भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 332

अ.-४, आ.-१, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [३०९ ज्ञाता परवशस्यैव सतो विकल्पक्रिया विकल्पनशक्तिरुदेति । ननु केन सा तस्योत्थाप्यते ?; आह— ईश्वरस्य परामर्शरूपतया शब्दराशिलक्षणस्य या शक्तिः स्वरूपविश्रान्तिलक्षणपारमैश्वर्योपरोध- प्रयोजना ब्राह्म्यादिदेवताचक्रमयी तैस्तैः ककारादिवर्णवैचित्र्यैर्विचित्रा, तया यासौ विकल्पक्रिया तस्य पशोरेकत्र निरूढचभावात् चञ्चला तेन 'मित्रमयं शत्रुरयम्' इत्यादिवर्णवैचित्र्यानुविद्धतया विकल्पनक्रियया तदात्मन ईश्वरस्वभावस्यैव पशोरसाधारणी सृष्टिः, 'पञ्चवक्त्रश्चतुर्दन्तो हस्ती नभसि धावति ।' इत्यपि विमिश्रतया विकल्प सृष्टिः, तानाभासान् ईश्वरसृष्टानेवोपजीवति,—इति सर्वा पाशवी प्रत्ययसृष्टिरीश्वरसृष्ट्युपजीविनीत्युक्तम् ॥ ८-९-१० ॥ नन्वेवं यदि पाशवी सृष्टिः संसाररूपा तर्हि पारमेश्वरी सृष्टिः पशोः किं कुर्यात् ? इति निर्णीयते— साधारणोऽन्यथा चैशः सर्गः स्पष्टावभासनात् । विकल्पहानेनैकाग्र्यात् क्रमेणेश्वरतापद्म् ॥ ११ ॥ ऐश्वरः सर्गो द्विधा, साधारणश्च घटादिरसाधारणश्च 'अन्यथा' इति निर्दिष्टो द्विचन्द्रादिः; तस्य च सामान्यलक्षणं स्पष्टावभासनं नाम । सोऽयं सर्गो यदा विकल्पहानक्रमेण तस्मिन्निर्विकल्पक- उत्तर में कहते हैं कि यदि अपनी शक्ति को जानेंगे तो निश्चित हो सकता है जब तक वह शक्ति पशुजीव को ज्ञान नहीं है तब तक वह परवश रहता है और तब तक ही विकल्प क्रिया, विकल्प-शक्ति उदय होतो रहती है । शङ्का होती है कि वह किससे उठती है ? उत्तर में कहते हैं कि ईश्वर की शब्दराशिरूप परामर्श करनेवाली जो शक्ति है अपने में विश्रान्त रहती है जब कि परम ऐश्वर्य का उपरोध करती है ब्राह्मी-शक्ति आदि देवता चक्र में अधिष्ठित ककारादि वर्णों की विचित्रता से विचित्र बनी हुई जो विकल्प है वही पशुजीव मे एक जगह एकत्र होकर बढे हुए प्राण एवं अपान आदि संमिश्रण से चंचल हुई यह मित्र है यह शत्रु है इत्यादि वर्णों की विचित्रता से मिले रहने के कारण विकल्पन क्रिया के द्वारा तादात्म्यरूप ईश्वर भाव को प्राप्त हुए पशुजीव की ही असाधारणी सृष्टि कही जाती है। 'पाँच मुखवाला और चार दातोंवाला हाथी आकाश में दौड़ता है।' यह विमिश्ररूप होने से विकल्प सृष्टि है, ईश्वर से बनाये गये उन्हीं आभासों का यह भी आधार रखती है, पशुजीव की अपनी भावना के अनुसार सृष्टि ईश्वर परमात्मा की सृष्टि का ही आधार लेकर होती है ऐसा कहा गया है ॥ ८-९-१० ॥ अच्छा तो, पाशवी सृष्टि संसाररूपा है तो फिर ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि पशुजीव के लिए क्या उपकार करेंगी ? इसका निर्णय करते हैं । स्पष्ट अभाव होने के कारण ईश्वर की सृष्टि साधारण होती है । विकल्प की हानि करके एकाग्रता के कारण क्रम से ईश्वर पद तक पहुँचा देती है यही ईश्वर सृष्टि का उसके लिए उपकार है ॥ ११ ॥ ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि दो प्रकार की होती हैं, साधारणरूप से और घटादि असाधारण रूप से होती है नहीं तो, द्विचन्द्रादि का निर्देश तो ही है और ईश्वर सृष्टि का सामान्यरूप तो स्पष्ट ही सब के सामने भासता है । जब वह यह ईश्वर सृष्टि विकल्प की हानि के क्रम से उस पशु में निर्विकल्परूप से गृहीत होती है तब तो एक ही पदार्थ में एकाग्ररूप का अवलम्बन