ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-२, का.-१९-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९९ इति प्रयोगात्; तद्धि न्यायसिद्धं न वाचनिकं, विशेषं वा दिनरात्रितदूनाधिकत्वलक्षणं सुवति प्रेरयत्यविरतम्,—इति शतरि विषुवत् । तत्र च विषुवति विच्छिद्यमानस्य प्राणापानस्य संस्काररूपतया सद्भावः, सैव हि विच्छेदो न तु सर्वात्मना नाशोऽस्ति,—इत्युक्तमसकृत् । ततश्च हानादानयोर्बीजरूपता सुषुप्ते; इयति च सर्वः प्रलयाकलान्तः पशुवर्गः। यदा तु सा प्राणना वृत्तिर्वामदक्षिणमार्गौ खिलीभावयन्ती मध्यरूपेणोर्ध्वेन प्रवहति, तदा तत्प्रवहणं सकलस्य भेदस्याभेदसारतादानलक्षणं विलापनमाश्यानस्येव सर्पिषो विदधती उदानवृत्तिर्विज्ञानाकलादारभ्य सदाशिवान्तं, सा च तुर्यात्मिका दशा। मायोर्ध्वे हि विज्ञानाकलाः,—इति ततःप्रभृति भेदगलनं प्रवर्तते। विलीने तु भेदे सर्ववेद्यराशिरूपतत्त्वभूतभुवनवर्गात्मकदेहव्यापाररूपेण प्राणवृत्तिर्व्यानि- रूपा विश्वात्मकपरमशिवोचिता तुर्यातीतरूपा। प्राण एव प्रमाता प्राणापानरूपः समानरूप नाम विषुवत् है। 'तदर्हम्' (पा० सूत्र ५।१।११७) इस सूत्र से वतिप्रत्यय होकर विषुवत् बना है और वतिप्रत्यय उपमान में अव्यय होता है 'उद्धतो निवतः' इत्यादि प्रयोगों में देखा जाता है; क्योंकि यह युक्तिपूर्वक भी सिद्ध है कोई मौखिक नहीं है अथवा तो दिन और रात्रि को न्यूनाधिक जो निरन्तर प्रेरित करता है,—शतृ प्रत्यय करके भी विषुवत् शब्द बनता है। इस प्रकार विषुवत् में विच्छिद्यमान जो प्राण-अपान है उसमें संस्काररूप से रहने के कारण उसे विच्छेद कहते हैं अर्थात् संस्काररूप से सद्भाव होना ही विच्छेद है सारा का सारा विनष्ट नहीं हो जाता है, यह हमने अनेक बार कहा है। आदान-प्रदान करना भी सुषुप्ति में बीजरूप से रहना सिद्ध है; इतने अंश में ही प्रलयाकल तक सभी पशुवर्ग रहते हैं। जब जीवन वृत्ति वाम और दक्षिण भाग को छोड़कर मध्यरूप से बहती है, तब उसका बहना सब भेदों में अभेद देनारूप जैसा कि पिघले हुए घी का स्वरूप, उसी में उदानवृत्ति विज्ञानाकल से लेकर सदाशिव दशा पर्यन्त जो दशा है उसे तुर्यावस्था कही जाती है माया तत्त्व के ऊपर विज्ञानाकल रहते हैं और वहां से ही भेद गलने लगता है। भेद के विलीन हो जाने पर सारी संवेद्यराशि भुवनवर्ग, देह व्यापार- रूप प्राणों की वृत्तियां विश्वात्मक परम शिव में रहने के कारण तुर्यातीतरूप हो जाती है, इसलिए १. ब्रह्मादिकीटान्तमनन्तकं यल्लोकत्रये वेदकचक्रवालम् । तद्वैतदृष्टयैव सुपूर्णमित्थं तदीयचक्षुर्युगलं व्यनक्ति ॥ इत्थं विमृश्याहमनन्तशक्तिविश्रान्तधीर्द्वैतदृशं जिहासुः । त्वद्भक्तिसंदर्शितशुद्धमार्ग निरर्गलोभावितभूरिभावः ॥ समं समप्रोद्गतवेदानाख्यबिन्दुस्थनेत्रान्तरशोभमानम् । भवन्तमन्तःकृतविश्वरूपमद्वैतदृष्टि शिवसंश्रितोऽस्मि ॥ शैव दर्शन में परम शिव को त्रिनेत्र शब्द से कहा गया है। हे भगवन् ! तीनों लोकों में ब्रह्मा से लेकर कीट-पतङ्ग पर्यन्त जितने भी वेदक पदार्थ हैं अर्थात् ज्ञाता वर्ग हैं, वे सभी द्वैतभाववाले हैं इसी कारण उन लोगों की द्वैतरूपी दो आँखें मानी जाती हैं, इसका विचार करके मैं आपकी अनन्त- शक्तियों में विश्राम लेकर अर्थात् द्वैतभाव को छोड़कर आपकी विशुद्ध-विमल भक्ति द्वारा अपने आपके द्वारा माने हुए बन्धन से मुक्त होकर सर्वत्र समभाववाले तृतीय बिन्दु स्थानीय नेत्र के खुल जाने से अपने में सारे विश्व को किये हुए अद्वैत दृष्टिवाले परम शिव को ही देख रहा हूँ अर्थात् मैं तो सारे त्रिलोकी विश्व को अन्तःसात् करनेवाले अद्वैत शिव को ही तृतीय-नेत्र से शोभायमान् देख रहा हूँ।