भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 341

३१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१८ सर्वोपकारकं महाफलमिदं शास्त्रं प्रसिद्धान्वययोगेन नामधेयप्रसिद्ध्या च तदुत्कर्षस्मरण- द्वारजनितसंभावनाप्रत्ययलक्षणप्रवर्तकसंवेदनया जनं प्रवर्तयितुं पितुर्नाम्ना चोपसंहारं दर्शयति— जनस्यायत्नसिद्धयर्थमुदयाकरसूनुना । ईश्वरप्रत्यभिज्ञेयमुत्पलेनोपपादिता ॥ १८ ॥ यस्य कस्यचिज्जन्तोरिति नात्र जात्याद्यपेक्षा काचित्,—इति सर्वोपकारित्वमुक्तम् । अय- त्नेन सिद्धिः परापररूपा यथा स्यात्,—इति महाफलत्वम् । उदयाकरपुत्रः श्रीमानुत्पलदेवोऽस्मत्प- रमगुरुरिदं शास्त्रमकार्षीत्,—इति तत्प्रसिद्ध्या जनः प्रवर्तते,—इति प्रवर्तनाद्वारेण सोऽनुगृहीतो भवति,—इत्युभयनामनिर्देशः । इयमिति हृदयङ्गमत्तामुपपत्तिशतैरानीता,—इति शिवम् ॥ १८ ॥ आदितः १९० ॥ एषाभिनवगुप्तेन सूत्रार्थप्रविमर्शिनी । रचिता प्रत्यभिज्ञायां लघ्वी वृत्तिरभङ्गुरा ॥ १ ॥ वाक्यप्रमाणपदतत्त्वसदागमार्थाः स्वात्मोपयोगमुपधान्त्यमुतः स्वशास्त्रात् । यह ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र जीवन में सब प्रकार से उपकार करनेवाला है तथा महाफल अर्थात् अमरफल देनेवाला है, कुल [ वंश ] के सम्बन्ध से प्रसिद्ध एवं नाम की प्रसिद्धि से, उसका उत्कर्ष स्मरण के द्वारा उत्पन्न हुआ ज्ञान लक्षण के प्रवर्तक संवेदन-ज्ञान से लोगों को प्रवृत्त करने के लिए पिता के नाम से उपसंहार दिखाते हैं— श्री उदयाकर के पुत्र उत्पलदेव ने इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की रचना की । लोगों को बिना अथक यत्न किये ही अर्थात् बिना प्राणायाम इत्यादि दुःसह क्लेशों के सहे 'मैं महेश्वर हूँ' जो इस बोध से ही स्वरूप को समझ लेता है ॥ १८ ॥ इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र का अध्ययन कोई भी व्यक्ति कर सकता है चाहे वह किसी भी जाति और समाज अथवा देश-विशेष का हो । जिज्ञासु व्यक्ति ही इसका सचमुच अधिकारी माना जाता है । जाति विशेष में उत्पन्न व्यक्ति विशेष का कोई इसमें आग्रह नहीं है कि यही इसका अध्ययन कर सकता है, इसलिए जीवन में सब तरह से उपयोगी यह शास्त्र है—ऐसा कहा गया है । बिना प्रयत्न विशेष किये ही भौतिक एवं आध्यात्मिक ऐश्वर्य [ जिसका शास्त्रों में उल्लेख दिया है ] जिज्ञासु व्यक्ति प्राप्त कर लेता है, यही महाफल है । श्री उदयाकर के पुत्र श्रीमान् उत्पलदेव हमारे [ अभिनवगुप्त आदि सभी के] परमगुरु ने इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र [अपूर्व ज्ञाप- कत्वं शास्त्रत्वं नाम ] का निर्माण किया है, इसलिए उनकी प्रसिद्धि से ही लोगों का झुकाव इसके प्रति स्वाभाविक होगा, इसके अध्ययन की प्रवृत्ति के द्वारा उस जिज्ञासु व्यक्ति में शिव का अनुग्रह अर्थात् शक्तिपात हो जाता है, इसी कारण दोनों के नामों का उल्लेख किया है । 'इयमिति' यह जो कारिका में दिया है, इससे यह द्योतित होता है कि इस प्रत्यभिज्ञा को सैकड़ों उपपत्तियों से हृदय पट तक लाने का प्रयत्न किया गया है ॥ १८ ॥ अभिनवगुप्त ने [ श्री उत्पलदेव प्रणीत ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ऊपर अबृहत् एवं अखण्डित सूत्रार्थ विमर्शिनी टीका का निर्माण किया है ॥ १ ॥ मीमांसा-वाक्य, न्यायादि-प्रमाण, व्याकरण सम्बन्धी पद-पदार्थ तथा सत् = परमार्थरूप