ] इत्यभिप्रायशेषः ॥ ६ ॥ नन्वस्माद्धेतोर्भवतु परमेश्वरात् तेषां भिन्नत्वमन्योन्यतस्तु कथं भेदो बोधरूपस्य व्यापकत्व- नित्यत्वकृतस्य च देशकालाभेदस्य समानत्वात्; अन्योन्यभेदाभावे च 'निर्मितास्ते' इति कथं बहुवचनम् ? इत्याशङ्कां व्यपोहति— बोधादिलक्षणैक्येऽपि तेषामन्योन्यभिन्नता । तथेश्वरेच्छाभेदेन ते च विज्ञानकेवलाः ॥ ७ ॥ इह हि सर्वत्राप्रतिहतशक्तिः परमेश्वर एव तथाबुभूषुस्तथा तथा भवति, नत्वन्यः कश्चित् परमार्थतोऽस्ति,—इत्यसकृदुक्तम्; ततश्च व्यापकनित्यबोधस्वभावोऽपि 'अहं भेदेन निर्भासे' इत्येवं- भूतेनेश्वरेच्छाविशेषेण तेषां शरीरादिशून्यान्तप्रमातृपदोत्तीर्णानां बोधत्वनित्यत्वविभुत्वादिधर्मजा- तस्यैक्येऽप्यन्योन्यं भेदः, ते च शास्त्रे विज्ञानकेवला उक्ताः । तत्र विज्ञानकेवलो मलैकयुक्तः,— किन्तु परमेश्वर में उत्तम कर्तृत्वरूप स्वातन्त्र्य अवियुक्त सदैव बना रहता है, यही इसका आशय है ॥ ६ ॥ इस प्रकार शङ्का होती है कि इस हेतु को लेकर भले ही परस्पर उनकी परमेश्वर से भिन्नता रहे, किन्तु ज्ञानरूप के व्यापकत्व-नित्यत्व तथा देश-काल के अभेद की समानता होने के कारण कैसे भेद रहेगा अर्थात् देश-काल के भेद का बोधस्वभाव के प्रति अभेदरूपता होने से और उनका आपस में परस्पर भेद न रहने पर 'निर्मितास्ते' इस पद में क्यों बहुवचन का प्रयोग किया हुआ है ? इस आशङ्का का निराकरण करते हैं— बोधादिरूप की एकता रहने पर भी परमेश्वर की इच्छा भेद से वैसा ठीक होने की रहती है, इससे परस्पर उन प्रमाताओं की भिन्नता भासती हैं और वे विज्ञानाकल कहलाते हैं ॥ ७ ॥ इसमें तो सर्वत्र अप्रतिहत-शक्ति संपन्न परमेश्वर ही वैसे-वैसे अनेकरूपों में अपनी स्वयं की इच्छा से हो जाते हैं। उससे भिन्न कोई अन्य परमार्थ नहीं दिखता, ऐसा हमने अनेक बार कहा है, इसलिए यह व्यापक नित्य बोध स्वभाववाला होने पर भी 'अहं भेदेन निर्भासे' अहं भेदपूर्वक निर्भासित होता है, इस प्रकार ईश्वर की इच्छाविशेष रहने के कारण उन शरीरादि से लेकर शून्यान्त प्रमातृपद से उत्तीर्ण होनेवालों का बोधरूपत्व, व्यापकत्वादि धर्मसमूह के ऐक्यरूप रहने पर भी परस्पर भेद रहता है, उन्हें शास्त्र में विज्ञानाकल शब्द से पुकारते हैं । इन विज्ञाना- १. जब 'अहम्' प्रत्यवमर्श नित्य, व्यापक, बोधसार स्वभाववाले होते हुए भी भेद से भासते हैं तब तो विज्ञानाकल इत्यादि प्रमाताओं का तो भेद पूर्वक भासना स्वाभाविक ही है; क्योंकि वे परस्पर ग्राह्यों से और ग्राहकान्तरों से भिन्न होकर रहते हैं इसलिए शास्त्र में इन्हीं को विज्ञानाकल कहा है । इस शब्द की व्युत्पत्ति है कि विज्ञान + अकल इसमें विज्ञान मात्र रहता है, कर्तृत्व-शक्ति से शून्य है, पूर्व अवस्थावाला जो सकल प्रमाता और प्रलयाकल प्रमाता का प्रमेय क्षेत्र था वही प्रमेय क्षेत्र इस विज्ञाना- कल में कुछ विकसित हो जाता है, शेष तो पूर्ववत् ही रहता है। इसमें अपना अभेद देखता है; क्योंकि इसमें से मायीय और कार्ममल का अभाव रहता है, मात्र आणवमल रह जाता है। इससे सिद्ध हुआ कि कर्तृत्व से शून्य इन विज्ञानाकल आदि का स्वभाव है ।

२८६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-८ इत्यादौ 'विज्ञानं' बोधात्मकं रूपं 'केवलं' स्वातन्त्र्यविरहितमेषामिति ॥ ७ ॥ एवं 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इत्यस्य भागस्य विज्ञानाकलविषयतामुक्त्वा 'स्वातन्त्र्य- स्याप्यबोधता' इत्यमुमंशं विषयप्रदर्शनेन स्पष्टयति— शून्याद्यबोधरूपास्तु कर्तारः प्रलयाकलाः । तेषां कार्मों मलोऽप्यस्ति मायोयस्तु विकल्पितः ॥ ८ ॥ शून्ये जडत्वादबोधरूपे एव, यदि वा प्राणे बुद्धौ वा येषाम् अहमिति चमत्कारयोगात् कर्तृत्वं ते प्रलयेन कृताः 'अकल:' कलातत्त्वोपलक्षितकरणकार्यरहिता अबोधरूपाः कर्तारश्च । प्रलयावधि हि ते तथाभूता उत्तरकालं तु कार्यकारणसंबद्धा एव भवन्ति; यतस्तेषां न केवलमुक्त रूप आणव एव मलो यावत् कार्मोऽपि वासनासंस्काररूपो धर्माधर्मात्मास्त्येव । यद्येवं, भिन्नवेद्य- प्रथाप्येषां स्यात् । सत्यम्, संवेद्यरूपे सुषुप्तपदे, ऽपवेद्ये तु न भवति; तेन मायीयो मल एषां विकल्पितो व्यवस्थितविषयत्वेन । तथा हि—केऽपि शून्यादिभागविश्रान्ता गाढनिद्राजडीकृता अपवेद्यसुषुप्तपदभाजः । अन्ये तु बुद्ध्यादिनिष्ठाः सुखदुःखावशेषसामान्यात्मकभिन्नवेद्यसंवेदन- कलों में मात्र एक ही मल रहता है, 'विज्ञानं' ज्ञानात्मक रूपता ही 'केवलं' मात्र इनमें है, परम स्वातन्त्र्य का अभाव विज्ञानकलों में रहता है ॥ ७ ॥ इस प्रकार 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इस भाग से विज्ञानाकल की विषयता को लेकर कह दिया 'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इस अंश का विषय दिखाने के लिए स्पष्ट करते हैं— शून्यादि प्रमातृवर्ग तो अबोधरूप होने से प्रलयाकल कर्ता कहे जाते हैं। उन प्रलयाकलों में कार्ममल भी रहता है, किन्तु मायीयमल तो विकल्परूप से रहता है ॥ ८ ॥ जडरूप होने के कारण अबोधरूप प्राण और बुद्धि में जिनकी 'अहन्ता' अर्थात् चमत्कार सारपूर्वक कर्तृत्व-शक्ति रहती है वे प्रलयाकल कहे जाते हैं; कलातत्त्व से उपलक्षित कार्य-कारण से रहित बोधरूप कर्ता होते हैं; क्योंकि वे लोग प्रलय पर्यन्त वैसे के वैसे रहते हैं और उत्तरकाल में तो कार्य-कारणभाव से सम्बन्धित होकर अवस्थित रहते हैं; जब कि उनमें केवल पहले कहा हुआ आणवमल ही नहीं रहता, अपितु वासना संस्काररूप धर्मा-धर्मात्मक कार्ममल भी रहता है। यदि ऐसी बात है, तब तो इनमें भिन्न प्रथा भी रहेगी। [ आपका कहना ] ठीक ही है, सवेद्यरूप सुषुप्तपद में तो है, किन्तु अपवेद्य में तो नहीं होता है; इसलिए इन प्रलयाकलों में मायीयमल विकल्पित विषयरूप से व्यवस्थित होकर रहता है। देखो—कोई तो शून्यादि भाग में विश्रान्त होकर गाढनिद्रा में जडीभूत हुए कुछ भी नहीं समझते और सुषुप्तपद में पड़े रहते हैं। दूसरे प्रमातृवर्ग तो बुद्धि इत्यादि में रहनेवाले सुख एवं दुःख को सामान्य विशेषरूप से भिन्न-

यह ठीक नहीं है, जब ईश्वर की इच्छा बोधसार स्वभाववाले को भेद से युक्त करती है तो बोधात्मक स्वभाववाले का ही भेद क्यों करते हैं ? प्रमातृ-तत्त्व से भिन्न घटादि वर्ग में भेद उत्पन्न करे ? क्योंकि हमने इस विषय में अनेक बार कह दिया है कि इसको छिपाना बड़ा ही कठिन होगा इसमें ऐसा होना तो स्वाभाविक है और मैं कृश हूँ, मैं सुखी हूँ, इत्यादि भेद तो इसमें कदम-कदम पर भरे पड़े हुए दिखायी देते हैं ।

अ.-३, आ.-२, का.-९-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८७ योगिनः सवेद्यसौषुप्तपदलीनाः। स्थूलदेहेन्द्रियात्मककार्यकरणवियोगरूपत्वं तु प्रलयाकललक्षणं सर्वेषां तुल्यम् ॥ ८॥ एवं 'स्वातन्र्यस्याप्यबोधता' इत्येवमंशः स्फुटीकृतः, प्रसङ्गाच्च कार्ममलस्य विषयो दर्शितः, मायामलस्य च पाक्षिकत्वमुक्तम् । अधुना पुनराणवकार्ममलद्वयाभावेऽपि शुद्धोऽस्ति मायाख्यस्य मलस्य विषयः,–इति दर्शयति— बोधानामपि कर्तृत्वजुषां कार्ममलक्षतौ । भिन्नवेद्यजुषां मायामलो विद्येश्वराश्च ते ॥ ९ ॥ ये चिन्मात्रमेवात्मतया पश्यन्ति 'अहम्' इति च चमत्का रोल्लासात् कर्तारस्तत एव सर्वज्ञाः सर्वकर्तारश्च ते विद्येश्वराः। किन्तु तनुक रणभुवनादि यदेषां वेद्यतया कार्यतया च भाति तत् कुविन्दपटदृष्ट्या भिन्नमेव सत्,—इत्यास्ति विद्येश्वराणां मायाख्यमलयोगः ॥ ९ ॥ अथ मलत्रयस्यापि यौगपद्येन यो विषयस्तं दर्शयितुमाह— देवादीनां च सर्वेषां भविनां त्रिविधं मलम् । तत्रापि कार्ममेवैकं मुख्यं संसारकारणम् ॥ १० ॥ भिन्न वेद्य संवेदन ज्ञानवाले संवेद्य सौषुप्तपद में लीन रहते हैं। स्थूलेन्द्रियात्मक कार्य-कारण के अभाव में तो इन सभी प्रलयाकल लक्षणवालों में समानरूपता बनी रहती है ॥ ८ ॥ इस प्रकार 'स्वातन्र्यस्याप्यबोधता' इस अंश की स्पष्टतापूर्वक व्याख्या कर दी और प्रसङ्ग को लेकर कार्ममल का भी विषय दिखा दिया तथा मायामल का पाक्षिकत्व [ कभी रहना एवं कभी न रहना ] कह दिया । अधुना पुनः आणवमल एवं कार्ममल इन दोनों के अभाव में भी माया नामक मल का विषय शुद्ध होता है, इसी को दिखाते हैं— मायामल के विनष्ट हो जाने पर कर्तृत्व प्राप्त करनेवाले ज्ञानियों में भी जो कि भिन्नरूप से वेद्य को जानते हैं उन्हीं में मायामल रहता है और वे विद्येश्वर कहे जाते हैं ॥ ९ ॥ जो चिन्मात्र को ही आत्मरूप से देखते हैं, उन्हीं में 'अहम्' इस चमत्कार उल्लास से अप्रतिहत ज्ञान-क्रिया रहती है इसी से वे सर्वज्ञ, सर्वकर्ता विद्येश्वर कहलाते हैं । किन्तु जिनको सूक्ष्मरूप में करण भुवनादि अनेक वेद्यरूप से और कार्यरूप से दिखायी देता है, तन्तुवाय वस्त्र की दृष्टि से अत्यन्त भिन्न ही वह सद्रूप में रहता है, अतः विद्येश्वरों में मायामल का योग रहता है ॥९॥ अब आणव, कार्म और मायीय इन मलों का एक साथ जो विषय है उसे दिखाने के लिए कहते हैं— सभी देवताओं और सांसारिक जीवों में ये तीनों मल रहते हैं। उनमें भी एकमात्र कारण संसार के लिए कार्ममल ही है ॥ १० ॥ १. अहम् प्रत्यवमर्श में अभिन्नरूप से भाव विद्येश्वर लोगों का होने के कारण कर्तृत्व-शक्ति से युक्त रहते हैं इसीलिए सर्वज्ञ सर्वकर्तार भी कहे जाते हैं जब अप्रतिहतरूप से ज्ञान एवं क्रिया-शक्ति के रह जाने पर तो आणवमल का न रहना स्वाभाविक ही सिद्ध हो जाता है; क्योंकि अप्रतिहत ज्ञान एवं क्रिया-शक्ति तो सर्वकर्तृत्ववालों में ही रहती है और उनमें आणवमल का सर्वथा अभाव ही रहता है । वे लोग संसार से उत्तीर्ण हो जाने के कारण कर्म संसार से शून्य हो जाते हैं ।

२८८] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१०

इह विद्येश्वरविज्ञानाकलास्तावन्न भविनो मायान्ताध्वातिक्रमणात्; प्रलयाकला अपि कंचित्कालमविद्यमानभवाः । ये त्वेते मायातत्त्वान्तरालपरिवर्तिनो देवादयः स्थावरान्ताश्चतुर्द- र्शधा शास्त्रेषु परिगणितास्ते सर्वे 'भविनः' संसारिणः, तेषां च त्रयोऽपि युगपन्मलाः । ननु मलत्रयमध्ये कतमो मलः संसरणमेषां संपादयेत् ? आह, 'तत्रापि' तेषु त्रिष्वपि सत्सु कार्मं मलं विद्येश्वर और विज्ञानाकल इत्यादि लोग संसारी नहीं होते; क्योंकि ये लोग तो मायाध्व से ऊपर उठे हुए होते हैं; प्रलयाकल प्रलय पर्यन्त ही रहते हैं इसके बाद मुक्त हो जाते हैं। ये जो भी मायातत्त्व के भीतर हैं वे सब के सब परिवर्तन गतिवाले देवताओं से लेकर स्थावर तक सभी जीव तथा शास्त्रों में जो चतुर्दश भुवनों में रहनेवाले को गिने गये हैं वे सभी 'भविनः' संसारी हैं और उनमें आणवमल, कार्ममल और मायीयमल एक साथ ही रहते हैं। अब शङ्का होती है कि इन तीनों मलों में से कौन सा मल संसार के लिए हेतु माना जाय ? इस पर कहते हैं कि 'तत्रापि' १. प्रलयाकल को प्रलय केवली एवं शून्य-प्रमाता के नामों से भी कहे जाते हैं। प्रलयाकल प्रमाता में माया का प्राधान्य है जिससे अहं प्रत्यवमर्श का स्फुट रूप में ज्ञान नहीं हो पाता है और न तो 'इदम्' का ही स्फुट बोध हो पाता है इसमें प्रायः चेतना-शक्ति की शून्य अवस्था बनी रहती है जिस तरह सुषुप्ति अवस्था में शून्य जैसा बोध होता है वैसा ही इसको भी शून्य बोध होता है। प्रलयाकल में सृष्टि और संहार के मध्य में प्रकृति से तादात्म्य रहता है और शून्य दशा में गये हुए साधक की भी स्थिति वैसी होती है। प्रलय अर्थात् संहार अवस्था में कला इत्यादि के विलीन हो जाने पर नूतन सृष्टि के प्रारम्भ काल में होने तक प्रलयाकल मायातत्त्व में विद्यमान रहते हैं इनमें आणवमल और मायीयमल मुख्यरूप से रहते हैं एवं कार्ममल का अभाव रहता है। २. अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति। मानुष्यश्चैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः। संक्षेप में भौतिक सृष्टि चौदह प्रकार की होती है। जिसमें ब्राह्म, प्राजापत्य, ऐन्द्र, पैत्र, गान्धर्व, याक्ष तथा पैशाच यह आठ प्रकारकी सृष्टि देवताओंकी मानी जाती है। इनमें ब्रह्म सम्बन्धी ब्रह्मलोक तीन हैं सत्यलोक, तपलोक, जनलोक । सत्य लोक में स्वयं ब्रह्मा का निवास रहता है, अथवा 'ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति' इस न्याय से स्वयं ब्रह्मभूत जीव जो कि प्रत्यक्ष दर्शी ॐकार के उपासक परमहंस रूप उसमें निवास करते हैं। तपलोक सत्यलोक के नीचे हैं- अभास्कर, महाभास्कर, सत्यमहाभास्करसंज्ञक देवता लोग जो कि ब्रह्मा के साक्षात् निकट रहते हैं। इसके नीचे तपलोक है जितेन्द्रिय, ब्रह्मपुरोहित, ब्रह्म कायिक, ब्रह्म महाकायिक लोग निवास करते हैं। महातापक प्रजापति के लोक में कुमुद, ऋभव, पतर्दन, अजनाभ, अमिताभ संज्ञक एक सहस्र कल्प की आयुवाले देवता लोग निवास करते हैं। इसके नीचे स्वर्ग नामक ऐन्द्रलोक में अणिमा, लघिमा, वशित्व इत्यादि सिद्धिवाले सिद्ध लोग जो कि स्वेच्छा से शरीर धारण करनेवाले होते हैं उनकी एक कल्प की मात्र आयु होती है। पैत्रलोक में पितृ लोग रहते हैं। सुमेरु पर्वत के पृष्ठ भाग में गान्धर्व लोक है जिसमें गन्धर्व, किन्नर आदि रहते हैं गन्धमादन पर्वत पर यक्ष लोग हैं जिसमें यक्ष कुबेर सयूथ निवास करते हैं। वितल लोक को छोड़कर अतल सुतल, तलातल, रसातल आदि छः लोकों में राक्षसों का निवास है। वितल में भूत पिशाच, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड विनायक आदि लोग निवास करते हैं और पशु, पक्षी, मृग, सर्प, वृक्ष इत्यादि, तिर्यक् जातीय सृष्टि पाँच प्रकार की है और एक प्रकार की मानुषी सृष्टि है।

अ.-३, आ.-२, का.-११-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८९ मुख्यतया संनिपत्य संसरणे कारणम् । यथोक्तम् 'कर्मतस्तु शरीराणि विषयाः करणानि च ।' इति । तनूकरणविषयसंबन्ध एव च वर्तमानो भविष्यंश्च, — इत्यनवरतं प्रबन्धतो वर्तमानः संसरणमुच्यते । आणवमायामलौ तु यद्यपि न कारणं संसारे, तथापि कार्मण विना तौ देहादि- विचित्रभावाभिनिर्वर्तनशक्तिशून्यौ विज्ञानाकलादिषु, — इति मुख्यं कार्ममेव मलं संसारकारणं तत्र तत्र शास्त्रे गण्यते । अत एव तदुपक्षये वृत्ते दत्तस्तावदसंसरणसोपानपदबन्धः, — इत्याशयेन कर्मबन्धाभिमानपरिहानिरेव यत्नतः सांख्यपुराणभारतादिशास्त्रेषूपदिश्यते । एवं मलत्रयस्यैकैक- भेदैस्त्रिभिर्द्विभेदैस्त्रिभिश्चैकभेदेनैकेन, — इति सप्त प्रमातार उत्तिष्ठन्ति । तथा च शास्त्रे 'शिवादि- सकलान्ताश्च शक्तिमन्तः सप्त ।' इत्युक्तम् । तत्राप्यवान्तरभेदेन गुणमुख्यताभेदेन विकल्पसमुच्चयता- विभेदेन चानन्तप्रकारत्वमिति ॥ १० ॥ अस्य च मलत्रयस्योद्भवतिरोभावभेदात् संसारिणां प्रकारद्वयम्, — इति दर्शयति— कलोद्बलितमेतच्च चित्त्तत्त्वं कर्तृतामयम् । अचिद्रूपस्य शून्यादेर्मितं गुणतया स्थितम् ॥ ११ ॥ मुख्यत्वं कर्तृतायाश्च बोधस्य च चिदात्मनः । शून्यादौ तद्गुणे ज्ञानं तत्समावेशलक्षणम् ॥ १२ ॥ उन मलों में मुख्यरूप से तो संसरण-आवागमन चक्र में डालनेवाला कार्ममल है। इस विषय में कहा गया है कि कर्म से शरीरादि विषय और इन्द्रिय वर्ग हुआ करते हैं। तनूकरण इन्द्रियों का जो विषम सम्बन्ध है वही वर्तमान और भविष्य है, इस प्रकार निरन्तर अबाध्य गतिपूर्वक अनादिकाल से चलनेवाला संसार कहा जाता है, आणवमल और मायामल यद्यपि संसार के लिए निमित्त नहीं होते, तथापि कार्ममल के बिना आणवमल और मायीमल दोनों देहादि विचित्रभाव के निर्माण के लिए असमर्थ होते हैं। जैसे विज्ञानकलों में देखा जाता है, इस प्रकार शास्त्र में कार्ममल को ही संसार के लिए मुख्य कारण माना गया है। अत एव उसके क्षय हो जाने पर तो जीव संसरण अर्थात् जन्म-मरणरूपी सोपान से मुक्त हो जाता है, इस आशय से कर्म बन्धन के अभिमान को यत्न के साथ बन्द करने के लिए ही सांख्य, पुराण, महाभारतादि शास्त्रों में उपदेश दिया गया है। इस प्रकार तीनों मलों का एक भेद से, दो भेदों से और तीनों भेदों से तथा एक भेद से सात प्रमाता हो जाते हैं। तथा शास्त्र में कहा गया है— शिव से लेकर [ शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, विद्येश्वर, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल ] प्रमाता तक सात प्रमाता शक्तिशाली होते हैं।' उनमें भी अवान्तर भेद, मुख्य गौण के भेद और विकल्प समुच्चय के भेद से असंख्य प्रमाता हो जाते हैं ॥ १० ॥ इस प्रकार इन तीनों मलों के उत्पन्न एवं तिरोहितभाव के भेद से संसारी जीवों के दो प्रकार की गति हो जाती है, इसे दिखाते हैं— कला से प्रकाशित होकर चित्तत्त्व कर्तृता से मिला हुआ, अचिद्रूप शून्यादि के गौणभाव से रहनेवाला परिमित-परिच्छिन्न हो जाता है ॥ ११ ॥ वह चिदात्मक ज्ञान का एवं कर्तृत्व का मुख्य कारण होता है। गौणशून्यादि में वही समा- वेशरूप ज्ञान कहा जाता है ॥ १२ ॥ ३७

२९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-११-१२ एतच्चेति, यत् त्रिदशादीनां भविनां चैतन्यं कर्तृतांशस्य प्राधान्यान्मलेन संविद्भागस्य निमज्जितत्वात् कर्तृतामयं चिद्रूपस्य तत्त्वं स्वातन्त्र्यं कलारूपेण परमेश्वरशक्त्यात्मना तत्त्वेन 'उपोद्वलितम्' अनुप्राणितं मलेन न्यक्कृतं सद्बुद्धोधितं शून्यादेर्देहपर्यन्तस्य मायाप्रमातुः संबन्धि, 'गुणत्वेन अप्रधानत्वेन स्थितं, यतो 'मितम्' इदन्तापन्नदेहादिशून्यान्तप्रमेयभागनिमग्नत्वात् प्रमेयं, यो गौरो, यः सुखी, यस्तृषितो, यः सर्वरूपरहितः सोऽहम्,—इति हि इदन्तैवान्तर्ली- नाहंभावा संसारिणां परिस्फुरति । सेयं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तरूपा संसारावस्था । यदा तूक्तगुरूपदेशा- दिदिशा तेनैवाहंभावेन स्वतन्त्र्यात्मना व्यापकत्वनित्यत्वादिसंपरामर्शाभात्मनि विदधता ततः शून्यादेः प्रमेयादुन्मज्ज्येवास्यते तदा तुर्यातीतावस्था । यदापि परामृष्टतथाभूतवैभवनित्यैश्वर्यादि- धर्मसंभेदेनैवाहंभावेन शून्याविदेहधात्वन्तं सिद्धरसयोगेन विध्यते, तदास्यां तुर्यदशायां तदपि प्रमेयतामुज्झतीव । सेयं द्वय्यपि जीवन्मुक्तावस्था 'समावेश' इत्युक्ता शास्त्रे । सम्यगावेशनमेव हि तत्र तत्र प्रधानं, तत्सिद्धये तूपदेशान्तराणि । यथा गीतम्—'मय्यावेश्य मनो ये मां ।' (गी० १२।२) इति 'अथावेशयितुं चित्तं ।' (गी० १२।९) इत्यादि च । समावेशपल्लवा एव च प्रसिद्धदेहादिप्रमातृभागप्रह्वीभावभावनानुप्राणिताः परमेश्वरस्तुतिप्रणामपूजाध्यानसमाधिप्रभृतयः जो देव लोग हैं उनमें कर्तृत्व का अंश प्रधान होने के कारण और मल से संवित् ज्ञानांश तिरोहित हो जाने से कर्तृत्वमय जो चेतन है उसके स्वातन्त्र्य कलारूप परमेश्वर की शक्तिरूप तत्त्व से तिरस्कृत हो जाने के कारण शून्यादि से लेकर देह पर्यन्त माया प्रमाता का सम्बन्धी बनता है, वह 'गुणत्वेन' अप्रधान होकर रहता है जिससे 'मितं' परिमित कहलाता है और देहादिरूप में आया हुआ देह से लेकर शून्य तक प्रमेय भाग में डूबा हुआ होने के कारण वह प्रमेय भी कहलाता है, जिस कारण यह भान होता है कि यह गौर है, यह सुखी-समृद्ध है, यह प्यासा है, सब रूप से रहित वही मैं हूँ, इसी इदन्ता के भीतर लीन होकर अहंभावना जीवों में स्फुरित होती है । वही यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तिरूप से संसार अवस्था कही जाती है । जब गुरु के उपदेशामृत को सुन कर उस स्वतन्त्ररूप अहंभाव से व्यापकत्व, नित्यत्व, शुद्धत्वादि अपने धर्मों का परामर्श करता हुआ उन शून्यादि प्रमेय से ऊपर उठ जाता है तब उस की तुर्यातीत अवस्था हो जाती है । उस परामर्श में अपना नित्य ऐश्वर्यादि धर्मों का परामर्श करके अहंभाव के द्वारा शून्यादि देहधातु तक छेदा हुआ रहता है । जैसा कि सिद्धरस से स्वर्ण, तब प्रमेयत्व को छोड़ता हुआ सा उस तुर्यातीत अवस्था में भी आत्मा के स्वरूप का बोध करने लगता है । इसलिए इन दोनों को जीवन्मुक्त अवस्था 'समावेश' शास्त्र में कहा है; क्योंकि उसमें अच्छी प्रकार समाहित ही जाना ही प्रधान माना जाता है, उसकी सिद्धि के लिए दूसरे उपदेश भी कहते हैं । 'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्य युक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः [ १२-२ ] श्रीमद्भगवद्- गीता में श्री कृष्णचन्द्र ने कहा है कि मुझ वासुदेव परमात्मा में जो भक्त अपने मन को श्रद्धा एवं भक्ति से स्थिर करता है वह परम उत्तम योगी माना जाता है । 'अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।।' [ १२-९ ] हे अर्जुन ! जो मुझ में चित्त को समाहित करने में असमर्थ हो, ता तुम अभ्यास के बल से भी मुझे पाने की इच्छा कर तुच्छ समावेश ही प्रसिद्ध प्रमातृभाव के अपने में लीन होने से

अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९१ कर्मप्रपञ्चाः । यद्गीतमपि—'अभ्यासेऽप्यसमर्थः सन्मत्कर्मपरमो भव ।' (गी० १२।१०) इति । देहपाते तु परमेश्वर एवैकरसः,—इति कः कुत्र कथं समाविशेत् । तदेतदाह यत् पुनः कर्तृताया मुख्यत्वं तन्नान्तरीय Broadway कश्च शून्यादेर्गुणभावः, तस्मिंश्चाप्यचिद्रूपे गुणीभूते 'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इति मलव्यापारस्यापहस्तनात् चितो योऽपरोऽप्यात्मभागो बोधलक्षणो मलेन न्यक्कृतोऽभूत् तस्यापि अधुनोन्मग्नत्वेन मुख्यत्वम् । यच्च कर्तृताया 'मुख्यत्वम्' उन्मग्नता, इदमेव ज्ञानमज्ञा- नात्मकमलप्रतिपक्षत्वात्; तदेतन्मुख्यत्वं समावेशस्य लक्षणं येन देहस्थितोऽपि 'पतिः' इति 'मुक्त' इति शास्त्रेषूक्तः ॥ ११-१२ ॥ नन्वेवं पत्युः समावेशात्मिका तुर्यतदतीतरूपा भवतु दशा, पशोस्तु कथं सुषुप्तस्वप्न- जाग्रद्दशाभेद आगमेषूक्तः,—इत्याशङ्क्य सुषुप्तस्वरूपमेव तावदाचष्टे श्लोकत्रयेण— शून्ये बुद्ध्याद्यभावात्मन्यहन्ताकर्तृतापदे । अस्फुटारूपसंस्कारमात्रिणि ज्ञेयशून्यता ॥ १३ ॥ साक्षाणामान्तरी वृत्तिः प्राणादिप्रेरिका मता । जीवनाख्याथवा प्राणेऽहन्ता पुर्यष्टकात्मिका ॥ १४ ॥ परमेश्वर को स्तुति-प्रार्थना, प्रणाम, पूजा, ध्यान, समाधि प्रभृति प्रपञ्च बहुत से करने पड़ जाते हैं । जो कि गीता भी यही कहती है 'अभ्यासेऽप्यसमर्थः सन्मत्कर्मपरमो भवः । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि [१२-१०] अभ्यास करने में भी समर्थ न हो, तो मुझे प्रसन्न करनेवाले व्रत, नियम, दान, पूजन, अर्चन, जप, तप, स्तवन, कीर्त्तन, श्रवण इत्यादि कर्म करने में तत्पर हो; इससे भी चित्त की शुद्धि होगी और चित्तशुद्धि के द्वारा मोक्षरूपी सिद्धि को प्राप्त कर लेगा । शरीर के छूट जाने पर तो परमेश्वर में एकता हो ही जाती है, इस प्रकार कौन कहाँ और कैसे संमिलित हो सकता है ? इसका उत्तर देते हैं कि उसमें जो कर्तृत्व की प्रधानता है वह आवश्यक शून्यादि का गौणभाव नहीं है, उसका जडरूप गौण हो जाने पर स्वतन्त्रता का भी बोध नहीं होता है—'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इसी कारण मल के व्यापार दब जाने से चेतन का जो दूसरा ज्ञान लक्षण आत्मांश था, वह भी मल से तिरस्कृत हो जाता है इसलिए उस भाग के भी स्फुटित होने से उसमें मुख्यत्व आ जाता है । जिसको कर्तृता का मुख्य स्फुरण कहते हैं, यही अज्ञानात्मक मल प्रतिपक्षी हो जाने से वह ज्ञान स्वरूप होता है; इसी का नाम मुख्य समावेश है वही देह में रहनेवाला 'पतिः' पशुपतिरूप और मुक्त इत्यादि शब्दों से शास्त्रों में कहा जाता है ॥ ११-१२ ॥ इस पर आशङ्का करते हैं कि पशुपति की तुर्यातीत समावेशरूप अवस्था भले ही हो, किन्तु पशुजीव की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओं का भेद जो शास्त्रों में बताया है वह कैसे होगा ? इस पर आशङ्का कर कहते हैं कि बुद्ध्यादि की अभावरूप शून्यता अहन्ता और कर्तृता के स्थान में अस्फुटरूपता संस्कारमात्र से रहती है और उसी में ज्ञेय की शून्यता भी रहती है ॥ १३ ॥ इन्द्रिय सहित प्रमाताओं की आन्तरी वृत्ति ही प्राणादि की प्रेरिका होती है अथवा प्राण में अहन्ता या पुर्यष्टकरूप से जीवनप्रद होती है ॥ १४ ॥

२९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५ तावन्मात्रस्थितौ प्रोक्तं सौषुप्तं प्रलयोपमम् । संवेद्यमपवेद्यं च मायामलयुतायुतम् ॥ १५ ॥ इह चित्तत्त्वं स्वस्वरूपमाच्छादयत् ज्ञेयरूपेण बुद्ध्यादिना देहान्तेन घटादिना वा भासते । एकमेव चेदं स्वातन्त्र्यविजृम्भितं, न त्वत्र वास्तवः क्रमो वा भेदो वा । तत्रापि तु स्वातन्त्र्यात् क्रमश्च भेदश्चाभासते । तदेवंस्थिते यश्चित्तत्त्वस्य स्वरूपाच्छादनभागः स एवोत्तरभागान्तरा- संकीर्णो यदा विश्राम्यति तदनुदयाद्वा तत्प्रध्वंसाद्वा प्रलय इव तदनादरणाद्रानिद्रासमाधि- मूर्च्छादाविव, तत्रैव चाहन्तारूपं कर्तृतायाः पदं परामर्शोऽस्फुटत्वादरूपात्मना संस्कारेण शुद्धेन वेद्यपदवोमप्राप्तेन युक्तो भवति, तदा सैवावस्था नेत्येवपरामर्शशेषा अनपेक्षितनिषेध्यबुद्ध्यादि- विषयसुस्पष्टपरामर्शसंभेदापि अवश्यंभाविनिषेधयोगात् 'अकिञ्चनोऽहम्' इत्येवंभूतपरामर्शवत् स्वीकृतसामान्याकारनिषेध्या, अत एव संस्कारशेषीकृतज्ञेयरूपा 'शून्य' इत्युच्यते । तथाविधे बुद्ध्यादीनां देहादिनीलान्तानामभावरूपे शून्यत्वमुच्यते, यतस्तत्र ज्ञेयानां 'शून्यता' अभावरूपता संस्कारशेषता । इयमेव हि सर्वत्राभावो न तु सतां सर्वात्मना विनाशः । तत्रैव शून्ये प्रमातरि केवल इतनी स्थिति में ही प्रलय तुल्य सुषुप्त अवस्था कही जाती है। जिसमें वेद्यसहित और वेद्यभावों को छोड़कर मायामल से मिली या नहीं मिली हुई अवस्था रहती है ॥ १५ ॥ चित्तत्त्व अपने स्वरूप प्रकाश को आवृत्त करता हुआ बुद्ध्यादि ज्ञेयरूप से अथवा घटादि देहान्तरूप से भासित होता है और यह एक ही स्वातन्त्र्य का प्रभाव है, वस्तुतः यहाँ कोई क्रम या भेद नही होता है, फिर भी तो स्वातन्त्र्य के कारण क्रम और भेद भासित होता है। ऐसी स्थिति में भी जो चेतनतत्त्व का अपने स्वरूप का आच्छादन भाग है अर्थात् देह बुद्धि से संमिलित होना रूप वही जब अन्य उत्तर भाग से असंकीर्ण होकर विश्राम लेता है तब तो उसके उदय न होने से अथवा ध्वंस हो जाने से प्रलय के समान उसका अनादर कर देने से निद्रा, मूर्च्छा, समाधि के समान रहता है, इस प्रकार उसमें ही अहन्तारूप कर्तृता से परामर्श के दब जाने पर शुद्ध संस्कार से वेद्यपद को प्राप्त होकर रह जाता है, तब वही अवस्था परामर्श के अभावरूप होकर निषेध बुद्ध्यादि से विषयों के स्पष्ट परामर्श न होने के कारण निश्चित होनेवाले निषेध के संपर्क से 'अकिंचनोऽहम्' अर्थात् मैं कुछ भी नहीं हूँ इस प्रकार परामर्श के समान सामान्य निषेध का बोध होता है, इसीलिए संस्कार शेष ज्ञेयरूप 'शून्य' कहा जाता है। उसी प्रकार बुद्ध्यादि से लेकर देहादि नील-पदार्थ पर्यन्त अभावरूप में शून्यत्व कहलाता है; क्योंकि उसमें ज्ञेयों की 'शून्यता' अभावरूपता संस्कार शेषता रहती है। इसी को सर्वत्र दर्शनों में अभाव नाम से प्रतिपादन किया है सद्भूभाव-पदार्थों का सर्वतो भावेन विनाश नहीं १. बोध मात्र ही संकुचित शून्य है, शून्यता में स्फुटता नहीं रहती है— ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः । पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥ जाग्रत एवं स्वप्न अवस्थाओं की अवस्थागत द्विरूपता का आधार ज्ञान और ज्ञेय है। सुषुप्ति और चतुर्थ [ शिवावस्था ] में मात्र अनुभव रहता है, अपने स्वरूप की प्राप्ति चिद्रूप की स्थिति सुषुप्ति एवं चतुर्थावस्था के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं पर भी नहीं रहती है ।

अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५] विमर्शिनीटीकोपेता [२९३ समवेता प्राणापानसमानोदानव्यानात्मके वायुचक्रे प्रेरणात्मिका शक्तिः, सा च विद्याकलयोः प्रपञ्चभूतौ यौ क्रमेण बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियवर्गौ तयोरान्तरी वृत्तिः। बाह्या हि तयोः शब्दाद्यालोचन- शब्दाभिव्यक्तिस्थानाभिहननादिका वृत्तिः। तदुक्तम् 'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च।' (सां० २९ का०) इति। एवं शून्य एवाहन्ता अक्षचक्रोपोद्वलिता जीवनम्, —इति स शून्य एव जीवः संसरति। यदि वेन्द्रियशक्तीनामेव यान्तरी साधारणप्राणात्मिका प्राणशब्द- वाच्या प्राणादिमारुतविशेषप्रेरणामयी सैव 'अहम्' इत्यधिशयाना जीवनं, तदा प्राण एव जीवः संसारी स एव शून्यः, प्राणश्च पुर्यष्टकशब्दवाच्यः, प्राणादिपञ्चकं बुद्धीन्द्रियवर्गः कर्मेन्द्रियगणो निश्चयात्मिका च यतो धीर्व्यज्यते। तन्मात्रपञ्चकं मनोऽहंबुद्धय, इत्यन्ये 'तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धि०।' (स्व० ४।१९) इति। 'भूमिरापोऽनलो०।' (गी० ७।४) इति च वदन्तः। एवं होता है। शून्य प्रमाता में समवेत प्राण, अपान, समान, उदान, व्यानरूप पाँचों वायु को प्रेरणा करनेवाली शक्ति रहती है और वह विद्या एवं कला के प्रपञ्चरूप जो क्रम से ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय वर्ग हैं उन दोनों के भीतर रहनेवाली वृत्ति होती हैं; क्योंकि उन दोनों की बाह्यवृत्ति शब्दात्मिकारूप, आलोचनरूप, शब्दरूप से अभिव्यक्त होनेवाली वृत्ति है, इस विषय में सांख्य कारिका में कहा भी गया है—'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च।' [सां० २९ का०] इन्द्रियों की सामान्यकरण वृत्ति प्राणादि पाँच वायु है। इस प्रकार शून्य प्रेरणात्मिका शक्तिरूप आन्तरिक वृत्ति ही इन्द्रिय तक प्रकाशित होकर जीवन कहलाता है। वही शून्यरूप होकर जीव संसार में संसरण करता रहता है अथवा इन्द्रिय-शक्तियों में जो भीतरी प्राणात्मिका-शक्ति है उसी का नाम प्राण है; क्योंकि वह प्राणादि श्वास-प्रश्वास को प्रेरणा देती है, वही 'अहम्' में रह कर जीवन कही जाती है, तब प्राण ही जीव संसारी हो जाता है और वही शून्य कहा जाता है, प्राण पुर्यष्टक शब्द का वाच्य है, जिससे प्राणादि पाँच, बुद्धीन्द्रिय समूह, कर्मेन्द्रिय वर्ग एवं निश्चयात्मक अन्तःकरण की वृत्तियाँ और बुद्धिरूप में व्यक्त होता है। कुछ लोग उसको तन्मात्र पञ्चक, मन, बुद्धि और अहंकार कहते हैं—'तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहं बुद्धि०।' (स्प० ४।१९) तथा गीता में कहा है 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकारं इतीयं मे भिन्ना प्रकृति- रष्टधा' (७।४) सूक्ष्म पञ्चभूत सहित पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पञ्च महाभूत; १. वही प्रेरणात्मिका शक्ति वृत्ति है। यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत्स्वयम् । ............प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥ लभते.....................। इत्यत्र सहान्तरेण चक्रेणेति.............। जिसके सामर्थ्य बल से ही, अनन्त-शक्ति चक्र के साथ-साथ उस बाह्य इन्द्रियों को भी चेतन के जैसा सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है जिससे स्वतन्त्र होकर सृष्टि, स्थिति, और संहारादि करने में प्रवृत्त होते हैं। इसलिए उस तत्त्व को जानने के लिए योगी को यत्न करना चाहिए। क्योंकि यह अकृत्रिम स्वभाववाली स्वतन्त्रता रोम-रोम में भरी हुई है। इस रीति से अपने आवेशवशात् उठाती हुई जीव ऐसा कहा जाता है। जो शून्य को उठानेवाली है वही जीवन क्रिया कही जाती है।

२९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१६-१७ यदुभयात्मकं पुर्यष्टकं तावत्येव शुद्धे या विश्रान्तिः, तस्यां सत्यां यदहन्तायाः सुषुप्ताया बोधलक्षणं भावरूपं कर्म च क्रियास्वभावं तत् सौषुप्तम् । मलेन हि प्रमाता सुप्तः कलया त्वसुप्त इव, अत्र तन्निमज्जनेन सुष्ठु सुप्रस्तस्य भावः कर्म वा, —इति । तत्र शून्यसौषुप्ते न किञ्चिद्व्यतिरिक्तं वेद्यम्,—इति मायीयमलाभावादपवेद्यं तत्; प्राणसुषुप्ते तु स्पर्शकृतस्य सुखदुःखादेर्भावात् माया- ख्यमस्ति मलम्,—इति सवेद्यं तत् । एवं गाढागाढसुषुप्तद्वितयवत् प्रलयोऽपि मन्तव्यः । स परं देहादिप्रध्वंसानुदयकृतश्चिरतरकालश्च । सुषुप्तं तु देहानादरकृतमचिरकालं च,—इति विशेषः । तत्रापि श्रमकृतं निद्रा, धातुदोषकृतं मूर्च्छा, द्रव्यकृतं मदोन्मादादि, स्वातन्त्र्यकृतं समाधिः,— इत्याद्यवान्तरभेदाः । केचित्तु समाधिरूपं सवेद्यमन्यदपवेद्यम्,—इति प्रपन्नाः ॥ १३-१४-१५ ॥ नन्वेवं स्फुटवेद्यपदविनिर्मुक्ता सुषुप्तावस्थास्तु, स्वप्नजाग्रद्दशयोस्तु स्फुटवेद्यावभासयोगिन्योः को भेदः ? इत्याशङ्क्य श्लोकद्वयेन भेदमाह— मनोमात्रपथेऽध्यक्षविषयत्वेन विभ्रमात् । स्पष्टावभासा भावानां सृष्टिः स्वप्नपदं मतम् ॥ १६ ॥ सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतया स्थिरा । सृष्टिः साधारणी सर्वप्रमातॄणां स जागरः ॥ १७ ॥ इन सबके कार्यरूप इन्द्रियाँ तथा अहङ्कार, बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्व, मन इस प्रकार यह मेरी प्रकृति- शक्ति अष्ट भेद से युक्त है । इस प्रकार ज्ञान और कर्मरूप पुर्यष्टक में विश्रान्ति लेते हुए जो अहन्ता सोई हुई रहती है उस सुषुप्त का बोधरूप भाव कर्म और क्रिया स्वभाव सुषुप्ति है; क्योंकि मल से प्रमाता सुप्त कहा जाता है और कला से असुप्त के जैसा रहता है, उसमें डूब जाने से भली-भाँति सुप्त हो जाता है एवं शून्य सुषुप्त हो जाने पर कोई भिन्न वेद्यभाव नहीं रहता है, मायीय मल के अभाव में अपवेद्य हो जाता है, प्राण सुषुप्त में तो सुख-दुखादि का स्पर्श होने से मायीय मल रहता है अर्थात् मायीक नाम का मल उसमें रहता है इसलिए वह सवेद्य रहता है। इस प्रकार गाढ, अगाढ, सुषुप्ति के समान प्रलय भी समझना चाहिए। वह देहादि प्रध्वंस के उदय न होने से चिरकाल तक रहता है। सुषुप्त तो देहादि के अनादर से होता है इसी कारण वह शीघ्र नष्ट हो जाता है यही दोनों में विशेषता है। उसमें अत्यधिक परिश्रम के करने से निद्रा, धातु के दोष से मूर्च्छा, मद्यपानादि से उन्माद, स्वतन्त्रता से समाधि होती है, इत्यादि सब अवान्तर भेद कहे जाते हैं। किन्तु कुछ लोग तो समाधि को सवेद्य और दूसरे को अपवेद्य मानते हैं ॥ १५ ॥ अब शङ्का करते हैं कि सुषुप्त अवस्था भले ही स्फुटवेद्य पद से शून्य रहित हो, किन्तु जाग्रत् और स्वप्न तो स्फुटरूप से वेद्य को अवभास करनेवाली अवस्था है उसमें कौन सा भेद है ? इस पर आशङ्का करके दो श्लोकों से उत्तर देते हैं— मनोमात्र मार्ग में इन्द्रियों के विषय का प्रत्यक्ष प्रमाण भ्रम से भाव-पदार्थों में स्पष्ट अव- भासपूर्वक सृष्टि का होना स्वप्न कहा जाता है ॥ १६ ॥ सभी प्रमाणों के भासित होने से जो बाहर की स्थिर सृष्टि है वह सभी प्रमाताओं के लिए साधारण सृष्टि है वही जाग्रत अवस्था है ॥ १७ ॥

अ.-३, आ.-२, का.-१६-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९५ बाह्येन्द्रियाधिष्ठानानि चक्षुर्गोलकादीनि निमीलितानि निद्रायमाणस्य लक्ष्यन्ते, न च तेषु निमीलितेषु बाह्येन्द्रियग्रहणव्यापारो दृष्टः तेन शुद्ध एव मनोमार्गे रूपस्पर्शादयो भावा अक्षग्रहण- समुचितेन स्पष्टेन वपुषा भासनयोग्याः परमेश्वरेण सृज्यन्ते, न त्वणुना अनिष्टस्यैव दर्शनात् इष्टस्यापि देशकालान्तरादियोगेन । अत एव मनोमात्रस्थितत्वादेव न प्रमात्रन्तरसाधारणीयं सृष्टिः । यत्तु तत्र बाह्येन्द्रियविषयत्वं प्रमात्रन्तरसाधारण्यं चकास्ति, तद्यद्यपि यावद्भाति तावत् तथैव, तथाप्युत्तरकालं प्रबुद्धस्य न तथा,—इति परामर्शेन तद्रूपं निर्मूलत्वेनावभाति, —इति भ्रान्तम् । यानि हि प्रमात्रन्तराणि स्वप्ने स्वेन्द्रियाणि च भ्रान्ति, एतानि प्रबोधकालभाविभिरेव तैरभिन्नानि,—इति निश्चयः, प्रबोधकाले च न तथा,—इति निश्चयानुवृत्तिरपहृतैव । तेनोभयमपि भ्रान्तमुच्यते; भ्रान्तत्वमेव चास्थैर्यम् । एवमिन्द्रियाविषयत्वेनैवासाधारणत्वमाक्षिप्तम्, 'विभ्रमेणैव चास्थैर्यं........' इति स्वकण्ठेन, तत् जाग्रत्प्रतियोगिधर्मनिरूपणावसरेऽपि न दर्शितम् । एवं भूता या सृष्टिः सा पशोः स्वप्नसमये भावात् 'स्वप्नपदं' स्वप्नकाले विषयः, —इति तथाभूतविषयं प्रमातृत्वं पशोः स्वप्नावस्था,—इति यावत् । अक्षग्रहणं बाह्येन्द्रियदशकस्योपलक्षणम् । यत्र तु बाह्याक्षविषयं सर्वप्रमातृसाधारणत्वं च निश्चयानुवृत्त्या बाधारहितया परमार्थत्वेन चकास्ति, तत एव स्थैर्यं विषयस्य सा सृष्टिः पशोः जागरः; तद्विषयं प्रमातृत्वं जाग्ररावस्था,—इति यावत् । बाह्येन्द्रियों के अधिष्ठान चक्षुगोलक इत्यादि जब निद्रा में पुरुष आ जाता है तो सम्बन्ध बन्द हो जाता है, और उन सबके बन्द हो जाने पर बाह्येन्द्रियों का व्यापार नहीं दिखायी देता है, इससे सिद्ध होता है कि रूप-स्पर्शादि जो भाव हैं वे सभी इन्द्रियों के बाह्य शरीर से परमेश्वर के द्वारा ही सृष्ट हुए हैं, जीव के द्वारा नहीं हुए हैं; क्योंकि जीव को अभीष्ट नहीं है, अभीष्ट तो भिन्न देश-कालादि से सम्बन्धित होता है। इसीलिए मनोमात्र में ही रहने के कारण सर्व साधारण प्रमाताओं के लिए यह सृष्टि नहीं होती है और न तो बाह्येन्द्रियों का विषय भी साधारण दूसरे प्रमाताओं के द्वारा प्रकाशित होता है, यद्यपि वह जब तक भासता है तब तक ही उसकी सत्ता रहती है उत्तरकाल में प्रबुद्ध के लिए वैसा नहीं रहता है उसका बाध हो जाता है, ऐसा इस परामर्श से वह उस रूप में निर्मूल भासता है, यही भ्रान्ति है। जो कि स्वप्न में अन्य प्रमाताओं की अपनी इन्द्रियाँ भासती हैं, प्रबोधकाल में होनेवाले आभासों से अभिन्न होते हैं, यही निश्चय होता है, उसी प्रकार प्रबोधकाल में नहीं होता है, इस प्रकार निश्चय ही अनुवृत्ति अपहृत रहती है। इसीसे ये दोनों भ्रान्त कहे जाते हैं और भ्रान्ति ही एक प्रकार से अस्थिरता है। इस प्रकार इन्द्रियों की अविषयता बता करके उनकी असाधरणता पर आक्षेप किया गया है, 'विभ्रमेणैव चास्थैर्यं......।' ऐसा अपने मुख से ही कहा है, उसे जाग्रत अवस्था के प्रतियोगी धर्म के निरूपण अवसर में भी नहीं दिखाया है। इस प्रकार जो सृष्टि है वह पशु जीव के स्वप्न काल में होती है 'स्वप्नपदं' अर्थात् स्वप्नकाल का विषय होती है, उसी प्रकार का विषय पशु प्रमातृत्व कहलाता है। जो कि पशु जीव की स्वप्न अवस्था है, अक्ष ग्रहण से पञ्च ज्ञानेन्द्रिय ओर पञ्च कर्मेन्द्रिय का ग्रहण करना चाहिए। किन्तु जिसमें बाह्येन्द्रियों का विषय रहता है वह सब प्रमाताओं के लिए साधारणत्व रहता है और वह निश्चयवृत्ति के कारण बाधा रहित होने से ठीक-ठीक प्रकाशित होता है, इसीलिए वह विषय की स्थिरता है और उसे ही पशुजीव की जाग्रत अवस्था कहते हैं, जो कि स्थिर विषयवाला सृष्टि है तो भी पशु का वह जागरण माना जाता है,

२९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१८ यावच्चानुवृत्तिस्थैर्यं निश्चयस्य चकास्ति, तावज्जागरः। तन्मध्य एव च निश्चयानुवृत्तिनिर्मूलनात् स्वप्नः,—इत्यवभाससारत्वात् वस्तूनां; स्वप्नेऽपि दीर्घे यत्र स्वप्नान्तरं, स तदपेक्षया जाग्रदेव; जाग्रदभिमतमपि वा दीर्घदीर्घं कालान्तरे निश्चयानुवृत्तिनिरोधाज्जाग्रदन्तरापेक्षया स्वप्न एवेति मन्तव्यम् ॥ १६-१७ ॥ आसां तिसृणां हेयत्वप्रदर्शनेन तुर्यावस्थातः प्रभृत्युपादेयत्वं सूचयति— हेया त्रयीयं प्राणादेः प्राधान्यात्कर्तृतागुणे । तद्धानोपचयप्रायसुखदुःखादियोगतः ॥ १८ ॥ यत्रायं प्रमाता त्यागोपादानतदिच्छाप्रयत्नादिकं परिक्लेशं पश्यति, तदेवास्य हेयतया भाति । स चास्य सुखदुःखयोगवैचित्र्येणैव कृतः, तच्चैतदवस्थात्रये संभवति; यतः कर्तृतारूपं स्वात्मविश्रान्त्यानन्योन्योन्मुख्यलक्षणमानन्दैकघनं यच्चिन्मयं वपुः, तद्यदा प्राणादिवृत्तिशून्यपुर्यष्टक- देहादिभूमिषु गुणतामभ्येति, तदा तस्मिन् गुणीभूते प्राणादेः प्राधान्यं स्फुरति । तथा च तस्य चिद्रूपस्य यथातथा हानिस्तथातथा दुःखोपचयो, यथातथा किञ्चिदुन्मज्जनं तथा तथा सुखोपचयः । तथाहि—बुभुक्षाकाले प्राणस्यैवोद्रेकात् दुःखं, तृप्तौ तस्य न्यग्भावादहन्तोद्रेके सुखम् । एवं जब तक विषय की स्थिरता का निश्चय प्रकाशित रहता है तब तक जागरण काल रहेगा । उसी बीच में निश्चय की अनुवृत्ति के निर्मूल होने पर स्वप्न प्रारम्भ हो जाता है । इसलिए वस्तु-पदार्थों में अवभास ही सार तत्त्व माना गया है; चिरकाल पर्यन्त होनेवाले स्वप्न में जो भी अन्य-अन्य स्वप्न होते हैं वे सब के सब उसकी अपेक्षा से ही है, जाग्रत का अभिमान होने पर भी दीर्घ-दीर्घ दूसरे काल तक निश्चय की अनुवृत्ति के रुक जाने से दूसरे जागरण की अपेक्षा से उसे स्वप्न ही मानना चाहिए ॥ १७ ॥ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं की हेयता को दिखा करके तुर्यावस्था ही उपादेय है, इसे सूचित करते हैं— कर्तृंता के गुण में प्राणादि की प्रधानता होने से जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को हेय समझना चाहिए । सुख-दुःखादि के योग से उसके भी प्रायः उपचय का त्याग करना चाहिए ॥ १८ ॥ यह प्रमाता छोड़ना एवं ग्रहण करना और उसकी इच्छा पर्यन्त करना आदि में क्लेशादि दुःख देखता है, वही उसकी हेयता प्रतीत होती है और सुख-दुःख की विचित्रता से क्लेश होता है । इस प्रकार सुख-दुःखादि तीनों अवस्थाओं में ही हो सकता है; क्योंकि अपने स्वरूप में विश्रान्ति लेना किसी दूसरे की अपेक्षा न रखना यह जो आनन्दघन चिन्मयरूप है वही परमेश्वर का स्वरूप है, जब वह प्राणादि वृत्तियों से शून्य पुर्यष्टक की भूमि में गौण हो जाता है उसी गुणीभूत अवस्था में प्राणादि की प्रधानता रहती है । उस काल में चिद्रूप परमात्मा को जैसी जैसी हानी होती जायेगी वैसी वैसी दुःख की अभिवृद्धि भी होती रहेगी, जब जब परमेश्वर सम्बन्धी कुछ भाव ऊपर उठता है तब तब सुख की अभिवृद्धि होती है । जैसा कि क्षुधाकाल में प्राण की उद्रेकरूपता से दुःख होता है और क्षुधा की परितृप्ति हो जाने पर उसके दब जाने से तो अहन्ता के उद्रेक से आनन्द का अनुभव होता है । इसी प्रकार थके हुए व्यक्ति का मर्दन करने पर और न करने

अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९७ श्रान्तस्य मर्दनामर्दने देहप्राधान्याप्राधान्ये मन्तव्ये । यस्तु समावेशतत्त्वज्ञस्तस्य तत्तत्काले दुःखानुदय एव । यदाह— 'दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । आच्छादयेद्बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥' (स्प० ४।८) इति । एवं प्राणादेः प्राधान्ये कर्तृताया गुणभावे सुखदुःखवैचित्र्यशतयोगः प्रयासभूमिः,—इति जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ते प्राणादिप्राधान्यं कर्तृतान्यग्भावश्चास्ति,—इति तत् त्रयमेव हेयम् । कर्तृता- प्राधान्योन्मेषात्तु तुर्यरूपातप्रभृति तत्स्थैर्यात्मकतुर्यातीतदशान्तमुपादेयम्, एकरसानन्दघनस्वभाव- लाभे उपादित्साजिहासावैवश्यपरिश्रमप्रशमात्,—इति तात्पर्यम् ॥ १८ ॥ ननु प्राणादिप्राधान्यं हेयताया कारणमुक्तं तच्चेज्जाग्रदादित्रय एव, तर्हि तुर्यादौ तदभावात् तत्समावेशे व्युत्थानानुपपत्तिः,—इति श्लोकद्वयेन शङ्कां परिहरति— प्राणापानमयः प्राणः प्रत्येकं सुप्तजाग्रतोः । तच्छेदात्मा समानाख्यः सौषुप्ते विषुवत्स्रव ॥ १९ ॥ मध्योध्वर्गाम्युदानाख्यस्तुर्यगो हुतभुङ्मयः । विज्ञानाकलमन्त्रेशो व्यानो विश्वात्मकः परः ॥ २० ॥ पर देह की प्रधानता और अप्रधानता माननी चाहिए। जो कि समावेश स्थिति में रहनेवाले ज्ञानिजन को तो उस-उस काल में दुःख का अभाव ही रहता है। इस विषय में कहा है कि— दुर्बल भी जिसको आक्रमण करके कार्य में प्रवर्तित होता है और अत्यन्त क्षुधा से आक्रान्त रहता है वह अपनी क्षुधा की निवृत्ति करे। प्राणादि की प्रधानता में और कर्तृता की गौणता में असंख्य सुख-दुःख के विचित्र योग से ही प्रयास भूमि होती है, उस जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति काल में प्राणादि की प्रधानता रहती है और कर्तृत्वभाव दबा रहता है, इसीलिए इन तीनों अवस्थाओं को विवेकपूर्वक छोड़ देना चाहिए। कर्तृत्वभाव की प्रधानता का उन्मेष होने से तुर्यरूप से लेकर उसकी तुर्यातीत अवस्था तक ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि इससे आनन्दघन स्वभाव की प्राप्ति होती है, ग्रहण करने की और त्याग करने की विवशता को शान्ति हो जाती है, यही इसका तात्पर्य है ॥ १८ ॥ अब शङ्का करते हैं कि प्राणादि के प्राधान्य को हेयता में कारण कहा गया है, वह यदि तीनों अवस्थाओं में है तो तुर्यादि में प्राणादि का अभाव रहने के कारण देहपात हो हो जायेगा, उसकी समाधि में व्युत्थान की अनुपपत्ति रहती है, इस प्रकार दो श्लोकों से इस आशङ्का का परिहार करते हैं— प्राण, अपान से युक्त होकर प्राण स्वप्न और जाग्रत प्रत्येक में रहता है। उन दोनों के अभाव में प्राण समान वायु होकर सुषुप्ति अवस्था में विषुवत् संक्रान्ति के समान रहता है ॥ १९ ॥ मध्य में उर्ध्वगामी होकर उदान नाम का वायु और अग्निरूप होकर तुर्य अवस्था में रहता है। विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर के रूप में व्यान वायु विश्वात्मक उत्तम होता है ॥ २० ॥ ३८

२९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० 'प्राण' इति प्राणनरूपा जीवनस्वभावा येयं चिद्रूपस्य स्थितिः, सा तावत्सामान्यपरिस्पन्द- रूपा, देहप्राणादेरचेतनस्य चेतनावानतासंपादनात्मिका 'अहम्' इति स्वातन्त्र्यारोपसारा सती विकल्परूपपरामर्शमयी सैव प्राणादिविशेषात्मना पञ्चरूपतां भजते। तत्र किञ्चिज्जहती क्वचित्पतन्ती च प्रश्वास-निःश्वासरूपा क्रमेण प्राणत्वमपानत्वं च विशेषं दर्शयति। तदिदं विशेषद्वयं जाग्रति तावत् स्फुटमेव देहात् प्रसृत्य विषये विश्रान्तेः, ततोऽपि देहे; स्मृत्यादौ वाभ्यन्तरे वेद्ये विश्रान्तेः प्राणापानयोः सुस्पष्टत्वात् । स्वप्नेऽपि तद्वयमस्त्येव; स्वपतोऽपि हि प्राणापानौ निर्गमप्रवेशात्मानौ स्फुटेनैवापरेण लक्ष्येते। स्वयमेव च वेद्यसंवेदनात् त्यागोपा- दानरूपा स्थितिः संवेद्यत एव, तेन प्राणना प्राणपानविशेषद्वयमयी जाग्रति, तथा स्वप्ने; सुप्तं स्वप्नः, तदेव तु यदा सुतरां पुष्टं भवति, तदा सुषुप्तः प्रमाता, तस्येदं सौषुप्तं पदम्। तत् द्विविध- मपि समानरूपं विशेषं प्रागीयं स्वीकरोति। सवेद्ये तावत्सुषुप्ते यद्यपि प्राणापानस्पन्दो लक्ष्यते, तथापि तयोर्मध्ये या विश्रान्तिर्हृदयसदने निरिन्द्रिये प्रदेशे तदेव मुख्यतः सुषुप्तमिति। तत्र प्राणा- पानयोर्यश्छेदो विश्रान्तिः कंचित्कालं तदात्मा सकलरसादिवर्गस्योर्ध्वाधरतिर्यक्षु समानीकरण- व्यापारात्मा, तत एव हृत्पद्मविकासदानाद्भुक्तपीतजरणकारी समानो दिनरात्रिरूपयोः प्राणा- पानयोः कंचित्कालं साम्याद्विच्छेदाच्च विषुवत्कालतुल्यः। विषुं व्याप्तिं समानीकरणमर्हति,— इति, 'तदर्हम्' ( पा०सू० ५।१।११७ ) इति वतिः। उपमाने वतेरेव चाव्ययत्वम् 'उद्वतो निवतः' 'प्राण' प्राणनरूप जीवन को चलानेवाली जो चेतन की स्थिति है, वह सामान्यरूप से स्फुरण कराती है, अचेतन जो देह-प्राणादि है उसे चेतनता देनेवाली यह 'अहम्' स्वातन्त्र्य-शक्ति है स्वतन्त्रता का आरोप करना जिसकी यही विशेषता है कि विकल्परूप परामर्श करनेवाली प्राणादिरूप से पाँचोरूपों में विभक्त हो जाती है। उसमें कुछ छोड़ती हुई और कहीं गिरती हुई श्वासप्रश्वासरूप होने से प्राणत्व और अपानत्व को विशेषरूप से बताती है। ये दोनों जाग्रत काल में स्पष्ट रहते हैं देह से फैलती हुई विषय में जाकर विश्राम लेती है, फिर उसके देह में; स्मृति आदि में अथवा वेद्य में विश्रान्त होकर प्राण, अपान के रूप में सुस्पष्ट प्रतीत है। स्वप्नकाल में भी दोनों रहते हैं; क्योंकि सोने पर प्राण, अपान दोनों का निर्गम और प्रवेश स्पष्ट ही दूसरे लोग देखते हैं और वेद्य अर्थात् ज्ञानरूप होने से स्वयं त्याग और ग्रहणरूप स्थिति की अवगति होती है, इस प्रकार जाग्रत काल में प्राणना, प्राण और अपान दोनों में विशेषरूप से रहती है, उसी प्रकार स्वप्न में भी 'सुप्तं' स्वप्न ऐसा प्रयोग आया है, वही जब भली भाँति पुष्ट हो जाता है, तब प्रमाता सुषुप्ति में पहुँच जाता है, उसका यह सौषुप्तपद है। वह सवेद्य और अपवेद्यरूप में भी समानरूप से विशेष भावपूर्वक जीवित रहना स्वीकार करता है। पहले यद्यपि सवेद्य सुषुप्ति में प्राण और अपान का स्पन्दन लक्षित होता है, तो भी दोनों के बीच में जो इन्द्रिय से रहित हृदय स्थान में विश्रान्ति है वही मुख्यतः सुषुप्ति अवस्था मानी जाती है। प्राण और अपान का जो भेदक है जिसको विश्रान्ति कहते हैं वही कुछ काल पर्यन्त उस रूप में रह कर सकल रसादि वर्ग का ऊपर-नीचे तथा चारों तरफ बराबर कर देना जिसका व्यापार है, उससे ही हृदय- कमल विकसित होने के कारण खाये-पीये पदार्थ को पचा देना यह सब समान वायु का कार्य है एवं दिन और रात्रिरूप जो प्राण और अपान वायु है वह कुछ अंश तक भेद करने के कारण विषुवत् काल के समान वह भी रहता है। चारों तरफ ठीक-ठीक व्यापकरूप में कर देने का

अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९९ इति प्रयोगात्; तद्धि न्यायसिद्धं न वाचनिकं, विशेषं वा दिनरात्रितदूनाधिकत्वलक्षणं सुवति प्रेरयत्यविरतम्,—इति शतरि विषुवत् । तत्र च विषुवति विच्छिद्यमानस्य प्राणापानस्य संस्काररूपतया सद्भावः, सैव हि विच्छेदो न तु सर्वात्मना नाशोऽस्ति,—इत्युक्तमसकृत् । ततश्च हानादानयोर्बीजरूपता सुषुप्ते; इयति च सर्वः प्रलयाकलान्तः पशुवर्गः। यदा तु सा प्राणना वृत्तिर्वामदक्षिणमार्गौ खिलीभावयन्ती मध्यरूपेणोर्ध्वेन प्रवहति, तदा तत्प्रवहणं सकलस्य भेदस्याभेदसारतादानलक्षणं विलापनमाश्यानस्येव सर्पिषो विदधती उदानवृत्तिर्विज्ञानाकलादारभ्य सदाशिवान्तं, सा च तुर्यात्मिका दशा। मायोर्ध्वे हि विज्ञानाकलाः,—इति ततःप्रभृति भेदगलनं प्रवर्तते। विलीने तु भेदे सर्ववेद्यराशिरूपतत्त्वभूतभुवनवर्गात्मकदेहव्यापाररूपेण प्राणवृत्तिर्व्यानि- रूपा विश्वात्मकपरमशिवोचिता तुर्यातीतरूपा। प्राण एव प्रमाता प्राणापानरूपः समानरूप नाम विषुवत् है। 'तदर्हम्' (पा० सूत्र ५।१।११७) इस सूत्र से वतिप्रत्यय होकर विषुवत् बना है और वतिप्रत्यय उपमान में अव्यय होता है 'उद्धतो निवतः' इत्यादि प्रयोगों में देखा जाता है; क्योंकि यह युक्तिपूर्वक भी सिद्ध है कोई मौखिक नहीं है अथवा तो दिन और रात्रि को न्यूनाधिक जो निरन्तर प्रेरित करता है,—शतृ प्रत्यय करके भी विषुवत् शब्द बनता है। इस प्रकार विषुवत् में विच्छिद्यमान जो प्राण-अपान है उसमें संस्काररूप से रहने के कारण उसे विच्छेद कहते हैं अर्थात् संस्काररूप से सद्भाव होना ही विच्छेद है सारा का सारा विनष्ट नहीं हो जाता है, यह हमने अनेक बार कहा है। आदान-प्रदान करना भी सुषुप्ति में बीजरूप से रहना सिद्ध है; इतने अंश में ही प्रलयाकल तक सभी पशुवर्ग रहते हैं। जब जीवन वृत्ति वाम और दक्षिण भाग को छोड़कर मध्यरूप से बहती है, तब उसका बहना सब भेदों में अभेद देनारूप जैसा कि पिघले हुए घी का स्वरूप, उसी में उदानवृत्ति विज्ञानाकल से लेकर सदाशिव दशा पर्यन्त जो दशा है उसे तुर्यावस्था कही जाती है माया तत्त्व के ऊपर विज्ञानाकल रहते हैं और वहां से ही भेद गलने लगता है। भेद के विलीन हो जाने पर सारी संवेद्यराशि भुवनवर्ग, देह व्यापार- रूप प्राणों की वृत्तियां विश्वात्मक परम शिव में रहने के कारण तुर्यातीतरूप हो जाती है, इसलिए १. ब्रह्मादिकीटान्तमनन्तकं यल्लोकत्रये वेदकचक्रवालम् । तद्वैतदृष्टयैव सुपूर्णमित्थं तदीयचक्षुर्युगलं व्यनक्ति ॥ इत्थं विमृश्याहमनन्तशक्तिविश्रान्तधीर्द्वैतदृशं जिहासुः । त्वद्भक्तिसंदर्शितशुद्धमार्ग निरर्गलोभावितभूरिभावः ॥ समं समप्रोद्गतवेदानाख्यबिन्दुस्थनेत्रान्तरशोभमानम् । भवन्तमन्तःकृतविश्वरूपमद्वैतदृष्टि शिवसंश्रितोऽस्मि ॥ शैव दर्शन में परम शिव को त्रिनेत्र शब्द से कहा गया है। हे भगवन् ! तीनों लोकों में ब्रह्मा से लेकर कीट-पतङ्ग पर्यन्त जितने भी वेदक पदार्थ हैं अर्थात् ज्ञाता वर्ग हैं, वे सभी द्वैतभाववाले हैं इसी कारण उन लोगों की द्वैतरूपी दो आँखें मानी जाती हैं, इसका विचार करके मैं आपकी अनन्त- शक्तियों में विश्राम लेकर अर्थात् द्वैतभाव को छोड़कर आपकी विशुद्ध-विमल भक्ति द्वारा अपने आपके द्वारा माने हुए बन्धन से मुक्त होकर सर्वत्र समभाववाले तृतीय बिन्दु स्थानीय नेत्र के खुल जाने से अपने में सारे विश्व को किये हुए अद्वैत दृष्टिवाले परम शिव को ही देख रहा हूँ अर्थात् मैं तो सारे त्रिलोकी विश्व को अन्तःसात् करनेवाले अद्वैत शिव को ही तृतीय-नेत्र से शोभायमान् देख रहा हूँ।

३०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० उदानरूपो व्यानरूपश्च,-इति सामानाधिकरण्यात् विज्ञानाकलश्चासौ मन्त्रश्चासौ वर्गापेक्षया, ईशश्च सदाशिवेश्वररूपो योऽसौ,-इति स उदानः। एतदुक्तं भवति यद्यपि तुर्यतदतीतयोरप्यस्ति प्राणना—अन्यथा जीवत्वस्य व्युत्थानस्य चानुपपत्तेः—तथापि भेदोपसंहारेणाभेदविश्रान्ति- प्राधान्यादनयोर्दशयोः सुखदुःखादिवैचित्र्यायोगात् एकघनस्वात्मविश्रान्त्यात्मकपरमानन्दमयत्वे- नोपादेयतैव। सुषुप्तादौ तु संस्काररूपत्वास्र्फुटवेद्योल्लासस्फुटवेद्यावभासरूपस्य भेदस्य विद्यमान- त्वात् अस्ति सुखदुःखादिवैचित्र्यम्,-इति हेयतैव,-इति युक्तमुक्तं 'हेया त्रयीयम्' इत्यादि। भगवतश्च विश्वशरीरस्य प्राणापानसमानोदानव्यानरूपतयैव सकलगतोल्लासप्रवेशप्रलयाकल- विज्ञानाकलादिवर्गसदाशिवरूपता,-इत्यप्यनेन दर्शितम्। यथोक्तम्—'षट्त्रिंशदात्मकं विश्वं शम्भोः प्राणादिशक्तयः।' इति ॥ १९-२० ॥ आदितः ॥ १७१ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्त- विरचितविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायामागमाधिकारे प्रमातृतत्त्व- निरूपणाख्यं द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥ • प्राण ही प्रमाता है वही प्राणरूप, अपानरूप, समानरूप, उदानरूप और व्यानरूप होकर रहता है, इस प्रकार यह सामानाधिकरण्यरूप होने से विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर भी है और वर्ग की अपेक्षा से ईश्वर और सदाशिवरूप उदान है। अब यह कहा जाता है कि परमेश्वर के विषय में जो कहना था सब कह दिया, अनन्तर जीव के विषय में प्रतिपादन किया जायेगा, तुर्यावस्था और तुर्यातीत अवस्था में भी जीव रहता है; नहीं तो, जीवत्व का उत्थान नहीं हो सकेगा, फिर भी भेदों का उपसंहार करके अभेद में विश्रान्ति लेने से उसकी प्रधानता से दोनों दशाओं में सुख-दुःखादि की विचित्रता से एकघन आत्मा में विश्राम पा लेने से परमानन्द स्थिति स्थिर हो जाती है, इस दर्शन में यही उपादेय है। सुषुप्ति अवस्था में तो संस्काररूप से अस्फुट वेद्य का उल्लास होना और स्फुटरूप से वेद्य का भास होना एवं दोनों रूपों में भेद के विद्यमान रहने से सुख-दुःखादि की विचित्रता बनी रहती है। इसलिए यह छोड़ने योग्य ही है, ठीक ही कहा है कि 'हेया त्रयीयम्' इत्यादि। भगवान् विश्व शरीर के प्राण, अपान, समान, उदान, व्यानरूप से ही सभी जीवों में उल्लासपूर्वक प्रवेश करने के कारण प्रलयाकल, विज्ञानाकल आदि वर्ग से लेकर सदाशिव तक दिखा दिया। जैसा कि कहा है—'छत्तीस तत्त्वोंवाला यह विश्व भगवान् सदाशिव की प्राणादि शक्तियाँ हैं' ॥ १९-२० ॥ द्वितीय आह्निक समाप्त इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता तृतीयागमाधिकारहिन्दीव्याख्या शिवरञ्जनी इति तृतीयः आगमाधिकारः समाप्तः •

अथ चतुर्थः तत्त्वसंग्रहाधिकारः अथ चतुर्थे तत्त्वसंग्रहाधिकारे गुरुपर्वक्रमाख्यं प्रथममाह्निकम् अनन्तमानमेयादिवैचित्र्याभेदशालिनम् । आत्मानं यः प्रथयते भक्तानां तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं स्वसंवेदनोपपत्त्यागमसिद्धं महेश्वररूपमात्मस्वरूपं यदधिकारत्रयेण वितत्य निर्णीतं तदेव संक्षेपेण शिष्यबुद्धिषु निवेशयितुमाग़मार्थसंग्रहं श्लोकाष्टादशकेन दर्शयति ‘स्वात्मैव सर्वजन्तू- नाम्’ इत्यादिना ‘उत्पलेनोपपादिता’ इत्यन्तेनैकेनाह्निकेन । तत्र श्लोकेन पारमार्थिकं रूपमुक्तवा श्लोकनवकेन बन्धस्वरूपं प्रमातृप्रमेयतत्त्वदर्शनदिशा, सप्तकेन प्रत्यभिज्ञात्मकं मोक्षतत्त्वं, श्लोके- नोपसंहारं दर्शयति, — इति तात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते— स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः । विश्वरूपोऽहमिदमित्यखण्डामर्शबृंहितः ॥ १ ॥ इह जडास्तावच्चेतननिमग्ना एव भान्ति; इदमिति हि जडपरामर्शोऽहमिति संवित्परामर्श एव विश्राम्यति; ततश्च जडा निरात्मान इति, जन्तव एव जीवाः सात्मानस्तेषां च महेश्वर एव अनन्त प्रमाता, प्रमेय, प्रमाणादि के वैचित्र्य भावों को अभेद से युक्त एवं भक्तजनों के स्वरूप को जो प्रकाशित करते हैं, उसकी हम स्तुति करते हैं। इस प्रकार अपने संवेदन ज्ञान की उपपत्ति से आगम सिद्ध महेश्वर के स्वरूप को ज्ञाना- धिकार, क्रियाधिकार और आगमाधिकार में विस्तारपूर्वक निरूपण किया है उसका संक्षेप से शिष्यों की बुद्धि में प्रवेश करने के लिए आगमार्थ संग्रह के रूप में अठारह श्लोकों से दिखाया जाता है ‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनाम्’ इत्यादि लेकर ‘उत्पलेनोपपादिता’ अन्तिम इस एक आह्निक तक। प्रथम श्लोक से पारमार्थिकरूप को कह कर नव श्लोकों द्वारा प्रमाता, प्रमेय तत्त्व दर्शन दिशा से बन्ध का स्वरूप कहेंगे, इसके बाद सात श्लोकों से प्रत्यभिज्ञारूप मोक्ष तत्त्व का प्रतिपादन करेंगे, एक श्लोक से उपसंहार दिखायेंगे, इसका यही तात्पर्य है। अब ग्रन्थ के अर्थ की व्याख्या करते हैं— सभी जन्तु जीवों का आत्मा ही एक महेश्वर है। मैं विश्वरूप अखण्ड इस विमर्श से व्याप्त हूँ ॥ १ ॥ सभी जड समूह चेतन तत्त्व में ही ओतप्रोत होकर भासते हैं; क्योंकि ‘इदम्’ जो जड परा- मर्श है वह अहं इस संवित् ज्ञान परामर्श में ही विश्राम लेता है, इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जड वर्ग चेतन शून्य ही रहता है, जन्तु ही जीव होते हैं और चेतन आत्मा से विशिष्ट रहते हैं,

३०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-२-३ स्वात्मा स एव महेश्वरो न त्वन्यः कश्चित् । यतः संवित्स्वभावोऽसौ, संविदश्च न देशेन न कालेन न स्वरूपेण कोऽपि भेदः, कामं देहप्राणादयो भिद्यन्तां, ते तु जडपक्ष्याश्चेतनमग्ना एव, —इत्येक एव चिदात्मा स्वातन्त्र्येण स्वात्मनि यतो वैश्वरूप्यं भासयति, ततो महेश्वरोऽन्तर्नीतामिदन्तां कृत्वा परानुन्मुखस्वात्मविश्रान्तिरूपाहंविमर्शपरिपूर्णः, अत एव सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वे नास्य यत्नो- पपाद्ये । विचित्रबुद्धिकर्मेन्द्रियविषये हि यथा ज्ञातृत्वकर्तृत्वे एकस्यैवात्मनस्तथेन्द्रियस्थानीयरुद्र- क्षेत्रज्ञसहस्रविषयस्य भावराशेर्यज्ज्ञानं करणं च तदेकत्र चिदात्मनि,—इति ॥ १ ॥ ननु यद्येक एवायं महेश्वररूप आत्मा कर्त्तर्हि बन्धो यदवमोचनायायमुद्यमः ? इत्याशङ्क्याह— तत्र स्वसृष्टेदंभागे बुद्ध्यादिग्राहकात्मना । अहङ्कारपरामर्शपदं नीतमनेन तत् ॥ २ ॥ 'तत्रैवं स्वात्मनि महेश्वरे स्थिते तस्मिन्नेव प्रकाशरूपे स्वात्मदर्पणे तेनैव परमेश्वरेण स्वातन्त्र्यात् तावत्सृष्टः सङ्कोचपुरःसर इदंभागः, तन्मध्ये यदेतद्बुद्धिप्राणदेहरूपमिदन्तया वेद्यं तद्भिन्नस्य वेद्यस्य ग्राहकत्या समुचितम् इदंभावाभिभवप्रभविष्णुत्वात् कृतकेनापूर्णेनाहंभावेन परामर्शेन भासमानं चकास्ति 'अहं देवदत्तोऽहं चैत्र' इति ॥ २ ॥ नन्वेवमप्यस्तु, तथापि कस्य बन्धः ईश्वरव्यतिरिक्तो हि कोऽन्योऽस्ति ? तदेतत् उन सब का आत्मस्वरूप महेश्वर ही है, इस प्रकार वही महेश्वर है अन्य कोई नहीं है। जिससे ज्ञात होता है कि यह संवित् ज्ञान स्वभाववाला है और संवित् का देश, काल और स्वरूप से कोई भेद नहीं है, भले ही देह प्राणादि का भेद होता हो, वे जड के पक्षपाती होते हुए भी चेतन में निमग्न रहते हैं। इस प्रकार एक ही चिदात्मा स्वतन्त्ररूप से अपने स्वरूप में विश्वरूप होकर भासित होता है, इससे महेश्वर इदन्ता को अन्तर्लीन करके किसी अन्य की ओर न उन्मुख होने- वाले अहं विमर्श में परिपूर्ण रहता है, इसीलिए सर्वज्ञत्व एवं सर्वकर्तृत्व के लिए कोई विशेष यत्न नहीं करना पड़ता है । [ इसीको दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं ] जैसे विचित्र ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय के विषय में एक चिदात्मा का ज्ञातृत्व-कर्तृत्व रहता है उसी प्रकार इन्द्रिय स्थानीय रुद्ररूप अनेक क्षेत्रज्ञ भावराशि के जो ज्ञान और करण एक ही चिदात्मा में संसक्त रहता है ॥ १ ॥ अब शङ्का करते हैं कि यदि यह एक ही महेश्वररूप आत्मा है तो कौन बन्धन ग्रस्त होगा और प्रपञ्च से छूटने के लिए उद्यम करता है ? इस पर आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं— अपने से सृष्ट इदंभाग में बुद्ध्यादि के ग्रहणरूप से अहङ्कार के परामर्श पद तक पहुँचा देना है वही वह पद है ॥ २ ॥ इस प्रकार स्वात्मस्वरूप महेश्वर के रहते-रहते वही प्रकाश स्वात्मदर्पण में परमेश्वर की स्वतन्त्रता के कारण संकुचित होकर इदंभाग का सर्जन करता है, उसके बीच में जो यह बुद्धि, प्राण, देहरूपी इदन्ता का वेद्य होती है उससे भिन्न वेद्य ग्राहक बनता है इदंभाग के प्रभाव को दबा देने से कृत्रिम अहंभाव के परामर्श से भासित हुआ 'अहं देवदत्तोऽहं चैत्रः' मैं देवदत्त हूँ, मैं चैत्र हूँ, ऐसा प्रकाशित होता है ॥ २ ॥ अच्छा तो, ऐसा भले ही हो; क्योंकि ईश्वर से भिन्न दूसरा कोई नहीं है तो फिर किस का

अ.-४, आ.-१, का.-३-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३०३ परिहर्तुमाह— स्वस्वरूपापरिज्ञानमयोऽनेकः पुमान् मतः । तत्र सृष्टौ क्रियानन्दौ भोगो दुःखसुखात्मकः ॥ ३ ॥ सत्यं, परमार्थतो न कश्चिद्बन्धः केवलं स्वस्मादनुत्तरात् स्वातन्त्र्यात् यदा स्वात्मानं संकु- चितमवभासयति स एव, तदा स्वस्थ पूर्णस्य रूपस्य यदपरिज्ञानं भासमानत्वेऽप्यपरामर्शरूपं, तदेव कारणत्वेन प्रकृतं यस्य स पूर्णत्वाख्यातिमात्रतत्त्वः ‘पुरुष’ इत्युच्यते । अत एवानेकस्तत्तद्देह- प्राणबुद्धिविशेषेण सङ्कोचग्रहणात् स च पुमान् भोक्ता सम्बन्धं भोगलक्षणमनुभवति, भोगश्च नाम तस्य यौ कल्पितौ क्रियानन्दौ, कल्पिता क्रिया दुःखं, रजो हि प्रकाशाप्रकाशचाञ्चल्यरूपं दुःख- मुच्यते; प्रकाशरूपं च सत्त्वं सुखं; तमस्त्वप्रकाशरूपो मध्ये विश्रमः प्रलयस्थानीयः ॥ ३ ॥ ननु सृष्टावित्यनेन किं व्यवच्छेद्यं किं च संग्राह्यम् ? इत्याह— स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥ ४ ॥ विश्वरूपस्य भगवतः स्वरूपभूत एव विश्वत्रयः प्रकाशो यश्च विमर्शः, ते तावज्ज्ञानक्रिये स्वरूपपरामर्शापरित्यागेनैव तु यद्विभिन्नतयापि विमर्शनं स्वरूपपरामर्श एव विश्रान्तम् ‘अहमिदम्’ बन्धन होगा ? इस आशङ्का को दूर करने के लिए कहते हैं— अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होने से अनेक पुरुष मानने लगता है । उसकी सृष्टि में क्रिया और आनन्द है एवं सुख-दुःखात्मक भोग होता है ॥ ३ ॥ ठीक है, ईश्वर से भिन्न दूसरा तो कोई नहीं है और जो बन्धन से युक्त होता हो । पर- मार्थतः कोई भी बन्धन ग्रस्त नहीं है, चिद्रूप स्वतन्त्र ही एक शिव है केवल अपने से अनुत्तर परम- स्वातन्त्र्यरूप जब अपने आपको संकोचरूप मानता है वही बन्धन है, उससे भिन्न दूसरा कोई बन्धन नहीं है । तब अपने पूर्ण स्वरूप का अज्ञान भासमान रहने पर भी अपरामर्शरूप रहता है, वही एक प्रकार से कारण बन जाता है उससे पूर्णता का ज्ञान नहीं होता जिस वजह से वह कहा जाता है । इसलिए देह, प्राण, बुद्धि आदि में विशेषरूप से संकोच हो जाने के कारण वह पुरुष भोक्ता भोग के सम्बन्ध रूप का अनुभव करता है, [ अत एव बद्ध कहा जाता है ] और भोग नाम उसका है जो कल्पित क्रिया आनन्द है, [ विमर्श और प्रकाशमय है ] कल्पित क्रिया ही दुःख है; क्योंकि रजोगुण प्रकाश-अप्रकाश चाञ्चल्यरूप है इसलिए उसे दुःख कहा जाता है, सतोगुण प्रकाशरूप होने से सुखात्मक होता है, किन्तु तमोगुण अप्रकाशरूप मायामय होने से मध्य में प्रलय अवस्था जैसा रहता है अर्थात् गहन सुषुप्ति में तम अप्रकाशरूप रहता है ॥ ३ ॥ सृष्टि में भोग पदार्थ सुख-दुःखात्मक है तो फिर क्या छोड़ना और क्या ग्रहण करना ? इस आशङ्का के उत्तर में कहते हैं— अपने अङ्गरूप भाव-पदार्थों में पशुपति की जो ज्ञान और क्रिया रहती है । पशु के लिए तीसरी माया के रहने पर वे ही सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हो जाते हैं ॥ ४ ॥ विश्वरूप भगवान् के स्वरूपभूत ही ये तीनों ज्ञान, क्रिया और माया के प्रकाश हैं और जो विमर्श है, वह ज्ञान और क्रिया के स्वरूप परामर्श को न छोड़ने के कारण भिन्नरूप से भी

३०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-५ इति सदाशिवेश्वरपरमार्थं सा भगवतो मायाशक्तिः, ता एतास्तिस्रः शक्तयो भगवति नैसर्गिक्यो दृष्टाः । स्वरूपापरिज्ञाने तु भिन्नेषु भावेषु ज्ञानं, क्रिया, शुद्धमेव भिन्नत्वं प्रकाशविमर्शशून्यम्,— इति पशोः प्रकाशः प्रकाशाप्रकाशावप्रकाशश्च,—इति क्रमेण सुखदुःखमोपलक्षणानि प्रकाशक्रिया- नियमनशीलानि सत्त्वरजस्तमांसि ॥ ४ ॥ ननु चैवं सति यथा परमेश्वरस्य ज्ञानक्रियामाया अव्यतिरेकिण्यः शक्तयः,—इत्युच्यन्ते, तद्वत् पशोः सत्त्वरजस्तमांसि प्रसज्यन्ते, व्यतिरिक्तानि च तानि पुंस्तत्त्वाद्गण्यन्ते; तदेतत् कथम् ? इति संशयं शमयति— भेदस्थितेः शक्तिमतः शक्तित्वं नापदिश्यते । एषां गुणानां करणकार्यत्वपरिणामिनाम् ॥ ५ ॥ सत्यम्, एवं स्यात् यदि भेदग्रहो न भवेत्, भेदव्यवहारस्त्वयं विचार्यते । तत्र च संकुचित- स्वभावः पुरुषो, नास्य नैसर्गिकं भावविषयं प्रकाशनादिरूपं सर्वदा तत्प्रसङ्गात्, अपि त्वन्यसंबन्ध- कृतम्; ततश्च तस्मात् पशोः शक्तिमत्त्वेन शङ्क्यमानाद् भेदेन यत एतानि सत्त्वादीनि, ततः शक्तयो व्यतिरेकमुक्ता;—इति नोच्यन्ते किं तूपकरणत्वात् 'गुणा' इत्युच्यन्ते । ननु पुरुषात् किमिति ते भेदेनोच्यन्ते ?' उच्यते, सुखदुःखमोहपरिणामरूपमेतत्करणत्रयोदशकं कार्यदशकं च सुखादि- विमर्श स्वरूपपरामर्श में ही विश्रान्त लेता है। 'अहमिदम्' मैं ही यह हूँ ऐसी वह भगवान् की माया-शक्ति है परमार्थतः सदाशिव एवं ईश्वररूप से कही जाती है। ज्ञान, क्रिया और माया ये तीनों शक्तियाँ भगवान् में स्वाभाविक देखी जाती हैं। स्वरूप के परिज्ञान न रहने पर तो भिन्न- भिन्न रूपों से पदार्थों में ज्ञान एवं क्रिया दिखायी देती है और प्रकाशविमर्श तो शुद्ध ही रह कर सब से भिन्न ही रहता है, पशु का प्रकाश तो प्रकाश और अप्रकाश तथा इन दोनों से मिला हुआ भी जो अप्रकाशरूप में रहता है, क्रमशः ये सुख-दुःख एवं मोहात्मक होते हैं। सतोगुण-रजोगुण- तमोगुण ये तीनों गुण सुख-दुःख और मोह स्वरूप हैं, सतोगुण का कार्य प्रकाश करना है, रजोगुण का कार्य विभिन्न कार्यों के करने में प्रवृत्तिशील रखता है और तमोगुण का कार्य कर्मशील व्यक्ति के कार्य में रुकावट डालकर प्रमादी बना देना है ॥ ४ ॥ अब शङ्का करते हैं कि जैसे परमेश्वर को ज्ञान, क्रिया और माया अभिन्न शक्तियाँ कही जाती हैं, उसी प्रकार पशु से सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं और ये तीनों भिन्नरूप से पुरुष में रहती हैं, इस प्रकार यह कैसे होगा ? इस संशय का समाधान करते हैं— परमेश्वर में अभिन्नरूप से रहनेवाली ज्ञानादि शक्तियाँ पशु जीव में भेदपूर्वक रहती है ऐसा नहीं कह सकते हैं। त्रयोदशकरण एवं दशविधकार्यरूप इन गुणों के परिणामस्वरूप से रहती हैं ॥ ५॥ आपका कहना ठीक है, ऐसा होगा यदि भेद ग्रह नहीं होता हो, तो ऐसा हो सकता है, इसलिए भेद व्यवहार का विचार करते हैं। पुरुष संकुचित स्वभाववाला है इस पुरुष का नैसर्गिक भाव विषय नहीं होता; क्योंकि वह स्वाभाविक होता तो सदा सर्वदा प्रकाशित हुआ करता, यह तो दूसरों के सम्बन्ध से होता है; इस कारण पशु की शक्तिमत्ता की शङ्का करके भेद से सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं, इसलिए ये शक्तियाँ भिन्न हैं यह कहा जाता है; यद्यपि इन्हें भिन्न नहीं कहते हैं किन्तु उपकरण होने के कारण वे सतोगुण आदि इनके 'गुणाः' गुण हैं ऐसा कहते