ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 336, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-४, आ.-१, का.-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१३ दर्शितागमाधिकारेण; एवं गुरुतः शास्त्रतः स्वतः एतद्दृढीकृतं भवति, — इत्यभिप्रायेण गुरुपारम्पर्यं दर्शयति— इति प्रकटितो मया सुघट एष मार्गो नवो महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा । तदत्र निदधत्पदं भुवनकर्तृतामात्मनो विभाव्य शिवतामयोमनिशमाविशन् सिद्ध्यति ॥ १६ ॥ अस्मत्परमेष्ठिभट्टारकश्रीसोमानन्दपादैः शिवदृष्टिशास्त्रेऽयमभिनवः सर्वरहस्यशाखान्तर्गतः सन्निगूढत्वादप्रसिद्धो बाह्यान्तरचर्याप्राणायामादिक्लेशप्रयासकलाविरहात् सुघटस्तावदुक्तः, गत मार्ग से प्राप्त उपदेश के द्वारा आगम शास्त्र इत्यादि के सिद्धान्त ज्ञान को लेकर ही दिखायी गयी है, इस प्रकार गुरु से, शास्त्र से और अपने अनुभव ज्ञान से यह दृढ निश्चित किया हुआ इसमें अर्थ है, इस आशय से गुरु परम्परा क्रम का उपस्थापन करते हैं— इस प्रकार मैंने [ उत्पलदेव ] ने यह सरल, नूतन मार्ग प्रकाशित किया है। जैसा श्री सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टिशास्त्र' में प्रतिपादित किया था। इसलिए प्रमेय विषय में जो परामर्श पद का विश्राम कराता हुआ, अपने विश्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य को देख कर, निरन्तर शिवमय स्वरूप में प्रवेश करता हुआ परम सिद्ध हो जाता है ॥ १६ ॥ हमारे परमेष्ठी गुरु श्री सोमानन्दपाद ने, जो अप्रसिद्ध शैवाद्वैत दर्शन था उसे लोक में 'शिवदृष्टिशास्त्र' नामक ग्रन्थ का निर्माण कर प्रचार-प्रसार किया, यह मार्ग अतीव सरल है समस्त बाह्य एवं आभ्यन्तर परिचर्या, प्राणायाम-अष्टांगयोग आदि, जो कि कायिक, मानसिक क्लेशों को देनेवाले हैं उन सब से रहित, एक सीधा सरल मार्ग 'शिवदृष्टिशास्त्र' में 'सर्वभूत- यातनाराजराजानां ते भोक्तारो विनिन्दिताः । तस्माद्गुरुक्रमायातं विशन्नेति परं शिवम् ॥ गुरु परम्परा मार्ग से रहित, जिन्होंने मात्र पुस्तकों की शरण लेकर विद्या पढ़ी हैं वे बड़ी से बड़ी यातनाओं को नरक में बहुत काल तक भोगते हैं क्यों ? उनके द्वारा किया गया आचरण एवं उपदेशादि शास्त्र से विरुद्ध है । इसलिए गुरु परम्परा से आया हुआ उपदेश अधिन्यस्त करते हुए परम शिव को प्राप्त कर लेते हैं । इसी कारण गुरु से तृतीय अंश पूरा करना चाहिए । इसका किरण संहिता में भी विवेचन किया गया है 'स्वतोऽपि गुरुतः शास्त्राद्विमर्शस्त्रिविधः स्मृतः ।' गुरु से, शास्त्र से और अपने आप से भी, इन तीन प्रकार से विमर्श का होना कहा गया है । १. जब कि प्रत्यभिज्ञा कर लेने मात्र से ही आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है; इससे फिर यम-नियम-आसन प्राणायाम-प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधि इत्यादि के द्वारा होनेवाले योग में क्लेशों का जो सहना है; अर्थात् इन सबों को सहना और सह कर भी जिसका उपयोग आत्मविश्रान्ति के लिए सिद्ध नहीं होता है तो उसे करना व्यर्थ ही सिद्ध होता है । ठीक ही है, इन सबों का अनुपयोग ही दिखाई देता है; क्योंकि ४०