भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-४, आ.-१, का.-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१५ इत्यादि । तां विभाव्य यद्यनिशमाविशति शरीरप्राणबुद्धिशून्येभ्योऽन्यतमं द्वयं सर्वं वा तत्रैव निमज्जयति, अनवरतं तत्तां तां विभूतिं परविभूतिपर्यन्तां लभते । ननु यद्यात्माख्यं वस्तु तदेव र्तार्ह तस्य प्रत्यभिज्ञानाप्रत्यभिज्ञानयोरविशेषः, नहि बीजमप्रत्यभिज्ञातं सति सहकारिसाकल्ये नाङ्कुरं जनयति, तत् क आत्मप्रत्यभिज्ञाने निर्बन्धः ?; उच्यते, —द्विविधार्थक्रियास्ति बाह्या चाङ्कुरादिका प्रमातृविश्रान्तिचमत्कारसारा च प्रीत्यादिरूपा, तत्राद्या सत्यं प्रत्यभिज्ञानं नापेक्षते, द्वितीया तु तदपेक्षते एव; इह च 'अहं महेश्वर' इत्येवंभूतचमत्कारसारा परापरसिद्धिलक्षणा जीवन्मुक्ति- विभूतियोगमर्थक्रिया, —इतीश्वरप्रत्यभिज्ञानमत्रावश्यापेक्षणीयम् ॥ १६ ॥ उस विश्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य को देख कर, जो निरन्तर उसमें समाहित या आविष्ट अपने आपको किया करता है, शरीर, प्राण, बुद्धि और शून्यादि से या इन्हीं में से किसी एक से, व दो से, अथवा सब से उस चिद्रूप में डूब जाता है, ऐसे योगी चिद्रूप में निरन्तर आविष्ट रहने के कारण उन-उन विभूति को प्राप्त करते हुए आत्म-विश्रान्तिरूप विभूति तक पहुँच जाते हैं । अब शङ्का होती है कि यदि आत्मा परम स्वातन्त्र्यरूप है तो उसका प्रत्यभिज्ञान करना और न करना, इसमें कोई अन्तर तो नहीं पड़नेवाला है जब कोई अन्तर ही नहीं पड़ना है तो व्यर्थ का प्रयास क्यों मोल लेगा ? बीज प्रत्यभिज्ञान न होने पर भी सहकारी साकल्य के साथ संयुक्त हो जाने से क्या अङ्कुर उत्पन्न नहीं करता है, तब फिर आत्मा के प्रत्यभिज्ञान करने में कौन सी रुकावट है ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं, —अर्थक्रिया दो प्रकार की होती है एक तो बाह्य, जो अङ्कुरादिरूप से रहती है और दूसरी प्रमातृ-विश्रान्तिरूप चमत्कार सारयुक्त प्रीत्यादि- रूप है । ठीक ही है, इसमें जो पहली अर्थक्रिया बाह्य है उसे तो प्रत्यभिज्ञान की अपेक्षा नहीं पड़ती है और प्रीत्यादिरूप आत्म-विश्रान्तिवाली जो द्वितीय अर्थक्रिया है उसे तो अपेक्षा रहती है; इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र में 'अहं महेश्वरः' मैं ही महेश्वर हूँ, यही आत्म-विश्रान्तिरूप, जीवन्मुक्ति देनेवाली अर्थक्रिया है—इसलिए इस में ईश्वर का प्रत्यभिज्ञान करना आवश्यक समझा जाता है ॥ १६ ॥ समझी जाती है । इसका स्वरूप प्रायः मूढ़लोगों में होनेवाली अल्पतारूप बुद्धि के समान ही रहता है बल्कि इससे बढ़-चढ़कर ही है । इसलिए ये सारी की सारी सिद्धियाँ अल्पकाल में सिद्ध होकर हस्तगत भी हो जाती हैं और बाजीगर की बाजी-मायाजाल के समान विनष्ट भी शीघ्र हो जाती हैं । ये अल्प फल देनेवाली सिद्धियाँ योगिजन को अपने स्वरूप प्राप्ति से बहुत दूर खींचकर ले जाती हैं तथा आत्मविश्रान्ति के मार्ग से विमुख कर देती हैं । न चैतदप्रसन्नेन शङ्करेणोपदिष्यते । कथञ्चिदुपलब्धेऽपि वासना न प्रजायते ॥ वासनामात्रालाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ॥ इस विषय में भगवान् शङ्कर कहते हैं कि अल्प भोगों में आसक्त-संसक्त अल्पज्ञ कभी तो प्रसन्नता के मारे फूल जाते हैं तो कभी-कभार शोकाग्नि में जल कर अपने मानस का संतुलन खो बैठते हैं ऐसे अल्पज्ञ कुछ मित-परिमित सिद्धियाँ अपने हस्तगत कर भी लेते हैं किन्तु वासना उत्तरोत्तर