ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१६ स एवात्र प्रकटतां परवादकलङ्कशङ्कापसारेण नीतः, यत एवं शास्त्रगुरुस्वप्रत्ययसिद्धोऽयमर्थः, तदिति तस्मादत्र प्रमेये पदं परामर्शं विश्रमयन् विश्वकर्तृत्वलक्षणमैश्वर्यमात्मनो विभाव्य दार्ढ्येन यदा परामृशति तर्हि तत्परामर्शमात्रादेव तावज्जीवन्मुक्तो भगवाञ्छिव एव। यथोक्तं परमेष्ठिपादैः — ‘ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना । करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयाऽपि वा ॥ सकृज्ज्ञाते सुवर्णे किं भावनाकरणादिना । सर्वथा पितृमात्रादितुल्यदार्ढ्येन सत्यता ॥’ (शि. दृ.) हिताय’ बताया है, वही इस प्रत्यभिज्ञा में लाया गया है जो कि प्रतिवादी के द्वारा दिये गये आक्षेप-प्रत्याक्षेपरूप दोष-कलङ्क को युक्तिपूर्वक खण्डन कर अपने सिद्धान्त को इसमें प्रमाण के साथ स्थिर किया गया है। जब कि ऐसा ही अर्थ गुरु, शास्त्र एवं अपने अनुभव ज्ञान के बल से सिद्ध होता है, ‘तदिति’ इसलिए इस प्रमेय संवेद्य में परामर्शपद की विश्रान्ति कराता हुआ अपने भुवनकर्तृत्वरूप परम ऐश्वर्य देख कर, जब दृढ़-निश्चय के साथ प्रत्यवमर्श करता है तब उस परामर्श मात्र से ही जीवन्मुक्त अवस्था में पहुँचता हुआ भगवान् शिवमय हो जाता है। शिवदृष्टि शास्त्र में श्री सोमानन्दपाद ने इसका उल्लेख किया है— प्रमाण, शास्त्र अथवा गुरु वाक्य से एक बार दृढ प्रतिपत्तिपूर्वक ज्ञान हो जाने पर कि यह सारा का सारा प्रपञ्चजाल शिवमय है—ऐसा दृढ बोध हो जाने से इन्द्रियों के द्वारा कोई कृत्य ही नहीं रह जाता है। जैसे सुवर्ण की परीक्षा में स्वर्ण सिद्ध हो जाता है तो फिर आगे घोसना, अग्नि में डाल कर तपाना आदि तमाम क्रियाएँ करनी नहीं रह जाती; माता-पिता के विषय में भली-भाँति बोध हो जाने पर उसे सिद्ध करने के लिए क्या दूसरे प्रमाणों की आवश्यकता समझी जाती है ? यह तो जन्मना सिद्ध है कि ये हमारे माता-पिता आदि स्वजन लोग हैं। प्रत्यभिज्ञाशास्त्रवाला बड़ा ही सरल मार्ग साधक के लिए पड़ेगा। स्फुटोपायमनायासमनारम्भं महाफलम् । श्रोतुमिच्छामि देवेश योगं योगविदां वर ॥ हे देवेश ! जो प्रत्यक्ष उपायवाला अनायास-सहज आरम्भ किया हुआ महाफल देता है। मैं योगवेत्ताओं के परम योग को सुनना चाहती हूँ। प्राणायामादिकैरङ्गैर्योगाः स्युः कृत्रिमायतः । तेन नाकृतकस्यास्य कलामर्हन्ति षोडशीम् ॥ क्योंकि प्राणायाम-ध्यान-धारणा इत्यादि, अष्टाङ्ग योग के द्वारा होनेवाले सभी योग कृत्रिम होते हैं। इसलिए इस परम शिवरूप अकृत्रिम योग की सोलहवीं कला को भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यद्यपि इसका उल्लेख रहस्य-आगमों में निरूपित किया गया है तथापि सुस्पष्टतया स्पष्टीकरण नहीं हुआ है किन्तु भीतर किये हुए के ही विषय में कहा गया है—‘गर्भः ख्यातिर्महामाया तत्र तदात्मके मितसिद्धिप्रपञ्चे यच्चित्तस्य विकासः तावन्मात्रे प्रपञ्चे संतोषः असावेव.........किञ्चिज्ज्ञ- त्वरूपा अशुद्धविद्या...............विकल्पात्मा क्रमः । शिव सूत्रवि० । समस्त योग सिद्धियाँ मायीय उपराजों से उपरञ्जित होने के कारण निम्न श्रेणी की और हेय