भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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३०८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-८-९-१० स्वविश्रान्त्युपरोधायाचलया प्राणरूपया । विकल्पक्रियया तत्तद्वर्णवैचित्र्यरूपया ॥ १० ॥ तुविशेषं द्योतयति प्रत्यगात्मनस्तु इत्थं प्रमेयरूपा अर्था, न त्वीश्वरवदुक्तनयेनेति । 'भिन्न' इति मिश्रामिश्रतया भिद्यमान आभासो येषामर्थानां ते विशेषसामान्यात्मानोऽर्थाः प्रत्यगात्मनः प्रतिपुरुषमविमिश्रस्वसंवेदनावगमरूपस्यासंकीर्णाऽहंप्रकाशात्मनः प्रकल्प्या विकल्पनीयाः, प्रतिप्राणि स्ववासनानुसारेण विभिन्नाभिः संज्ञाभिः 'प्रियोऽयं शत्रुरयम्' इत्यादिकाभिर्भावनाविशेषानुसारेण तत्तद्विचित्रसुखदुःखाद्युपयुक्ताभिः स्मरणे उत्प्रेक्षणे संकल्पनेऽन्यत्रान्यत्र च विकल्पयोगे । एतदुक्तं भवति— ईश्वरस्य विकल्पात्मकतामन्तरेण शुद्धविमर्शविषयीभाव्या अर्थाः, पशोस्त्वन्योन्यापोहन हेवाकिनि विकल्पे समारूढातेऽर्था भवन्ति, सांसारिकहानादानादिव्यवहारोपयोगात् इति । नन्व- विकल्पत्वे यावानेवार्थस्तावोनेव यदि विकल्पत्वे तत्को विशेषः प्रमेयस्य पतिपशुरूपतायाम्, ? उच्यते, तस्येति पशुकर्तृका सृष्टिस्तेषामर्थानामीश्वरसृष्टानामुपरिवर्तिनी, अत एव तामीश्वर- सृष्टिमुपजीवन्ती असाधारणी प्रतिप्रमातृनियता । तद्यथा 'इदं हृद्यम्' इति येन सृष्टं तत् तस्यैव तदा नान्यस्य । ननु यदि पशोरपि सृष्टिशक्तिरस्ति तर्हीश्वर एव; सत्यम्, ईश्वर एवासौ । नन्वेवं साधारणत्वं कस्मात् सृष्टेर्न भवति ?; भवेत् यदि स्वशक्तिं परिजानीयात्, यावता सा तस्यापरि- अपने में विश्रान्त होनेवाली विश्राम के उपरोध के लिए अचल प्राणरूप से, विकल्प क्रिया से, उन उन वर्णों में विचित्ररूप से रहती है ॥ १० ॥ 'तु' शब्द विशेषता को द्योतित करता है । जीवात्मा का ऐसा हो प्रमेयरूप अर्थ होता है, उक्त नीति से ईश्वर के समान नहीं होता । 'भिन्नः' मिला हुआ अर्थात् भेद एवं अभेदरूप से भिन्न भिन्न जो आभास हैं वे ही विशेष और सामान्यरूप होकर जीवात्मा के पदार्थ होते हैं जो कि प्रतिपुरुष भिन्न भिन्न अपने संवेदन के अनुरूप असंकीर्ण अहं प्रकाशरूप से कल्पित होते हैं और प्रतिप्राणी अपनी वासना के अनुसार विभिन्न विभिन्न संज्ञाओं से 'प्रियोऽयं शत्रुरयम्' अर्थात् 'यह प्रिय है, यह शत्रु है' इत्यादि भावना विशेष के अनुसार विचित्र सुख-दुःखादि के स्मरण करने पर अथवा उत्प्रेक्षा करने पर अथवा संकल्प करने पर दूसरी दूसरी जगह विकल्पना से योग्य होने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर की विकल्परूपता को अन्तःकरण में शुद्ध विमर्श के विषय बनाने पर ईश्वर के ही पदार्थ हो जाते हैं, पशुजीव का तो परस्पर अपोहन को नहीं छोड़नेवाले विकल्प में आरूढ होकर जो पदार्थ भासते हैं, सांसारिक ग्रहण और त्याग इत्यादि व्यवहार के योग से पदार्थ कहलाते हैं । इस पर शङ्का होती है कि यदि अविकल्प में जितने भी अर्थ रहते हैं उतने ही अर्थ यदि विकल्प में भी हो तो फिर क्या विशेषता हुई, पशुपति के प्रमेय में और पशुजीव के प्रमेय में भेद क्या हुआ ? इसका उत्तर देते हैं, 'तस्यासाधारणेति' पशुजीव कर्तृक सृष्टि ईश्वर से सृष्ट पदार्थों में जो इसके ऊपर रहते हैं, इसीलिए इसी ईश्वर सृष्टि का आधार मान करके जीव प्रमाता की असाधारणी सृष्टि होती है । इसीलिए कहा गया है कि 'इदं हृद्यं' इस मनोहर संसार को जिसने बनाया है उसी की यह शक्ति है, किसी अन्य की नहीं है । अच्छा तो, अब कहो कि पशुजीव में में भी यदि सृष्टि करने की शक्ति है, तो वह भी ईश्वर हो गया; आपका कहना ठीक ही है, ईश्वररूप ही जीव है । अच्छा तो, इस प्रकार ईश्वर सृष्टि के समान साधारण क्यों न हो जाय ?

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