भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 329

३०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-७ नीलानीलवत् परस्परपरिहारेण यद्यपि वर्तेते कार्यत्वकारणत्ववत् तथापि एकपरामर्शगोचरी- कार्यधर्ममपेक्षया चित्रपतङ्गसंगतनीलानीलात्मकरूपन्यायेनान्योन्यमिश्रतयापि भातः, अतो योऽयं 'द्वयात्मा' मिश्रस्वभावः तद्रजोगुणः, अत एव प्रकाशाप्रकाशस्वरूपयोः सत्त्वतमसोरत्र श्लेषेणाव- स्थानम्,—इति दुःखत्वम्; प्रियपुत्रादेरेकघन एव हि प्रकाशः सुखम्; एकघन एवाप्रकाशो मोहः । यस्तु कथञ्चित्प्रकाशो यथा सव्याधिकदेहरूपतयानभिमतया, कथञ्चिच्चाप्रकाशो यथा गतगद- कल्पौषधसंयोगितयाभिमतया तदेव दुःखत्वम्; अयमेव च पूर्वापरीभावसारः क्रिया परमार्थः अत्रानुभयरूपत्वं तु नास्ति, प्रतीतौ कस्याञ्चित् कल्पिताकल्पितरूपायामननुप्रवेशात् तस्य । तथा हि—नीलं तावदकल्पितरूपायां धियि भाति; नीलाभावस्तु तुच्छोऽपि कल्पनाकल्पित आभास- मानत्वात् तावद्व्यवहारपरमार्थः, तदुभयव्यामिश्रणात्तु नीलानीलं भातु नाम; यत्त्वनुभयरूपं तन्नीलप्रतीत्या तावदकल्पितया न विषयीकृतं चेत् तत् कल्पितामनीलधियमनुधावेत्; अथ तां कल्पितां धियं नाविशत्यकल्पितया विषयीकृतं नीलमेव स्यात्,—इति न पशोश्चतुर्थोऽस्ति गुणः । अपिश्चार्थे, पशोः सा सत्ता सत्त्वं, तदभावस्तमो, द्वयात्मा रजश्च,—इति संबन्धः ॥ ६ ॥ एवं तावत् पशुपशुरूपं प्रमातृतत्त्वं संक्षेपेण निर्णीतम्; अथ प्रमेयत्तत्त्वं निर्णैतुं पत्यौ तावत् 'इत्थमिदं प्रमेयत्तत्त्वम्' इति निर्णैतुमाह— येऽप्यसामयिकेदन्तापरामर्शभुवः प्रभोः । ते विमिश्रा विभिन्नाश्च तथा चित्रावभासिनः ॥ ७ ॥ परस्पर परिहाररूप से कार्य-कारणभाव बन कर रहते हैं, तो भी एकविषयक परामर्श करनेवाले धर्म की अपेक्षा से 'चित्रपतङ्गसंगतनीलानीलात्मकन्यायेन' परस्पर संमिलित होकर एक परामर्श बलात् भासते हैं, जो यह 'द्वयात्मा' द्वित्वभाव से संमिलित स्वभाव है वही रजोगुण है, इसलिए प्रकाश और अप्रकाशरूप दोनों सतोगुण और तमोगुण में मिश्रित होकर रहना दुःख कहलाता है, प्रिय पुत्रादि के साथ एकघन ही आनन्द सुख है और एकघन प्रकाश का अप्रकाश होना मोह है । जो कि किसी प्रकार प्रकाशित रहता है । जैसा कि व्याधि रोग से सहित देह में कभी-कभी अनभिमत प्रकाश रहता है वह अभिमत रोग के औषध से युक्त होकर दुःख कहा जाता है यही पूर्वोत्तर भावरूप परामर्श क्रिया कही जाती है । किन्तु इसमें दोनों का अभाव नहीं रहता है; क्योंकि किसी भी कल्पित एवं अकल्पित प्रतीति में इसका प्रवेश नहीं होता है । देखो-पहले नील अकल्पितरूप बुद्धि में भासना है; नील का अभाव यद्यपि तुच्छ है तो भी कल्पना से कल्पित होकर इसका व्यवहार परमार्थतः होता है, उन दोनों के व्यामिश्रण से नील और अनील भले भासित हो; किन्तु जो दोनों से भिन्न रूप में अकल्पित नील प्रतीति से विषयी न होकर वह कल्पित नील बुद्धि का पीछा करने से उस कल्पित बुद्धि में यदि प्रवेश न करेंगे तो वह विषयीकृत नील ही हो जाता है, इसलिए पशुजीव का कोई चतुर्थ गुण नहीं होता है । 'अपि' शब्द 'चकार' के अर्थ में है, पशुजीव की वह सत्ता सतोगुण से युक्त रहता है, उसका अभाव तमोगुण है और दोनों का मिलना रजोगुण कहलाता है, यही इसका सम्बन्ध है ॥ ६ ॥ इस प्रकार ईश्वर पशुपतिरूप और पशुजीवरूप प्रमातृत्व का संक्षेप में निर्णय कर दिया गया । अब प्रमेयत्तत्त्व निर्णय करने के लिए पशुपति में 'इत्थमिदं प्रमेयत्तत्त्वम्' ऐसा ही यह प्रमेयत्तत्त्व है, इस का निर्णय करते हैं—

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक) · पृष्ठ 329, कुल 343 में से · BharatKosha