ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
३०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-७ नीलानीलवत् परस्परपरिहारेण यद्यपि वर्तेते कार्यत्वकारणत्ववत् तथापि एकपरामर्शगोचरी- कार्यधर्ममपेक्षया चित्रपतङ्गसंगतनीलानीलात्मकरूपन्यायेनान्योन्यमिश्रतयापि भातः, अतो योऽयं 'द्वयात्मा' मिश्रस्वभावः तद्रजोगुणः, अत एव प्रकाशाप्रकाशस्वरूपयोः सत्त्वतमसोरत्र श्लेषेणाव- स्थानम्,—इति दुःखत्वम्; प्रियपुत्रादेरेकघन एव हि प्रकाशः सुखम्; एकघन एवाप्रकाशो मोहः । यस्तु कथञ्चित्प्रकाशो यथा सव्याधिकदेहरूपतयानभिमतया, कथञ्चिच्चाप्रकाशो यथा गतगद- कल्पौषधसंयोगितयाभिमतया तदेव दुःखत्वम्; अयमेव च पूर्वापरीभावसारः क्रिया परमार्थः अत्रानुभयरूपत्वं तु नास्ति, प्रतीतौ कस्याञ्चित् कल्पिताकल्पितरूपायामननुप्रवेशात् तस्य । तथा हि—नीलं तावदकल्पितरूपायां धियि भाति; नीलाभावस्तु तुच्छोऽपि कल्पनाकल्पित आभास- मानत्वात् तावद्व्यवहारपरमार्थः, तदुभयव्यामिश्रणात्तु नीलानीलं भातु नाम; यत्त्वनुभयरूपं तन्नीलप्रतीत्या तावदकल्पितया न विषयीकृतं चेत् तत् कल्पितामनीलधियमनुधावेत्; अथ तां कल्पितां धियं नाविशत्यकल्पितया विषयीकृतं नीलमेव स्यात्,—इति न पशोश्चतुर्थोऽस्ति गुणः । अपिश्चार्थे, पशोः सा सत्ता सत्त्वं, तदभावस्तमो, द्वयात्मा रजश्च,—इति संबन्धः ॥ ६ ॥ एवं तावत् पशुपशुरूपं प्रमातृतत्त्वं संक्षेपेण निर्णीतम्; अथ प्रमेयत्तत्त्वं निर्णैतुं पत्यौ तावत् 'इत्थमिदं प्रमेयत्तत्त्वम्' इति निर्णैतुमाह— येऽप्यसामयिकेदन्तापरामर्शभुवः प्रभोः । ते विमिश्रा विभिन्नाश्च तथा चित्रावभासिनः ॥ ७ ॥ परस्पर परिहाररूप से कार्य-कारणभाव बन कर रहते हैं, तो भी एकविषयक परामर्श करनेवाले धर्म की अपेक्षा से 'चित्रपतङ्गसंगतनीलानीलात्मकन्यायेन' परस्पर संमिलित होकर एक परामर्श बलात् भासते हैं, जो यह 'द्वयात्मा' द्वित्वभाव से संमिलित स्वभाव है वही रजोगुण है, इसलिए प्रकाश और अप्रकाशरूप दोनों सतोगुण और तमोगुण में मिश्रित होकर रहना दुःख कहलाता है, प्रिय पुत्रादि के साथ एकघन ही आनन्द सुख है और एकघन प्रकाश का अप्रकाश होना मोह है । जो कि किसी प्रकार प्रकाशित रहता है । जैसा कि व्याधि रोग से सहित देह में कभी-कभी अनभिमत प्रकाश रहता है वह अभिमत रोग के औषध से युक्त होकर दुःख कहा जाता है यही पूर्वोत्तर भावरूप परामर्श क्रिया कही जाती है । किन्तु इसमें दोनों का अभाव नहीं रहता है; क्योंकि किसी भी कल्पित एवं अकल्पित प्रतीति में इसका प्रवेश नहीं होता है । देखो-पहले नील अकल्पितरूप बुद्धि में भासना है; नील का अभाव यद्यपि तुच्छ है तो भी कल्पना से कल्पित होकर इसका व्यवहार परमार्थतः होता है, उन दोनों के व्यामिश्रण से नील और अनील भले भासित हो; किन्तु जो दोनों से भिन्न रूप में अकल्पित नील प्रतीति से विषयी न होकर वह कल्पित नील बुद्धि का पीछा करने से उस कल्पित बुद्धि में यदि प्रवेश न करेंगे तो वह विषयीकृत नील ही हो जाता है, इसलिए पशुजीव का कोई चतुर्थ गुण नहीं होता है । 'अपि' शब्द 'चकार' के अर्थ में है, पशुजीव की वह सत्ता सतोगुण से युक्त रहता है, उसका अभाव तमोगुण है और दोनों का मिलना रजोगुण कहलाता है, यही इसका सम्बन्ध है ॥ ६ ॥ इस प्रकार ईश्वर पशुपतिरूप और पशुजीवरूप प्रमातृत्व का संक्षेप में निर्णय कर दिया गया । अब प्रमेयत्तत्त्व निर्णय करने के लिए पशुपति में 'इत्थमिदं प्रमेयत्तत्त्वम्' ऐसा ही यह प्रमेयत्तत्त्व है, इस का निर्णय करते हैं—
अ.-४, आ.-१, का.-८-९-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३०७ इहाभासा एव तावदर्थाः, — इत्युक्तं, ते च परामर्शैक्येन कदाचिन्मिश्रीक्रियन्ते यदा विशेष- रूपता, कदाचिदमिश्रा एव परामृश्यन्ते यदा सामान्यरूपता, ते एते उभयात्मानोऽप्यसामयिकेना- कल्पितेनेदंभावेन सहजभेदपरामर्शरूपेणाङ्गुलिनिर्देशादिप्रत्ययेन गोचरीकार्याः प्रभोरपि न केवलं सद्योजातबालादेर्यावदीश्वरस्यापि, 'तथा' येन सामान्यविशेषप्रकारेण चित्रतयावभासन्ते । चित्रत्वं हि तयोः — यन्मिश्रत्वममिश्रत्वं च युगपदेकाहन्ताविश्रान्तं भाति, — इति ईश्वरदशायां भावोल्ला- सनान्तरीयकत्वेन संवित्संकोचरूपं निषेध्यानुपरक्तनञर्थमात्ररूपं शून्यं संवित्प्रकाशेनैव प्रकाश- मानमहन्तानिषेधरूपामसामयिकीमिदन्तामुल्लासयति ॥ ७ ॥ एवं तावदीश्वररूपस्य पत्युरित्थं प्रमेयतत्त्वं, परमशिवे तु भगवति प्रमेयकथैव कथमुत्ति- ष्ठति, प्रमेयकथोत्थापकत्वमेव भगवतः सदाशिवेश्वरत्वम्; अतोऽधुना पशुं प्रति कीदृक् प्रमेयस्य वृत्तान्तः, — इति सन्देहमपोहति श्लोकत्रयेण— ते तु भिन्नावभासार्थाः प्रकल्प्याः प्रत्यगात्मनः । तत्तद्विभिन्नसंज्ञाभिः स्मृत्युत्प्रेक्षादिगोचरे ॥ ८ ॥ तस्यासाधारणी सृष्टिरीशसृष्ट्युपजीविनी । सैषाप्यज्ञतया सत्यैवेशशक्त्या तदात्मनः ॥ ९ ॥ ये जो प्रभु की असामयिक इदन्तांश का परामर्श स्थानीय आभास हैं । वे मिश्रित और भिन्न-भिन्न हैं तथा चित्र विचित्र आभासवाले होते हैं ॥ ७ ॥ इस शास्त्रमें आभासों को ही अर्थ कहा जाता है, उनको परामर्श की एकता से कभी मिला दिये जाते हैं जब उसमें विशेषता आ जाती है और कभी पृथक् होकर भिन्नरूप में परामृष्ट होते हैं जब सामान्यरूपता रहती है, तब ये दोनों असामयिक कल्पित इदंभाव स्वाभाविक भेद परामर्शरूप से अङ्गुलि द्वारा निर्देश किये हुए के जैसा इन्द्रियों के विषय किये जाते हैं यह केवल ईश्वर को नहीं होता है अपि तु सद्योजात बालक को भी सामान्य विशेषरूप से चित्र-विचित्र होकर भासते हैं; क्योंकि उनकी विचित्रता मिश्रत्व और अमिश्रत्व रूप से एक साथ अहन्ता में विश्रान्त होती है, इसलिए ईश्वर दशा में उसका अवश्य उल्लास होने के कारण ज्ञान का संकु- चितरूप निषेध से मिला हुआ नञर्थ शून्य ज्ञान प्रकाशित होता है वह ज्ञानप्रकाश अहन्ता के निषेधरूप असामयिक इदन्ता को उल्लासित करता है ॥ ७ ॥ ऐसा ही ईश्वररूप पशुपति का प्रमेयत्त्व है, भगवान् परम शिव में प्रमेयता का होना नहीं घटता है, प्रमेयता तो सदाशिव और ईश्वर पर्यन्त ही रहती है; इसके आगे पशुजीव में कैसी प्रमेयता होती है यह बतायेंगे, तीन श्लोकों से इस सन्देह को दूर करते हैं— जीवात्मा के लिए भिन्न-भिन्न अवभासवाले पदार्थ कल्पित होते हैं । स्मृति, उत्प्रेक्षा आदि के विषय में उन उन विभिन्न संज्ञाओं से उनका कथन होता है ॥ ८ ॥ उस पशुजीव की असाधारण सृष्टि ईश्वर की सृष्टि का आधार लेकर होती है । वह भी अज्ञरूप से सत्य ही ईश्वर की शक्ति द्वारा तद्रूप होकर भासती है ॥ ९ ॥
३०८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-८-९-१० स्वविश्रान्त्युपरोधायाचलया प्राणरूपया । विकल्पक्रियया तत्तद्वर्णवैचित्र्यरूपया ॥ १० ॥ तुविशेषं द्योतयति प्रत्यगात्मनस्तु इत्थं प्रमेयरूपा अर्था, न त्वीश्वरवदुक्तनयेनेति । 'भिन्न' इति मिश्रामिश्रतया भिद्यमान आभासो येषामर्थानां ते विशेषसामान्यात्मानोऽर्थाः प्रत्यगात्मनः प्रतिपुरुषमविमिश्रस्वसंवेदनावगमरूपस्यासंकीर्णाऽहंप्रकाशात्मनः प्रकल्प्या विकल्पनीयाः, प्रतिप्राणि स्ववासनानुसारेण विभिन्नाभिः संज्ञाभिः 'प्रियोऽयं शत्रुरयम्' इत्यादिकाभिर्भावनाविशेषानुसारेण तत्तद्विचित्रसुखदुःखाद्युपयुक्ताभिः स्मरणे उत्प्रेक्षणे संकल्पनेऽन्यत्रान्यत्र च विकल्पयोगे । एतदुक्तं भवति— ईश्वरस्य विकल्पात्मकतामन्तरेण शुद्धविमर्शविषयीभाव्या अर्थाः, पशोस्त्वन्योन्यापोहन हेवाकिनि विकल्पे समारूढातेऽर्था भवन्ति, सांसारिकहानादानादिव्यवहारोपयोगात् इति । नन्व- विकल्पत्वे यावानेवार्थस्तावोनेव यदि विकल्पत्वे तत्को विशेषः प्रमेयस्य पतिपशुरूपतायाम्, ? उच्यते, तस्येति पशुकर्तृका सृष्टिस्तेषामर्थानामीश्वरसृष्टानामुपरिवर्तिनी, अत एव तामीश्वर- सृष्टिमुपजीवन्ती असाधारणी प्रतिप्रमातृनियता । तद्यथा 'इदं हृद्यम्' इति येन सृष्टं तत् तस्यैव तदा नान्यस्य । ननु यदि पशोरपि सृष्टिशक्तिरस्ति तर्हीश्वर एव; सत्यम्, ईश्वर एवासौ । नन्वेवं साधारणत्वं कस्मात् सृष्टेर्न भवति ?; भवेत् यदि स्वशक्तिं परिजानीयात्, यावता सा तस्यापरि- अपने में विश्रान्त होनेवाली विश्राम के उपरोध के लिए अचल प्राणरूप से, विकल्प क्रिया से, उन उन वर्णों में विचित्ररूप से रहती है ॥ १० ॥ 'तु' शब्द विशेषता को द्योतित करता है । जीवात्मा का ऐसा हो प्रमेयरूप अर्थ होता है, उक्त नीति से ईश्वर के समान नहीं होता । 'भिन्नः' मिला हुआ अर्थात् भेद एवं अभेदरूप से भिन्न भिन्न जो आभास हैं वे ही विशेष और सामान्यरूप होकर जीवात्मा के पदार्थ होते हैं जो कि प्रतिपुरुष भिन्न भिन्न अपने संवेदन के अनुरूप असंकीर्ण अहं प्रकाशरूप से कल्पित होते हैं और प्रतिप्राणी अपनी वासना के अनुसार विभिन्न विभिन्न संज्ञाओं से 'प्रियोऽयं शत्रुरयम्' अर्थात् 'यह प्रिय है, यह शत्रु है' इत्यादि भावना विशेष के अनुसार विचित्र सुख-दुःखादि के स्मरण करने पर अथवा उत्प्रेक्षा करने पर अथवा संकल्प करने पर दूसरी दूसरी जगह विकल्पना से योग्य होने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर की विकल्परूपता को अन्तःकरण में शुद्ध विमर्श के विषय बनाने पर ईश्वर के ही पदार्थ हो जाते हैं, पशुजीव का तो परस्पर अपोहन को नहीं छोड़नेवाले विकल्प में आरूढ होकर जो पदार्थ भासते हैं, सांसारिक ग्रहण और त्याग इत्यादि व्यवहार के योग से पदार्थ कहलाते हैं । इस पर शङ्का होती है कि यदि अविकल्प में जितने भी अर्थ रहते हैं उतने ही अर्थ यदि विकल्प में भी हो तो फिर क्या विशेषता हुई, पशुपति के प्रमेय में और पशुजीव के प्रमेय में भेद क्या हुआ ? इसका उत्तर देते हैं, 'तस्यासाधारणेति' पशुजीव कर्तृक सृष्टि ईश्वर से सृष्ट पदार्थों में जो इसके ऊपर रहते हैं, इसीलिए इसी ईश्वर सृष्टि का आधार मान करके जीव प्रमाता की असाधारणी सृष्टि होती है । इसीलिए कहा गया है कि 'इदं हृद्यं' इस मनोहर संसार को जिसने बनाया है उसी की यह शक्ति है, किसी अन्य की नहीं है । अच्छा तो, अब कहो कि पशुजीव में में भी यदि सृष्टि करने की शक्ति है, तो वह भी ईश्वर हो गया; आपका कहना ठीक ही है, ईश्वररूप ही जीव है । अच्छा तो, इस प्रकार ईश्वर सृष्टि के समान साधारण क्यों न हो जाय ?
अ.-४, आ.-१, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [३०९ ज्ञाता परवशस्यैव सतो विकल्पक्रिया विकल्पनशक्तिरुदेति । ननु केन सा तस्योत्थाप्यते ?; आह— ईश्वरस्य परामर्शरूपतया शब्दराशिलक्षणस्य या शक्तिः स्वरूपविश्रान्तिलक्षणपारमैश्वर्योपरोध- प्रयोजना ब्राह्म्यादिदेवताचक्रमयी तैस्तैः ककारादिवर्णवैचित्र्यैर्विचित्रा, तया यासौ विकल्पक्रिया तस्य पशोरेकत्र निरूढचभावात् चञ्चला तेन 'मित्रमयं शत्रुरयम्' इत्यादिवर्णवैचित्र्यानुविद्धतया विकल्पनक्रियया तदात्मन ईश्वरस्वभावस्यैव पशोरसाधारणी सृष्टिः, 'पञ्चवक्त्रश्चतुर्दन्तो हस्ती नभसि धावति ।' इत्यपि विमिश्रतया विकल्प सृष्टिः, तानाभासान् ईश्वरसृष्टानेवोपजीवति,—इति सर्वा पाशवी प्रत्ययसृष्टिरीश्वरसृष्ट्युपजीविनीत्युक्तम् ॥ ८-९-१० ॥ नन्वेवं यदि पाशवी सृष्टिः संसाररूपा तर्हि पारमेश्वरी सृष्टिः पशोः किं कुर्यात् ? इति निर्णीयते— साधारणोऽन्यथा चैशः सर्गः स्पष्टावभासनात् । विकल्पहानेनैकाग्र्यात् क्रमेणेश्वरतापद्म् ॥ ११ ॥ ऐश्वरः सर्गो द्विधा, साधारणश्च घटादिरसाधारणश्च 'अन्यथा' इति निर्दिष्टो द्विचन्द्रादिः; तस्य च सामान्यलक्षणं स्पष्टावभासनं नाम । सोऽयं सर्गो यदा विकल्पहानक्रमेण तस्मिन्निर्विकल्पक- उत्तर में कहते हैं कि यदि अपनी शक्ति को जानेंगे तो निश्चित हो सकता है जब तक वह शक्ति पशुजीव को ज्ञान नहीं है तब तक वह परवश रहता है और तब तक ही विकल्प क्रिया, विकल्प-शक्ति उदय होतो रहती है । शङ्का होती है कि वह किससे उठती है ? उत्तर में कहते हैं कि ईश्वर की शब्दराशिरूप परामर्श करनेवाली जो शक्ति है अपने में विश्रान्त रहती है जब कि परम ऐश्वर्य का उपरोध करती है ब्राह्मी-शक्ति आदि देवता चक्र में अधिष्ठित ककारादि वर्णों की विचित्रता से विचित्र बनी हुई जो विकल्प है वही पशुजीव मे एक जगह एकत्र होकर बढे हुए प्राण एवं अपान आदि संमिश्रण से चंचल हुई यह मित्र है यह शत्रु है इत्यादि वर्णों की विचित्रता से मिले रहने के कारण विकल्पन क्रिया के द्वारा तादात्म्यरूप ईश्वर भाव को प्राप्त हुए पशुजीव की ही असाधारणी सृष्टि कही जाती है। 'पाँच मुखवाला और चार दातोंवाला हाथी आकाश में दौड़ता है।' यह विमिश्ररूप होने से विकल्प सृष्टि है, ईश्वर से बनाये गये उन्हीं आभासों का यह भी आधार रखती है, पशुजीव की अपनी भावना के अनुसार सृष्टि ईश्वर परमात्मा की सृष्टि का ही आधार लेकर होती है ऐसा कहा गया है ॥ ८-९-१० ॥ अच्छा तो, पाशवी सृष्टि संसाररूपा है तो फिर ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि पशुजीव के लिए क्या उपकार करेंगी ? इसका निर्णय करते हैं । स्पष्ट अभाव होने के कारण ईश्वर की सृष्टि साधारण होती है । विकल्प की हानि करके एकाग्रता के कारण क्रम से ईश्वर पद तक पहुँचा देती है यही ईश्वर सृष्टि का उसके लिए उपकार है ॥ ११ ॥ ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि दो प्रकार की होती हैं, साधारणरूप से और घटादि असाधारण रूप से होती है नहीं तो, द्विचन्द्रादि का निर्देश तो ही है और ईश्वर सृष्टि का सामान्यरूप तो स्पष्ट ही सब के सामने भासता है । जब वह यह ईश्वर सृष्टि विकल्प की हानि के क्रम से उस पशु में निर्विकल्परूप से गृहीत होती है तब तो एक ही पदार्थ में एकाग्ररूप का अवलम्बन
परिगृहीत एव स्पष्टाभेदार्थ एकाग्रत्वमवलम्ब्य 'अहमिदम्' इत्यैश्वर्यपरामर्शपदं भवति तदा अन्त- र्लक्ष्यबहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषपरिहारोपदेशदिशा 'क्रमेण' अभ्यासतारतम्येन पशोः पशुत्वं प्रतिहन्ती- श्वरत्वं च दर्शयति । किं च योऽयं विकल्पसर्गः पाशव उक्तः सोऽपि यदि 'अन्यथा' इति पूर्वोक्त- रूपवैपरीत्येन परिज्ञातयेशशक्त्या परिज्ञाततादात्म्यस्य भवति तदा सोऽपि साधारण एवाप्यायना- भिररणशान्त्यादिविकल्प इव न्यस्तमन्त्रस्य भावित्तान्तःकरणस्य ॥ ११ ॥ एवं विकल्पनिर्ह्रासेन निर्विकल्परूपसात्मीभावे विश्वात्मसाक्षात्कारलक्षणः स्वप्रत्यय एव मोक्षो दर्शितः, अधुना विकल्पनिर्ह्रासाभावेऽपि तं दर्शयति- सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ १२ ॥ नहि प्रत्यगात्मा नाम पशुः कश्चिदन्यो योऽहम्, अपि तु परिगृहीतग्राह्यप्रकाशैकघनः परो यः स एवाहं स चाहमेव, न त्वन्य कश्चित्; अतो विकल्पसृष्टिरपि मम स्वातन्त्र्यलक्षणो विभवः,- इत्येवं विमर्शे दृढीभूते सत्यपरिक्षीणविकल्पोऽपि जीवन्नेव मुक्तः । यथोक्तम्-'शङ्कापि न विशङ्केत निःशङ्कत्वमिदं स्फुटम् ।' इति ॥ १२ ॥ करके 'अहमिदम्' ऐसा परामर्श पद स्थान होता है, ऐसी अवस्था में अन्तर का लक्ष्य रहता है और बाहरी मात्र दृष्टि ही रहती है निमेष-उन्मेष से शून्य होकर विशेष अभ्यास के क्रम से पशु की पशुता दूर करती जाती है और ईश्वरता को उभारती जाती है और जो यह पशुओं की विकल्प सृष्टि बतायी है वह भी पूर्वोक्तरूप से विपरीत होकर ईश्वर-शक्ति का ज्ञान होने पर उनसे तादात्म्य प्राप्त कर तब वह भी साधारणरूप से आप्यायन, अभिचरन, शान्ति आदि विकल्पों के समान मन्त्र को छोड़कर भावित ईश्वरमय जपने को माननेवालों का ही होता है ॥ ११ ॥ इस प्रकार विकल्प ह्रास करके निर्विकल्प के आत्मसात् कर लेने पर विश्वमय आत्मा का साक्षात्कार कर लेना; क्योंकि अपना ज्ञान ही मोक्ष दिखाया है, अब तो विकल्प के निर्ह्रास न होने पर भी मोक्ष हो जाता है उसे दिखाते हैं- यह सारा का सारा विश्व मेरा ही वैभव है ऐसा ज्ञान रखनेवाले विश्वात्मा में विकल्पों के उदय होने पर भी महेश्वर-भाव बना रहता है ॥ १२ ॥ जो मैं हूँ वह कोई दूसरा जीवरूप पशु नहीं है, ग्राह्य-ग्राहक भाव को ग्रहण करके एक प्रकाशमय होकर वह जो परमेश्वर है वही मैं हूँ और वही मैं हूँ, दूसरा कोई भी नहीं है; इसीलिए विकल्प सृष्टि भी मेरा ही वैभव है ऐसा विमर्श दृढ़ हो जाने पर विकल्प का निश्चयरूप से क्षीण हो जाने से जिते हुए ही मुक्त हो जाता है । जिसके विषय में कहा है 'इसमें शङ्का भी नहीं करनी चाहिए यह तो शङ्का से रहित स्पष्ट है' ॥ १२ ॥ १. अन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता । एषाऽसौ भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ लक्ष्य तो अन्तर में रहे, एवं दृष्टि बिना निमेष और उन्मेष की हो अर्थात् नेत्र का निरन्तर एक पलक गिराये-उठाये बिना देखते रहना चित्त के भीतर अनुप्रवेश के साथ सभी इन्द्रियों का बाहर की ओर प्रसारना यही भैरवी मुद्रा सब तन्त्रों में गुप्त रूप से कही हुई है ।
अ.-४, आ.-१, का.-१४-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३११ नन्वेवं बद्धमुक्तयोः प्रमेयं प्रति को भेदः ?, उच्यते— मेयं साधारणं मुक्तः स्वात्माभेदेन मन्यते । महेश्वरो यथा बद्धः पुनरत्यन्तभेदवत् ॥ १३ ॥ श्रीमत्सदाशिवेश्वरपदादारभ्य क्रिमिपर्यन्तप्रमातृवर्गाधिष्ठातृ यदहमितिरूपं तदेवात्म- तयाभिनिविशते मुक्तः; ततश्च विश्वस्यापि प्रमेयं ममापि, मम प्रमेयं विश्वस्यापि, प्रमेयं चेदं ममैवाङ्गभूतं प्रमेयान्तरमपि तथा,—इत्यनेन क्रमेण प्रमेयं परस्परतश्च प्रमातृवर्गाच्चाव्यावृत्तम्,- इत्येकरसाभेदविश्रान्तितत्त्वमस्य सर्वं परामर्शपदमुपैति । बद्धस्य तु सर्वमेतद्विपरीतम्,—इत्येक- रसभेदविश्रान्त एवासौ ॥ १३ ॥ ननु सदाशिवेश्वरभुवि जीवन्मुक्तिपदे बद्धरूपपशुप्रमातृविषये च प्रमेयवृत्तान्तः परीक्षितः, परमशिवे तु कथमसौ ? इत्याशङ्क्याह— सर्वथा त्वन्तरालीनानन्ततत्त्वौघनिर्भरः । शिवः चिदानन्दघनः परमाक्षरविग्रहः ॥ १४ ॥ न खलु भगवति श्री परमशिवे प्रमेयकथा काचिदस्ति, तत्त्वौघस्य सर्वथा तत्र चिद्रूपता- मात्रविश्रान्तत्वेन लीनत्वात्; ततश्च सावस्था संवित्स्वभावेन स्वात्मविश्रान्त्यानन्देन अकृत्रिमनै- अच्छा तो, बद्ध और मुक्त में प्रमेय के लिएक्या भेद रहेगा ? उत्तर में कहते हैं— मुक्त पुरुष साधारण प्रमेय को अपने से अभिन्न मानता है । जैसा कि महेश्वर अत्यन्त भेद के समान उसे बद्ध मानता है ॥ १३ ॥ श्री सदाशिव ईश्वर से लेकर कीट-पतङ्ग पर्यन्त प्रमातृवर्ग के अधिष्ठाता जो अहं यह परामर्श है उसे मुक्त अपना स्वरूप समझता है; इसी कारण सारे विश्व का प्रमेय भी मेरा ही है और मेरा प्रमेय विश्व का प्रमेय है, यह सारा का सारा प्रमेय मेरा ही अंगरूप ही है उसी- प्रकार दूसरे प्रमेय भी, इसी क्रम से प्रमेय और परस्पर प्रमातृवर्ग से भिन्न न होकर एकरस में अभेदरूप से विश्रान्ति लेता हुआ परामर्शपद को प्राप्त करता है । किन्तु बद्धपुरुष के लिए सब कुछ विपरीत होता है, इस प्रकार एकरस भेद में ही विश्राम हो जाता है ॥ १३ ॥ अब शङ्का करते हैं कि सदाशिव भूमि जो जीवन्मुक्तावस्था है उसमें बद्ध पशु प्रमाता के विषय में प्रमेय विषय की परीक्षा हो गयी, परन्तु यह भेद परम शिव के विषय में कैसे होंगे ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— विकल्प और अविकल्प भूमिका में जिसकी इन्द्रियाँ उद्बुद्ध हो चुकी है उस योगी का प्रमेय क्रम कह दिया गया और निमीलित इन्द्रियवाले योगी का क्रम कैसा होता है उसको कहते हैं । सब प्रकार से अनन्त तत्त्व का समूह जिसमें छिपा रहता है । वही चिदानन्दघन परम अक्षर शरीरवाला शिवतत्त्व है ॥ १४ ॥ जो कि भगवान् परम शिव में कीई प्रमेय कथा नही रहती है, सारे के सारे तत्त्व समूह चिद्रूप में विश्रान्त हो जाने के कारण; इसी कारण संवित् ज्ञान स्वरूप से अपने आप में विश्रान्त होकर आनन्दरूप से अकृत्रिम स्वाभाविक और परामर्शस्वरूप आत्मचमत्काररूप से अनेक प्रकार
३१२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१५-१६ सर्गिकपरामर्शात्मकस्वात्मचमत्कारलक्षणेनैकघना अविच्छिन्नतद्रूपा परमाक्षरेण विग्रहवती भगवतो विश्वमयस्यानवच्छिन्नानुत्तरधाम्नो गलितप्रमेयकथा सर्वोत्तीर्णा व्यपदिश्यते ॥ १४ ॥ एवमधिकारचतुष्टयोक्तं यद्वस्तु तत्फलमाह— एवमात्मानमेतस्य सम्यग्ज्ञानक्रिये तथा । जानन्यथेप्सितान्पश्यञ्जानाति च करोति च । १५ ॥ एवमिति, ईश्वररूपमात्मानं तस्य च स्वाव्यतिरिक्ते स्वातन्त्र्यमात्ररूपे ज्ञानक्रिये जानन् एवं-भूतोऽयमात्मा न तु काणादादिदर्शितः, इत्थं च ज्ञानक्रिये न तु तस्य व्यतिरिक्ते केचन,— इति परामृशन् यद्यदिच्छति तत्तज्जानाति करोति च समावेशाभ्यासपरोऽनेनैव शरीरेण; अतत्परस्तु सति देहे जीवन्मुक्तस्तत्पाते परमेश्वर एवेति ॥ १५ ॥ अस्यार्थस्य स्वप्रत्ययसिद्धस्यापि गुरुपरम्परोपदेश उपोद्वलको वक्तव्यः, शास्त्रदृष्टिर्हि के अविच्छिन्न तद्रूप होकर परम अक्षर विग्रह से विश्वरूप भगवान् शिव के अनवच्छिन्न अनुत्तर- धाम का रूप धारण कर लेता है—ऐसी अवस्था में प्रमेय कथा सब गलित हो जाती है ॥ १४ ॥ इस प्रकार चारों अधिकारों से जो बातें कही गयी हैं उसके फल को कहते हैं— एवं अपने स्वरूप को और इसके ज्ञान और क्रिया को ठीक-ठीक जानता हुआ एवं अभीष्ट को देखता हुआ वैसा ही जानता है और करता है ॥ १५ ॥ अपने आप को ईश्वरस्वरूप मानता है और उस स्वरूप से अभिन्न स्वातन्त्र्यमात्र ज्ञान एवं क्रिया को जानते हुए ऐसा ही यह आत्मा है काणादादि दर्शन से दिखाया गया आत्मा नहीं है, इस प्रकार ज्ञान-क्रिया उससे भिन्न नहीं होता है ऐसा परामर्श करता हुआ जो जो चाहता है वह वह जानता है और करता है इसी शरीर से समाधि का अभ्यास करता हुआ उसमें जबतक लीन नहीं होता तबतक देह रहते हुए जीवन्मुक्त कहलाता है देह के गिर जाने पर तो परमेश्वर रूप ही हो जाता है ॥ १५ ॥ इस ईश्वर प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का अर्थ अपने ज्ञान-अनुभव से सिद्ध होता हुआ भी गुरुपरम्परा क्रम से प्राप्त उपदेश, इसको पुष्ट करनेवाला अवश्य होगा, क्योंकि शास्त्र दृष्टि भी उन गुरुपरम्परा १. ज्ञानाधिकार और क्रियाधिकार इन दोनों अधिकारों के द्वारा तथा उसी में तत्त्वार्थसंग्रहाधिकार के साथ अपने से प्रकाशित होनेवाले तत्त्व में भी युक्ति का बढावा देकर निरूपित किया हुआ अंश स्वतः पूरा हो जाता है, आगम अधिकार के माध्यम से यद्यपि उस अर्थ की पुष्टि हो ही जाती है तथापि शास्त्र से भी इस अंश को पूरा किया है—इस पर कहते हैं कि 'शास्त्रदृष्टिर्हीति' शिव दृष्टि शास्त्र में भी उस प्राचीन प्रसिद्ध गुरु परम्परा क्रम के अनुसार आगम के विषय को ही लेकर प्रायः तत्त्वों का प्रतिपादन किया हुआ है । अत्यन्त महत्त्व-पूर्ण बीच-बीच में दिव्य अतिदिव्यादि सम्बन्ध को ठुकरा कर, केवल अपनी प्रतिभा के बल से पुस्तक की शरण में जाना तो विडम्बना ही कहलाती है इस अभिप्राय को लेकर कहते हैं— पुस्तकाधीतविद्याश्च गुरुक्रमविवर्जिताः । आचरन्तो दिशन्तश्च पच्यन्ते नरके चिरम् ॥
अ.-४, आ.-१, का.-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१३ दर्शितागमाधिकारेण; एवं गुरुतः शास्त्रतः स्वतः एतद्दृढीकृतं भवति, — इत्यभिप्रायेण गुरुपारम्पर्यं दर्शयति— इति प्रकटितो मया सुघट एष मार्गो नवो महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा । तदत्र निदधत्पदं भुवनकर्तृतामात्मनो विभाव्य शिवतामयोमनिशमाविशन् सिद्ध्यति ॥ १६ ॥ अस्मत्परमेष्ठिभट्टारकश्रीसोमानन्दपादैः शिवदृष्टिशास्त्रेऽयमभिनवः सर्वरहस्यशाखान्तर्गतः सन्निगूढत्वादप्रसिद्धो बाह्यान्तरचर्याप्राणायामादिक्लेशप्रयासकलाविरहात् सुघटस्तावदुक्तः, गत मार्ग से प्राप्त उपदेश के द्वारा आगम शास्त्र इत्यादि के सिद्धान्त ज्ञान को लेकर ही दिखायी गयी है, इस प्रकार गुरु से, शास्त्र से और अपने अनुभव ज्ञान से यह दृढ निश्चित किया हुआ इसमें अर्थ है, इस आशय से गुरु परम्परा क्रम का उपस्थापन करते हैं— इस प्रकार मैंने [ उत्पलदेव ] ने यह सरल, नूतन मार्ग प्रकाशित किया है। जैसा श्री सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टिशास्त्र' में प्रतिपादित किया था। इसलिए प्रमेय विषय में जो परामर्श पद का विश्राम कराता हुआ, अपने विश्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य को देख कर, निरन्तर शिवमय स्वरूप में प्रवेश करता हुआ परम सिद्ध हो जाता है ॥ १६ ॥ हमारे परमेष्ठी गुरु श्री सोमानन्दपाद ने, जो अप्रसिद्ध शैवाद्वैत दर्शन था उसे लोक में 'शिवदृष्टिशास्त्र' नामक ग्रन्थ का निर्माण कर प्रचार-प्रसार किया, यह मार्ग अतीव सरल है समस्त बाह्य एवं आभ्यन्तर परिचर्या, प्राणायाम-अष्टांगयोग आदि, जो कि कायिक, मानसिक क्लेशों को देनेवाले हैं उन सब से रहित, एक सीधा सरल मार्ग 'शिवदृष्टिशास्त्र' में 'सर्वभूत- यातनाराजराजानां ते भोक्तारो विनिन्दिताः । तस्माद्गुरुक्रमायातं विशन्नेति परं शिवम् ॥ गुरु परम्परा मार्ग से रहित, जिन्होंने मात्र पुस्तकों की शरण लेकर विद्या पढ़ी हैं वे बड़ी से बड़ी यातनाओं को नरक में बहुत काल तक भोगते हैं क्यों ? उनके द्वारा किया गया आचरण एवं उपदेशादि शास्त्र से विरुद्ध है । इसलिए गुरु परम्परा से आया हुआ उपदेश अधिन्यस्त करते हुए परम शिव को प्राप्त कर लेते हैं । इसी कारण गुरु से तृतीय अंश पूरा करना चाहिए । इसका किरण संहिता में भी विवेचन किया गया है 'स्वतोऽपि गुरुतः शास्त्राद्विमर्शस्त्रिविधः स्मृतः ।' गुरु से, शास्त्र से और अपने आप से भी, इन तीन प्रकार से विमर्श का होना कहा गया है । १. जब कि प्रत्यभिज्ञा कर लेने मात्र से ही आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है; इससे फिर यम-नियम-आसन प्राणायाम-प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधि इत्यादि के द्वारा होनेवाले योग में क्लेशों का जो सहना है; अर्थात् इन सबों को सहना और सह कर भी जिसका उपयोग आत्मविश्रान्ति के लिए सिद्ध नहीं होता है तो उसे करना व्यर्थ ही सिद्ध होता है । ठीक ही है, इन सबों का अनुपयोग ही दिखाई देता है; क्योंकि ४०
३१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१६ स एवात्र प्रकटतां परवादकलङ्कशङ्कापसारेण नीतः, यत एवं शास्त्रगुरुस्वप्रत्ययसिद्धोऽयमर्थः, तदिति तस्मादत्र प्रमेये पदं परामर्शं विश्रमयन् विश्वकर्तृत्वलक्षणमैश्वर्यमात्मनो विभाव्य दार्ढ्येन यदा परामृशति तर्हि तत्परामर्शमात्रादेव तावज्जीवन्मुक्तो भगवाञ्छिव एव। यथोक्तं परमेष्ठिपादैः — ‘ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना । करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयाऽपि वा ॥ सकृज्ज्ञाते सुवर्णे किं भावनाकरणादिना । सर्वथा पितृमात्रादितुल्यदार्ढ्येन सत्यता ॥’ (शि. दृ.) हिताय’ बताया है, वही इस प्रत्यभिज्ञा में लाया गया है जो कि प्रतिवादी के द्वारा दिये गये आक्षेप-प्रत्याक्षेपरूप दोष-कलङ्क को युक्तिपूर्वक खण्डन कर अपने सिद्धान्त को इसमें प्रमाण के साथ स्थिर किया गया है। जब कि ऐसा ही अर्थ गुरु, शास्त्र एवं अपने अनुभव ज्ञान के बल से सिद्ध होता है, ‘तदिति’ इसलिए इस प्रमेय संवेद्य में परामर्शपद की विश्रान्ति कराता हुआ अपने भुवनकर्तृत्वरूप परम ऐश्वर्य देख कर, जब दृढ़-निश्चय के साथ प्रत्यवमर्श करता है तब उस परामर्श मात्र से ही जीवन्मुक्त अवस्था में पहुँचता हुआ भगवान् शिवमय हो जाता है। शिवदृष्टि शास्त्र में श्री सोमानन्दपाद ने इसका उल्लेख किया है— प्रमाण, शास्त्र अथवा गुरु वाक्य से एक बार दृढ प्रतिपत्तिपूर्वक ज्ञान हो जाने पर कि यह सारा का सारा प्रपञ्चजाल शिवमय है—ऐसा दृढ बोध हो जाने से इन्द्रियों के द्वारा कोई कृत्य ही नहीं रह जाता है। जैसे सुवर्ण की परीक्षा में स्वर्ण सिद्ध हो जाता है तो फिर आगे घोसना, अग्नि में डाल कर तपाना आदि तमाम क्रियाएँ करनी नहीं रह जाती; माता-पिता के विषय में भली-भाँति बोध हो जाने पर उसे सिद्ध करने के लिए क्या दूसरे प्रमाणों की आवश्यकता समझी जाती है ? यह तो जन्मना सिद्ध है कि ये हमारे माता-पिता आदि स्वजन लोग हैं। प्रत्यभिज्ञाशास्त्रवाला बड़ा ही सरल मार्ग साधक के लिए पड़ेगा। स्फुटोपायमनायासमनारम्भं महाफलम् । श्रोतुमिच्छामि देवेश योगं योगविदां वर ॥ हे देवेश ! जो प्रत्यक्ष उपायवाला अनायास-सहज आरम्भ किया हुआ महाफल देता है। मैं योगवेत्ताओं के परम योग को सुनना चाहती हूँ। प्राणायामादिकैरङ्गैर्योगाः स्युः कृत्रिमायतः । तेन नाकृतकस्यास्य कलामर्हन्ति षोडशीम् ॥ क्योंकि प्राणायाम-ध्यान-धारणा इत्यादि, अष्टाङ्ग योग के द्वारा होनेवाले सभी योग कृत्रिम होते हैं। इसलिए इस परम शिवरूप अकृत्रिम योग की सोलहवीं कला को भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यद्यपि इसका उल्लेख रहस्य-आगमों में निरूपित किया गया है तथापि सुस्पष्टतया स्पष्टीकरण नहीं हुआ है किन्तु भीतर किये हुए के ही विषय में कहा गया है—‘गर्भः ख्यातिर्महामाया तत्र तदात्मके मितसिद्धिप्रपञ्चे यच्चित्तस्य विकासः तावन्मात्रे प्रपञ्चे संतोषः असावेव.........किञ्चिज्ज्ञ- त्वरूपा अशुद्धविद्या...............विकल्पात्मा क्रमः । शिव सूत्रवि० । समस्त योग सिद्धियाँ मायीय उपराजों से उपरञ्जित होने के कारण निम्न श्रेणी की और हेय
अ.-४, आ.-१, का.-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१५ इत्यादि । तां विभाव्य यद्यनिशमाविशति शरीरप्राणबुद्धिशून्येभ्योऽन्यतमं द्वयं सर्वं वा तत्रैव निमज्जयति, अनवरतं तत्तां तां विभूतिं परविभूतिपर्यन्तां लभते । ननु यद्यात्माख्यं वस्तु तदेव र्तार्ह तस्य प्रत्यभिज्ञानाप्रत्यभिज्ञानयोरविशेषः, नहि बीजमप्रत्यभिज्ञातं सति सहकारिसाकल्ये नाङ्कुरं जनयति, तत् क आत्मप्रत्यभिज्ञाने निर्बन्धः ?; उच्यते, —द्विविधार्थक्रियास्ति बाह्या चाङ्कुरादिका प्रमातृविश्रान्तिचमत्कारसारा च प्रीत्यादिरूपा, तत्राद्या सत्यं प्रत्यभिज्ञानं नापेक्षते, द्वितीया तु तदपेक्षते एव; इह च 'अहं महेश्वर' इत्येवंभूतचमत्कारसारा परापरसिद्धिलक्षणा जीवन्मुक्ति- विभूतियोगमर्थक्रिया, —इतीश्वरप्रत्यभिज्ञानमत्रावश्यापेक्षणीयम् ॥ १६ ॥ उस विश्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य को देख कर, जो निरन्तर उसमें समाहित या आविष्ट अपने आपको किया करता है, शरीर, प्राण, बुद्धि और शून्यादि से या इन्हीं में से किसी एक से, व दो से, अथवा सब से उस चिद्रूप में डूब जाता है, ऐसे योगी चिद्रूप में निरन्तर आविष्ट रहने के कारण उन-उन विभूति को प्राप्त करते हुए आत्म-विश्रान्तिरूप विभूति तक पहुँच जाते हैं । अब शङ्का होती है कि यदि आत्मा परम स्वातन्त्र्यरूप है तो उसका प्रत्यभिज्ञान करना और न करना, इसमें कोई अन्तर तो नहीं पड़नेवाला है जब कोई अन्तर ही नहीं पड़ना है तो व्यर्थ का प्रयास क्यों मोल लेगा ? बीज प्रत्यभिज्ञान न होने पर भी सहकारी साकल्य के साथ संयुक्त हो जाने से क्या अङ्कुर उत्पन्न नहीं करता है, तब फिर आत्मा के प्रत्यभिज्ञान करने में कौन सी रुकावट है ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं, —अर्थक्रिया दो प्रकार की होती है एक तो बाह्य, जो अङ्कुरादिरूप से रहती है और दूसरी प्रमातृ-विश्रान्तिरूप चमत्कार सारयुक्त प्रीत्यादि- रूप है । ठीक ही है, इसमें जो पहली अर्थक्रिया बाह्य है उसे तो प्रत्यभिज्ञान की अपेक्षा नहीं पड़ती है और प्रीत्यादिरूप आत्म-विश्रान्तिवाली जो द्वितीय अर्थक्रिया है उसे तो अपेक्षा रहती है; इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र में 'अहं महेश्वरः' मैं ही महेश्वर हूँ, यही आत्म-विश्रान्तिरूप, जीवन्मुक्ति देनेवाली अर्थक्रिया है—इसलिए इस में ईश्वर का प्रत्यभिज्ञान करना आवश्यक समझा जाता है ॥ १६ ॥ समझी जाती है । इसका स्वरूप प्रायः मूढ़लोगों में होनेवाली अल्पतारूप बुद्धि के समान ही रहता है बल्कि इससे बढ़-चढ़कर ही है । इसलिए ये सारी की सारी सिद्धियाँ अल्पकाल में सिद्ध होकर हस्तगत भी हो जाती हैं और बाजीगर की बाजी-मायाजाल के समान विनष्ट भी शीघ्र हो जाती हैं । ये अल्प फल देनेवाली सिद्धियाँ योगिजन को अपने स्वरूप प्राप्ति से बहुत दूर खींचकर ले जाती हैं तथा आत्मविश्रान्ति के मार्ग से विमुख कर देती हैं । न चैतदप्रसन्नेन शङ्करेणोपदिष्यते । कथञ्चिदुपलब्धेऽपि वासना न प्रजायते ॥ वासनामात्रालाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ॥ इस विषय में भगवान् शङ्कर कहते हैं कि अल्प भोगों में आसक्त-संसक्त अल्पज्ञ कभी तो प्रसन्नता के मारे फूल जाते हैं तो कभी-कभार शोकाग्नि में जल कर अपने मानस का संतुलन खो बैठते हैं ऐसे अल्पज्ञ कुछ मित-परिमित सिद्धियाँ अपने हस्तगत कर भी लेते हैं किन्तु वासना उत्तरोत्तर
३१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१७ ननु प्रमातृविश्रान्तिसारार्थक्रिया प्रत्यभिज्ञानेन विना न दृष्टा, सति तत्र दृष्टा,—इति कैतदुपलब्धम् ? इत्याशङ्क्याह— तैस्तैरप्युपयाचितैरुपनतस्तन्व्याः स्थितोऽप्यन्तिके कान्तो लोकसमान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा । लोकस्यैष तथानवेक्षितगुणः स्वात्मापि विश्वेश्वरो नैवालं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता ॥ १७ ॥ अब प्रश्न उठता है कि प्रमातृ-विश्रान्तिरूप अर्थक्रिया प्रत्यभिज्ञान के बिना नहीं देखी गयी है, किन्तु अमुक स्थल में प्रत्यभिज्ञा रहने पर भी देखी गयी है,—यह कहाँ पर देखी गयी है ? इस आशङ्का के उत्तर में कहते हैं— देवताओं की उन उन मनौतियों [ प्रार्थना ] करने से प्राप्त, तन्वी दमयन्ती के निकट में नल खड़ा भी है परन्तु यही नल है ऐसा दृढ-निश्चयात्मक ज्ञान न होने से अपने प्रियतम को जन साधारण के समान मान कर सन्तुष्टि नहीं प्राप्त कर सकी । उसी प्रकार यह अपना आत्मा स्वयं महेश्वर स्वरूप होता हुआ भी प्रत्यभिज्ञान न होने के कारण अपना निजी वैभव-ऐश्वर्य दिखाने के लिए समर्थ नहीं होता है, इसीलिए प्रत्यभिज्ञा दर्शन का निर्माण किया गया है ॥ १७ ॥
संस्कार बाहुल्य से बढती ही जाती है, इसके क्षय होने के लिए साधना का अभाव होने के कारण वासना जैस की तैस रह जाती है। इसलिए विनायक अर्थात् दिव्य योगभूमिकाओं की अध्यक्षा दिव्य- शक्तियाँ होती हैं ये सभी सिद्धियाँ योगी के लिए बड़ा ही दुःखदायी परिणाम लाकर खड़ा कर देती हैं अर्थात् योगिजनों को पथभ्रष्ट करने के लिए प्रतिक्षण उद्यत रहती हैं । पातञ्जल योग का भी ठीक यही कहना है । ये दिव्यशक्तियाँ ऋतम्भरा प्रज्ञा से संयुक्त कर, योगी की अन्तःकरण विशुद्धि को देख कर सांसारिक भोगों में फसाने का प्रलोभन देती रहती हैं— हे आयुष्मान् ! ये सारे के सारे भोग्य-पदार्थ आपकी दिव्य साधना से उपलब्ध हो रहे हैं । ये सुर सी सुन्दरियाँ तथा संसार-सौरभ को बिखेरनेवाली सुन्दरतायें तुम्हें चाह रही हैं । ये आपके अङ्ग-प्रत्यङ्ग दिव्य आभा से झलक रहे हैं । ये जीर्णता एवं जरावस्था को दूर करनेवाले सुधारस स्वर्णपात्र में भरे पड़े हैं । अतः इसको स्वीकार किया जाय । योगी ने कहीं थोड़ी भी असावधानता रखी तो अपने पथ से च्युत हो गया एवं आत्मविश्रान्ति से विमुख हो गया समझो । क्योंकि 'प्रसह्यो चञ्चलीत्येव योगिनामपि यन्मनः । [ स्व० तं०, ] इसलिए महान् पुरुषों ने जिज्ञासु साधकों को सावधान करने के आशय से अनेक बार इस बात को दोहराया है— यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतश्च तु ॥ जिस साधक का भाव चारों ओर से पूर्ण एवं स्थिर ज्ञेयमय हो चुका है वह कनक-कामिनी जैसे भोग विषय भी छोड़ देता है । वह फिर किसी भी अवस्था-विशेष में पड़े रहे किन्तु उसका मन डोलता नहीं है ।
अ.-४, आ.-१, का.-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१७ यदा नायकगुणसंश्रवणप्रवृद्धानुरागा कामिनी तद्दर्शनमेव परमुपादेयमाकाङ्क्षन्ती दिवा- निशमवशहृदया देवतोपयाचितानि दूतीसंप्रेषणानि मदनलेखकद्वारात्मावस्थानिवेदनानि कुर्वाणा विरहक्षामीभवद्गात्रलतिका तिष्ठति, तदा तदुपयाचितवशादशङ्कितमेव सविधवर्तिनि प्रियतमेऽव- लोकिते तैस्तैरुत्कर्षविशेषैः परामर्शपदवीमगच्छद्दुर्जनसाधारणतामापादिते संपन्नमपि तत्प्रियत- मावलोकनं न हृदयं पूर्णीकरोति; तथा स्वात्मनि विश्वेश्वरे सततं निर्भासमानेऽपि तन्निर्भासनं न हृदयस्य पूर्णतामाधत्ते; यतः सोऽप्यात्मा विश्वज्ञत्वकर्तृत्वाद्यप्रतिहतस्वशक्तिलक्षणपारमेश्वर्योत्कर्ष- योगेन न परामृष्टः, — इति भासमानघटादितुल्यवृत्तान्तो जातः । यदा तु दूतीवचनाद्वा तल्लक्षणा- भिज्ञानाद्वोपायान्तराद्वा तानुत्कर्षान् हृदयङ्गमीकरणेनामृशति, तदा तत्क्षणमद्भुतफुल्लन्यायेनैव तावात् कामपि पूर्णतामभ्येति, परिभोगाभ्यासरसे तु विश्रान्त्यन्तराण्यपि लभते; तद्वदात्मनि गुरुवचनाज्ज्ञानक्रियालक्षणशक्त्याभिज्ञानादेवा यदा पारमेश्वर्योत्कर्षहृदयङ्गमीभावो जायते, तदा तत्क्षणमेव पूर्णतात्मिका जीवन्मुक्तिः, समावेशाभ्यासरसे तु विभूतिलाभः, — इति तस्य प्रत्यभिज्ञैव परापरसिद्धिप्रदायिनी भवति ॥ १७ ॥
जिसका नायक के पराक्रम-शौर्यादि, गुण-गरिमा को सुनने मात्र से ही गाढ अनुराग-प्रेम बढ गया है कामिनी दमयन्ती उस नल के दर्शन करने की हृदय में अत्यधिक अभिलाषा रखती हुई, अहोरात्र उसकी प्राप्ति के विचार में डूब जाने के कारण अपने आपको भूल चुकी है। देवताओं से याचनायें करना, दूती के द्वारा अपने अनुराग राग में उपरञ्जित होने का प्रेम-पत्र भेजना और स्वप्न व एकान्त में नल का ही दृश्य देखना इत्यादि करती हुई विरह में शुष्क लता सी शरीरवाली होकर खड़ी है तो खड़ी ही रह जाती है एवं बैठी है तो बैठी हुई ही रह जाती है, तब कहीं उसकी याचना के कारण निःशंक ही प्राप्त नल समीप में खड़ा होता हुआ, अपने प्रियतम को देख लेने पर भी उन उन उत्कर्ष विशेषों के द्वारा परामर्शपदवी तक पहुँच जाती है, तो भी नल को साधारण मनुष्य के रूप में देखती है जिससे अपने प्रियतम का अनुराग हृदय में नहीं प्राप्त कर सकती है; उसी प्रकार विश्वेश्वर परम शिव अपने आत्मा में निरन्तर पूर्णरूप से निर्भासित होने पर भी उसका आभासित होना हृदय की पूर्णता को आप्लावित नहीं करता है; क्योंकि विश्वज्ञातृत्व, कर्तृत्व आदि, अप्रतिहत अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति- रूप पारमेश्वर्य के उत्कर्ष सम्बन्ध से युक्त अपने आपको परामृष्ट नहीं करता है; इसीलिए प्रकाशित होनेवाले घटादि जड-पदार्थ के समान ही हो जाता है, जब तो दूती वचन से, अथवा उसके लक्षणज्ञान से और दूसरे उपाय से उन उत्कर्षों को हृदयङ्गमीकरण करती हुई परामृष्ट करती है, तब तो उसी क्षण 'अद्भुतफुल्ल' न्याय से सहसा हृदय में आंशिक पूर्णता प्राप्त कर लेती है, परन्तु परिभोग अवस्था की एक रसता में तो भिन्न ही विश्रान्ति उपलब्ध होती है; उसी प्रकार अपने आत्मा में गुरुजनों के उपदेशों से अथवा ज्ञान-क्रियारूप शक्ति के अभिज्ञानों से परमेश्वर सम्बन्धी समस्त उत्कर्ष का भाव हृदयङ्गम हो जाता है, तब तो उसी क्षण पूर्णरूप से जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है, समावेश अर्थात् समाधि अवस्था के एक रसभाव में डूब जाने पर तो परम विभूति की प्राप्ति हो जाती है, जिससे उस योगी के लिए प्रत्यभिज्ञा अमित-आध्यात्मिक और सांसारिक परिमित सिद्धियाँ देनेवाली हो जाती है ॥ १७॥
३१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१८ सर्वोपकारकं महाफलमिदं शास्त्रं प्रसिद्धान्वययोगेन नामधेयप्रसिद्ध्या च तदुत्कर्षस्मरण- द्वारजनितसंभावनाप्रत्ययलक्षणप्रवर्तकसंवेदनया जनं प्रवर्तयितुं पितुर्नाम्ना चोपसंहारं दर्शयति— जनस्यायत्नसिद्धयर्थमुदयाकरसूनुना । ईश्वरप्रत्यभिज्ञेयमुत्पलेनोपपादिता ॥ १८ ॥ यस्य कस्यचिज्जन्तोरिति नात्र जात्याद्यपेक्षा काचित्,—इति सर्वोपकारित्वमुक्तम् । अय- त्नेन सिद्धिः परापररूपा यथा स्यात्,—इति महाफलत्वम् । उदयाकरपुत्रः श्रीमानुत्पलदेवोऽस्मत्प- रमगुरुरिदं शास्त्रमकार्षीत्,—इति तत्प्रसिद्ध्या जनः प्रवर्तते,—इति प्रवर्तनाद्वारेण सोऽनुगृहीतो भवति,—इत्युभयनामनिर्देशः । इयमिति हृदयङ्गमत्तामुपपत्तिशतैरानीता,—इति शिवम् ॥ १८ ॥ आदितः १९० ॥ एषाभिनवगुप्तेन सूत्रार्थप्रविमर्शिनी । रचिता प्रत्यभिज्ञायां लघ्वी वृत्तिरभङ्गुरा ॥ १ ॥ वाक्यप्रमाणपदतत्त्वसदागमार्थाः स्वात्मोपयोगमुपधान्त्यमुतः स्वशास्त्रात् । यह ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र जीवन में सब प्रकार से उपकार करनेवाला है तथा महाफल अर्थात् अमरफल देनेवाला है, कुल [ वंश ] के सम्बन्ध से प्रसिद्ध एवं नाम की प्रसिद्धि से, उसका उत्कर्ष स्मरण के द्वारा उत्पन्न हुआ ज्ञान लक्षण के प्रवर्तक संवेदन-ज्ञान से लोगों को प्रवृत्त करने के लिए पिता के नाम से उपसंहार दिखाते हैं— श्री उदयाकर के पुत्र उत्पलदेव ने इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की रचना की । लोगों को बिना अथक यत्न किये ही अर्थात् बिना प्राणायाम इत्यादि दुःसह क्लेशों के सहे 'मैं महेश्वर हूँ' जो इस बोध से ही स्वरूप को समझ लेता है ॥ १८ ॥ इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र का अध्ययन कोई भी व्यक्ति कर सकता है चाहे वह किसी भी जाति और समाज अथवा देश-विशेष का हो । जिज्ञासु व्यक्ति ही इसका सचमुच अधिकारी माना जाता है । जाति विशेष में उत्पन्न व्यक्ति विशेष का कोई इसमें आग्रह नहीं है कि यही इसका अध्ययन कर सकता है, इसलिए जीवन में सब तरह से उपयोगी यह शास्त्र है—ऐसा कहा गया है । बिना प्रयत्न विशेष किये ही भौतिक एवं आध्यात्मिक ऐश्वर्य [ जिसका शास्त्रों में उल्लेख दिया है ] जिज्ञासु व्यक्ति प्राप्त कर लेता है, यही महाफल है । श्री उदयाकर के पुत्र श्रीमान् उत्पलदेव हमारे [ अभिनवगुप्त आदि सभी के] परमगुरु ने इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र [अपूर्व ज्ञाप- कत्वं शास्त्रत्वं नाम ] का निर्माण किया है, इसलिए उनकी प्रसिद्धि से ही लोगों का झुकाव इसके प्रति स्वाभाविक होगा, इसके अध्ययन की प्रवृत्ति के द्वारा उस जिज्ञासु व्यक्ति में शिव का अनुग्रह अर्थात् शक्तिपात हो जाता है, इसी कारण दोनों के नामों का उल्लेख किया है । 'इयमिति' यह जो कारिका में दिया है, इससे यह द्योतित होता है कि इस प्रत्यभिज्ञा को सैकड़ों उपपत्तियों से हृदय पट तक लाने का प्रयत्न किया गया है ॥ १८ ॥ अभिनवगुप्त ने [ श्री उत्पलदेव प्रणीत ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ऊपर अबृहत् एवं अखण्डित सूत्रार्थ विमर्शिनी टीका का निर्माण किया है ॥ १ ॥ मीमांसा-वाक्य, न्यायादि-प्रमाण, व्याकरण सम्बन्धी पद-पदार्थ तथा सत् = परमार्थरूप
अ.-४, आ.-१, का.-१८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१९ भौमान्रसाञ्जलमयांश्च न सस्यपुष्टौ मुक्त्वाकमेकमिह योजयितुं क्षमोऽन्यः ॥ २ ॥ आत्मानमनभिज्ञाय विवेक्तुं योऽन्यदिच्छति । तेन भौतेन किं वाच्यं प्रश्नेऽस्मिन्को भवानिति ॥ ३ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितविमर्शिन्याख्यटीको- पेतायां तत्त्वसंग्रहाधिकारे गुरुपर्वक्रमाख्यं प्रथमाह्निकम् ॥ १ ॥ आगमशास्त्रों से सम्बन्ध रखनेवाले जितने भी अर्थ हैं वे सब के सब हमारे शैवाद्वैत शास्त्र में उपयोगी सिद्ध होते हैं । भूमिगत एवं जलमय धान्यादिकों के लिए रसवर्धक एक सूर्य को छोड़कर अन्य कौन समर्थ है अर्थात् दूसरा कोई भी नहीं हो सकता है ।। २ ।। जो अपने आपके लिए अनभिज्ञ है वह यदि दूसरों को समझाने की इच्छा करता है तो उस मूढ को पूछना चाहिए कि आप स्वयं कौन हो ? जो कि दूसरों के लिए विवेचन करने चल पड़े हो ।। ३ ।। प्रथम आह्निक समाप्त इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता चतुर्थतत्त्वसंग्रहाधिकारहिन्दीव्याख्या शिवरञ्जनी इति चतुर्थः तत्त्वसंग्रहाधिकारः समाप्तः ग्रन्थोऽयं समाप्तिमगात्
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