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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-४, आ.-१, का.-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१३ दर्शितागमाधिकारेण; एवं गुरुतः शास्त्रतः स्वतः एतद्दृढीकृतं भवति, — इत्यभिप्रायेण गुरुपारम्पर्यं दर्शयति— इति प्रकटितो मया सुघट एष मार्गो नवो महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा । तदत्र निदधत्पदं भुवनकर्तृतामात्मनो विभाव्य शिवतामयोमनिशमाविशन् सिद्ध्यति ॥ १६ ॥ अस्मत्परमेष्ठिभट्टारकश्रीसोमानन्दपादैः शिवदृष्टिशास्त्रेऽयमभिनवः सर्वरहस्यशाखान्तर्गतः सन्निगूढत्वादप्रसिद्धो बाह्यान्तरचर्याप्राणायामादिक्लेशप्रयासकलाविरहात् सुघटस्तावदुक्तः, गत मार्ग से प्राप्त उपदेश के द्वारा आगम शास्त्र इत्यादि के सिद्धान्त ज्ञान को लेकर ही दिखायी गयी है, इस प्रकार गुरु से, शास्त्र से और अपने अनुभव ज्ञान से यह दृढ निश्चित किया हुआ इसमें अर्थ है, इस आशय से गुरु परम्परा क्रम का उपस्थापन करते हैं— इस प्रकार मैंने [ उत्पलदेव ] ने यह सरल, नूतन मार्ग प्रकाशित किया है। जैसा श्री सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टिशास्त्र' में प्रतिपादित किया था। इसलिए प्रमेय विषय में जो परामर्श पद का विश्राम कराता हुआ, अपने विश्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य को देख कर, निरन्तर शिवमय स्वरूप में प्रवेश करता हुआ परम सिद्ध हो जाता है ॥ १६ ॥ हमारे परमेष्ठी गुरु श्री सोमानन्दपाद ने, जो अप्रसिद्ध शैवाद्वैत दर्शन था उसे लोक में 'शिवदृष्टिशास्त्र' नामक ग्रन्थ का निर्माण कर प्रचार-प्रसार किया, यह मार्ग अतीव सरल है समस्त बाह्य एवं आभ्यन्तर परिचर्या, प्राणायाम-अष्टांगयोग आदि, जो कि कायिक, मानसिक क्लेशों को देनेवाले हैं उन सब से रहित, एक सीधा सरल मार्ग 'शिवदृष्टिशास्त्र' में 'सर्वभूत- यातनाराजराजानां ते भोक्तारो विनिन्दिताः । तस्माद्गुरुक्रमायातं विशन्नेति परं शिवम् ॥ गुरु परम्परा मार्ग से रहित, जिन्होंने मात्र पुस्तकों की शरण लेकर विद्या पढ़ी हैं वे बड़ी से बड़ी यातनाओं को नरक में बहुत काल तक भोगते हैं क्यों ? उनके द्वारा किया गया आचरण एवं उपदेशादि शास्त्र से विरुद्ध है । इसलिए गुरु परम्परा से आया हुआ उपदेश अधिन्यस्त करते हुए परम शिव को प्राप्त कर लेते हैं । इसी कारण गुरु से तृतीय अंश पूरा करना चाहिए । इसका किरण संहिता में भी विवेचन किया गया है 'स्वतोऽपि गुरुतः शास्त्राद्विमर्शस्त्रिविधः स्मृतः ।' गुरु से, शास्त्र से और अपने आप से भी, इन तीन प्रकार से विमर्श का होना कहा गया है । १. जब कि प्रत्यभिज्ञा कर लेने मात्र से ही आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है; इससे फिर यम-नियम-आसन प्राणायाम-प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधि इत्यादि के द्वारा होनेवाले योग में क्लेशों का जो सहना है; अर्थात् इन सबों को सहना और सह कर भी जिसका उपयोग आत्मविश्रान्ति के लिए सिद्ध नहीं होता है तो उसे करना व्यर्थ ही सिद्ध होता है । ठीक ही है, इन सबों का अनुपयोग ही दिखाई देता है; क्योंकि ४०

३१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१६ स एवात्र प्रकटतां परवादकलङ्कशङ्कापसारेण नीतः, यत एवं शास्त्रगुरुस्वप्रत्ययसिद्धोऽयमर्थः, तदिति तस्मादत्र प्रमेये पदं परामर्शं विश्रमयन् विश्वकर्तृत्वलक्षणमैश्वर्यमात्मनो विभाव्य दार्ढ्येन यदा परामृशति तर्हि तत्परामर्शमात्रादेव तावज्जीवन्मुक्तो भगवाञ्छिव एव। यथोक्तं परमेष्ठिपादैः — ‘ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना । करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयाऽपि वा ॥ सकृज्ज्ञाते सुवर्णे किं भावनाकरणादिना । सर्वथा पितृमात्रादितुल्यदार्ढ्येन सत्यता ॥’ (शि. दृ.) हिताय’ बताया है, वही इस प्रत्यभिज्ञा में लाया गया है जो कि प्रतिवादी के द्वारा दिये गये आक्षेप-प्रत्याक्षेपरूप दोष-कलङ्क को युक्तिपूर्वक खण्डन कर अपने सिद्धान्त को इसमें प्रमाण के साथ स्थिर किया गया है। जब कि ऐसा ही अर्थ गुरु, शास्त्र एवं अपने अनुभव ज्ञान के बल से सिद्ध होता है, ‘तदिति’ इसलिए इस प्रमेय संवेद्य में परामर्शपद की विश्रान्ति कराता हुआ अपने भुवनकर्तृत्वरूप परम ऐश्वर्य देख कर, जब दृढ़-निश्चय के साथ प्रत्यवमर्श करता है तब उस परामर्श मात्र से ही जीवन्मुक्त अवस्था में पहुँचता हुआ भगवान् शिवमय हो जाता है। शिवदृष्टि शास्त्र में श्री सोमानन्दपाद ने इसका उल्लेख किया है— प्रमाण, शास्त्र अथवा गुरु वाक्य से एक बार दृढ प्रतिपत्तिपूर्वक ज्ञान हो जाने पर कि यह सारा का सारा प्रपञ्चजाल शिवमय है—ऐसा दृढ बोध हो जाने से इन्द्रियों के द्वारा कोई कृत्य ही नहीं रह जाता है। जैसे सुवर्ण की परीक्षा में स्वर्ण सिद्ध हो जाता है तो फिर आगे घोसना, अग्नि में डाल कर तपाना आदि तमाम क्रियाएँ करनी नहीं रह जाती; माता-पिता के विषय में भली-भाँति बोध हो जाने पर उसे सिद्ध करने के लिए क्या दूसरे प्रमाणों की आवश्यकता समझी जाती है ? यह तो जन्मना सिद्ध है कि ये हमारे माता-पिता आदि स्वजन लोग हैं। प्रत्यभिज्ञाशास्त्रवाला बड़ा ही सरल मार्ग साधक के लिए पड़ेगा। स्फुटोपायमनायासमनारम्भं महाफलम् । श्रोतुमिच्छामि देवेश योगं योगविदां वर ॥ हे देवेश ! जो प्रत्यक्ष उपायवाला अनायास-सहज आरम्भ किया हुआ महाफल देता है। मैं योगवेत्ताओं के परम योग को सुनना चाहती हूँ। प्राणायामादिकैरङ्गैर्योगाः स्युः कृत्रिमायतः । तेन नाकृतकस्यास्य कलामर्हन्ति षोडशीम् ॥ क्योंकि प्राणायाम-ध्यान-धारणा इत्यादि, अष्टाङ्ग योग के द्वारा होनेवाले सभी योग कृत्रिम होते हैं। इसलिए इस परम शिवरूप अकृत्रिम योग की सोलहवीं कला को भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यद्यपि इसका उल्लेख रहस्य-आगमों में निरूपित किया गया है तथापि सुस्पष्टतया स्पष्टीकरण नहीं हुआ है किन्तु भीतर किये हुए के ही विषय में कहा गया है—‘गर्भः ख्यातिर्महामाया तत्र तदात्मके मितसिद्धिप्रपञ्चे यच्चित्तस्य विकासः तावन्मात्रे प्रपञ्चे संतोषः असावेव.........किञ्चिज्ज्ञ- त्वरूपा अशुद्धविद्या...............विकल्पात्मा क्रमः । शिव सूत्रवि० । समस्त योग सिद्धियाँ मायीय उपराजों से उपरञ्जित होने के कारण निम्न श्रेणी की और हेय

अ.-४, आ.-१, का.-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१५ इत्यादि । तां विभाव्य यद्यनिशमाविशति शरीरप्राणबुद्धिशून्येभ्योऽन्यतमं द्वयं सर्वं वा तत्रैव निमज्जयति, अनवरतं तत्तां तां विभूतिं परविभूतिपर्यन्तां लभते । ननु यद्यात्माख्यं वस्तु तदेव र्तार्ह तस्य प्रत्यभिज्ञानाप्रत्यभिज्ञानयोरविशेषः, नहि बीजमप्रत्यभिज्ञातं सति सहकारिसाकल्ये नाङ्कुरं जनयति, तत् क आत्मप्रत्यभिज्ञाने निर्बन्धः ?; उच्यते, —द्विविधार्थक्रियास्ति बाह्या चाङ्कुरादिका प्रमातृविश्रान्तिचमत्कारसारा च प्रीत्यादिरूपा, तत्राद्या सत्यं प्रत्यभिज्ञानं नापेक्षते, द्वितीया तु तदपेक्षते एव; इह च 'अहं महेश्वर' इत्येवंभूतचमत्कारसारा परापरसिद्धिलक्षणा जीवन्मुक्ति- विभूतियोगमर्थक्रिया, —इतीश्वरप्रत्यभिज्ञानमत्रावश्यापेक्षणीयम् ॥ १६ ॥ उस विश्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य को देख कर, जो निरन्तर उसमें समाहित या आविष्ट अपने आपको किया करता है, शरीर, प्राण, बुद्धि और शून्यादि से या इन्हीं में से किसी एक से, व दो से, अथवा सब से उस चिद्रूप में डूब जाता है, ऐसे योगी चिद्रूप में निरन्तर आविष्ट रहने के कारण उन-उन विभूति को प्राप्त करते हुए आत्म-विश्रान्तिरूप विभूति तक पहुँच जाते हैं । अब शङ्का होती है कि यदि आत्मा परम स्वातन्त्र्यरूप है तो उसका प्रत्यभिज्ञान करना और न करना, इसमें कोई अन्तर तो नहीं पड़नेवाला है जब कोई अन्तर ही नहीं पड़ना है तो व्यर्थ का प्रयास क्यों मोल लेगा ? बीज प्रत्यभिज्ञान न होने पर भी सहकारी साकल्य के साथ संयुक्त हो जाने से क्या अङ्कुर उत्पन्न नहीं करता है, तब फिर आत्मा के प्रत्यभिज्ञान करने में कौन सी रुकावट है ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं, —अर्थक्रिया दो प्रकार की होती है एक तो बाह्य, जो अङ्कुरादिरूप से रहती है और दूसरी प्रमातृ-विश्रान्तिरूप चमत्कार सारयुक्त प्रीत्यादि- रूप है । ठीक ही है, इसमें जो पहली अर्थक्रिया बाह्य है उसे तो प्रत्यभिज्ञान की अपेक्षा नहीं पड़ती है और प्रीत्यादिरूप आत्म-विश्रान्तिवाली जो द्वितीय अर्थक्रिया है उसे तो अपेक्षा रहती है; इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र में 'अहं महेश्वरः' मैं ही महेश्वर हूँ, यही आत्म-विश्रान्तिरूप, जीवन्मुक्ति देनेवाली अर्थक्रिया है—इसलिए इस में ईश्वर का प्रत्यभिज्ञान करना आवश्यक समझा जाता है ॥ १६ ॥ समझी जाती है । इसका स्वरूप प्रायः मूढ़लोगों में होनेवाली अल्पतारूप बुद्धि के समान ही रहता है बल्कि इससे बढ़-चढ़कर ही है । इसलिए ये सारी की सारी सिद्धियाँ अल्पकाल में सिद्ध होकर हस्तगत भी हो जाती हैं और बाजीगर की बाजी-मायाजाल के समान विनष्ट भी शीघ्र हो जाती हैं । ये अल्प फल देनेवाली सिद्धियाँ योगिजन को अपने स्वरूप प्राप्ति से बहुत दूर खींचकर ले जाती हैं तथा आत्मविश्रान्ति के मार्ग से विमुख कर देती हैं । न चैतदप्रसन्नेन शङ्करेणोपदिष्यते । कथञ्चिदुपलब्धेऽपि वासना न प्रजायते ॥ वासनामात्रालाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ॥ इस विषय में भगवान् शङ्कर कहते हैं कि अल्प भोगों में आसक्त-संसक्त अल्पज्ञ कभी तो प्रसन्नता के मारे फूल जाते हैं तो कभी-कभार शोकाग्नि में जल कर अपने मानस का संतुलन खो बैठते हैं ऐसे अल्पज्ञ कुछ मित-परिमित सिद्धियाँ अपने हस्तगत कर भी लेते हैं किन्तु वासना उत्तरोत्तर

३१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१७ ननु प्रमातृविश्रान्तिसारार्थक्रिया प्रत्यभिज्ञानेन विना न दृष्टा, सति तत्र दृष्टा,—इति कैतदुपलब्धम् ? इत्याशङ्क्याह— तैस्तैरप्युपयाचितैरुपनतस्तन्व्याः स्थितोऽप्यन्तिके कान्तो लोकसमान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा । लोकस्यैष तथानवेक्षितगुणः स्वात्मापि विश्वेश्वरो नैवालं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता ॥ १७ ॥ अब प्रश्न उठता है कि प्रमातृ-विश्रान्तिरूप अर्थक्रिया प्रत्यभिज्ञान के बिना नहीं देखी गयी है, किन्तु अमुक स्थल में प्रत्यभिज्ञा रहने पर भी देखी गयी है,—यह कहाँ पर देखी गयी है ? इस आशङ्का के उत्तर में कहते हैं— देवताओं की उन उन मनौतियों [ प्रार्थना ] करने से प्राप्त, तन्वी दमयन्ती के निकट में नल खड़ा भी है परन्तु यही नल है ऐसा दृढ-निश्चयात्मक ज्ञान न होने से अपने प्रियतम को जन साधारण के समान मान कर सन्तुष्टि नहीं प्राप्त कर सकी । उसी प्रकार यह अपना आत्मा स्वयं महेश्वर स्वरूप होता हुआ भी प्रत्यभिज्ञान न होने के कारण अपना निजी वैभव-ऐश्वर्य दिखाने के लिए समर्थ नहीं होता है, इसीलिए प्रत्यभिज्ञा दर्शन का निर्माण किया गया है ॥ १७ ॥

संस्कार बाहुल्य से बढती ही जाती है, इसके क्षय होने के लिए साधना का अभाव होने के कारण वासना जैस की तैस रह जाती है। इसलिए विनायक अर्थात् दिव्य योगभूमिकाओं की अध्यक्षा दिव्य- शक्तियाँ होती हैं ये सभी सिद्धियाँ योगी के लिए बड़ा ही दुःखदायी परिणाम लाकर खड़ा कर देती हैं अर्थात् योगिजनों को पथभ्रष्ट करने के लिए प्रतिक्षण उद्यत रहती हैं । पातञ्जल योग का भी ठीक यही कहना है । ये दिव्यशक्तियाँ ऋतम्भरा प्रज्ञा से संयुक्त कर, योगी की अन्तःकरण विशुद्धि को देख कर सांसारिक भोगों में फसाने का प्रलोभन देती रहती हैं— हे आयुष्मान् ! ये सारे के सारे भोग्य-पदार्थ आपकी दिव्य साधना से उपलब्ध हो रहे हैं । ये सुर सी सुन्दरियाँ तथा संसार-सौरभ को बिखेरनेवाली सुन्दरतायें तुम्हें चाह रही हैं । ये आपके अङ्ग-प्रत्यङ्ग दिव्य आभा से झलक रहे हैं । ये जीर्णता एवं जरावस्था को दूर करनेवाले सुधारस स्वर्णपात्र में भरे पड़े हैं । अतः इसको स्वीकार किया जाय । योगी ने कहीं थोड़ी भी असावधानता रखी तो अपने पथ से च्युत हो गया एवं आत्मविश्रान्ति से विमुख हो गया समझो । क्योंकि 'प्रसह्यो चञ्चलीत्येव योगिनामपि यन्मनः । [ स्व० तं०, ] इसलिए महान् पुरुषों ने जिज्ञासु साधकों को सावधान करने के आशय से अनेक बार इस बात को दोहराया है— यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतश्च तु ॥ जिस साधक का भाव चारों ओर से पूर्ण एवं स्थिर ज्ञेयमय हो चुका है वह कनक-कामिनी जैसे भोग विषय भी छोड़ देता है । वह फिर किसी भी अवस्था-विशेष में पड़े रहे किन्तु उसका मन डोलता नहीं है ।

अ.-४, आ.-१, का.-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१७ यदा नायकगुणसंश्रवणप्रवृद्धानुरागा कामिनी तद्दर्शनमेव परमुपादेयमाकाङ्क्षन्ती दिवा- निशमवशहृदया देवतोपयाचितानि दूतीसंप्रेषणानि मदनलेखकद्वारात्मावस्थानिवेदनानि कुर्वाणा विरहक्षामीभवद्गात्रलतिका तिष्ठति, तदा तदुपयाचितवशादशङ्कितमेव सविधवर्तिनि प्रियतमेऽव- लोकिते तैस्तैरुत्कर्षविशेषैः परामर्शपदवीमगच्छद्दुर्जनसाधारणतामापादिते संपन्नमपि तत्प्रियत- मावलोकनं न हृदयं पूर्णीकरोति; तथा स्वात्मनि विश्वेश्वरे सततं निर्भासमानेऽपि तन्निर्भासनं न हृदयस्य पूर्णतामाधत्ते; यतः सोऽप्यात्मा विश्वज्ञत्वकर्तृत्वाद्यप्रतिहतस्वशक्तिलक्षणपारमेश्वर्योत्कर्ष- योगेन न परामृष्टः, — इति भासमानघटादितुल्यवृत्तान्तो जातः । यदा तु दूतीवचनाद्वा तल्लक्षणा- भिज्ञानाद्वोपायान्तराद्वा तानुत्कर्षान् हृदयङ्गमीकरणेनामृशति, तदा तत्क्षणमद्भुतफुल्लन्यायेनैव तावात् कामपि पूर्णतामभ्येति, परिभोगाभ्यासरसे तु विश्रान्त्यन्तराण्यपि लभते; तद्वदात्मनि गुरुवचनाज्ज्ञानक्रियालक्षणशक्त्याभिज्ञानादेवा यदा पारमेश्वर्योत्कर्षहृदयङ्गमीभावो जायते, तदा तत्क्षणमेव पूर्णतात्मिका जीवन्मुक्तिः, समावेशाभ्यासरसे तु विभूतिलाभः, — इति तस्य प्रत्यभिज्ञैव परापरसिद्धिप्रदायिनी भवति ॥ १७ ॥

जिसका नायक के पराक्रम-शौर्यादि, गुण-गरिमा को सुनने मात्र से ही गाढ अनुराग-प्रेम बढ गया है कामिनी दमयन्ती उस नल के दर्शन करने की हृदय में अत्यधिक अभिलाषा रखती हुई, अहोरात्र उसकी प्राप्ति के विचार में डूब जाने के कारण अपने आपको भूल चुकी है। देवताओं से याचनायें करना, दूती के द्वारा अपने अनुराग राग में उपरञ्जित होने का प्रेम-पत्र भेजना और स्वप्न व एकान्त में नल का ही दृश्य देखना इत्यादि करती हुई विरह में शुष्क लता सी शरीरवाली होकर खड़ी है तो खड़ी ही रह जाती है एवं बैठी है तो बैठी हुई ही रह जाती है, तब कहीं उसकी याचना के कारण निःशंक ही प्राप्त नल समीप में खड़ा होता हुआ, अपने प्रियतम को देख लेने पर भी उन उन उत्कर्ष विशेषों के द्वारा परामर्शपदवी तक पहुँच जाती है, तो भी नल को साधारण मनुष्य के रूप में देखती है जिससे अपने प्रियतम का अनुराग हृदय में नहीं प्राप्त कर सकती है; उसी प्रकार विश्वेश्वर परम शिव अपने आत्मा में निरन्तर पूर्णरूप से निर्भासित होने पर भी उसका आभासित होना हृदय की पूर्णता को आप्लावित नहीं करता है; क्योंकि विश्वज्ञातृत्व, कर्तृत्व आदि, अप्रतिहत अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति- रूप पारमेश्वर्य के उत्कर्ष सम्बन्ध से युक्त अपने आपको परामृष्ट नहीं करता है; इसीलिए प्रकाशित होनेवाले घटादि जड-पदार्थ के समान ही हो जाता है, जब तो दूती वचन से, अथवा उसके लक्षणज्ञान से और दूसरे उपाय से उन उत्कर्षों को हृदयङ्गमीकरण करती हुई परामृष्ट करती है, तब तो उसी क्षण 'अद्भुतफुल्ल' न्याय से सहसा हृदय में आंशिक पूर्णता प्राप्त कर लेती है, परन्तु परिभोग अवस्था की एक रसता में तो भिन्न ही विश्रान्ति उपलब्ध होती है; उसी प्रकार अपने आत्मा में गुरुजनों के उपदेशों से अथवा ज्ञान-क्रियारूप शक्ति के अभिज्ञानों से परमेश्वर सम्बन्धी समस्त उत्कर्ष का भाव हृदयङ्गम हो जाता है, तब तो उसी क्षण पूर्णरूप से जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है, समावेश अर्थात् समाधि अवस्था के एक रसभाव में डूब जाने पर तो परम विभूति की प्राप्ति हो जाती है, जिससे उस योगी के लिए प्रत्यभिज्ञा अमित-आध्यात्मिक और सांसारिक परिमित सिद्धियाँ देनेवाली हो जाती है ॥ १७॥

३१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१८ सर्वोपकारकं महाफलमिदं शास्त्रं प्रसिद्धान्वययोगेन नामधेयप्रसिद्ध्या च तदुत्कर्षस्मरण- द्वारजनितसंभावनाप्रत्ययलक्षणप्रवर्तकसंवेदनया जनं प्रवर्तयितुं पितुर्नाम्ना चोपसंहारं दर्शयति— जनस्यायत्नसिद्धयर्थमुदयाकरसूनुना । ईश्वरप्रत्यभिज्ञेयमुत्पलेनोपपादिता ॥ १८ ॥ यस्य कस्यचिज्जन्तोरिति नात्र जात्याद्यपेक्षा काचित्,—इति सर्वोपकारित्वमुक्तम् । अय- त्नेन सिद्धिः परापररूपा यथा स्यात्,—इति महाफलत्वम् । उदयाकरपुत्रः श्रीमानुत्पलदेवोऽस्मत्प- रमगुरुरिदं शास्त्रमकार्षीत्,—इति तत्प्रसिद्ध्या जनः प्रवर्तते,—इति प्रवर्तनाद्वारेण सोऽनुगृहीतो भवति,—इत्युभयनामनिर्देशः । इयमिति हृदयङ्गमत्तामुपपत्तिशतैरानीता,—इति शिवम् ॥ १८ ॥ आदितः १९० ॥ एषाभिनवगुप्तेन सूत्रार्थप्रविमर्शिनी । रचिता प्रत्यभिज्ञायां लघ्वी वृत्तिरभङ्गुरा ॥ १ ॥ वाक्यप्रमाणपदतत्त्वसदागमार्थाः स्वात्मोपयोगमुपधान्त्यमुतः स्वशास्त्रात् । यह ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र जीवन में सब प्रकार से उपकार करनेवाला है तथा महाफल अर्थात् अमरफल देनेवाला है, कुल [ वंश ] के सम्बन्ध से प्रसिद्ध एवं नाम की प्रसिद्धि से, उसका उत्कर्ष स्मरण के द्वारा उत्पन्न हुआ ज्ञान लक्षण के प्रवर्तक संवेदन-ज्ञान से लोगों को प्रवृत्त करने के लिए पिता के नाम से उपसंहार दिखाते हैं— श्री उदयाकर के पुत्र उत्पलदेव ने इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की रचना की । लोगों को बिना अथक यत्न किये ही अर्थात् बिना प्राणायाम इत्यादि दुःसह क्लेशों के सहे 'मैं महेश्वर हूँ' जो इस बोध से ही स्वरूप को समझ लेता है ॥ १८ ॥ इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र का अध्ययन कोई भी व्यक्ति कर सकता है चाहे वह किसी भी जाति और समाज अथवा देश-विशेष का हो । जिज्ञासु व्यक्ति ही इसका सचमुच अधिकारी माना जाता है । जाति विशेष में उत्पन्न व्यक्ति विशेष का कोई इसमें आग्रह नहीं है कि यही इसका अध्ययन कर सकता है, इसलिए जीवन में सब तरह से उपयोगी यह शास्त्र है—ऐसा कहा गया है । बिना प्रयत्न विशेष किये ही भौतिक एवं आध्यात्मिक ऐश्वर्य [ जिसका शास्त्रों में उल्लेख दिया है ] जिज्ञासु व्यक्ति प्राप्त कर लेता है, यही महाफल है । श्री उदयाकर के पुत्र श्रीमान् उत्पलदेव हमारे [ अभिनवगुप्त आदि सभी के] परमगुरु ने इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र [अपूर्व ज्ञाप- कत्वं शास्त्रत्वं नाम ] का निर्माण किया है, इसलिए उनकी प्रसिद्धि से ही लोगों का झुकाव इसके प्रति स्वाभाविक होगा, इसके अध्ययन की प्रवृत्ति के द्वारा उस जिज्ञासु व्यक्ति में शिव का अनुग्रह अर्थात् शक्तिपात हो जाता है, इसी कारण दोनों के नामों का उल्लेख किया है । 'इयमिति' यह जो कारिका में दिया है, इससे यह द्योतित होता है कि इस प्रत्यभिज्ञा को सैकड़ों उपपत्तियों से हृदय पट तक लाने का प्रयत्न किया गया है ॥ १८ ॥ अभिनवगुप्त ने [ श्री उत्पलदेव प्रणीत ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ऊपर अबृहत् एवं अखण्डित सूत्रार्थ विमर्शिनी टीका का निर्माण किया है ॥ १ ॥ मीमांसा-वाक्य, न्यायादि-प्रमाण, व्याकरण सम्बन्धी पद-पदार्थ तथा सत् = परमार्थरूप

अ.-४, आ.-१, का.-१८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१९ भौमान्रसाञ्जलमयांश्च न सस्यपुष्टौ मुक्त्वाकमेकमिह योजयितुं क्षमोऽन्यः ॥ २ ॥ आत्मानमनभिज्ञाय विवेक्तुं योऽन्यदिच्छति । तेन भौतेन किं वाच्यं प्रश्नेऽस्मिन्को भवानिति ॥ ३ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितविमर्शिन्याख्यटीको- पेतायां तत्त्वसंग्रहाधिकारे गुरुपर्वक्रमाख्यं प्रथमाह्निकम् ॥ १ ॥ आगमशास्त्रों से सम्बन्ध रखनेवाले जितने भी अर्थ हैं वे सब के सब हमारे शैवाद्वैत शास्त्र में उपयोगी सिद्ध होते हैं । भूमिगत एवं जलमय धान्यादिकों के लिए रसवर्धक एक सूर्य को छोड़कर अन्य कौन समर्थ है अर्थात् दूसरा कोई भी नहीं हो सकता है ।। २ ।। जो अपने आपके लिए अनभिज्ञ है वह यदि दूसरों को समझाने की इच्छा करता है तो उस मूढ को पूछना चाहिए कि आप स्वयं कौन हो ? जो कि दूसरों के लिए विवेचन करने चल पड़े हो ।। ३ ।। प्रथम आह्निक समाप्त इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता चतुर्थतत्त्वसंग्रहाधिकारहिन्दीव्याख्या शिवरञ्जनी इति चतुर्थः तत्त्वसंग्रहाधिकारः समाप्तः ग्रन्थोऽयं समाप्तिमगात्

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