भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१८ यावच्चानुवृत्तिस्थैर्यं निश्चयस्य चकास्ति, तावज्जागरः। तन्मध्य एव च निश्चयानुवृत्तिनिर्मूलनात् स्वप्नः,—इत्यवभाससारत्वात् वस्तूनां; स्वप्नेऽपि दीर्घे यत्र स्वप्नान्तरं, स तदपेक्षया जाग्रदेव; जाग्रदभिमतमपि वा दीर्घदीर्घं कालान्तरे निश्चयानुवृत्तिनिरोधाज्जाग्रदन्तरापेक्षया स्वप्न एवेति मन्तव्यम् ॥ १६-१७ ॥ आसां तिसृणां हेयत्वप्रदर्शनेन तुर्यावस्थातः प्रभृत्युपादेयत्वं सूचयति— हेया त्रयीयं प्राणादेः प्राधान्यात्कर्तृतागुणे । तद्धानोपचयप्रायसुखदुःखादियोगतः ॥ १८ ॥ यत्रायं प्रमाता त्यागोपादानतदिच्छाप्रयत्नादिकं परिक्लेशं पश्यति, तदेवास्य हेयतया भाति । स चास्य सुखदुःखयोगवैचित्र्येणैव कृतः, तच्चैतदवस्थात्रये संभवति; यतः कर्तृतारूपं स्वात्मविश्रान्त्यानन्योन्योन्मुख्यलक्षणमानन्दैकघनं यच्चिन्मयं वपुः, तद्यदा प्राणादिवृत्तिशून्यपुर्यष्टक- देहादिभूमिषु गुणतामभ्येति, तदा तस्मिन् गुणीभूते प्राणादेः प्राधान्यं स्फुरति । तथा च तस्य चिद्रूपस्य यथातथा हानिस्तथातथा दुःखोपचयो, यथातथा किञ्चिदुन्मज्जनं तथा तथा सुखोपचयः । तथाहि—बुभुक्षाकाले प्राणस्यैवोद्रेकात् दुःखं, तृप्तौ तस्य न्यग्भावादहन्तोद्रेके सुखम् । एवं जब तक विषय की स्थिरता का निश्चय प्रकाशित रहता है तब तक जागरण काल रहेगा । उसी बीच में निश्चय की अनुवृत्ति के निर्मूल होने पर स्वप्न प्रारम्भ हो जाता है । इसलिए वस्तु-पदार्थों में अवभास ही सार तत्त्व माना गया है; चिरकाल पर्यन्त होनेवाले स्वप्न में जो भी अन्य-अन्य स्वप्न होते हैं वे सब के सब उसकी अपेक्षा से ही है, जाग्रत का अभिमान होने पर भी दीर्घ-दीर्घ दूसरे काल तक निश्चय की अनुवृत्ति के रुक जाने से दूसरे जागरण की अपेक्षा से उसे स्वप्न ही मानना चाहिए ॥ १७ ॥ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं की हेयता को दिखा करके तुर्यावस्था ही उपादेय है, इसे सूचित करते हैं— कर्तृंता के गुण में प्राणादि की प्रधानता होने से जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को हेय समझना चाहिए । सुख-दुःखादि के योग से उसके भी प्रायः उपचय का त्याग करना चाहिए ॥ १८ ॥ यह प्रमाता छोड़ना एवं ग्रहण करना और उसकी इच्छा पर्यन्त करना आदि में क्लेशादि दुःख देखता है, वही उसकी हेयता प्रतीत होती है और सुख-दुःख की विचित्रता से क्लेश होता है । इस प्रकार सुख-दुःखादि तीनों अवस्थाओं में ही हो सकता है; क्योंकि अपने स्वरूप में विश्रान्ति लेना किसी दूसरे की अपेक्षा न रखना यह जो आनन्दघन चिन्मयरूप है वही परमेश्वर का स्वरूप है, जब वह प्राणादि वृत्तियों से शून्य पुर्यष्टक की भूमि में गौण हो जाता है उसी गुणीभूत अवस्था में प्राणादि की प्रधानता रहती है । उस काल में चिद्रूप परमात्मा को जैसी जैसी हानी होती जायेगी वैसी वैसी दुःख की अभिवृद्धि भी होती रहेगी, जब जब परमेश्वर सम्बन्धी कुछ भाव ऊपर उठता है तब तब सुख की अभिवृद्धि होती है । जैसा कि क्षुधाकाल में प्राण की उद्रेकरूपता से दुःख होता है और क्षुधा की परितृप्ति हो जाने पर उसके दब जाने से तो अहन्ता के उद्रेक से आनन्द का अनुभव होता है । इसी प्रकार थके हुए व्यक्ति का मर्दन करने पर और न करने