ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 339, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें३१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१७ ननु प्रमातृविश्रान्तिसारार्थक्रिया प्रत्यभिज्ञानेन विना न दृष्टा, सति तत्र दृष्टा,—इति कैतदुपलब्धम् ? इत्याशङ्क्याह— तैस्तैरप्युपयाचितैरुपनतस्तन्व्याः स्थितोऽप्यन्तिके कान्तो लोकसमान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा । लोकस्यैष तथानवेक्षितगुणः स्वात्मापि विश्वेश्वरो नैवालं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता ॥ १७ ॥ अब प्रश्न उठता है कि प्रमातृ-विश्रान्तिरूप अर्थक्रिया प्रत्यभिज्ञान के बिना नहीं देखी गयी है, किन्तु अमुक स्थल में प्रत्यभिज्ञा रहने पर भी देखी गयी है,—यह कहाँ पर देखी गयी है ? इस आशङ्का के उत्तर में कहते हैं— देवताओं की उन उन मनौतियों [ प्रार्थना ] करने से प्राप्त, तन्वी दमयन्ती के निकट में नल खड़ा भी है परन्तु यही नल है ऐसा दृढ-निश्चयात्मक ज्ञान न होने से अपने प्रियतम को जन साधारण के समान मान कर सन्तुष्टि नहीं प्राप्त कर सकी । उसी प्रकार यह अपना आत्मा स्वयं महेश्वर स्वरूप होता हुआ भी प्रत्यभिज्ञान न होने के कारण अपना निजी वैभव-ऐश्वर्य दिखाने के लिए समर्थ नहीं होता है, इसीलिए प्रत्यभिज्ञा दर्शन का निर्माण किया गया है ॥ १७ ॥
संस्कार बाहुल्य से बढती ही जाती है, इसके क्षय होने के लिए साधना का अभाव होने के कारण वासना जैस की तैस रह जाती है। इसलिए विनायक अर्थात् दिव्य योगभूमिकाओं की अध्यक्षा दिव्य- शक्तियाँ होती हैं ये सभी सिद्धियाँ योगी के लिए बड़ा ही दुःखदायी परिणाम लाकर खड़ा कर देती हैं अर्थात् योगिजनों को पथभ्रष्ट करने के लिए प्रतिक्षण उद्यत रहती हैं । पातञ्जल योग का भी ठीक यही कहना है । ये दिव्यशक्तियाँ ऋतम्भरा प्रज्ञा से संयुक्त कर, योगी की अन्तःकरण विशुद्धि को देख कर सांसारिक भोगों में फसाने का प्रलोभन देती रहती हैं— हे आयुष्मान् ! ये सारे के सारे भोग्य-पदार्थ आपकी दिव्य साधना से उपलब्ध हो रहे हैं । ये सुर सी सुन्दरियाँ तथा संसार-सौरभ को बिखेरनेवाली सुन्दरतायें तुम्हें चाह रही हैं । ये आपके अङ्ग-प्रत्यङ्ग दिव्य आभा से झलक रहे हैं । ये जीर्णता एवं जरावस्था को दूर करनेवाले सुधारस स्वर्णपात्र में भरे पड़े हैं । अतः इसको स्वीकार किया जाय । योगी ने कहीं थोड़ी भी असावधानता रखी तो अपने पथ से च्युत हो गया एवं आत्मविश्रान्ति से विमुख हो गया समझो । क्योंकि 'प्रसह्यो चञ्चलीत्येव योगिनामपि यन्मनः । [ स्व० तं०, ] इसलिए महान् पुरुषों ने जिज्ञासु साधकों को सावधान करने के आशय से अनेक बार इस बात को दोहराया है— यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतश्च तु ॥ जिस साधक का भाव चारों ओर से पूर्ण एवं स्थिर ज्ञेयमय हो चुका है वह कनक-कामिनी जैसे भोग विषय भी छोड़ देता है । वह फिर किसी भी अवस्था-विशेष में पड़े रहे किन्तु उसका मन डोलता नहीं है ।