भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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३०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-२-३ स्वात्मा स एव महेश्वरो न त्वन्यः कश्चित् । यतः संवित्स्वभावोऽसौ, संविदश्च न देशेन न कालेन न स्वरूपेण कोऽपि भेदः, कामं देहप्राणादयो भिद्यन्तां, ते तु जडपक्ष्याश्चेतनमग्ना एव, —इत्येक एव चिदात्मा स्वातन्त्र्येण स्वात्मनि यतो वैश्वरूप्यं भासयति, ततो महेश्वरोऽन्तर्नीतामिदन्तां कृत्वा परानुन्मुखस्वात्मविश्रान्तिरूपाहंविमर्शपरिपूर्णः, अत एव सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वे नास्य यत्नो- पपाद्ये । विचित्रबुद्धिकर्मेन्द्रियविषये हि यथा ज्ञातृत्वकर्तृत्वे एकस्यैवात्मनस्तथेन्द्रियस्थानीयरुद्र- क्षेत्रज्ञसहस्रविषयस्य भावराशेर्यज्ज्ञानं करणं च तदेकत्र चिदात्मनि,—इति ॥ १ ॥ ननु यद्येक एवायं महेश्वररूप आत्मा कर्त्तर्हि बन्धो यदवमोचनायायमुद्यमः ? इत्याशङ्क्याह— तत्र स्वसृष्टेदंभागे बुद्ध्यादिग्राहकात्मना । अहङ्कारपरामर्शपदं नीतमनेन तत् ॥ २ ॥ 'तत्रैवं स्वात्मनि महेश्वरे स्थिते तस्मिन्नेव प्रकाशरूपे स्वात्मदर्पणे तेनैव परमेश्वरेण स्वातन्त्र्यात् तावत्सृष्टः सङ्कोचपुरःसर इदंभागः, तन्मध्ये यदेतद्बुद्धिप्राणदेहरूपमिदन्तया वेद्यं तद्भिन्नस्य वेद्यस्य ग्राहकत्या समुचितम् इदंभावाभिभवप्रभविष्णुत्वात् कृतकेनापूर्णेनाहंभावेन परामर्शेन भासमानं चकास्ति 'अहं देवदत्तोऽहं चैत्र' इति ॥ २ ॥ नन्वेवमप्यस्तु, तथापि कस्य बन्धः ईश्वरव्यतिरिक्तो हि कोऽन्योऽस्ति ? तदेतत् उन सब का आत्मस्वरूप महेश्वर ही है, इस प्रकार वही महेश्वर है अन्य कोई नहीं है। जिससे ज्ञात होता है कि यह संवित् ज्ञान स्वभाववाला है और संवित् का देश, काल और स्वरूप से कोई भेद नहीं है, भले ही देह प्राणादि का भेद होता हो, वे जड के पक्षपाती होते हुए भी चेतन में निमग्न रहते हैं। इस प्रकार एक ही चिदात्मा स्वतन्त्ररूप से अपने स्वरूप में विश्वरूप होकर भासित होता है, इससे महेश्वर इदन्ता को अन्तर्लीन करके किसी अन्य की ओर न उन्मुख होने- वाले अहं विमर्श में परिपूर्ण रहता है, इसीलिए सर्वज्ञत्व एवं सर्वकर्तृत्व के लिए कोई विशेष यत्न नहीं करना पड़ता है । [ इसीको दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं ] जैसे विचित्र ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय के विषय में एक चिदात्मा का ज्ञातृत्व-कर्तृत्व रहता है उसी प्रकार इन्द्रिय स्थानीय रुद्ररूप अनेक क्षेत्रज्ञ भावराशि के जो ज्ञान और करण एक ही चिदात्मा में संसक्त रहता है ॥ १ ॥ अब शङ्का करते हैं कि यदि यह एक ही महेश्वररूप आत्मा है तो कौन बन्धन ग्रस्त होगा और प्रपञ्च से छूटने के लिए उद्यम करता है ? इस पर आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं— अपने से सृष्ट इदंभाग में बुद्ध्यादि के ग्रहणरूप से अहङ्कार के परामर्श पद तक पहुँचा देना है वही वह पद है ॥ २ ॥ इस प्रकार स्वात्मस्वरूप महेश्वर के रहते-रहते वही प्रकाश स्वात्मदर्पण में परमेश्वर की स्वतन्त्रता के कारण संकुचित होकर इदंभाग का सर्जन करता है, उसके बीच में जो यह बुद्धि, प्राण, देहरूपी इदन्ता का वेद्य होती है उससे भिन्न वेद्य ग्राहक बनता है इदंभाग के प्रभाव को दबा देने से कृत्रिम अहंभाव के परामर्श से भासित हुआ 'अहं देवदत्तोऽहं चैत्रः' मैं देवदत्त हूँ, मैं चैत्र हूँ, ऐसा प्रकाशित होता है ॥ २ ॥ अच्छा तो, ऐसा भले ही हो; क्योंकि ईश्वर से भिन्न दूसरा कोई नहीं है तो फिर किस का