भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 335

३१२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१५-१६ सर्गिकपरामर्शात्मकस्वात्मचमत्कारलक्षणेनैकघना अविच्छिन्नतद्रूपा परमाक्षरेण विग्रहवती भगवतो विश्वमयस्यानवच्छिन्नानुत्तरधाम्नो गलितप्रमेयकथा सर्वोत्तीर्णा व्यपदिश्यते ॥ १४ ॥ एवमधिकारचतुष्टयोक्तं यद्वस्तु तत्फलमाह— एवमात्मानमेतस्य सम्यग्ज्ञानक्रिये तथा । जानन्यथेप्सितान्पश्यञ्जानाति च करोति च । १५ ॥ एवमिति, ईश्वररूपमात्मानं तस्य च स्वाव्यतिरिक्ते स्वातन्त्र्यमात्ररूपे ज्ञानक्रिये जानन् एवं-भूतोऽयमात्मा न तु काणादादिदर्शितः, इत्थं च ज्ञानक्रिये न तु तस्य व्यतिरिक्ते केचन,— इति परामृशन् यद्यदिच्छति तत्तज्जानाति करोति च समावेशाभ्यासपरोऽनेनैव शरीरेण; अतत्परस्तु सति देहे जीवन्मुक्तस्तत्पाते परमेश्वर एवेति ॥ १५ ॥ अस्यार्थस्य स्वप्रत्ययसिद्धस्यापि गुरुपरम्परोपदेश उपोद्वलको वक्तव्यः, शास्त्रदृष्टिर्हि के अविच्छिन्न तद्रूप होकर परम अक्षर विग्रह से विश्वरूप भगवान् शिव के अनवच्छिन्न अनुत्तर- धाम का रूप धारण कर लेता है—ऐसी अवस्था में प्रमेय कथा सब गलित हो जाती है ॥ १४ ॥ इस प्रकार चारों अधिकारों से जो बातें कही गयी हैं उसके फल को कहते हैं— एवं अपने स्वरूप को और इसके ज्ञान और क्रिया को ठीक-ठीक जानता हुआ एवं अभीष्ट को देखता हुआ वैसा ही जानता है और करता है ॥ १५ ॥ अपने आप को ईश्वरस्वरूप मानता है और उस स्वरूप से अभिन्न स्वातन्त्र्यमात्र ज्ञान एवं क्रिया को जानते हुए ऐसा ही यह आत्मा है काणादादि दर्शन से दिखाया गया आत्मा नहीं है, इस प्रकार ज्ञान-क्रिया उससे भिन्न नहीं होता है ऐसा परामर्श करता हुआ जो जो चाहता है वह वह जानता है और करता है इसी शरीर से समाधि का अभ्यास करता हुआ उसमें जबतक लीन नहीं होता तबतक देह रहते हुए जीवन्मुक्त कहलाता है देह के गिर जाने पर तो परमेश्वर रूप ही हो जाता है ॥ १५ ॥ इस ईश्वर प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का अर्थ अपने ज्ञान-अनुभव से सिद्ध होता हुआ भी गुरुपरम्परा क्रम से प्राप्त उपदेश, इसको पुष्ट करनेवाला अवश्य होगा, क्योंकि शास्त्र दृष्टि भी उन गुरुपरम्परा १. ज्ञानाधिकार और क्रियाधिकार इन दोनों अधिकारों के द्वारा तथा उसी में तत्त्वार्थसंग्रहाधिकार के साथ अपने से प्रकाशित होनेवाले तत्त्व में भी युक्ति का बढावा देकर निरूपित किया हुआ अंश स्वतः पूरा हो जाता है, आगम अधिकार के माध्यम से यद्यपि उस अर्थ की पुष्टि हो ही जाती है तथापि शास्त्र से भी इस अंश को पूरा किया है—इस पर कहते हैं कि 'शास्त्रदृष्टिर्हीति' शिव दृष्टि शास्त्र में भी उस प्राचीन प्रसिद्ध गुरु परम्परा क्रम के अनुसार आगम के विषय को ही लेकर प्रायः तत्त्वों का प्रतिपादन किया हुआ है । अत्यन्त महत्त्व-पूर्ण बीच-बीच में दिव्य अतिदिव्यादि सम्बन्ध को ठुकरा कर, केवल अपनी प्रतिभा के बल से पुस्तक की शरण में जाना तो विडम्बना ही कहलाती है इस अभिप्राय को लेकर कहते हैं— पुस्तकाधीतविद्याश्च गुरुक्रमविवर्जिताः । आचरन्तो दिशन्तश्च पच्यन्ते नरके चिरम् ॥