भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-३, आ.-२, का.-१६-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९५ बाह्येन्द्रियाधिष्ठानानि चक्षुर्गोलकादीनि निमीलितानि निद्रायमाणस्य लक्ष्यन्ते, न च तेषु निमीलितेषु बाह्येन्द्रियग्रहणव्यापारो दृष्टः तेन शुद्ध एव मनोमार्गे रूपस्पर्शादयो भावा अक्षग्रहण- समुचितेन स्पष्टेन वपुषा भासनयोग्याः परमेश्वरेण सृज्यन्ते, न त्वणुना अनिष्टस्यैव दर्शनात् इष्टस्यापि देशकालान्तरादियोगेन । अत एव मनोमात्रस्थितत्वादेव न प्रमात्रन्तरसाधारणीयं सृष्टिः । यत्तु तत्र बाह्येन्द्रियविषयत्वं प्रमात्रन्तरसाधारण्यं चकास्ति, तद्यद्यपि यावद्भाति तावत् तथैव, तथाप्युत्तरकालं प्रबुद्धस्य न तथा,—इति परामर्शेन तद्रूपं निर्मूलत्वेनावभाति, —इति भ्रान्तम् । यानि हि प्रमात्रन्तराणि स्वप्ने स्वेन्द्रियाणि च भ्रान्ति, एतानि प्रबोधकालभाविभिरेव तैरभिन्नानि,—इति निश्चयः, प्रबोधकाले च न तथा,—इति निश्चयानुवृत्तिरपहृतैव । तेनोभयमपि भ्रान्तमुच्यते; भ्रान्तत्वमेव चास्थैर्यम् । एवमिन्द्रियाविषयत्वेनैवासाधारणत्वमाक्षिप्तम्, 'विभ्रमेणैव चास्थैर्यं........' इति स्वकण्ठेन, तत् जाग्रत्प्रतियोगिधर्मनिरूपणावसरेऽपि न दर्शितम् । एवं भूता या सृष्टिः सा पशोः स्वप्नसमये भावात् 'स्वप्नपदं' स्वप्नकाले विषयः, —इति तथाभूतविषयं प्रमातृत्वं पशोः स्वप्नावस्था,—इति यावत् । अक्षग्रहणं बाह्येन्द्रियदशकस्योपलक्षणम् । यत्र तु बाह्याक्षविषयं सर्वप्रमातृसाधारणत्वं च निश्चयानुवृत्त्या बाधारहितया परमार्थत्वेन चकास्ति, तत एव स्थैर्यं विषयस्य सा सृष्टिः पशोः जागरः; तद्विषयं प्रमातृत्वं जाग्ररावस्था,—इति यावत् । बाह्येन्द्रियों के अधिष्ठान चक्षुगोलक इत्यादि जब निद्रा में पुरुष आ जाता है तो सम्बन्ध बन्द हो जाता है, और उन सबके बन्द हो जाने पर बाह्येन्द्रियों का व्यापार नहीं दिखायी देता है, इससे सिद्ध होता है कि रूप-स्पर्शादि जो भाव हैं वे सभी इन्द्रियों के बाह्य शरीर से परमेश्वर के द्वारा ही सृष्ट हुए हैं, जीव के द्वारा नहीं हुए हैं; क्योंकि जीव को अभीष्ट नहीं है, अभीष्ट तो भिन्न देश-कालादि से सम्बन्धित होता है। इसीलिए मनोमात्र में ही रहने के कारण सर्व साधारण प्रमाताओं के लिए यह सृष्टि नहीं होती है और न तो बाह्येन्द्रियों का विषय भी साधारण दूसरे प्रमाताओं के द्वारा प्रकाशित होता है, यद्यपि वह जब तक भासता है तब तक ही उसकी सत्ता रहती है उत्तरकाल में प्रबुद्ध के लिए वैसा नहीं रहता है उसका बाध हो जाता है, ऐसा इस परामर्श से वह उस रूप में निर्मूल भासता है, यही भ्रान्ति है। जो कि स्वप्न में अन्य प्रमाताओं की अपनी इन्द्रियाँ भासती हैं, प्रबोधकाल में होनेवाले आभासों से अभिन्न होते हैं, यही निश्चय होता है, उसी प्रकार प्रबोधकाल में नहीं होता है, इस प्रकार निश्चय ही अनुवृत्ति अपहृत रहती है। इसीसे ये दोनों भ्रान्त कहे जाते हैं और भ्रान्ति ही एक प्रकार से अस्थिरता है। इस प्रकार इन्द्रियों की अविषयता बता करके उनकी असाधरणता पर आक्षेप किया गया है, 'विभ्रमेणैव चास्थैर्यं......।' ऐसा अपने मुख से ही कहा है, उसे जाग्रत अवस्था के प्रतियोगी धर्म के निरूपण अवसर में भी नहीं दिखाया है। इस प्रकार जो सृष्टि है वह पशु जीव के स्वप्न काल में होती है 'स्वप्नपदं' अर्थात् स्वप्नकाल का विषय होती है, उसी प्रकार का विषय पशु प्रमातृत्व कहलाता है। जो कि पशु जीव की स्वप्न अवस्था है, अक्ष ग्रहण से पञ्च ज्ञानेन्द्रिय ओर पञ्च कर्मेन्द्रिय का ग्रहण करना चाहिए। किन्तु जिसमें बाह्येन्द्रियों का विषय रहता है वह सब प्रमाताओं के लिए साधारणत्व रहता है और वह निश्चयवृत्ति के कारण बाधा रहित होने से ठीक-ठीक प्रकाशित होता है, इसीलिए वह विषय की स्थिरता है और उसे ही पशुजीव की जाग्रत अवस्था कहते हैं, जो कि स्थिर विषयवाला सृष्टि है तो भी पशु का वह जागरण माना जाता है,