ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-२, का.-१९-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९७ श्रान्तस्य मर्दनामर्दने देहप्राधान्याप्राधान्ये मन्तव्ये । यस्तु समावेशतत्त्वज्ञस्तस्य तत्तत्काले दुःखानुदय एव । यदाह— 'दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । आच्छादयेद्बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥' (स्प० ४।८) इति । एवं प्राणादेः प्राधान्ये कर्तृताया गुणभावे सुखदुःखवैचित्र्यशतयोगः प्रयासभूमिः,—इति जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ते प्राणादिप्राधान्यं कर्तृतान्यग्भावश्चास्ति,—इति तत् त्रयमेव हेयम् । कर्तृता- प्राधान्योन्मेषात्तु तुर्यरूपातप्रभृति तत्स्थैर्यात्मकतुर्यातीतदशान्तमुपादेयम्, एकरसानन्दघनस्वभाव- लाभे उपादित्साजिहासावैवश्यपरिश्रमप्रशमात्,—इति तात्पर्यम् ॥ १८ ॥ ननु प्राणादिप्राधान्यं हेयताया कारणमुक्तं तच्चेज्जाग्रदादित्रय एव, तर्हि तुर्यादौ तदभावात् तत्समावेशे व्युत्थानानुपपत्तिः,—इति श्लोकद्वयेन शङ्कां परिहरति— प्राणापानमयः प्राणः प्रत्येकं सुप्तजाग्रतोः । तच्छेदात्मा समानाख्यः सौषुप्ते विषुवत्स्रव ॥ १९ ॥ मध्योध्वर्गाम्युदानाख्यस्तुर्यगो हुतभुङ्मयः । विज्ञानाकलमन्त्रेशो व्यानो विश्वात्मकः परः ॥ २० ॥ पर देह की प्रधानता और अप्रधानता माननी चाहिए। जो कि समावेश स्थिति में रहनेवाले ज्ञानिजन को तो उस-उस काल में दुःख का अभाव ही रहता है। इस विषय में कहा है कि— दुर्बल भी जिसको आक्रमण करके कार्य में प्रवर्तित होता है और अत्यन्त क्षुधा से आक्रान्त रहता है वह अपनी क्षुधा की निवृत्ति करे। प्राणादि की प्रधानता में और कर्तृता की गौणता में असंख्य सुख-दुःख के विचित्र योग से ही प्रयास भूमि होती है, उस जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति काल में प्राणादि की प्रधानता रहती है और कर्तृत्वभाव दबा रहता है, इसीलिए इन तीनों अवस्थाओं को विवेकपूर्वक छोड़ देना चाहिए। कर्तृत्वभाव की प्रधानता का उन्मेष होने से तुर्यरूप से लेकर उसकी तुर्यातीत अवस्था तक ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि इससे आनन्दघन स्वभाव की प्राप्ति होती है, ग्रहण करने की और त्याग करने की विवशता को शान्ति हो जाती है, यही इसका तात्पर्य है ॥ १८ ॥ अब शङ्का करते हैं कि प्राणादि के प्राधान्य को हेयता में कारण कहा गया है, वह यदि तीनों अवस्थाओं में है तो तुर्यादि में प्राणादि का अभाव रहने के कारण देहपात हो हो जायेगा, उसकी समाधि में व्युत्थान की अनुपपत्ति रहती है, इस प्रकार दो श्लोकों से इस आशङ्का का परिहार करते हैं— प्राण, अपान से युक्त होकर प्राण स्वप्न और जाग्रत प्रत्येक में रहता है। उन दोनों के अभाव में प्राण समान वायु होकर सुषुप्ति अवस्था में विषुवत् संक्रान्ति के समान रहता है ॥ १९ ॥ मध्य में उर्ध्वगामी होकर उदान नाम का वायु और अग्निरूप होकर तुर्य अवस्था में रहता है। विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर के रूप में व्यान वायु विश्वात्मक उत्तम होता है ॥ २० ॥ ३८