भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अथ चतुर्थः तत्त्वसंग्रहाधिकारः अथ चतुर्थे तत्त्वसंग्रहाधिकारे गुरुपर्वक्रमाख्यं प्रथममाह्निकम् अनन्तमानमेयादिवैचित्र्याभेदशालिनम् । आत्मानं यः प्रथयते भक्तानां तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं स्वसंवेदनोपपत्त्यागमसिद्धं महेश्वररूपमात्मस्वरूपं यदधिकारत्रयेण वितत्य निर्णीतं तदेव संक्षेपेण शिष्यबुद्धिषु निवेशयितुमाग़मार्थसंग्रहं श्लोकाष्टादशकेन दर्शयति ‘स्वात्मैव सर्वजन्तू- नाम्’ इत्यादिना ‘उत्पलेनोपपादिता’ इत्यन्तेनैकेनाह्निकेन । तत्र श्लोकेन पारमार्थिकं रूपमुक्तवा श्लोकनवकेन बन्धस्वरूपं प्रमातृप्रमेयतत्त्वदर्शनदिशा, सप्तकेन प्रत्यभिज्ञात्मकं मोक्षतत्त्वं, श्लोके- नोपसंहारं दर्शयति, — इति तात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते— स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः । विश्वरूपोऽहमिदमित्यखण्डामर्शबृंहितः ॥ १ ॥ इह जडास्तावच्चेतननिमग्ना एव भान्ति; इदमिति हि जडपरामर्शोऽहमिति संवित्परामर्श एव विश्राम्यति; ततश्च जडा निरात्मान इति, जन्तव एव जीवाः सात्मानस्तेषां च महेश्वर एव अनन्त प्रमाता, प्रमेय, प्रमाणादि के वैचित्र्य भावों को अभेद से युक्त एवं भक्तजनों के स्वरूप को जो प्रकाशित करते हैं, उसकी हम स्तुति करते हैं। इस प्रकार अपने संवेदन ज्ञान की उपपत्ति से आगम सिद्ध महेश्वर के स्वरूप को ज्ञाना- धिकार, क्रियाधिकार और आगमाधिकार में विस्तारपूर्वक निरूपण किया है उसका संक्षेप से शिष्यों की बुद्धि में प्रवेश करने के लिए आगमार्थ संग्रह के रूप में अठारह श्लोकों से दिखाया जाता है ‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनाम्’ इत्यादि लेकर ‘उत्पलेनोपपादिता’ अन्तिम इस एक आह्निक तक। प्रथम श्लोक से पारमार्थिकरूप को कह कर नव श्लोकों द्वारा प्रमाता, प्रमेय तत्त्व दर्शन दिशा से बन्ध का स्वरूप कहेंगे, इसके बाद सात श्लोकों से प्रत्यभिज्ञारूप मोक्ष तत्त्व का प्रतिपादन करेंगे, एक श्लोक से उपसंहार दिखायेंगे, इसका यही तात्पर्य है। अब ग्रन्थ के अर्थ की व्याख्या करते हैं— सभी जन्तु जीवों का आत्मा ही एक महेश्वर है। मैं विश्वरूप अखण्ड इस विमर्श से व्याप्त हूँ ॥ १ ॥ सभी जड समूह चेतन तत्त्व में ही ओतप्रोत होकर भासते हैं; क्योंकि ‘इदम्’ जो जड परा- मर्श है वह अहं इस संवित् ज्ञान परामर्श में ही विश्राम लेता है, इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जड वर्ग चेतन शून्य ही रहता है, जन्तु ही जीव होते हैं और चेतन आत्मा से विशिष्ट रहते हैं,