ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-४, आ.-१, का.-३-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३०३ परिहर्तुमाह— स्वस्वरूपापरिज्ञानमयोऽनेकः पुमान् मतः । तत्र सृष्टौ क्रियानन्दौ भोगो दुःखसुखात्मकः ॥ ३ ॥ सत्यं, परमार्थतो न कश्चिद्बन्धः केवलं स्वस्मादनुत्तरात् स्वातन्त्र्यात् यदा स्वात्मानं संकु- चितमवभासयति स एव, तदा स्वस्थ पूर्णस्य रूपस्य यदपरिज्ञानं भासमानत्वेऽप्यपरामर्शरूपं, तदेव कारणत्वेन प्रकृतं यस्य स पूर्णत्वाख्यातिमात्रतत्त्वः ‘पुरुष’ इत्युच्यते । अत एवानेकस्तत्तद्देह- प्राणबुद्धिविशेषेण सङ्कोचग्रहणात् स च पुमान् भोक्ता सम्बन्धं भोगलक्षणमनुभवति, भोगश्च नाम तस्य यौ कल्पितौ क्रियानन्दौ, कल्पिता क्रिया दुःखं, रजो हि प्रकाशाप्रकाशचाञ्चल्यरूपं दुःख- मुच्यते; प्रकाशरूपं च सत्त्वं सुखं; तमस्त्वप्रकाशरूपो मध्ये विश्रमः प्रलयस्थानीयः ॥ ३ ॥ ननु सृष्टावित्यनेन किं व्यवच्छेद्यं किं च संग्राह्यम् ? इत्याह— स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥ ४ ॥ विश्वरूपस्य भगवतः स्वरूपभूत एव विश्वत्रयः प्रकाशो यश्च विमर्शः, ते तावज्ज्ञानक्रिये स्वरूपपरामर्शापरित्यागेनैव तु यद्विभिन्नतयापि विमर्शनं स्वरूपपरामर्श एव विश्रान्तम् ‘अहमिदम्’ बन्धन होगा ? इस आशङ्का को दूर करने के लिए कहते हैं— अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होने से अनेक पुरुष मानने लगता है । उसकी सृष्टि में क्रिया और आनन्द है एवं सुख-दुःखात्मक भोग होता है ॥ ३ ॥ ठीक है, ईश्वर से भिन्न दूसरा तो कोई नहीं है और जो बन्धन से युक्त होता हो । पर- मार्थतः कोई भी बन्धन ग्रस्त नहीं है, चिद्रूप स्वतन्त्र ही एक शिव है केवल अपने से अनुत्तर परम- स्वातन्त्र्यरूप जब अपने आपको संकोचरूप मानता है वही बन्धन है, उससे भिन्न दूसरा कोई बन्धन नहीं है । तब अपने पूर्ण स्वरूप का अज्ञान भासमान रहने पर भी अपरामर्शरूप रहता है, वही एक प्रकार से कारण बन जाता है उससे पूर्णता का ज्ञान नहीं होता जिस वजह से वह कहा जाता है । इसलिए देह, प्राण, बुद्धि आदि में विशेषरूप से संकोच हो जाने के कारण वह पुरुष भोक्ता भोग के सम्बन्ध रूप का अनुभव करता है, [ अत एव बद्ध कहा जाता है ] और भोग नाम उसका है जो कल्पित क्रिया आनन्द है, [ विमर्श और प्रकाशमय है ] कल्पित क्रिया ही दुःख है; क्योंकि रजोगुण प्रकाश-अप्रकाश चाञ्चल्यरूप है इसलिए उसे दुःख कहा जाता है, सतोगुण प्रकाशरूप होने से सुखात्मक होता है, किन्तु तमोगुण अप्रकाशरूप मायामय होने से मध्य में प्रलय अवस्था जैसा रहता है अर्थात् गहन सुषुप्ति में तम अप्रकाशरूप रहता है ॥ ३ ॥ सृष्टि में भोग पदार्थ सुख-दुःखात्मक है तो फिर क्या छोड़ना और क्या ग्रहण करना ? इस आशङ्का के उत्तर में कहते हैं— अपने अङ्गरूप भाव-पदार्थों में पशुपति की जो ज्ञान और क्रिया रहती है । पशु के लिए तीसरी माया के रहने पर वे ही सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हो जाते हैं ॥ ४ ॥ विश्वरूप भगवान् के स्वरूपभूत ही ये तीनों ज्ञान, क्रिया और माया के प्रकाश हैं और जो विमर्श है, वह ज्ञान और क्रिया के स्वरूप परामर्श को न छोड़ने के कारण भिन्नरूप से भी