भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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३०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० उदानरूपो व्यानरूपश्च,-इति सामानाधिकरण्यात् विज्ञानाकलश्चासौ मन्त्रश्चासौ वर्गापेक्षया, ईशश्च सदाशिवेश्वररूपो योऽसौ,-इति स उदानः। एतदुक्तं भवति यद्यपि तुर्यतदतीतयोरप्यस्ति प्राणना—अन्यथा जीवत्वस्य व्युत्थानस्य चानुपपत्तेः—तथापि भेदोपसंहारेणाभेदविश्रान्ति- प्राधान्यादनयोर्दशयोः सुखदुःखादिवैचित्र्यायोगात् एकघनस्वात्मविश्रान्त्यात्मकपरमानन्दमयत्वे- नोपादेयतैव। सुषुप्तादौ तु संस्काररूपत्वास्र्फुटवेद्योल्लासस्फुटवेद्यावभासरूपस्य भेदस्य विद्यमान- त्वात् अस्ति सुखदुःखादिवैचित्र्यम्,-इति हेयतैव,-इति युक्तमुक्तं 'हेया त्रयीयम्' इत्यादि। भगवतश्च विश्वशरीरस्य प्राणापानसमानोदानव्यानरूपतयैव सकलगतोल्लासप्रवेशप्रलयाकल- विज्ञानाकलादिवर्गसदाशिवरूपता,-इत्यप्यनेन दर्शितम्। यथोक्तम्—'षट्त्रिंशदात्मकं विश्वं शम्भोः प्राणादिशक्तयः।' इति ॥ १९-२० ॥ आदितः ॥ १७१ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्त- विरचितविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायामागमाधिकारे प्रमातृतत्त्व- निरूपणाख्यं द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥ • प्राण ही प्रमाता है वही प्राणरूप, अपानरूप, समानरूप, उदानरूप और व्यानरूप होकर रहता है, इस प्रकार यह सामानाधिकरण्यरूप होने से विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर भी है और वर्ग की अपेक्षा से ईश्वर और सदाशिवरूप उदान है। अब यह कहा जाता है कि परमेश्वर के विषय में जो कहना था सब कह दिया, अनन्तर जीव के विषय में प्रतिपादन किया जायेगा, तुर्यावस्था और तुर्यातीत अवस्था में भी जीव रहता है; नहीं तो, जीवत्व का उत्थान नहीं हो सकेगा, फिर भी भेदों का उपसंहार करके अभेद में विश्रान्ति लेने से उसकी प्रधानता से दोनों दशाओं में सुख-दुःखादि की विचित्रता से एकघन आत्मा में विश्राम पा लेने से परमानन्द स्थिति स्थिर हो जाती है, इस दर्शन में यही उपादेय है। सुषुप्ति अवस्था में तो संस्काररूप से अस्फुट वेद्य का उल्लास होना और स्फुटरूप से वेद्य का भास होना एवं दोनों रूपों में भेद के विद्यमान रहने से सुख-दुःखादि की विचित्रता बनी रहती है। इसलिए यह छोड़ने योग्य ही है, ठीक ही कहा है कि 'हेया त्रयीयम्' इत्यादि। भगवान् विश्व शरीर के प्राण, अपान, समान, उदान, व्यानरूप से ही सभी जीवों में उल्लासपूर्वक प्रवेश करने के कारण प्रलयाकल, विज्ञानाकल आदि वर्ग से लेकर सदाशिव तक दिखा दिया। जैसा कि कहा है—'छत्तीस तत्त्वोंवाला यह विश्व भगवान् सदाशिव की प्राणादि शक्तियाँ हैं' ॥ १९-२० ॥ द्वितीय आह्निक समाप्त इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता तृतीयागमाधिकारहिन्दीव्याख्या शिवरञ्जनी इति तृतीयः आगमाधिकारः समाप्तः •