ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें२९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० 'प्राण' इति प्राणनरूपा जीवनस्वभावा येयं चिद्रूपस्य स्थितिः, सा तावत्सामान्यपरिस्पन्द- रूपा, देहप्राणादेरचेतनस्य चेतनावानतासंपादनात्मिका 'अहम्' इति स्वातन्त्र्यारोपसारा सती विकल्परूपपरामर्शमयी सैव प्राणादिविशेषात्मना पञ्चरूपतां भजते। तत्र किञ्चिज्जहती क्वचित्पतन्ती च प्रश्वास-निःश्वासरूपा क्रमेण प्राणत्वमपानत्वं च विशेषं दर्शयति। तदिदं विशेषद्वयं जाग्रति तावत् स्फुटमेव देहात् प्रसृत्य विषये विश्रान्तेः, ततोऽपि देहे; स्मृत्यादौ वाभ्यन्तरे वेद्ये विश्रान्तेः प्राणापानयोः सुस्पष्टत्वात् । स्वप्नेऽपि तद्वयमस्त्येव; स्वपतोऽपि हि प्राणापानौ निर्गमप्रवेशात्मानौ स्फुटेनैवापरेण लक्ष्येते। स्वयमेव च वेद्यसंवेदनात् त्यागोपा- दानरूपा स्थितिः संवेद्यत एव, तेन प्राणना प्राणपानविशेषद्वयमयी जाग्रति, तथा स्वप्ने; सुप्तं स्वप्नः, तदेव तु यदा सुतरां पुष्टं भवति, तदा सुषुप्तः प्रमाता, तस्येदं सौषुप्तं पदम्। तत् द्विविध- मपि समानरूपं विशेषं प्रागीयं स्वीकरोति। सवेद्ये तावत्सुषुप्ते यद्यपि प्राणापानस्पन्दो लक्ष्यते, तथापि तयोर्मध्ये या विश्रान्तिर्हृदयसदने निरिन्द्रिये प्रदेशे तदेव मुख्यतः सुषुप्तमिति। तत्र प्राणा- पानयोर्यश्छेदो विश्रान्तिः कंचित्कालं तदात्मा सकलरसादिवर्गस्योर्ध्वाधरतिर्यक्षु समानीकरण- व्यापारात्मा, तत एव हृत्पद्मविकासदानाद्भुक्तपीतजरणकारी समानो दिनरात्रिरूपयोः प्राणा- पानयोः कंचित्कालं साम्याद्विच्छेदाच्च विषुवत्कालतुल्यः। विषुं व्याप्तिं समानीकरणमर्हति,— इति, 'तदर्हम्' ( पा०सू० ५।१।११७ ) इति वतिः। उपमाने वतेरेव चाव्ययत्वम् 'उद्वतो निवतः' 'प्राण' प्राणनरूप जीवन को चलानेवाली जो चेतन की स्थिति है, वह सामान्यरूप से स्फुरण कराती है, अचेतन जो देह-प्राणादि है उसे चेतनता देनेवाली यह 'अहम्' स्वातन्त्र्य-शक्ति है स्वतन्त्रता का आरोप करना जिसकी यही विशेषता है कि विकल्परूप परामर्श करनेवाली प्राणादिरूप से पाँचोरूपों में विभक्त हो जाती है। उसमें कुछ छोड़ती हुई और कहीं गिरती हुई श्वासप्रश्वासरूप होने से प्राणत्व और अपानत्व को विशेषरूप से बताती है। ये दोनों जाग्रत काल में स्पष्ट रहते हैं देह से फैलती हुई विषय में जाकर विश्राम लेती है, फिर उसके देह में; स्मृति आदि में अथवा वेद्य में विश्रान्त होकर प्राण, अपान के रूप में सुस्पष्ट प्रतीत है। स्वप्नकाल में भी दोनों रहते हैं; क्योंकि सोने पर प्राण, अपान दोनों का निर्गम और प्रवेश स्पष्ट ही दूसरे लोग देखते हैं और वेद्य अर्थात् ज्ञानरूप होने से स्वयं त्याग और ग्रहणरूप स्थिति की अवगति होती है, इस प्रकार जाग्रत काल में प्राणना, प्राण और अपान दोनों में विशेषरूप से रहती है, उसी प्रकार स्वप्न में भी 'सुप्तं' स्वप्न ऐसा प्रयोग आया है, वही जब भली भाँति पुष्ट हो जाता है, तब प्रमाता सुषुप्ति में पहुँच जाता है, उसका यह सौषुप्तपद है। वह सवेद्य और अपवेद्यरूप में भी समानरूप से विशेष भावपूर्वक जीवित रहना स्वीकार करता है। पहले यद्यपि सवेद्य सुषुप्ति में प्राण और अपान का स्पन्दन लक्षित होता है, तो भी दोनों के बीच में जो इन्द्रिय से रहित हृदय स्थान में विश्रान्ति है वही मुख्यतः सुषुप्ति अवस्था मानी जाती है। प्राण और अपान का जो भेदक है जिसको विश्रान्ति कहते हैं वही कुछ काल पर्यन्त उस रूप में रह कर सकल रसादि वर्ग का ऊपर-नीचे तथा चारों तरफ बराबर कर देना जिसका व्यापार है, उससे ही हृदय- कमल विकसित होने के कारण खाये-पीये पदार्थ को पचा देना यह सब समान वायु का कार्य है एवं दिन और रात्रिरूप जो प्राण और अपान वायु है वह कुछ अंश तक भेद करने के कारण विषुवत् काल के समान वह भी रहता है। चारों तरफ ठीक-ठीक व्यापकरूप में कर देने का