भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 343 में से

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अ.-४, आ.-१, का.-१४-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३११ नन्वेवं बद्धमुक्तयोः प्रमेयं प्रति को भेदः ?, उच्यते— मेयं साधारणं मुक्तः स्वात्माभेदेन मन्यते । महेश्वरो यथा बद्धः पुनरत्यन्तभेदवत् ॥ १३ ॥ श्रीमत्सदाशिवेश्वरपदादारभ्य क्रिमिपर्यन्तप्रमातृवर्गाधिष्ठातृ यदहमितिरूपं तदेवात्म- तयाभिनिविशते मुक्तः; ततश्च विश्वस्यापि प्रमेयं ममापि, मम प्रमेयं विश्वस्यापि, प्रमेयं चेदं ममैवाङ्गभूतं प्रमेयान्तरमपि तथा,—इत्यनेन क्रमेण प्रमेयं परस्परतश्च प्रमातृवर्गाच्चाव्यावृत्तम्,- इत्येकरसाभेदविश्रान्तितत्त्वमस्य सर्वं परामर्शपदमुपैति । बद्धस्य तु सर्वमेतद्विपरीतम्,—इत्येक- रसभेदविश्रान्त एवासौ ॥ १३ ॥ ननु सदाशिवेश्वरभुवि जीवन्मुक्तिपदे बद्धरूपपशुप्रमातृविषये च प्रमेयवृत्तान्तः परीक्षितः, परमशिवे तु कथमसौ ? इत्याशङ्क्याह— सर्वथा त्वन्तरालीनानन्ततत्त्वौघनिर्भरः । शिवः चिदानन्दघनः परमाक्षरविग्रहः ॥ १४ ॥ न खलु भगवति श्री परमशिवे प्रमेयकथा काचिदस्ति, तत्त्वौघस्य सर्वथा तत्र चिद्रूपता- मात्रविश्रान्तत्वेन लीनत्वात्; ततश्च सावस्था संवित्स्वभावेन स्वात्मविश्रान्त्यानन्देन अकृत्रिमनै- अच्छा तो, बद्ध और मुक्त में प्रमेय के लिएक्या भेद रहेगा ? उत्तर में कहते हैं— मुक्त पुरुष साधारण प्रमेय को अपने से अभिन्न मानता है । जैसा कि महेश्वर अत्यन्त भेद के समान उसे बद्ध मानता है ॥ १३ ॥ श्री सदाशिव ईश्वर से लेकर कीट-पतङ्ग पर्यन्त प्रमातृवर्ग के अधिष्ठाता जो अहं यह परामर्श है उसे मुक्त अपना स्वरूप समझता है; इसी कारण सारे विश्व का प्रमेय भी मेरा ही है और मेरा प्रमेय विश्व का प्रमेय है, यह सारा का सारा प्रमेय मेरा ही अंगरूप ही है उसी- प्रकार दूसरे प्रमेय भी, इसी क्रम से प्रमेय और परस्पर प्रमातृवर्ग से भिन्न न होकर एकरस में अभेदरूप से विश्रान्ति लेता हुआ परामर्शपद को प्राप्त करता है । किन्तु बद्धपुरुष के लिए सब कुछ विपरीत होता है, इस प्रकार एकरस भेद में ही विश्राम हो जाता है ॥ १३ ॥ अब शङ्का करते हैं कि सदाशिव भूमि जो जीवन्मुक्तावस्था है उसमें बद्ध पशु प्रमाता के विषय में प्रमेय विषय की परीक्षा हो गयी, परन्तु यह भेद परम शिव के विषय में कैसे होंगे ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— विकल्प और अविकल्प भूमिका में जिसकी इन्द्रियाँ उद्बुद्ध हो चुकी है उस योगी का प्रमेय क्रम कह दिया गया और निमीलित इन्द्रियवाले योगी का क्रम कैसा होता है उसको कहते हैं । सब प्रकार से अनन्त तत्त्व का समूह जिसमें छिपा रहता है । वही चिदानन्दघन परम अक्षर शरीरवाला शिवतत्त्व है ॥ १४ ॥ जो कि भगवान् परम शिव में कीई प्रमेय कथा नही रहती है, सारे के सारे तत्त्व समूह चिद्रूप में विश्रान्त हो जाने के कारण; इसी कारण संवित् ज्ञान स्वरूप से अपने आप में विश्रान्त होकर आनन्दरूप से अकृत्रिम स्वाभाविक और परामर्शस्वरूप आत्मचमत्काररूप से अनेक प्रकार

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