भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-४, आ.-१, का.-८-९-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३०७ इहाभासा एव तावदर्थाः, — इत्युक्तं, ते च परामर्शैक्येन कदाचिन्मिश्रीक्रियन्ते यदा विशेष- रूपता, कदाचिदमिश्रा एव परामृश्यन्ते यदा सामान्यरूपता, ते एते उभयात्मानोऽप्यसामयिकेना- कल्पितेनेदंभावेन सहजभेदपरामर्शरूपेणाङ्गुलिनिर्देशादिप्रत्ययेन गोचरीकार्याः प्रभोरपि न केवलं सद्योजातबालादेर्यावदीश्वरस्यापि, 'तथा' येन सामान्यविशेषप्रकारेण चित्रतयावभासन्ते । चित्रत्वं हि तयोः — यन्मिश्रत्वममिश्रत्वं च युगपदेकाहन्ताविश्रान्तं भाति, — इति ईश्वरदशायां भावोल्ला- सनान्तरीयकत्वेन संवित्संकोचरूपं निषेध्यानुपरक्तनञर्थमात्ररूपं शून्यं संवित्प्रकाशेनैव प्रकाश- मानमहन्तानिषेधरूपामसामयिकीमिदन्तामुल्लासयति ॥ ७ ॥ एवं तावदीश्वररूपस्य पत्युरित्थं प्रमेयतत्त्वं, परमशिवे तु भगवति प्रमेयकथैव कथमुत्ति- ष्ठति, प्रमेयकथोत्थापकत्वमेव भगवतः सदाशिवेश्वरत्वम्; अतोऽधुना पशुं प्रति कीदृक् प्रमेयस्य वृत्तान्तः, — इति सन्देहमपोहति श्लोकत्रयेण— ते तु भिन्नावभासार्थाः प्रकल्प्याः प्रत्यगात्मनः । तत्तद्विभिन्नसंज्ञाभिः स्मृत्युत्प्रेक्षादिगोचरे ॥ ८ ॥ तस्यासाधारणी सृष्टिरीशसृष्ट्युपजीविनी । सैषाप्यज्ञतया सत्यैवेशशक्त्या तदात्मनः ॥ ९ ॥ ये जो प्रभु की असामयिक इदन्तांश का परामर्श स्थानीय आभास हैं । वे मिश्रित और भिन्न-भिन्न हैं तथा चित्र विचित्र आभासवाले होते हैं ॥ ७ ॥ इस शास्त्रमें आभासों को ही अर्थ कहा जाता है, उनको परामर्श की एकता से कभी मिला दिये जाते हैं जब उसमें विशेषता आ जाती है और कभी पृथक् होकर भिन्नरूप में परामृष्ट होते हैं जब सामान्यरूपता रहती है, तब ये दोनों असामयिक कल्पित इदंभाव स्वाभाविक भेद परामर्शरूप से अङ्गुलि द्वारा निर्देश किये हुए के जैसा इन्द्रियों के विषय किये जाते हैं यह केवल ईश्वर को नहीं होता है अपि तु सद्योजात बालक को भी सामान्य विशेषरूप से चित्र-विचित्र होकर भासते हैं; क्योंकि उनकी विचित्रता मिश्रत्व और अमिश्रत्व रूप से एक साथ अहन्ता में विश्रान्त होती है, इसलिए ईश्वर दशा में उसका अवश्य उल्लास होने के कारण ज्ञान का संकु- चितरूप निषेध से मिला हुआ नञर्थ शून्य ज्ञान प्रकाशित होता है वह ज्ञानप्रकाश अहन्ता के निषेधरूप असामयिक इदन्ता को उल्लासित करता है ॥ ७ ॥ ऐसा ही ईश्वररूप पशुपति का प्रमेयत्त्व है, भगवान् परम शिव में प्रमेयता का होना नहीं घटता है, प्रमेयता तो सदाशिव और ईश्वर पर्यन्त ही रहती है; इसके आगे पशुजीव में कैसी प्रमेयता होती है यह बतायेंगे, तीन श्लोकों से इस सन्देह को दूर करते हैं— जीवात्मा के लिए भिन्न-भिन्न अवभासवाले पदार्थ कल्पित होते हैं । स्मृति, उत्प्रेक्षा आदि के विषय में उन उन विभिन्न संज्ञाओं से उनका कथन होता है ॥ ८ ॥ उस पशुजीव की असाधारण सृष्टि ईश्वर की सृष्टि का आधार लेकर होती है । वह भी अज्ञरूप से सत्य ही ईश्वर की शक्ति द्वारा तद्रूप होकर भासती है ॥ ९ ॥