भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

३०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-५ इति सदाशिवेश्वरपरमार्थं सा भगवतो मायाशक्तिः, ता एतास्तिस्रः शक्तयो भगवति नैसर्गिक्यो दृष्टाः । स्वरूपापरिज्ञाने तु भिन्नेषु भावेषु ज्ञानं, क्रिया, शुद्धमेव भिन्नत्वं प्रकाशविमर्शशून्यम्,— इति पशोः प्रकाशः प्रकाशाप्रकाशावप्रकाशश्च,—इति क्रमेण सुखदुःखमोपलक्षणानि प्रकाशक्रिया- नियमनशीलानि सत्त्वरजस्तमांसि ॥ ४ ॥ ननु चैवं सति यथा परमेश्वरस्य ज्ञानक्रियामाया अव्यतिरेकिण्यः शक्तयः,—इत्युच्यन्ते, तद्वत् पशोः सत्त्वरजस्तमांसि प्रसज्यन्ते, व्यतिरिक्तानि च तानि पुंस्तत्त्वाद्गण्यन्ते; तदेतत् कथम् ? इति संशयं शमयति— भेदस्थितेः शक्तिमतः शक्तित्वं नापदिश्यते । एषां गुणानां करणकार्यत्वपरिणामिनाम् ॥ ५ ॥ सत्यम्, एवं स्यात् यदि भेदग्रहो न भवेत्, भेदव्यवहारस्त्वयं विचार्यते । तत्र च संकुचित- स्वभावः पुरुषो, नास्य नैसर्गिकं भावविषयं प्रकाशनादिरूपं सर्वदा तत्प्रसङ्गात्, अपि त्वन्यसंबन्ध- कृतम्; ततश्च तस्मात् पशोः शक्तिमत्त्वेन शङ्क्यमानाद् भेदेन यत एतानि सत्त्वादीनि, ततः शक्तयो व्यतिरेकमुक्ता;—इति नोच्यन्ते किं तूपकरणत्वात् 'गुणा' इत्युच्यन्ते । ननु पुरुषात् किमिति ते भेदेनोच्यन्ते ?' उच्यते, सुखदुःखमोहपरिणामरूपमेतत्करणत्रयोदशकं कार्यदशकं च सुखादि- विमर्श स्वरूपपरामर्श में ही विश्रान्त लेता है। 'अहमिदम्' मैं ही यह हूँ ऐसी वह भगवान् की माया-शक्ति है परमार्थतः सदाशिव एवं ईश्वररूप से कही जाती है। ज्ञान, क्रिया और माया ये तीनों शक्तियाँ भगवान् में स्वाभाविक देखी जाती हैं। स्वरूप के परिज्ञान न रहने पर तो भिन्न- भिन्न रूपों से पदार्थों में ज्ञान एवं क्रिया दिखायी देती है और प्रकाशविमर्श तो शुद्ध ही रह कर सब से भिन्न ही रहता है, पशु का प्रकाश तो प्रकाश और अप्रकाश तथा इन दोनों से मिला हुआ भी जो अप्रकाशरूप में रहता है, क्रमशः ये सुख-दुःख एवं मोहात्मक होते हैं। सतोगुण-रजोगुण- तमोगुण ये तीनों गुण सुख-दुःख और मोह स्वरूप हैं, सतोगुण का कार्य प्रकाश करना है, रजोगुण का कार्य विभिन्न कार्यों के करने में प्रवृत्तिशील रखता है और तमोगुण का कार्य कर्मशील व्यक्ति के कार्य में रुकावट डालकर प्रमादी बना देना है ॥ ४ ॥ अब शङ्का करते हैं कि जैसे परमेश्वर को ज्ञान, क्रिया और माया अभिन्न शक्तियाँ कही जाती हैं, उसी प्रकार पशु से सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं और ये तीनों भिन्नरूप से पुरुष में रहती हैं, इस प्रकार यह कैसे होगा ? इस संशय का समाधान करते हैं— परमेश्वर में अभिन्नरूप से रहनेवाली ज्ञानादि शक्तियाँ पशु जीव में भेदपूर्वक रहती है ऐसा नहीं कह सकते हैं। त्रयोदशकरण एवं दशविधकार्यरूप इन गुणों के परिणामस्वरूप से रहती हैं ॥ ५॥ आपका कहना ठीक है, ऐसा होगा यदि भेद ग्रह नहीं होता हो, तो ऐसा हो सकता है, इसलिए भेद व्यवहार का विचार करते हैं। पुरुष संकुचित स्वभाववाला है इस पुरुष का नैसर्गिक भाव विषय नहीं होता; क्योंकि वह स्वाभाविक होता तो सदा सर्वदा प्रकाशित हुआ करता, यह तो दूसरों के सम्बन्ध से होता है; इस कारण पशु की शक्तिमत्ता की शङ्का करके भेद से सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं, इसलिए ये शक्तियाँ भिन्न हैं यह कहा जाता है; यद्यपि इन्हें भिन्न नहीं कहते हैं किन्तु उपकरण होने के कारण वे सतोगुण आदि इनके 'गुणाः' गुण हैं ऐसा कहते