ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-४, आ.-१, का.-६] विमर्शिनीटीकोपेता [३०५ स्वभावत्वेनानुभूयते, —इति सुखदुःखमोहाः कारणकार्यवर्गतादात्म्यवृत्तयो यदि पुरुषव्यापि तादात्म्यं भजेरन् तर्हि पुरुषः कार्यकारणपर्यन्तसृष्टिमयः संपन्नः, परिणामश्च दूषितः, —इति स्वातन्त्र्यशक्त्या पुरुषो विश्वरूपः, इत्यायातम् । तथा च—न कश्चित् पुरुष ईश्वर एव, तस्मात् अप्रत्यभिज्ञानमयपुरुषस्वरूपविचारे सत्त्वादयो भिन्ना एव, —इति स्थितम् ॥ ५ ॥ ननु ज्ञानादीनि कथं सत्त्वादिरूपाणि पशुं प्रति ? इत्याह— सत्तानन्दः क्रिया पत्युस्तदभावोऽपि सा पशोः । द्वयात्मा तद्रजो दुःखं श्लेषि सत्त्वतमोमयम् ॥ ६ ॥ इह तावत् पतिर्विश्वस्यावभासमानवैचित्र्यलक्षणेन सृष्ट्यादिना पालयिता स्वप्रकाशस्वभावः, तस्य विश्वपतेर्या सत्ता भवनकर्तृता स्फुरत्तारूपा पूर्वं व्याख्याता 'सा स्फुरत्ता महासत्ता' (ई० प्र० १।५।१४ ) इत्यत्र, सैव प्रकाशस्य विमर्शाव्यतिरेकात् विमर्शात्मकचमत्काररूपा सती क्रिया- शक्तिरुच्यते, परोन्मुख्यत्यागेन स्वात्मविश्रान्तिरूपत्वाच्च सैन आनन्दः; तदेवं भगवतश्चिदात्मतयै- वेयद्रूपता । पशोस्तु सत्ता तदभावश्च आनन्दश्च तदभावश्च संकुचिततद्रूपत्वात्; तेन योऽसौ सत्ता- नन्दभागस्तत्प्रकाशसुखवृत्ति सत्त्वं, यस्तदभावस्तदावरणमोहरूपं तमः, एते च ते सत्त्वतमसी हैं । अच्छा तो, पुरुष से इन सबका भेद क्यों किया जाता है ? उत्तर में कहते हैं कि सुख, दुःख और मोह के परिणाम होकर त्रयोदश करण हो जाते हैं और दश कार्य हो जाते हैं और सुख दुःखादि का स्वभाविक अनुभव होता है, सुख, दुःख और मोह ये करण कार्य वर्ग से तादात्म्यरूप होकर पुरुष में व्याप्त अर्थात् पुरुष से अभिन्नता सम्पादन करके उससे भी तादात्म्य प्राप्त कर लेते हैं, इसी से पुरुष कार्य-करण पर्यन्त सृष्टिमय होकर सम्पन्न हो जाता है और इसके परिणाम को दूषित करते हैं, इस प्रकार स्वातन्त्र्य-शक्ति से पुरुष विश्वरूप बन जाता है, यही निष्कर्ष निकलता है। इसलिए कोई पुरुष नहीं है सब ईश्वर ही है, जब तक प्रत्यभिज्ञा नहीं होती है इसलिए प्रत्यभिज्ञा से शून्य पुरुष के स्वरूप का विचार-विमर्श करने पर ये सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण भिन्न-भिन्न ही प्रतीत होते हैं, यही स्थिर अर्थ है ॥ ५ ॥ अच्छा तो, पशु जीव के लिए ये सत्त्वादि ज्ञान कैसे होते हैं ? इस पर कहते हैं— पशुपति की सत्ता आनन्द एवं क्रिया है उससे रहित होकर पशु के लिए वह रजोगुण होकर दुःखरूप हो जाता है और सतोगुण एवं तमोगुण मिल कर सुख-दुःख-मोहरूप हो जाता है ॥ ६ ॥ ईश्वर विश्व को विचित्र प्रकार से अवभासित करके सृष्टि-स्थिति और अपने विल्यादि कार्य प्रपञ्च करते हैं, उसमें ईश्वर का स्वप्रकाशरूप रहता है, उस विश्वपति की सत्ता है 'सा स्फुरत्ता महासत्ता' जो भवनकर्तृता स्फुरत्तारूपा पूर्व में बता दी है वही विमर्श से अभिन्न होकर विमर्शात्मक चमत्कारवाली क्रिया-शक्ति कही जाती है, जब अन्य की उन्मुखता का त्याग कर और अपने में विश्राम कर लेती है तब वही आनन्द कहा जाता है; भगवान् चिद्रूप से इतने परिणाम की प्राप्ति कर लेते हैं। पशुजीव में तो सत्ता और उसका अभाव रहता है, आनन्द और उसका अभाव रहता है उस जीव पशु के संकुचितरूप होने के कारण; इसलिए यह सत्ता एवं आनन्द भाग है उसका प्रकाश सुखवृत्ति सतोगुण है, उन दोनों का अभाव और उसका जो आवरण करनेवाला मोहरूप तमोगुण है, ये दोनों सतोगुण और तमोगुण नील और अनील के जैसा यद्यपि ३९