ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिगृहीत एव स्पष्टाभेदार्थ एकाग्रत्वमवलम्ब्य 'अहमिदम्' इत्यैश्वर्यपरामर्शपदं भवति तदा अन्त- र्लक्ष्यबहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषपरिहारोपदेशदिशा 'क्रमेण' अभ्यासतारतम्येन पशोः पशुत्वं प्रतिहन्ती- श्वरत्वं च दर्शयति । किं च योऽयं विकल्पसर्गः पाशव उक्तः सोऽपि यदि 'अन्यथा' इति पूर्वोक्त- रूपवैपरीत्येन परिज्ञातयेशशक्त्या परिज्ञाततादात्म्यस्य भवति तदा सोऽपि साधारण एवाप्यायना- भिररणशान्त्यादिविकल्प इव न्यस्तमन्त्रस्य भावित्तान्तःकरणस्य ॥ ११ ॥ एवं विकल्पनिर्ह्रासेन निर्विकल्परूपसात्मीभावे विश्वात्मसाक्षात्कारलक्षणः स्वप्रत्यय एव मोक्षो दर्शितः, अधुना विकल्पनिर्ह्रासाभावेऽपि तं दर्शयति- सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ १२ ॥ नहि प्रत्यगात्मा नाम पशुः कश्चिदन्यो योऽहम्, अपि तु परिगृहीतग्राह्यप्रकाशैकघनः परो यः स एवाहं स चाहमेव, न त्वन्य कश्चित्; अतो विकल्पसृष्टिरपि मम स्वातन्त्र्यलक्षणो विभवः,- इत्येवं विमर्शे दृढीभूते सत्यपरिक्षीणविकल्पोऽपि जीवन्नेव मुक्तः । यथोक्तम्-'शङ्कापि न विशङ्केत निःशङ्कत्वमिदं स्फुटम् ।' इति ॥ १२ ॥ करके 'अहमिदम्' ऐसा परामर्श पद स्थान होता है, ऐसी अवस्था में अन्तर का लक्ष्य रहता है और बाहरी मात्र दृष्टि ही रहती है निमेष-उन्मेष से शून्य होकर विशेष अभ्यास के क्रम से पशु की पशुता दूर करती जाती है और ईश्वरता को उभारती जाती है और जो यह पशुओं की विकल्प सृष्टि बतायी है वह भी पूर्वोक्तरूप से विपरीत होकर ईश्वर-शक्ति का ज्ञान होने पर उनसे तादात्म्य प्राप्त कर तब वह भी साधारणरूप से आप्यायन, अभिचरन, शान्ति आदि विकल्पों के समान मन्त्र को छोड़कर भावित ईश्वरमय जपने को माननेवालों का ही होता है ॥ ११ ॥ इस प्रकार विकल्प ह्रास करके निर्विकल्प के आत्मसात् कर लेने पर विश्वमय आत्मा का साक्षात्कार कर लेना; क्योंकि अपना ज्ञान ही मोक्ष दिखाया है, अब तो विकल्प के निर्ह्रास न होने पर भी मोक्ष हो जाता है उसे दिखाते हैं- यह सारा का सारा विश्व मेरा ही वैभव है ऐसा ज्ञान रखनेवाले विश्वात्मा में विकल्पों के उदय होने पर भी महेश्वर-भाव बना रहता है ॥ १२ ॥ जो मैं हूँ वह कोई दूसरा जीवरूप पशु नहीं है, ग्राह्य-ग्राहक भाव को ग्रहण करके एक प्रकाशमय होकर वह जो परमेश्वर है वही मैं हूँ और वही मैं हूँ, दूसरा कोई भी नहीं है; इसीलिए विकल्प सृष्टि भी मेरा ही वैभव है ऐसा विमर्श दृढ़ हो जाने पर विकल्प का निश्चयरूप से क्षीण हो जाने से जिते हुए ही मुक्त हो जाता है । जिसके विषय में कहा है 'इसमें शङ्का भी नहीं करनी चाहिए यह तो शङ्का से रहित स्पष्ट है' ॥ १२ ॥ १. अन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता । एषाऽसौ भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ लक्ष्य तो अन्तर में रहे, एवं दृष्टि बिना निमेष और उन्मेष की हो अर्थात् नेत्र का निरन्तर एक पलक गिराये-उठाये बिना देखते रहना चित्त के भीतर अनुप्रवेश के साथ सभी इन्द्रियों का बाहर की ओर प्रसारना यही भैरवी मुद्रा सब तन्त्रों में गुप्त रूप से कही हुई है ।