ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-४, आ.-१, का.-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१७ यदा नायकगुणसंश्रवणप्रवृद्धानुरागा कामिनी तद्दर्शनमेव परमुपादेयमाकाङ्क्षन्ती दिवा- निशमवशहृदया देवतोपयाचितानि दूतीसंप्रेषणानि मदनलेखकद्वारात्मावस्थानिवेदनानि कुर्वाणा विरहक्षामीभवद्गात्रलतिका तिष्ठति, तदा तदुपयाचितवशादशङ्कितमेव सविधवर्तिनि प्रियतमेऽव- लोकिते तैस्तैरुत्कर्षविशेषैः परामर्शपदवीमगच्छद्दुर्जनसाधारणतामापादिते संपन्नमपि तत्प्रियत- मावलोकनं न हृदयं पूर्णीकरोति; तथा स्वात्मनि विश्वेश्वरे सततं निर्भासमानेऽपि तन्निर्भासनं न हृदयस्य पूर्णतामाधत्ते; यतः सोऽप्यात्मा विश्वज्ञत्वकर्तृत्वाद्यप्रतिहतस्वशक्तिलक्षणपारमेश्वर्योत्कर्ष- योगेन न परामृष्टः, — इति भासमानघटादितुल्यवृत्तान्तो जातः । यदा तु दूतीवचनाद्वा तल्लक्षणा- भिज्ञानाद्वोपायान्तराद्वा तानुत्कर्षान् हृदयङ्गमीकरणेनामृशति, तदा तत्क्षणमद्भुतफुल्लन्यायेनैव तावात् कामपि पूर्णतामभ्येति, परिभोगाभ्यासरसे तु विश्रान्त्यन्तराण्यपि लभते; तद्वदात्मनि गुरुवचनाज्ज्ञानक्रियालक्षणशक्त्याभिज्ञानादेवा यदा पारमेश्वर्योत्कर्षहृदयङ्गमीभावो जायते, तदा तत्क्षणमेव पूर्णतात्मिका जीवन्मुक्तिः, समावेशाभ्यासरसे तु विभूतिलाभः, — इति तस्य प्रत्यभिज्ञैव परापरसिद्धिप्रदायिनी भवति ॥ १७ ॥
जिसका नायक के पराक्रम-शौर्यादि, गुण-गरिमा को सुनने मात्र से ही गाढ अनुराग-प्रेम बढ गया है कामिनी दमयन्ती उस नल के दर्शन करने की हृदय में अत्यधिक अभिलाषा रखती हुई, अहोरात्र उसकी प्राप्ति के विचार में डूब जाने के कारण अपने आपको भूल चुकी है। देवताओं से याचनायें करना, दूती के द्वारा अपने अनुराग राग में उपरञ्जित होने का प्रेम-पत्र भेजना और स्वप्न व एकान्त में नल का ही दृश्य देखना इत्यादि करती हुई विरह में शुष्क लता सी शरीरवाली होकर खड़ी है तो खड़ी ही रह जाती है एवं बैठी है तो बैठी हुई ही रह जाती है, तब कहीं उसकी याचना के कारण निःशंक ही प्राप्त नल समीप में खड़ा होता हुआ, अपने प्रियतम को देख लेने पर भी उन उन उत्कर्ष विशेषों के द्वारा परामर्शपदवी तक पहुँच जाती है, तो भी नल को साधारण मनुष्य के रूप में देखती है जिससे अपने प्रियतम का अनुराग हृदय में नहीं प्राप्त कर सकती है; उसी प्रकार विश्वेश्वर परम शिव अपने आत्मा में निरन्तर पूर्णरूप से निर्भासित होने पर भी उसका आभासित होना हृदय की पूर्णता को आप्लावित नहीं करता है; क्योंकि विश्वज्ञातृत्व, कर्तृत्व आदि, अप्रतिहत अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति- रूप पारमेश्वर्य के उत्कर्ष सम्बन्ध से युक्त अपने आपको परामृष्ट नहीं करता है; इसीलिए प्रकाशित होनेवाले घटादि जड-पदार्थ के समान ही हो जाता है, जब तो दूती वचन से, अथवा उसके लक्षणज्ञान से और दूसरे उपाय से उन उत्कर्षों को हृदयङ्गमीकरण करती हुई परामृष्ट करती है, तब तो उसी क्षण 'अद्भुतफुल्ल' न्याय से सहसा हृदय में आंशिक पूर्णता प्राप्त कर लेती है, परन्तु परिभोग अवस्था की एक रसता में तो भिन्न ही विश्रान्ति उपलब्ध होती है; उसी प्रकार अपने आत्मा में गुरुजनों के उपदेशों से अथवा ज्ञान-क्रियारूप शक्ति के अभिज्ञानों से परमेश्वर सम्बन्धी समस्त उत्कर्ष का भाव हृदयङ्गम हो जाता है, तब तो उसी क्षण पूर्णरूप से जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है, समावेश अर्थात् समाधि अवस्था के एक रसभाव में डूब जाने पर तो परम विभूति की प्राप्ति हो जाती है, जिससे उस योगी के लिए प्रत्यभिज्ञा अमित-आध्यात्मिक और सांसारिक परिमित सिद्धियाँ देनेवाली हो जाती है ॥ १७॥