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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

२९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१८ यावच्चानुवृत्तिस्थैर्यं निश्चयस्य चकास्ति, तावज्जागरः। तन्मध्य एव च निश्चयानुवृत्तिनिर्मूलनात् स्वप्नः,—इत्यवभाससारत्वात् वस्तूनां; स्वप्नेऽपि दीर्घे यत्र स्वप्नान्तरं, स तदपेक्षया जाग्रदेव; जाग्रदभिमतमपि वा दीर्घदीर्घं कालान्तरे निश्चयानुवृत्तिनिरोधाज्जाग्रदन्तरापेक्षया स्वप्न एवेति मन्तव्यम् ॥ १६-१७ ॥ आसां तिसृणां हेयत्वप्रदर्शनेन तुर्यावस्थातः प्रभृत्युपादेयत्वं सूचयति— हेया त्रयीयं प्राणादेः प्राधान्यात्कर्तृतागुणे । तद्धानोपचयप्रायसुखदुःखादियोगतः ॥ १८ ॥ यत्रायं प्रमाता त्यागोपादानतदिच्छाप्रयत्नादिकं परिक्लेशं पश्यति, तदेवास्य हेयतया भाति । स चास्य सुखदुःखयोगवैचित्र्येणैव कृतः, तच्चैतदवस्थात्रये संभवति; यतः कर्तृतारूपं स्वात्मविश्रान्त्यानन्योन्योन्मुख्यलक्षणमानन्दैकघनं यच्चिन्मयं वपुः, तद्यदा प्राणादिवृत्तिशून्यपुर्यष्टक- देहादिभूमिषु गुणतामभ्येति, तदा तस्मिन् गुणीभूते प्राणादेः प्राधान्यं स्फुरति । तथा च तस्य चिद्रूपस्य यथातथा हानिस्तथातथा दुःखोपचयो, यथातथा किञ्चिदुन्मज्जनं तथा तथा सुखोपचयः । तथाहि—बुभुक्षाकाले प्राणस्यैवोद्रेकात् दुःखं, तृप्तौ तस्य न्यग्भावादहन्तोद्रेके सुखम् । एवं जब तक विषय की स्थिरता का निश्चय प्रकाशित रहता है तब तक जागरण काल रहेगा । उसी बीच में निश्चय की अनुवृत्ति के निर्मूल होने पर स्वप्न प्रारम्भ हो जाता है । इसलिए वस्तु-पदार्थों में अवभास ही सार तत्त्व माना गया है; चिरकाल पर्यन्त होनेवाले स्वप्न में जो भी अन्य-अन्य स्वप्न होते हैं वे सब के सब उसकी अपेक्षा से ही है, जाग्रत का अभिमान होने पर भी दीर्घ-दीर्घ दूसरे काल तक निश्चय की अनुवृत्ति के रुक जाने से दूसरे जागरण की अपेक्षा से उसे स्वप्न ही मानना चाहिए ॥ १७ ॥ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं की हेयता को दिखा करके तुर्यावस्था ही उपादेय है, इसे सूचित करते हैं— कर्तृंता के गुण में प्राणादि की प्रधानता होने से जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को हेय समझना चाहिए । सुख-दुःखादि के योग से उसके भी प्रायः उपचय का त्याग करना चाहिए ॥ १८ ॥ यह प्रमाता छोड़ना एवं ग्रहण करना और उसकी इच्छा पर्यन्त करना आदि में क्लेशादि दुःख देखता है, वही उसकी हेयता प्रतीत होती है और सुख-दुःख की विचित्रता से क्लेश होता है । इस प्रकार सुख-दुःखादि तीनों अवस्थाओं में ही हो सकता है; क्योंकि अपने स्वरूप में विश्रान्ति लेना किसी दूसरे की अपेक्षा न रखना यह जो आनन्दघन चिन्मयरूप है वही परमेश्वर का स्वरूप है, जब वह प्राणादि वृत्तियों से शून्य पुर्यष्टक की भूमि में गौण हो जाता है उसी गुणीभूत अवस्था में प्राणादि की प्रधानता रहती है । उस काल में चिद्रूप परमात्मा को जैसी जैसी हानी होती जायेगी वैसी वैसी दुःख की अभिवृद्धि भी होती रहेगी, जब जब परमेश्वर सम्बन्धी कुछ भाव ऊपर उठता है तब तब सुख की अभिवृद्धि होती है । जैसा कि क्षुधाकाल में प्राण की उद्रेकरूपता से दुःख होता है और क्षुधा की परितृप्ति हो जाने पर उसके दब जाने से तो अहन्ता के उद्रेक से आनन्द का अनुभव होता है । इसी प्रकार थके हुए व्यक्ति का मर्दन करने पर और न करने

अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९७ श्रान्तस्य मर्दनामर्दने देहप्राधान्याप्राधान्ये मन्तव्ये । यस्तु समावेशतत्त्वज्ञस्तस्य तत्तत्काले दुःखानुदय एव । यदाह— 'दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । आच्छादयेद्बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥' (स्प० ४।८) इति । एवं प्राणादेः प्राधान्ये कर्तृताया गुणभावे सुखदुःखवैचित्र्यशतयोगः प्रयासभूमिः,—इति जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ते प्राणादिप्राधान्यं कर्तृतान्यग्भावश्चास्ति,—इति तत् त्रयमेव हेयम् । कर्तृता- प्राधान्योन्मेषात्तु तुर्यरूपातप्रभृति तत्स्थैर्यात्मकतुर्यातीतदशान्तमुपादेयम्, एकरसानन्दघनस्वभाव- लाभे उपादित्साजिहासावैवश्यपरिश्रमप्रशमात्,—इति तात्पर्यम् ॥ १८ ॥ ननु प्राणादिप्राधान्यं हेयताया कारणमुक्तं तच्चेज्जाग्रदादित्रय एव, तर्हि तुर्यादौ तदभावात् तत्समावेशे व्युत्थानानुपपत्तिः,—इति श्लोकद्वयेन शङ्कां परिहरति— प्राणापानमयः प्राणः प्रत्येकं सुप्तजाग्रतोः । तच्छेदात्मा समानाख्यः सौषुप्ते विषुवत्स्रव ॥ १९ ॥ मध्योध्वर्गाम्युदानाख्यस्तुर्यगो हुतभुङ्मयः । विज्ञानाकलमन्त्रेशो व्यानो विश्वात्मकः परः ॥ २० ॥ पर देह की प्रधानता और अप्रधानता माननी चाहिए। जो कि समावेश स्थिति में रहनेवाले ज्ञानिजन को तो उस-उस काल में दुःख का अभाव ही रहता है। इस विषय में कहा है कि— दुर्बल भी जिसको आक्रमण करके कार्य में प्रवर्तित होता है और अत्यन्त क्षुधा से आक्रान्त रहता है वह अपनी क्षुधा की निवृत्ति करे। प्राणादि की प्रधानता में और कर्तृता की गौणता में असंख्य सुख-दुःख के विचित्र योग से ही प्रयास भूमि होती है, उस जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति काल में प्राणादि की प्रधानता रहती है और कर्तृत्वभाव दबा रहता है, इसीलिए इन तीनों अवस्थाओं को विवेकपूर्वक छोड़ देना चाहिए। कर्तृत्वभाव की प्रधानता का उन्मेष होने से तुर्यरूप से लेकर उसकी तुर्यातीत अवस्था तक ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि इससे आनन्दघन स्वभाव की प्राप्ति होती है, ग्रहण करने की और त्याग करने की विवशता को शान्ति हो जाती है, यही इसका तात्पर्य है ॥ १८ ॥ अब शङ्का करते हैं कि प्राणादि के प्राधान्य को हेयता में कारण कहा गया है, वह यदि तीनों अवस्थाओं में है तो तुर्यादि में प्राणादि का अभाव रहने के कारण देहपात हो हो जायेगा, उसकी समाधि में व्युत्थान की अनुपपत्ति रहती है, इस प्रकार दो श्लोकों से इस आशङ्का का परिहार करते हैं— प्राण, अपान से युक्त होकर प्राण स्वप्न और जाग्रत प्रत्येक में रहता है। उन दोनों के अभाव में प्राण समान वायु होकर सुषुप्ति अवस्था में विषुवत् संक्रान्ति के समान रहता है ॥ १९ ॥ मध्य में उर्ध्वगामी होकर उदान नाम का वायु और अग्निरूप होकर तुर्य अवस्था में रहता है। विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर के रूप में व्यान वायु विश्वात्मक उत्तम होता है ॥ २० ॥ ३८

२९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० 'प्राण' इति प्राणनरूपा जीवनस्वभावा येयं चिद्रूपस्य स्थितिः, सा तावत्सामान्यपरिस्पन्द- रूपा, देहप्राणादेरचेतनस्य चेतनावानतासंपादनात्मिका 'अहम्' इति स्वातन्त्र्यारोपसारा सती विकल्परूपपरामर्शमयी सैव प्राणादिविशेषात्मना पञ्चरूपतां भजते। तत्र किञ्चिज्जहती क्वचित्पतन्ती च प्रश्वास-निःश्वासरूपा क्रमेण प्राणत्वमपानत्वं च विशेषं दर्शयति। तदिदं विशेषद्वयं जाग्रति तावत् स्फुटमेव देहात् प्रसृत्य विषये विश्रान्तेः, ततोऽपि देहे; स्मृत्यादौ वाभ्यन्तरे वेद्ये विश्रान्तेः प्राणापानयोः सुस्पष्टत्वात् । स्वप्नेऽपि तद्वयमस्त्येव; स्वपतोऽपि हि प्राणापानौ निर्गमप्रवेशात्मानौ स्फुटेनैवापरेण लक्ष्येते। स्वयमेव च वेद्यसंवेदनात् त्यागोपा- दानरूपा स्थितिः संवेद्यत एव, तेन प्राणना प्राणपानविशेषद्वयमयी जाग्रति, तथा स्वप्ने; सुप्तं स्वप्नः, तदेव तु यदा सुतरां पुष्टं भवति, तदा सुषुप्तः प्रमाता, तस्येदं सौषुप्तं पदम्। तत् द्विविध- मपि समानरूपं विशेषं प्रागीयं स्वीकरोति। सवेद्ये तावत्सुषुप्ते यद्यपि प्राणापानस्पन्दो लक्ष्यते, तथापि तयोर्मध्ये या विश्रान्तिर्हृदयसदने निरिन्द्रिये प्रदेशे तदेव मुख्यतः सुषुप्तमिति। तत्र प्राणा- पानयोर्यश्छेदो विश्रान्तिः कंचित्कालं तदात्मा सकलरसादिवर्गस्योर्ध्वाधरतिर्यक्षु समानीकरण- व्यापारात्मा, तत एव हृत्पद्मविकासदानाद्भुक्तपीतजरणकारी समानो दिनरात्रिरूपयोः प्राणा- पानयोः कंचित्कालं साम्याद्विच्छेदाच्च विषुवत्कालतुल्यः। विषुं व्याप्तिं समानीकरणमर्हति,— इति, 'तदर्हम्' ( पा०सू० ५।१।११७ ) इति वतिः। उपमाने वतेरेव चाव्ययत्वम् 'उद्वतो निवतः' 'प्राण' प्राणनरूप जीवन को चलानेवाली जो चेतन की स्थिति है, वह सामान्यरूप से स्फुरण कराती है, अचेतन जो देह-प्राणादि है उसे चेतनता देनेवाली यह 'अहम्' स्वातन्त्र्य-शक्ति है स्वतन्त्रता का आरोप करना जिसकी यही विशेषता है कि विकल्परूप परामर्श करनेवाली प्राणादिरूप से पाँचोरूपों में विभक्त हो जाती है। उसमें कुछ छोड़ती हुई और कहीं गिरती हुई श्वासप्रश्वासरूप होने से प्राणत्व और अपानत्व को विशेषरूप से बताती है। ये दोनों जाग्रत काल में स्पष्ट रहते हैं देह से फैलती हुई विषय में जाकर विश्राम लेती है, फिर उसके देह में; स्मृति आदि में अथवा वेद्य में विश्रान्त होकर प्राण, अपान के रूप में सुस्पष्ट प्रतीत है। स्वप्नकाल में भी दोनों रहते हैं; क्योंकि सोने पर प्राण, अपान दोनों का निर्गम और प्रवेश स्पष्ट ही दूसरे लोग देखते हैं और वेद्य अर्थात् ज्ञानरूप होने से स्वयं त्याग और ग्रहणरूप स्थिति की अवगति होती है, इस प्रकार जाग्रत काल में प्राणना, प्राण और अपान दोनों में विशेषरूप से रहती है, उसी प्रकार स्वप्न में भी 'सुप्तं' स्वप्न ऐसा प्रयोग आया है, वही जब भली भाँति पुष्ट हो जाता है, तब प्रमाता सुषुप्ति में पहुँच जाता है, उसका यह सौषुप्तपद है। वह सवेद्य और अपवेद्यरूप में भी समानरूप से विशेष भावपूर्वक जीवित रहना स्वीकार करता है। पहले यद्यपि सवेद्य सुषुप्ति में प्राण और अपान का स्पन्दन लक्षित होता है, तो भी दोनों के बीच में जो इन्द्रिय से रहित हृदय स्थान में विश्रान्ति है वही मुख्यतः सुषुप्ति अवस्था मानी जाती है। प्राण और अपान का जो भेदक है जिसको विश्रान्ति कहते हैं वही कुछ काल पर्यन्त उस रूप में रह कर सकल रसादि वर्ग का ऊपर-नीचे तथा चारों तरफ बराबर कर देना जिसका व्यापार है, उससे ही हृदय- कमल विकसित होने के कारण खाये-पीये पदार्थ को पचा देना यह सब समान वायु का कार्य है एवं दिन और रात्रिरूप जो प्राण और अपान वायु है वह कुछ अंश तक भेद करने के कारण विषुवत् काल के समान वह भी रहता है। चारों तरफ ठीक-ठीक व्यापकरूप में कर देने का

अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९९ इति प्रयोगात्; तद्धि न्यायसिद्धं न वाचनिकं, विशेषं वा दिनरात्रितदूनाधिकत्वलक्षणं सुवति प्रेरयत्यविरतम्,—इति शतरि विषुवत् । तत्र च विषुवति विच्छिद्यमानस्य प्राणापानस्य संस्काररूपतया सद्भावः, सैव हि विच्छेदो न तु सर्वात्मना नाशोऽस्ति,—इत्युक्तमसकृत् । ततश्च हानादानयोर्बीजरूपता सुषुप्ते; इयति च सर्वः प्रलयाकलान्तः पशुवर्गः। यदा तु सा प्राणना वृत्तिर्वामदक्षिणमार्गौ खिलीभावयन्ती मध्यरूपेणोर्ध्वेन प्रवहति, तदा तत्प्रवहणं सकलस्य भेदस्याभेदसारतादानलक्षणं विलापनमाश्यानस्येव सर्पिषो विदधती उदानवृत्तिर्विज्ञानाकलादारभ्य सदाशिवान्तं, सा च तुर्यात्मिका दशा। मायोर्ध्वे हि विज्ञानाकलाः,—इति ततःप्रभृति भेदगलनं प्रवर्तते। विलीने तु भेदे सर्ववेद्यराशिरूपतत्त्वभूतभुवनवर्गात्मकदेहव्यापाररूपेण प्राणवृत्तिर्व्यानि- रूपा विश्वात्मकपरमशिवोचिता तुर्यातीतरूपा। प्राण एव प्रमाता प्राणापानरूपः समानरूप नाम विषुवत् है। 'तदर्हम्' (पा० सूत्र ५।१।११७) इस सूत्र से वतिप्रत्यय होकर विषुवत् बना है और वतिप्रत्यय उपमान में अव्यय होता है 'उद्धतो निवतः' इत्यादि प्रयोगों में देखा जाता है; क्योंकि यह युक्तिपूर्वक भी सिद्ध है कोई मौखिक नहीं है अथवा तो दिन और रात्रि को न्यूनाधिक जो निरन्तर प्रेरित करता है,—शतृ प्रत्यय करके भी विषुवत् शब्द बनता है। इस प्रकार विषुवत् में विच्छिद्यमान जो प्राण-अपान है उसमें संस्काररूप से रहने के कारण उसे विच्छेद कहते हैं अर्थात् संस्काररूप से सद्भाव होना ही विच्छेद है सारा का सारा विनष्ट नहीं हो जाता है, यह हमने अनेक बार कहा है। आदान-प्रदान करना भी सुषुप्ति में बीजरूप से रहना सिद्ध है; इतने अंश में ही प्रलयाकल तक सभी पशुवर्ग रहते हैं। जब जीवन वृत्ति वाम और दक्षिण भाग को छोड़कर मध्यरूप से बहती है, तब उसका बहना सब भेदों में अभेद देनारूप जैसा कि पिघले हुए घी का स्वरूप, उसी में उदानवृत्ति विज्ञानाकल से लेकर सदाशिव दशा पर्यन्त जो दशा है उसे तुर्यावस्था कही जाती है माया तत्त्व के ऊपर विज्ञानाकल रहते हैं और वहां से ही भेद गलने लगता है। भेद के विलीन हो जाने पर सारी संवेद्यराशि भुवनवर्ग, देह व्यापार- रूप प्राणों की वृत्तियां विश्वात्मक परम शिव में रहने के कारण तुर्यातीतरूप हो जाती है, इसलिए १. ब्रह्मादिकीटान्तमनन्तकं यल्लोकत्रये वेदकचक्रवालम् । तद्वैतदृष्टयैव सुपूर्णमित्थं तदीयचक्षुर्युगलं व्यनक्ति ॥ इत्थं विमृश्याहमनन्तशक्तिविश्रान्तधीर्द्वैतदृशं जिहासुः । त्वद्भक्तिसंदर्शितशुद्धमार्ग निरर्गलोभावितभूरिभावः ॥ समं समप्रोद्गतवेदानाख्यबिन्दुस्थनेत्रान्तरशोभमानम् । भवन्तमन्तःकृतविश्वरूपमद्वैतदृष्टि शिवसंश्रितोऽस्मि ॥ शैव दर्शन में परम शिव को त्रिनेत्र शब्द से कहा गया है। हे भगवन् ! तीनों लोकों में ब्रह्मा से लेकर कीट-पतङ्ग पर्यन्त जितने भी वेदक पदार्थ हैं अर्थात् ज्ञाता वर्ग हैं, वे सभी द्वैतभाववाले हैं इसी कारण उन लोगों की द्वैतरूपी दो आँखें मानी जाती हैं, इसका विचार करके मैं आपकी अनन्त- शक्तियों में विश्राम लेकर अर्थात् द्वैतभाव को छोड़कर आपकी विशुद्ध-विमल भक्ति द्वारा अपने आपके द्वारा माने हुए बन्धन से मुक्त होकर सर्वत्र समभाववाले तृतीय बिन्दु स्थानीय नेत्र के खुल जाने से अपने में सारे विश्व को किये हुए अद्वैत दृष्टिवाले परम शिव को ही देख रहा हूँ अर्थात् मैं तो सारे त्रिलोकी विश्व को अन्तःसात् करनेवाले अद्वैत शिव को ही तृतीय-नेत्र से शोभायमान् देख रहा हूँ।

३०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० उदानरूपो व्यानरूपश्च,-इति सामानाधिकरण्यात् विज्ञानाकलश्चासौ मन्त्रश्चासौ वर्गापेक्षया, ईशश्च सदाशिवेश्वररूपो योऽसौ,-इति स उदानः। एतदुक्तं भवति यद्यपि तुर्यतदतीतयोरप्यस्ति प्राणना—अन्यथा जीवत्वस्य व्युत्थानस्य चानुपपत्तेः—तथापि भेदोपसंहारेणाभेदविश्रान्ति- प्राधान्यादनयोर्दशयोः सुखदुःखादिवैचित्र्यायोगात् एकघनस्वात्मविश्रान्त्यात्मकपरमानन्दमयत्वे- नोपादेयतैव। सुषुप्तादौ तु संस्काररूपत्वास्र्फुटवेद्योल्लासस्फुटवेद्यावभासरूपस्य भेदस्य विद्यमान- त्वात् अस्ति सुखदुःखादिवैचित्र्यम्,-इति हेयतैव,-इति युक्तमुक्तं 'हेया त्रयीयम्' इत्यादि। भगवतश्च विश्वशरीरस्य प्राणापानसमानोदानव्यानरूपतयैव सकलगतोल्लासप्रवेशप्रलयाकल- विज्ञानाकलादिवर्गसदाशिवरूपता,-इत्यप्यनेन दर्शितम्। यथोक्तम्—'षट्त्रिंशदात्मकं विश्वं शम्भोः प्राणादिशक्तयः।' इति ॥ १९-२० ॥ आदितः ॥ १७१ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्त- विरचितविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायामागमाधिकारे प्रमातृतत्त्व- निरूपणाख्यं द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥ • प्राण ही प्रमाता है वही प्राणरूप, अपानरूप, समानरूप, उदानरूप और व्यानरूप होकर रहता है, इस प्रकार यह सामानाधिकरण्यरूप होने से विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर भी है और वर्ग की अपेक्षा से ईश्वर और सदाशिवरूप उदान है। अब यह कहा जाता है कि परमेश्वर के विषय में जो कहना था सब कह दिया, अनन्तर जीव के विषय में प्रतिपादन किया जायेगा, तुर्यावस्था और तुर्यातीत अवस्था में भी जीव रहता है; नहीं तो, जीवत्व का उत्थान नहीं हो सकेगा, फिर भी भेदों का उपसंहार करके अभेद में विश्रान्ति लेने से उसकी प्रधानता से दोनों दशाओं में सुख-दुःखादि की विचित्रता से एकघन आत्मा में विश्राम पा लेने से परमानन्द स्थिति स्थिर हो जाती है, इस दर्शन में यही उपादेय है। सुषुप्ति अवस्था में तो संस्काररूप से अस्फुट वेद्य का उल्लास होना और स्फुटरूप से वेद्य का भास होना एवं दोनों रूपों में भेद के विद्यमान रहने से सुख-दुःखादि की विचित्रता बनी रहती है। इसलिए यह छोड़ने योग्य ही है, ठीक ही कहा है कि 'हेया त्रयीयम्' इत्यादि। भगवान् विश्व शरीर के प्राण, अपान, समान, उदान, व्यानरूप से ही सभी जीवों में उल्लासपूर्वक प्रवेश करने के कारण प्रलयाकल, विज्ञानाकल आदि वर्ग से लेकर सदाशिव तक दिखा दिया। जैसा कि कहा है—'छत्तीस तत्त्वोंवाला यह विश्व भगवान् सदाशिव की प्राणादि शक्तियाँ हैं' ॥ १९-२० ॥ द्वितीय आह्निक समाप्त इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता तृतीयागमाधिकारहिन्दीव्याख्या शिवरञ्जनी इति तृतीयः आगमाधिकारः समाप्तः •

अथ चतुर्थः तत्त्वसंग्रहाधिकारः अथ चतुर्थे तत्त्वसंग्रहाधिकारे गुरुपर्वक्रमाख्यं प्रथममाह्निकम् अनन्तमानमेयादिवैचित्र्याभेदशालिनम् । आत्मानं यः प्रथयते भक्तानां तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं स्वसंवेदनोपपत्त्यागमसिद्धं महेश्वररूपमात्मस्वरूपं यदधिकारत्रयेण वितत्य निर्णीतं तदेव संक्षेपेण शिष्यबुद्धिषु निवेशयितुमाग़मार्थसंग्रहं श्लोकाष्टादशकेन दर्शयति ‘स्वात्मैव सर्वजन्तू- नाम्’ इत्यादिना ‘उत्पलेनोपपादिता’ इत्यन्तेनैकेनाह्निकेन । तत्र श्लोकेन पारमार्थिकं रूपमुक्तवा श्लोकनवकेन बन्धस्वरूपं प्रमातृप्रमेयतत्त्वदर्शनदिशा, सप्तकेन प्रत्यभिज्ञात्मकं मोक्षतत्त्वं, श्लोके- नोपसंहारं दर्शयति, — इति तात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते— स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः । विश्वरूपोऽहमिदमित्यखण्डामर्शबृंहितः ॥ १ ॥ इह जडास्तावच्चेतननिमग्ना एव भान्ति; इदमिति हि जडपरामर्शोऽहमिति संवित्परामर्श एव विश्राम्यति; ततश्च जडा निरात्मान इति, जन्तव एव जीवाः सात्मानस्तेषां च महेश्वर एव अनन्त प्रमाता, प्रमेय, प्रमाणादि के वैचित्र्य भावों को अभेद से युक्त एवं भक्तजनों के स्वरूप को जो प्रकाशित करते हैं, उसकी हम स्तुति करते हैं। इस प्रकार अपने संवेदन ज्ञान की उपपत्ति से आगम सिद्ध महेश्वर के स्वरूप को ज्ञाना- धिकार, क्रियाधिकार और आगमाधिकार में विस्तारपूर्वक निरूपण किया है उसका संक्षेप से शिष्यों की बुद्धि में प्रवेश करने के लिए आगमार्थ संग्रह के रूप में अठारह श्लोकों से दिखाया जाता है ‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनाम्’ इत्यादि लेकर ‘उत्पलेनोपपादिता’ अन्तिम इस एक आह्निक तक। प्रथम श्लोक से पारमार्थिकरूप को कह कर नव श्लोकों द्वारा प्रमाता, प्रमेय तत्त्व दर्शन दिशा से बन्ध का स्वरूप कहेंगे, इसके बाद सात श्लोकों से प्रत्यभिज्ञारूप मोक्ष तत्त्व का प्रतिपादन करेंगे, एक श्लोक से उपसंहार दिखायेंगे, इसका यही तात्पर्य है। अब ग्रन्थ के अर्थ की व्याख्या करते हैं— सभी जन्तु जीवों का आत्मा ही एक महेश्वर है। मैं विश्वरूप अखण्ड इस विमर्श से व्याप्त हूँ ॥ १ ॥ सभी जड समूह चेतन तत्त्व में ही ओतप्रोत होकर भासते हैं; क्योंकि ‘इदम्’ जो जड परा- मर्श है वह अहं इस संवित् ज्ञान परामर्श में ही विश्राम लेता है, इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जड वर्ग चेतन शून्य ही रहता है, जन्तु ही जीव होते हैं और चेतन आत्मा से विशिष्ट रहते हैं,

३०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-२-३ स्वात्मा स एव महेश्वरो न त्वन्यः कश्चित् । यतः संवित्स्वभावोऽसौ, संविदश्च न देशेन न कालेन न स्वरूपेण कोऽपि भेदः, कामं देहप्राणादयो भिद्यन्तां, ते तु जडपक्ष्याश्चेतनमग्ना एव, —इत्येक एव चिदात्मा स्वातन्त्र्येण स्वात्मनि यतो वैश्वरूप्यं भासयति, ततो महेश्वरोऽन्तर्नीतामिदन्तां कृत्वा परानुन्मुखस्वात्मविश्रान्तिरूपाहंविमर्शपरिपूर्णः, अत एव सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वे नास्य यत्नो- पपाद्ये । विचित्रबुद्धिकर्मेन्द्रियविषये हि यथा ज्ञातृत्वकर्तृत्वे एकस्यैवात्मनस्तथेन्द्रियस्थानीयरुद्र- क्षेत्रज्ञसहस्रविषयस्य भावराशेर्यज्ज्ञानं करणं च तदेकत्र चिदात्मनि,—इति ॥ १ ॥ ननु यद्येक एवायं महेश्वररूप आत्मा कर्त्तर्हि बन्धो यदवमोचनायायमुद्यमः ? इत्याशङ्क्याह— तत्र स्वसृष्टेदंभागे बुद्ध्यादिग्राहकात्मना । अहङ्कारपरामर्शपदं नीतमनेन तत् ॥ २ ॥ 'तत्रैवं स्वात्मनि महेश्वरे स्थिते तस्मिन्नेव प्रकाशरूपे स्वात्मदर्पणे तेनैव परमेश्वरेण स्वातन्त्र्यात् तावत्सृष्टः सङ्कोचपुरःसर इदंभागः, तन्मध्ये यदेतद्बुद्धिप्राणदेहरूपमिदन्तया वेद्यं तद्भिन्नस्य वेद्यस्य ग्राहकत्या समुचितम् इदंभावाभिभवप्रभविष्णुत्वात् कृतकेनापूर्णेनाहंभावेन परामर्शेन भासमानं चकास्ति 'अहं देवदत्तोऽहं चैत्र' इति ॥ २ ॥ नन्वेवमप्यस्तु, तथापि कस्य बन्धः ईश्वरव्यतिरिक्तो हि कोऽन्योऽस्ति ? तदेतत् उन सब का आत्मस्वरूप महेश्वर ही है, इस प्रकार वही महेश्वर है अन्य कोई नहीं है। जिससे ज्ञात होता है कि यह संवित् ज्ञान स्वभाववाला है और संवित् का देश, काल और स्वरूप से कोई भेद नहीं है, भले ही देह प्राणादि का भेद होता हो, वे जड के पक्षपाती होते हुए भी चेतन में निमग्न रहते हैं। इस प्रकार एक ही चिदात्मा स्वतन्त्ररूप से अपने स्वरूप में विश्वरूप होकर भासित होता है, इससे महेश्वर इदन्ता को अन्तर्लीन करके किसी अन्य की ओर न उन्मुख होने- वाले अहं विमर्श में परिपूर्ण रहता है, इसीलिए सर्वज्ञत्व एवं सर्वकर्तृत्व के लिए कोई विशेष यत्न नहीं करना पड़ता है । [ इसीको दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं ] जैसे विचित्र ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय के विषय में एक चिदात्मा का ज्ञातृत्व-कर्तृत्व रहता है उसी प्रकार इन्द्रिय स्थानीय रुद्ररूप अनेक क्षेत्रज्ञ भावराशि के जो ज्ञान और करण एक ही चिदात्मा में संसक्त रहता है ॥ १ ॥ अब शङ्का करते हैं कि यदि यह एक ही महेश्वररूप आत्मा है तो कौन बन्धन ग्रस्त होगा और प्रपञ्च से छूटने के लिए उद्यम करता है ? इस पर आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं— अपने से सृष्ट इदंभाग में बुद्ध्यादि के ग्रहणरूप से अहङ्कार के परामर्श पद तक पहुँचा देना है वही वह पद है ॥ २ ॥ इस प्रकार स्वात्मस्वरूप महेश्वर के रहते-रहते वही प्रकाश स्वात्मदर्पण में परमेश्वर की स्वतन्त्रता के कारण संकुचित होकर इदंभाग का सर्जन करता है, उसके बीच में जो यह बुद्धि, प्राण, देहरूपी इदन्ता का वेद्य होती है उससे भिन्न वेद्य ग्राहक बनता है इदंभाग के प्रभाव को दबा देने से कृत्रिम अहंभाव के परामर्श से भासित हुआ 'अहं देवदत्तोऽहं चैत्रः' मैं देवदत्त हूँ, मैं चैत्र हूँ, ऐसा प्रकाशित होता है ॥ २ ॥ अच्छा तो, ऐसा भले ही हो; क्योंकि ईश्वर से भिन्न दूसरा कोई नहीं है तो फिर किस का

अ.-४, आ.-१, का.-३-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३०३ परिहर्तुमाह— स्वस्वरूपापरिज्ञानमयोऽनेकः पुमान् मतः । तत्र सृष्टौ क्रियानन्दौ भोगो दुःखसुखात्मकः ॥ ३ ॥ सत्यं, परमार्थतो न कश्चिद्बन्धः केवलं स्वस्मादनुत्तरात् स्वातन्त्र्यात् यदा स्वात्मानं संकु- चितमवभासयति स एव, तदा स्वस्थ पूर्णस्य रूपस्य यदपरिज्ञानं भासमानत्वेऽप्यपरामर्शरूपं, तदेव कारणत्वेन प्रकृतं यस्य स पूर्णत्वाख्यातिमात्रतत्त्वः ‘पुरुष’ इत्युच्यते । अत एवानेकस्तत्तद्देह- प्राणबुद्धिविशेषेण सङ्कोचग्रहणात् स च पुमान् भोक्ता सम्बन्धं भोगलक्षणमनुभवति, भोगश्च नाम तस्य यौ कल्पितौ क्रियानन्दौ, कल्पिता क्रिया दुःखं, रजो हि प्रकाशाप्रकाशचाञ्चल्यरूपं दुःख- मुच्यते; प्रकाशरूपं च सत्त्वं सुखं; तमस्त्वप्रकाशरूपो मध्ये विश्रमः प्रलयस्थानीयः ॥ ३ ॥ ननु सृष्टावित्यनेन किं व्यवच्छेद्यं किं च संग्राह्यम् ? इत्याह— स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥ ४ ॥ विश्वरूपस्य भगवतः स्वरूपभूत एव विश्वत्रयः प्रकाशो यश्च विमर्शः, ते तावज्ज्ञानक्रिये स्वरूपपरामर्शापरित्यागेनैव तु यद्विभिन्नतयापि विमर्शनं स्वरूपपरामर्श एव विश्रान्तम् ‘अहमिदम्’ बन्धन होगा ? इस आशङ्का को दूर करने के लिए कहते हैं— अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होने से अनेक पुरुष मानने लगता है । उसकी सृष्टि में क्रिया और आनन्द है एवं सुख-दुःखात्मक भोग होता है ॥ ३ ॥ ठीक है, ईश्वर से भिन्न दूसरा तो कोई नहीं है और जो बन्धन से युक्त होता हो । पर- मार्थतः कोई भी बन्धन ग्रस्त नहीं है, चिद्रूप स्वतन्त्र ही एक शिव है केवल अपने से अनुत्तर परम- स्वातन्त्र्यरूप जब अपने आपको संकोचरूप मानता है वही बन्धन है, उससे भिन्न दूसरा कोई बन्धन नहीं है । तब अपने पूर्ण स्वरूप का अज्ञान भासमान रहने पर भी अपरामर्शरूप रहता है, वही एक प्रकार से कारण बन जाता है उससे पूर्णता का ज्ञान नहीं होता जिस वजह से वह कहा जाता है । इसलिए देह, प्राण, बुद्धि आदि में विशेषरूप से संकोच हो जाने के कारण वह पुरुष भोक्ता भोग के सम्बन्ध रूप का अनुभव करता है, [ अत एव बद्ध कहा जाता है ] और भोग नाम उसका है जो कल्पित क्रिया आनन्द है, [ विमर्श और प्रकाशमय है ] कल्पित क्रिया ही दुःख है; क्योंकि रजोगुण प्रकाश-अप्रकाश चाञ्चल्यरूप है इसलिए उसे दुःख कहा जाता है, सतोगुण प्रकाशरूप होने से सुखात्मक होता है, किन्तु तमोगुण अप्रकाशरूप मायामय होने से मध्य में प्रलय अवस्था जैसा रहता है अर्थात् गहन सुषुप्ति में तम अप्रकाशरूप रहता है ॥ ३ ॥ सृष्टि में भोग पदार्थ सुख-दुःखात्मक है तो फिर क्या छोड़ना और क्या ग्रहण करना ? इस आशङ्का के उत्तर में कहते हैं— अपने अङ्गरूप भाव-पदार्थों में पशुपति की जो ज्ञान और क्रिया रहती है । पशु के लिए तीसरी माया के रहने पर वे ही सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हो जाते हैं ॥ ४ ॥ विश्वरूप भगवान् के स्वरूपभूत ही ये तीनों ज्ञान, क्रिया और माया के प्रकाश हैं और जो विमर्श है, वह ज्ञान और क्रिया के स्वरूप परामर्श को न छोड़ने के कारण भिन्नरूप से भी

३०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-५ इति सदाशिवेश्वरपरमार्थं सा भगवतो मायाशक्तिः, ता एतास्तिस्रः शक्तयो भगवति नैसर्गिक्यो दृष्टाः । स्वरूपापरिज्ञाने तु भिन्नेषु भावेषु ज्ञानं, क्रिया, शुद्धमेव भिन्नत्वं प्रकाशविमर्शशून्यम्,— इति पशोः प्रकाशः प्रकाशाप्रकाशावप्रकाशश्च,—इति क्रमेण सुखदुःखमोपलक्षणानि प्रकाशक्रिया- नियमनशीलानि सत्त्वरजस्तमांसि ॥ ४ ॥ ननु चैवं सति यथा परमेश्वरस्य ज्ञानक्रियामाया अव्यतिरेकिण्यः शक्तयः,—इत्युच्यन्ते, तद्वत् पशोः सत्त्वरजस्तमांसि प्रसज्यन्ते, व्यतिरिक्तानि च तानि पुंस्तत्त्वाद्गण्यन्ते; तदेतत् कथम् ? इति संशयं शमयति— भेदस्थितेः शक्तिमतः शक्तित्वं नापदिश्यते । एषां गुणानां करणकार्यत्वपरिणामिनाम् ॥ ५ ॥ सत्यम्, एवं स्यात् यदि भेदग्रहो न भवेत्, भेदव्यवहारस्त्वयं विचार्यते । तत्र च संकुचित- स्वभावः पुरुषो, नास्य नैसर्गिकं भावविषयं प्रकाशनादिरूपं सर्वदा तत्प्रसङ्गात्, अपि त्वन्यसंबन्ध- कृतम्; ततश्च तस्मात् पशोः शक्तिमत्त्वेन शङ्क्यमानाद् भेदेन यत एतानि सत्त्वादीनि, ततः शक्तयो व्यतिरेकमुक्ता;—इति नोच्यन्ते किं तूपकरणत्वात् 'गुणा' इत्युच्यन्ते । ननु पुरुषात् किमिति ते भेदेनोच्यन्ते ?' उच्यते, सुखदुःखमोहपरिणामरूपमेतत्करणत्रयोदशकं कार्यदशकं च सुखादि- विमर्श स्वरूपपरामर्श में ही विश्रान्त लेता है। 'अहमिदम्' मैं ही यह हूँ ऐसी वह भगवान् की माया-शक्ति है परमार्थतः सदाशिव एवं ईश्वररूप से कही जाती है। ज्ञान, क्रिया और माया ये तीनों शक्तियाँ भगवान् में स्वाभाविक देखी जाती हैं। स्वरूप के परिज्ञान न रहने पर तो भिन्न- भिन्न रूपों से पदार्थों में ज्ञान एवं क्रिया दिखायी देती है और प्रकाशविमर्श तो शुद्ध ही रह कर सब से भिन्न ही रहता है, पशु का प्रकाश तो प्रकाश और अप्रकाश तथा इन दोनों से मिला हुआ भी जो अप्रकाशरूप में रहता है, क्रमशः ये सुख-दुःख एवं मोहात्मक होते हैं। सतोगुण-रजोगुण- तमोगुण ये तीनों गुण सुख-दुःख और मोह स्वरूप हैं, सतोगुण का कार्य प्रकाश करना है, रजोगुण का कार्य विभिन्न कार्यों के करने में प्रवृत्तिशील रखता है और तमोगुण का कार्य कर्मशील व्यक्ति के कार्य में रुकावट डालकर प्रमादी बना देना है ॥ ४ ॥ अब शङ्का करते हैं कि जैसे परमेश्वर को ज्ञान, क्रिया और माया अभिन्न शक्तियाँ कही जाती हैं, उसी प्रकार पशु से सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं और ये तीनों भिन्नरूप से पुरुष में रहती हैं, इस प्रकार यह कैसे होगा ? इस संशय का समाधान करते हैं— परमेश्वर में अभिन्नरूप से रहनेवाली ज्ञानादि शक्तियाँ पशु जीव में भेदपूर्वक रहती है ऐसा नहीं कह सकते हैं। त्रयोदशकरण एवं दशविधकार्यरूप इन गुणों के परिणामस्वरूप से रहती हैं ॥ ५॥ आपका कहना ठीक है, ऐसा होगा यदि भेद ग्रह नहीं होता हो, तो ऐसा हो सकता है, इसलिए भेद व्यवहार का विचार करते हैं। पुरुष संकुचित स्वभाववाला है इस पुरुष का नैसर्गिक भाव विषय नहीं होता; क्योंकि वह स्वाभाविक होता तो सदा सर्वदा प्रकाशित हुआ करता, यह तो दूसरों के सम्बन्ध से होता है; इस कारण पशु की शक्तिमत्ता की शङ्का करके भेद से सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं, इसलिए ये शक्तियाँ भिन्न हैं यह कहा जाता है; यद्यपि इन्हें भिन्न नहीं कहते हैं किन्तु उपकरण होने के कारण वे सतोगुण आदि इनके 'गुणाः' गुण हैं ऐसा कहते

अ.-४, आ.-१, का.-६] विमर्शिनीटीकोपेता [३०५ स्वभावत्वेनानुभूयते, —इति सुखदुःखमोहाः कारणकार्यवर्गतादात्म्यवृत्तयो यदि पुरुषव्यापि तादात्म्यं भजेरन् तर्हि पुरुषः कार्यकारणपर्यन्तसृष्टिमयः संपन्नः, परिणामश्च दूषितः, —इति स्वातन्त्र्यशक्त्या पुरुषो विश्वरूपः, इत्यायातम् । तथा च—न कश्चित् पुरुष ईश्वर एव, तस्मात् अप्रत्यभिज्ञानमयपुरुषस्वरूपविचारे सत्त्वादयो भिन्ना एव, —इति स्थितम् ॥ ५ ॥ ननु ज्ञानादीनि कथं सत्त्वादिरूपाणि पशुं प्रति ? इत्याह— सत्तानन्दः क्रिया पत्युस्तदभावोऽपि सा पशोः । द्वयात्मा तद्रजो दुःखं श्लेषि सत्त्वतमोमयम् ॥ ६ ॥ इह तावत् पतिर्विश्वस्यावभासमानवैचित्र्यलक्षणेन सृष्ट्यादिना पालयिता स्वप्रकाशस्वभावः, तस्य विश्वपतेर्या सत्ता भवनकर्तृता स्फुरत्तारूपा पूर्वं व्याख्याता 'सा स्फुरत्ता महासत्ता' (ई० प्र० १।५।१४ ) इत्यत्र, सैव प्रकाशस्य विमर्शाव्यतिरेकात् विमर्शात्मकचमत्काररूपा सती क्रिया- शक्तिरुच्यते, परोन्मुख्यत्यागेन स्वात्मविश्रान्तिरूपत्वाच्च सैन आनन्दः; तदेवं भगवतश्चिदात्मतयै- वेयद्रूपता । पशोस्तु सत्ता तदभावश्च आनन्दश्च तदभावश्च संकुचिततद्रूपत्वात्; तेन योऽसौ सत्ता- नन्दभागस्तत्प्रकाशसुखवृत्ति सत्त्वं, यस्तदभावस्तदावरणमोहरूपं तमः, एते च ते सत्त्वतमसी हैं । अच्छा तो, पुरुष से इन सबका भेद क्यों किया जाता है ? उत्तर में कहते हैं कि सुख, दुःख और मोह के परिणाम होकर त्रयोदश करण हो जाते हैं और दश कार्य हो जाते हैं और सुख दुःखादि का स्वभाविक अनुभव होता है, सुख, दुःख और मोह ये करण कार्य वर्ग से तादात्म्यरूप होकर पुरुष में व्याप्त अर्थात् पुरुष से अभिन्नता सम्पादन करके उससे भी तादात्म्य प्राप्त कर लेते हैं, इसी से पुरुष कार्य-करण पर्यन्त सृष्टिमय होकर सम्पन्न हो जाता है और इसके परिणाम को दूषित करते हैं, इस प्रकार स्वातन्त्र्य-शक्ति से पुरुष विश्वरूप बन जाता है, यही निष्कर्ष निकलता है। इसलिए कोई पुरुष नहीं है सब ईश्वर ही है, जब तक प्रत्यभिज्ञा नहीं होती है इसलिए प्रत्यभिज्ञा से शून्य पुरुष के स्वरूप का विचार-विमर्श करने पर ये सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण भिन्न-भिन्न ही प्रतीत होते हैं, यही स्थिर अर्थ है ॥ ५ ॥ अच्छा तो, पशु जीव के लिए ये सत्त्वादि ज्ञान कैसे होते हैं ? इस पर कहते हैं— पशुपति की सत्ता आनन्द एवं क्रिया है उससे रहित होकर पशु के लिए वह रजोगुण होकर दुःखरूप हो जाता है और सतोगुण एवं तमोगुण मिल कर सुख-दुःख-मोहरूप हो जाता है ॥ ६ ॥ ईश्वर विश्व को विचित्र प्रकार से अवभासित करके सृष्टि-स्थिति और अपने विल्यादि कार्य प्रपञ्च करते हैं, उसमें ईश्वर का स्वप्रकाशरूप रहता है, उस विश्वपति की सत्ता है 'सा स्फुरत्ता महासत्ता' जो भवनकर्तृता स्फुरत्तारूपा पूर्व में बता दी है वही विमर्श से अभिन्न होकर विमर्शात्मक चमत्कारवाली क्रिया-शक्ति कही जाती है, जब अन्य की उन्मुखता का त्याग कर और अपने में विश्राम कर लेती है तब वही आनन्द कहा जाता है; भगवान् चिद्रूप से इतने परिणाम की प्राप्ति कर लेते हैं। पशुजीव में तो सत्ता और उसका अभाव रहता है, आनन्द और उसका अभाव रहता है उस जीव पशु के संकुचितरूप होने के कारण; इसलिए यह सत्ता एवं आनन्द भाग है उसका प्रकाश सुखवृत्ति सतोगुण है, उन दोनों का अभाव और उसका जो आवरण करनेवाला मोहरूप तमोगुण है, ये दोनों सतोगुण और तमोगुण नील और अनील के जैसा यद्यपि ३९

३०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-७ नीलानीलवत् परस्परपरिहारेण यद्यपि वर्तेते कार्यत्वकारणत्ववत् तथापि एकपरामर्शगोचरी- कार्यधर्ममपेक्षया चित्रपतङ्गसंगतनीलानीलात्मकरूपन्यायेनान्योन्यमिश्रतयापि भातः, अतो योऽयं 'द्वयात्मा' मिश्रस्वभावः तद्रजोगुणः, अत एव प्रकाशाप्रकाशस्वरूपयोः सत्त्वतमसोरत्र श्लेषेणाव- स्थानम्,—इति दुःखत्वम्; प्रियपुत्रादेरेकघन एव हि प्रकाशः सुखम्; एकघन एवाप्रकाशो मोहः । यस्तु कथञ्चित्प्रकाशो यथा सव्याधिकदेहरूपतयानभिमतया, कथञ्चिच्चाप्रकाशो यथा गतगद- कल्पौषधसंयोगितयाभिमतया तदेव दुःखत्वम्; अयमेव च पूर्वापरीभावसारः क्रिया परमार्थः अत्रानुभयरूपत्वं तु नास्ति, प्रतीतौ कस्याञ्चित् कल्पिताकल्पितरूपायामननुप्रवेशात् तस्य । तथा हि—नीलं तावदकल्पितरूपायां धियि भाति; नीलाभावस्तु तुच्छोऽपि कल्पनाकल्पित आभास- मानत्वात् तावद्व्यवहारपरमार्थः, तदुभयव्यामिश्रणात्तु नीलानीलं भातु नाम; यत्त्वनुभयरूपं तन्नीलप्रतीत्या तावदकल्पितया न विषयीकृतं चेत् तत् कल्पितामनीलधियमनुधावेत्; अथ तां कल्पितां धियं नाविशत्यकल्पितया विषयीकृतं नीलमेव स्यात्,—इति न पशोश्चतुर्थोऽस्ति गुणः । अपिश्चार्थे, पशोः सा सत्ता सत्त्वं, तदभावस्तमो, द्वयात्मा रजश्च,—इति संबन्धः ॥ ६ ॥ एवं तावत् पशुपशुरूपं प्रमातृतत्त्वं संक्षेपेण निर्णीतम्; अथ प्रमेयत्तत्त्वं निर्णैतुं पत्यौ तावत् 'इत्थमिदं प्रमेयत्तत्त्वम्' इति निर्णैतुमाह— येऽप्यसामयिकेदन्तापरामर्शभुवः प्रभोः । ते विमिश्रा विभिन्नाश्च तथा चित्रावभासिनः ॥ ७ ॥ परस्पर परिहाररूप से कार्य-कारणभाव बन कर रहते हैं, तो भी एकविषयक परामर्श करनेवाले धर्म की अपेक्षा से 'चित्रपतङ्गसंगतनीलानीलात्मकन्यायेन' परस्पर संमिलित होकर एक परामर्श बलात् भासते हैं, जो यह 'द्वयात्मा' द्वित्वभाव से संमिलित स्वभाव है वही रजोगुण है, इसलिए प्रकाश और अप्रकाशरूप दोनों सतोगुण और तमोगुण में मिश्रित होकर रहना दुःख कहलाता है, प्रिय पुत्रादि के साथ एकघन ही आनन्द सुख है और एकघन प्रकाश का अप्रकाश होना मोह है । जो कि किसी प्रकार प्रकाशित रहता है । जैसा कि व्याधि रोग से सहित देह में कभी-कभी अनभिमत प्रकाश रहता है वह अभिमत रोग के औषध से युक्त होकर दुःख कहा जाता है यही पूर्वोत्तर भावरूप परामर्श क्रिया कही जाती है । किन्तु इसमें दोनों का अभाव नहीं रहता है; क्योंकि किसी भी कल्पित एवं अकल्पित प्रतीति में इसका प्रवेश नहीं होता है । देखो-पहले नील अकल्पितरूप बुद्धि में भासना है; नील का अभाव यद्यपि तुच्छ है तो भी कल्पना से कल्पित होकर इसका व्यवहार परमार्थतः होता है, उन दोनों के व्यामिश्रण से नील और अनील भले भासित हो; किन्तु जो दोनों से भिन्न रूप में अकल्पित नील प्रतीति से विषयी न होकर वह कल्पित नील बुद्धि का पीछा करने से उस कल्पित बुद्धि में यदि प्रवेश न करेंगे तो वह विषयीकृत नील ही हो जाता है, इसलिए पशुजीव का कोई चतुर्थ गुण नहीं होता है । 'अपि' शब्द 'चकार' के अर्थ में है, पशुजीव की वह सत्ता सतोगुण से युक्त रहता है, उसका अभाव तमोगुण है और दोनों का मिलना रजोगुण कहलाता है, यही इसका सम्बन्ध है ॥ ६ ॥ इस प्रकार ईश्वर पशुपतिरूप और पशुजीवरूप प्रमातृत्व का संक्षेप में निर्णय कर दिया गया । अब प्रमेयत्तत्त्व निर्णय करने के लिए पशुपति में 'इत्थमिदं प्रमेयत्तत्त्वम्' ऐसा ही यह प्रमेयत्तत्त्व है, इस का निर्णय करते हैं—

अ.-४, आ.-१, का.-८-९-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३०७ इहाभासा एव तावदर्थाः, — इत्युक्तं, ते च परामर्शैक्येन कदाचिन्मिश्रीक्रियन्ते यदा विशेष- रूपता, कदाचिदमिश्रा एव परामृश्यन्ते यदा सामान्यरूपता, ते एते उभयात्मानोऽप्यसामयिकेना- कल्पितेनेदंभावेन सहजभेदपरामर्शरूपेणाङ्गुलिनिर्देशादिप्रत्ययेन गोचरीकार्याः प्रभोरपि न केवलं सद्योजातबालादेर्यावदीश्वरस्यापि, 'तथा' येन सामान्यविशेषप्रकारेण चित्रतयावभासन्ते । चित्रत्वं हि तयोः — यन्मिश्रत्वममिश्रत्वं च युगपदेकाहन्ताविश्रान्तं भाति, — इति ईश्वरदशायां भावोल्ला- सनान्तरीयकत्वेन संवित्संकोचरूपं निषेध्यानुपरक्तनञर्थमात्ररूपं शून्यं संवित्प्रकाशेनैव प्रकाश- मानमहन्तानिषेधरूपामसामयिकीमिदन्तामुल्लासयति ॥ ७ ॥ एवं तावदीश्वररूपस्य पत्युरित्थं प्रमेयतत्त्वं, परमशिवे तु भगवति प्रमेयकथैव कथमुत्ति- ष्ठति, प्रमेयकथोत्थापकत्वमेव भगवतः सदाशिवेश्वरत्वम्; अतोऽधुना पशुं प्रति कीदृक् प्रमेयस्य वृत्तान्तः, — इति सन्देहमपोहति श्लोकत्रयेण— ते तु भिन्नावभासार्थाः प्रकल्प्याः प्रत्यगात्मनः । तत्तद्विभिन्नसंज्ञाभिः स्मृत्युत्प्रेक्षादिगोचरे ॥ ८ ॥ तस्यासाधारणी सृष्टिरीशसृष्ट्युपजीविनी । सैषाप्यज्ञतया सत्यैवेशशक्त्या तदात्मनः ॥ ९ ॥ ये जो प्रभु की असामयिक इदन्तांश का परामर्श स्थानीय आभास हैं । वे मिश्रित और भिन्न-भिन्न हैं तथा चित्र विचित्र आभासवाले होते हैं ॥ ७ ॥ इस शास्त्रमें आभासों को ही अर्थ कहा जाता है, उनको परामर्श की एकता से कभी मिला दिये जाते हैं जब उसमें विशेषता आ जाती है और कभी पृथक् होकर भिन्नरूप में परामृष्ट होते हैं जब सामान्यरूपता रहती है, तब ये दोनों असामयिक कल्पित इदंभाव स्वाभाविक भेद परामर्शरूप से अङ्गुलि द्वारा निर्देश किये हुए के जैसा इन्द्रियों के विषय किये जाते हैं यह केवल ईश्वर को नहीं होता है अपि तु सद्योजात बालक को भी सामान्य विशेषरूप से चित्र-विचित्र होकर भासते हैं; क्योंकि उनकी विचित्रता मिश्रत्व और अमिश्रत्व रूप से एक साथ अहन्ता में विश्रान्त होती है, इसलिए ईश्वर दशा में उसका अवश्य उल्लास होने के कारण ज्ञान का संकु- चितरूप निषेध से मिला हुआ नञर्थ शून्य ज्ञान प्रकाशित होता है वह ज्ञानप्रकाश अहन्ता के निषेधरूप असामयिक इदन्ता को उल्लासित करता है ॥ ७ ॥ ऐसा ही ईश्वररूप पशुपति का प्रमेयत्त्व है, भगवान् परम शिव में प्रमेयता का होना नहीं घटता है, प्रमेयता तो सदाशिव और ईश्वर पर्यन्त ही रहती है; इसके आगे पशुजीव में कैसी प्रमेयता होती है यह बतायेंगे, तीन श्लोकों से इस सन्देह को दूर करते हैं— जीवात्मा के लिए भिन्न-भिन्न अवभासवाले पदार्थ कल्पित होते हैं । स्मृति, उत्प्रेक्षा आदि के विषय में उन उन विभिन्न संज्ञाओं से उनका कथन होता है ॥ ८ ॥ उस पशुजीव की असाधारण सृष्टि ईश्वर की सृष्टि का आधार लेकर होती है । वह भी अज्ञरूप से सत्य ही ईश्वर की शक्ति द्वारा तद्रूप होकर भासती है ॥ ९ ॥

३०८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-८-९-१० स्वविश्रान्त्युपरोधायाचलया प्राणरूपया । विकल्पक्रियया तत्तद्वर्णवैचित्र्यरूपया ॥ १० ॥ तुविशेषं द्योतयति प्रत्यगात्मनस्तु इत्थं प्रमेयरूपा अर्था, न त्वीश्वरवदुक्तनयेनेति । 'भिन्न' इति मिश्रामिश्रतया भिद्यमान आभासो येषामर्थानां ते विशेषसामान्यात्मानोऽर्थाः प्रत्यगात्मनः प्रतिपुरुषमविमिश्रस्वसंवेदनावगमरूपस्यासंकीर्णाऽहंप्रकाशात्मनः प्रकल्प्या विकल्पनीयाः, प्रतिप्राणि स्ववासनानुसारेण विभिन्नाभिः संज्ञाभिः 'प्रियोऽयं शत्रुरयम्' इत्यादिकाभिर्भावनाविशेषानुसारेण तत्तद्विचित्रसुखदुःखाद्युपयुक्ताभिः स्मरणे उत्प्रेक्षणे संकल्पनेऽन्यत्रान्यत्र च विकल्पयोगे । एतदुक्तं भवति— ईश्वरस्य विकल्पात्मकतामन्तरेण शुद्धविमर्शविषयीभाव्या अर्थाः, पशोस्त्वन्योन्यापोहन हेवाकिनि विकल्पे समारूढातेऽर्था भवन्ति, सांसारिकहानादानादिव्यवहारोपयोगात् इति । नन्व- विकल्पत्वे यावानेवार्थस्तावोनेव यदि विकल्पत्वे तत्को विशेषः प्रमेयस्य पतिपशुरूपतायाम्, ? उच्यते, तस्येति पशुकर्तृका सृष्टिस्तेषामर्थानामीश्वरसृष्टानामुपरिवर्तिनी, अत एव तामीश्वर- सृष्टिमुपजीवन्ती असाधारणी प्रतिप्रमातृनियता । तद्यथा 'इदं हृद्यम्' इति येन सृष्टं तत् तस्यैव तदा नान्यस्य । ननु यदि पशोरपि सृष्टिशक्तिरस्ति तर्हीश्वर एव; सत्यम्, ईश्वर एवासौ । नन्वेवं साधारणत्वं कस्मात् सृष्टेर्न भवति ?; भवेत् यदि स्वशक्तिं परिजानीयात्, यावता सा तस्यापरि- अपने में विश्रान्त होनेवाली विश्राम के उपरोध के लिए अचल प्राणरूप से, विकल्प क्रिया से, उन उन वर्णों में विचित्ररूप से रहती है ॥ १० ॥ 'तु' शब्द विशेषता को द्योतित करता है । जीवात्मा का ऐसा हो प्रमेयरूप अर्थ होता है, उक्त नीति से ईश्वर के समान नहीं होता । 'भिन्नः' मिला हुआ अर्थात् भेद एवं अभेदरूप से भिन्न भिन्न जो आभास हैं वे ही विशेष और सामान्यरूप होकर जीवात्मा के पदार्थ होते हैं जो कि प्रतिपुरुष भिन्न भिन्न अपने संवेदन के अनुरूप असंकीर्ण अहं प्रकाशरूप से कल्पित होते हैं और प्रतिप्राणी अपनी वासना के अनुसार विभिन्न विभिन्न संज्ञाओं से 'प्रियोऽयं शत्रुरयम्' अर्थात् 'यह प्रिय है, यह शत्रु है' इत्यादि भावना विशेष के अनुसार विचित्र सुख-दुःखादि के स्मरण करने पर अथवा उत्प्रेक्षा करने पर अथवा संकल्प करने पर दूसरी दूसरी जगह विकल्पना से योग्य होने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर की विकल्परूपता को अन्तःकरण में शुद्ध विमर्श के विषय बनाने पर ईश्वर के ही पदार्थ हो जाते हैं, पशुजीव का तो परस्पर अपोहन को नहीं छोड़नेवाले विकल्प में आरूढ होकर जो पदार्थ भासते हैं, सांसारिक ग्रहण और त्याग इत्यादि व्यवहार के योग से पदार्थ कहलाते हैं । इस पर शङ्का होती है कि यदि अविकल्प में जितने भी अर्थ रहते हैं उतने ही अर्थ यदि विकल्प में भी हो तो फिर क्या विशेषता हुई, पशुपति के प्रमेय में और पशुजीव के प्रमेय में भेद क्या हुआ ? इसका उत्तर देते हैं, 'तस्यासाधारणेति' पशुजीव कर्तृक सृष्टि ईश्वर से सृष्ट पदार्थों में जो इसके ऊपर रहते हैं, इसीलिए इसी ईश्वर सृष्टि का आधार मान करके जीव प्रमाता की असाधारणी सृष्टि होती है । इसीलिए कहा गया है कि 'इदं हृद्यं' इस मनोहर संसार को जिसने बनाया है उसी की यह शक्ति है, किसी अन्य की नहीं है । अच्छा तो, अब कहो कि पशुजीव में में भी यदि सृष्टि करने की शक्ति है, तो वह भी ईश्वर हो गया; आपका कहना ठीक ही है, ईश्वररूप ही जीव है । अच्छा तो, इस प्रकार ईश्वर सृष्टि के समान साधारण क्यों न हो जाय ?

अ.-४, आ.-१, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [३०९ ज्ञाता परवशस्यैव सतो विकल्पक्रिया विकल्पनशक्तिरुदेति । ननु केन सा तस्योत्थाप्यते ?; आह— ईश्वरस्य परामर्शरूपतया शब्दराशिलक्षणस्य या शक्तिः स्वरूपविश्रान्तिलक्षणपारमैश्वर्योपरोध- प्रयोजना ब्राह्म्यादिदेवताचक्रमयी तैस्तैः ककारादिवर्णवैचित्र्यैर्विचित्रा, तया यासौ विकल्पक्रिया तस्य पशोरेकत्र निरूढचभावात् चञ्चला तेन 'मित्रमयं शत्रुरयम्' इत्यादिवर्णवैचित्र्यानुविद्धतया विकल्पनक्रियया तदात्मन ईश्वरस्वभावस्यैव पशोरसाधारणी सृष्टिः, 'पञ्चवक्त्रश्चतुर्दन्तो हस्ती नभसि धावति ।' इत्यपि विमिश्रतया विकल्प सृष्टिः, तानाभासान् ईश्वरसृष्टानेवोपजीवति,—इति सर्वा पाशवी प्रत्ययसृष्टिरीश्वरसृष्ट्युपजीविनीत्युक्तम् ॥ ८-९-१० ॥ नन्वेवं यदि पाशवी सृष्टिः संसाररूपा तर्हि पारमेश्वरी सृष्टिः पशोः किं कुर्यात् ? इति निर्णीयते— साधारणोऽन्यथा चैशः सर्गः स्पष्टावभासनात् । विकल्पहानेनैकाग्र्यात् क्रमेणेश्वरतापद्म् ॥ ११ ॥ ऐश्वरः सर्गो द्विधा, साधारणश्च घटादिरसाधारणश्च 'अन्यथा' इति निर्दिष्टो द्विचन्द्रादिः; तस्य च सामान्यलक्षणं स्पष्टावभासनं नाम । सोऽयं सर्गो यदा विकल्पहानक्रमेण तस्मिन्निर्विकल्पक- उत्तर में कहते हैं कि यदि अपनी शक्ति को जानेंगे तो निश्चित हो सकता है जब तक वह शक्ति पशुजीव को ज्ञान नहीं है तब तक वह परवश रहता है और तब तक ही विकल्प क्रिया, विकल्प-शक्ति उदय होतो रहती है । शङ्का होती है कि वह किससे उठती है ? उत्तर में कहते हैं कि ईश्वर की शब्दराशिरूप परामर्श करनेवाली जो शक्ति है अपने में विश्रान्त रहती है जब कि परम ऐश्वर्य का उपरोध करती है ब्राह्मी-शक्ति आदि देवता चक्र में अधिष्ठित ककारादि वर्णों की विचित्रता से विचित्र बनी हुई जो विकल्प है वही पशुजीव मे एक जगह एकत्र होकर बढे हुए प्राण एवं अपान आदि संमिश्रण से चंचल हुई यह मित्र है यह शत्रु है इत्यादि वर्णों की विचित्रता से मिले रहने के कारण विकल्पन क्रिया के द्वारा तादात्म्यरूप ईश्वर भाव को प्राप्त हुए पशुजीव की ही असाधारणी सृष्टि कही जाती है। 'पाँच मुखवाला और चार दातोंवाला हाथी आकाश में दौड़ता है।' यह विमिश्ररूप होने से विकल्प सृष्टि है, ईश्वर से बनाये गये उन्हीं आभासों का यह भी आधार रखती है, पशुजीव की अपनी भावना के अनुसार सृष्टि ईश्वर परमात्मा की सृष्टि का ही आधार लेकर होती है ऐसा कहा गया है ॥ ८-९-१० ॥ अच्छा तो, पाशवी सृष्टि संसाररूपा है तो फिर ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि पशुजीव के लिए क्या उपकार करेंगी ? इसका निर्णय करते हैं । स्पष्ट अभाव होने के कारण ईश्वर की सृष्टि साधारण होती है । विकल्प की हानि करके एकाग्रता के कारण क्रम से ईश्वर पद तक पहुँचा देती है यही ईश्वर सृष्टि का उसके लिए उपकार है ॥ ११ ॥ ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि दो प्रकार की होती हैं, साधारणरूप से और घटादि असाधारण रूप से होती है नहीं तो, द्विचन्द्रादि का निर्देश तो ही है और ईश्वर सृष्टि का सामान्यरूप तो स्पष्ट ही सब के सामने भासता है । जब वह यह ईश्वर सृष्टि विकल्प की हानि के क्रम से उस पशु में निर्विकल्परूप से गृहीत होती है तब तो एक ही पदार्थ में एकाग्ररूप का अवलम्बन

परिगृहीत एव स्पष्टाभेदार्थ एकाग्रत्वमवलम्ब्य 'अहमिदम्' इत्यैश्वर्यपरामर्शपदं भवति तदा अन्त- र्लक्ष्यबहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषपरिहारोपदेशदिशा 'क्रमेण' अभ्यासतारतम्येन पशोः पशुत्वं प्रतिहन्ती- श्वरत्वं च दर्शयति । किं च योऽयं विकल्पसर्गः पाशव उक्तः सोऽपि यदि 'अन्यथा' इति पूर्वोक्त- रूपवैपरीत्येन परिज्ञातयेशशक्त्या परिज्ञाततादात्म्यस्य भवति तदा सोऽपि साधारण एवाप्यायना- भिररणशान्त्यादिविकल्प इव न्यस्तमन्त्रस्य भावित्तान्तःकरणस्य ॥ ११ ॥ एवं विकल्पनिर्ह्रासेन निर्विकल्परूपसात्मीभावे विश्वात्मसाक्षात्कारलक्षणः स्वप्रत्यय एव मोक्षो दर्शितः, अधुना विकल्पनिर्ह्रासाभावेऽपि तं दर्शयति- सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ १२ ॥ नहि प्रत्यगात्मा नाम पशुः कश्चिदन्यो योऽहम्, अपि तु परिगृहीतग्राह्यप्रकाशैकघनः परो यः स एवाहं स चाहमेव, न त्वन्य कश्चित्; अतो विकल्पसृष्टिरपि मम स्वातन्त्र्यलक्षणो विभवः,- इत्येवं विमर्शे दृढीभूते सत्यपरिक्षीणविकल्पोऽपि जीवन्नेव मुक्तः । यथोक्तम्-'शङ्कापि न विशङ्केत निःशङ्कत्वमिदं स्फुटम् ।' इति ॥ १२ ॥ करके 'अहमिदम्' ऐसा परामर्श पद स्थान होता है, ऐसी अवस्था में अन्तर का लक्ष्य रहता है और बाहरी मात्र दृष्टि ही रहती है निमेष-उन्मेष से शून्य होकर विशेष अभ्यास के क्रम से पशु की पशुता दूर करती जाती है और ईश्वरता को उभारती जाती है और जो यह पशुओं की विकल्प सृष्टि बतायी है वह भी पूर्वोक्तरूप से विपरीत होकर ईश्वर-शक्ति का ज्ञान होने पर उनसे तादात्म्य प्राप्त कर तब वह भी साधारणरूप से आप्यायन, अभिचरन, शान्ति आदि विकल्पों के समान मन्त्र को छोड़कर भावित ईश्वरमय जपने को माननेवालों का ही होता है ॥ ११ ॥ इस प्रकार विकल्प ह्रास करके निर्विकल्प के आत्मसात् कर लेने पर विश्वमय आत्मा का साक्षात्कार कर लेना; क्योंकि अपना ज्ञान ही मोक्ष दिखाया है, अब तो विकल्प के निर्ह्रास न होने पर भी मोक्ष हो जाता है उसे दिखाते हैं- यह सारा का सारा विश्व मेरा ही वैभव है ऐसा ज्ञान रखनेवाले विश्वात्मा में विकल्पों के उदय होने पर भी महेश्वर-भाव बना रहता है ॥ १२ ॥ जो मैं हूँ वह कोई दूसरा जीवरूप पशु नहीं है, ग्राह्य-ग्राहक भाव को ग्रहण करके एक प्रकाशमय होकर वह जो परमेश्वर है वही मैं हूँ और वही मैं हूँ, दूसरा कोई भी नहीं है; इसीलिए विकल्प सृष्टि भी मेरा ही वैभव है ऐसा विमर्श दृढ़ हो जाने पर विकल्प का निश्चयरूप से क्षीण हो जाने से जिते हुए ही मुक्त हो जाता है । जिसके विषय में कहा है 'इसमें शङ्का भी नहीं करनी चाहिए यह तो शङ्का से रहित स्पष्ट है' ॥ १२ ॥ १. अन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता । एषाऽसौ भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ लक्ष्य तो अन्तर में रहे, एवं दृष्टि बिना निमेष और उन्मेष की हो अर्थात् नेत्र का निरन्तर एक पलक गिराये-उठाये बिना देखते रहना चित्त के भीतर अनुप्रवेश के साथ सभी इन्द्रियों का बाहर की ओर प्रसारना यही भैरवी मुद्रा सब तन्त्रों में गुप्त रूप से कही हुई है ।

अ.-४, आ.-१, का.-१४-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३११ नन्वेवं बद्धमुक्तयोः प्रमेयं प्रति को भेदः ?, उच्यते— मेयं साधारणं मुक्तः स्वात्माभेदेन मन्यते । महेश्वरो यथा बद्धः पुनरत्यन्तभेदवत् ॥ १३ ॥ श्रीमत्सदाशिवेश्वरपदादारभ्य क्रिमिपर्यन्तप्रमातृवर्गाधिष्ठातृ यदहमितिरूपं तदेवात्म- तयाभिनिविशते मुक्तः; ततश्च विश्वस्यापि प्रमेयं ममापि, मम प्रमेयं विश्वस्यापि, प्रमेयं चेदं ममैवाङ्गभूतं प्रमेयान्तरमपि तथा,—इत्यनेन क्रमेण प्रमेयं परस्परतश्च प्रमातृवर्गाच्चाव्यावृत्तम्,- इत्येकरसाभेदविश्रान्तितत्त्वमस्य सर्वं परामर्शपदमुपैति । बद्धस्य तु सर्वमेतद्विपरीतम्,—इत्येक- रसभेदविश्रान्त एवासौ ॥ १३ ॥ ननु सदाशिवेश्वरभुवि जीवन्मुक्तिपदे बद्धरूपपशुप्रमातृविषये च प्रमेयवृत्तान्तः परीक्षितः, परमशिवे तु कथमसौ ? इत्याशङ्क्याह— सर्वथा त्वन्तरालीनानन्ततत्त्वौघनिर्भरः । शिवः चिदानन्दघनः परमाक्षरविग्रहः ॥ १४ ॥ न खलु भगवति श्री परमशिवे प्रमेयकथा काचिदस्ति, तत्त्वौघस्य सर्वथा तत्र चिद्रूपता- मात्रविश्रान्तत्वेन लीनत्वात्; ततश्च सावस्था संवित्स्वभावेन स्वात्मविश्रान्त्यानन्देन अकृत्रिमनै- अच्छा तो, बद्ध और मुक्त में प्रमेय के लिएक्या भेद रहेगा ? उत्तर में कहते हैं— मुक्त पुरुष साधारण प्रमेय को अपने से अभिन्न मानता है । जैसा कि महेश्वर अत्यन्त भेद के समान उसे बद्ध मानता है ॥ १३ ॥ श्री सदाशिव ईश्वर से लेकर कीट-पतङ्ग पर्यन्त प्रमातृवर्ग के अधिष्ठाता जो अहं यह परामर्श है उसे मुक्त अपना स्वरूप समझता है; इसी कारण सारे विश्व का प्रमेय भी मेरा ही है और मेरा प्रमेय विश्व का प्रमेय है, यह सारा का सारा प्रमेय मेरा ही अंगरूप ही है उसी- प्रकार दूसरे प्रमेय भी, इसी क्रम से प्रमेय और परस्पर प्रमातृवर्ग से भिन्न न होकर एकरस में अभेदरूप से विश्रान्ति लेता हुआ परामर्शपद को प्राप्त करता है । किन्तु बद्धपुरुष के लिए सब कुछ विपरीत होता है, इस प्रकार एकरस भेद में ही विश्राम हो जाता है ॥ १३ ॥ अब शङ्का करते हैं कि सदाशिव भूमि जो जीवन्मुक्तावस्था है उसमें बद्ध पशु प्रमाता के विषय में प्रमेय विषय की परीक्षा हो गयी, परन्तु यह भेद परम शिव के विषय में कैसे होंगे ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— विकल्प और अविकल्प भूमिका में जिसकी इन्द्रियाँ उद्बुद्ध हो चुकी है उस योगी का प्रमेय क्रम कह दिया गया और निमीलित इन्द्रियवाले योगी का क्रम कैसा होता है उसको कहते हैं । सब प्रकार से अनन्त तत्त्व का समूह जिसमें छिपा रहता है । वही चिदानन्दघन परम अक्षर शरीरवाला शिवतत्त्व है ॥ १४ ॥ जो कि भगवान् परम शिव में कीई प्रमेय कथा नही रहती है, सारे के सारे तत्त्व समूह चिद्रूप में विश्रान्त हो जाने के कारण; इसी कारण संवित् ज्ञान स्वरूप से अपने आप में विश्रान्त होकर आनन्दरूप से अकृत्रिम स्वाभाविक और परामर्शस्वरूप आत्मचमत्काररूप से अनेक प्रकार

३१२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१५-१६ सर्गिकपरामर्शात्मकस्वात्मचमत्कारलक्षणेनैकघना अविच्छिन्नतद्रूपा परमाक्षरेण विग्रहवती भगवतो विश्वमयस्यानवच्छिन्नानुत्तरधाम्नो गलितप्रमेयकथा सर्वोत्तीर्णा व्यपदिश्यते ॥ १४ ॥ एवमधिकारचतुष्टयोक्तं यद्वस्तु तत्फलमाह— एवमात्मानमेतस्य सम्यग्ज्ञानक्रिये तथा । जानन्यथेप्सितान्पश्यञ्जानाति च करोति च । १५ ॥ एवमिति, ईश्वररूपमात्मानं तस्य च स्वाव्यतिरिक्ते स्वातन्त्र्यमात्ररूपे ज्ञानक्रिये जानन् एवं-भूतोऽयमात्मा न तु काणादादिदर्शितः, इत्थं च ज्ञानक्रिये न तु तस्य व्यतिरिक्ते केचन,— इति परामृशन् यद्यदिच्छति तत्तज्जानाति करोति च समावेशाभ्यासपरोऽनेनैव शरीरेण; अतत्परस्तु सति देहे जीवन्मुक्तस्तत्पाते परमेश्वर एवेति ॥ १५ ॥ अस्यार्थस्य स्वप्रत्ययसिद्धस्यापि गुरुपरम्परोपदेश उपोद्वलको वक्तव्यः, शास्त्रदृष्टिर्हि के अविच्छिन्न तद्रूप होकर परम अक्षर विग्रह से विश्वरूप भगवान् शिव के अनवच्छिन्न अनुत्तर- धाम का रूप धारण कर लेता है—ऐसी अवस्था में प्रमेय कथा सब गलित हो जाती है ॥ १४ ॥ इस प्रकार चारों अधिकारों से जो बातें कही गयी हैं उसके फल को कहते हैं— एवं अपने स्वरूप को और इसके ज्ञान और क्रिया को ठीक-ठीक जानता हुआ एवं अभीष्ट को देखता हुआ वैसा ही जानता है और करता है ॥ १५ ॥ अपने आप को ईश्वरस्वरूप मानता है और उस स्वरूप से अभिन्न स्वातन्त्र्यमात्र ज्ञान एवं क्रिया को जानते हुए ऐसा ही यह आत्मा है काणादादि दर्शन से दिखाया गया आत्मा नहीं है, इस प्रकार ज्ञान-क्रिया उससे भिन्न नहीं होता है ऐसा परामर्श करता हुआ जो जो चाहता है वह वह जानता है और करता है इसी शरीर से समाधि का अभ्यास करता हुआ उसमें जबतक लीन नहीं होता तबतक देह रहते हुए जीवन्मुक्त कहलाता है देह के गिर जाने पर तो परमेश्वर रूप ही हो जाता है ॥ १५ ॥ इस ईश्वर प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का अर्थ अपने ज्ञान-अनुभव से सिद्ध होता हुआ भी गुरुपरम्परा क्रम से प्राप्त उपदेश, इसको पुष्ट करनेवाला अवश्य होगा, क्योंकि शास्त्र दृष्टि भी उन गुरुपरम्परा १. ज्ञानाधिकार और क्रियाधिकार इन दोनों अधिकारों के द्वारा तथा उसी में तत्त्वार्थसंग्रहाधिकार के साथ अपने से प्रकाशित होनेवाले तत्त्व में भी युक्ति का बढावा देकर निरूपित किया हुआ अंश स्वतः पूरा हो जाता है, आगम अधिकार के माध्यम से यद्यपि उस अर्थ की पुष्टि हो ही जाती है तथापि शास्त्र से भी इस अंश को पूरा किया है—इस पर कहते हैं कि 'शास्त्रदृष्टिर्हीति' शिव दृष्टि शास्त्र में भी उस प्राचीन प्रसिद्ध गुरु परम्परा क्रम के अनुसार आगम के विषय को ही लेकर प्रायः तत्त्वों का प्रतिपादन किया हुआ है । अत्यन्त महत्त्व-पूर्ण बीच-बीच में दिव्य अतिदिव्यादि सम्बन्ध को ठुकरा कर, केवल अपनी प्रतिभा के बल से पुस्तक की शरण में जाना तो विडम्बना ही कहलाती है इस अभिप्राय को लेकर कहते हैं— पुस्तकाधीतविद्याश्च गुरुक्रमविवर्जिताः । आचरन्तो दिशन्तश्च पच्यन्ते नरके चिरम् ॥

अ.-४, आ.-१, का.-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१३ दर्शितागमाधिकारेण; एवं गुरुतः शास्त्रतः स्वतः एतद्दृढीकृतं भवति, — इत्यभिप्रायेण गुरुपारम्पर्यं दर्शयति— इति प्रकटितो मया सुघट एष मार्गो नवो महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा । तदत्र निदधत्पदं भुवनकर्तृतामात्मनो विभाव्य शिवतामयोमनिशमाविशन् सिद्ध्यति ॥ १६ ॥ अस्मत्परमेष्ठिभट्टारकश्रीसोमानन्दपादैः शिवदृष्टिशास्त्रेऽयमभिनवः सर्वरहस्यशाखान्तर्गतः सन्निगूढत्वादप्रसिद्धो बाह्यान्तरचर्याप्राणायामादिक्लेशप्रयासकलाविरहात् सुघटस्तावदुक्तः, गत मार्ग से प्राप्त उपदेश के द्वारा आगम शास्त्र इत्यादि के सिद्धान्त ज्ञान को लेकर ही दिखायी गयी है, इस प्रकार गुरु से, शास्त्र से और अपने अनुभव ज्ञान से यह दृढ निश्चित किया हुआ इसमें अर्थ है, इस आशय से गुरु परम्परा क्रम का उपस्थापन करते हैं— इस प्रकार मैंने [ उत्पलदेव ] ने यह सरल, नूतन मार्ग प्रकाशित किया है। जैसा श्री सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टिशास्त्र' में प्रतिपादित किया था। इसलिए प्रमेय विषय में जो परामर्श पद का विश्राम कराता हुआ, अपने विश्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य को देख कर, निरन्तर शिवमय स्वरूप में प्रवेश करता हुआ परम सिद्ध हो जाता है ॥ १६ ॥ हमारे परमेष्ठी गुरु श्री सोमानन्दपाद ने, जो अप्रसिद्ध शैवाद्वैत दर्शन था उसे लोक में 'शिवदृष्टिशास्त्र' नामक ग्रन्थ का निर्माण कर प्रचार-प्रसार किया, यह मार्ग अतीव सरल है समस्त बाह्य एवं आभ्यन्तर परिचर्या, प्राणायाम-अष्टांगयोग आदि, जो कि कायिक, मानसिक क्लेशों को देनेवाले हैं उन सब से रहित, एक सीधा सरल मार्ग 'शिवदृष्टिशास्त्र' में 'सर्वभूत- यातनाराजराजानां ते भोक्तारो विनिन्दिताः । तस्माद्गुरुक्रमायातं विशन्नेति परं शिवम् ॥ गुरु परम्परा मार्ग से रहित, जिन्होंने मात्र पुस्तकों की शरण लेकर विद्या पढ़ी हैं वे बड़ी से बड़ी यातनाओं को नरक में बहुत काल तक भोगते हैं क्यों ? उनके द्वारा किया गया आचरण एवं उपदेशादि शास्त्र से विरुद्ध है । इसलिए गुरु परम्परा से आया हुआ उपदेश अधिन्यस्त करते हुए परम शिव को प्राप्त कर लेते हैं । इसी कारण गुरु से तृतीय अंश पूरा करना चाहिए । इसका किरण संहिता में भी विवेचन किया गया है 'स्वतोऽपि गुरुतः शास्त्राद्विमर्शस्त्रिविधः स्मृतः ।' गुरु से, शास्त्र से और अपने आप से भी, इन तीन प्रकार से विमर्श का होना कहा गया है । १. जब कि प्रत्यभिज्ञा कर लेने मात्र से ही आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है; इससे फिर यम-नियम-आसन प्राणायाम-प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधि इत्यादि के द्वारा होनेवाले योग में क्लेशों का जो सहना है; अर्थात् इन सबों को सहना और सह कर भी जिसका उपयोग आत्मविश्रान्ति के लिए सिद्ध नहीं होता है तो उसे करना व्यर्थ ही सिद्ध होता है । ठीक ही है, इन सबों का अनुपयोग ही दिखाई देता है; क्योंकि ४०

३१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-१६ स एवात्र प्रकटतां परवादकलङ्कशङ्कापसारेण नीतः, यत एवं शास्त्रगुरुस्वप्रत्ययसिद्धोऽयमर्थः, तदिति तस्मादत्र प्रमेये पदं परामर्शं विश्रमयन् विश्वकर्तृत्वलक्षणमैश्वर्यमात्मनो विभाव्य दार्ढ्येन यदा परामृशति तर्हि तत्परामर्शमात्रादेव तावज्जीवन्मुक्तो भगवाञ्छिव एव। यथोक्तं परमेष्ठिपादैः — ‘ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना । करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयाऽपि वा ॥ सकृज्ज्ञाते सुवर्णे किं भावनाकरणादिना । सर्वथा पितृमात्रादितुल्यदार्ढ्येन सत्यता ॥’ (शि. दृ.) हिताय’ बताया है, वही इस प्रत्यभिज्ञा में लाया गया है जो कि प्रतिवादी के द्वारा दिये गये आक्षेप-प्रत्याक्षेपरूप दोष-कलङ्क को युक्तिपूर्वक खण्डन कर अपने सिद्धान्त को इसमें प्रमाण के साथ स्थिर किया गया है। जब कि ऐसा ही अर्थ गुरु, शास्त्र एवं अपने अनुभव ज्ञान के बल से सिद्ध होता है, ‘तदिति’ इसलिए इस प्रमेय संवेद्य में परामर्शपद की विश्रान्ति कराता हुआ अपने भुवनकर्तृत्वरूप परम ऐश्वर्य देख कर, जब दृढ़-निश्चय के साथ प्रत्यवमर्श करता है तब उस परामर्श मात्र से ही जीवन्मुक्त अवस्था में पहुँचता हुआ भगवान् शिवमय हो जाता है। शिवदृष्टि शास्त्र में श्री सोमानन्दपाद ने इसका उल्लेख किया है— प्रमाण, शास्त्र अथवा गुरु वाक्य से एक बार दृढ प्रतिपत्तिपूर्वक ज्ञान हो जाने पर कि यह सारा का सारा प्रपञ्चजाल शिवमय है—ऐसा दृढ बोध हो जाने से इन्द्रियों के द्वारा कोई कृत्य ही नहीं रह जाता है। जैसे सुवर्ण की परीक्षा में स्वर्ण सिद्ध हो जाता है तो फिर आगे घोसना, अग्नि में डाल कर तपाना आदि तमाम क्रियाएँ करनी नहीं रह जाती; माता-पिता के विषय में भली-भाँति बोध हो जाने पर उसे सिद्ध करने के लिए क्या दूसरे प्रमाणों की आवश्यकता समझी जाती है ? यह तो जन्मना सिद्ध है कि ये हमारे माता-पिता आदि स्वजन लोग हैं। प्रत्यभिज्ञाशास्त्रवाला बड़ा ही सरल मार्ग साधक के लिए पड़ेगा। स्फुटोपायमनायासमनारम्भं महाफलम् । श्रोतुमिच्छामि देवेश योगं योगविदां वर ॥ हे देवेश ! जो प्रत्यक्ष उपायवाला अनायास-सहज आरम्भ किया हुआ महाफल देता है। मैं योगवेत्ताओं के परम योग को सुनना चाहती हूँ। प्राणायामादिकैरङ्गैर्योगाः स्युः कृत्रिमायतः । तेन नाकृतकस्यास्य कलामर्हन्ति षोडशीम् ॥ क्योंकि प्राणायाम-ध्यान-धारणा इत्यादि, अष्टाङ्ग योग के द्वारा होनेवाले सभी योग कृत्रिम होते हैं। इसलिए इस परम शिवरूप अकृत्रिम योग की सोलहवीं कला को भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यद्यपि इसका उल्लेख रहस्य-आगमों में निरूपित किया गया है तथापि सुस्पष्टतया स्पष्टीकरण नहीं हुआ है किन्तु भीतर किये हुए के ही विषय में कहा गया है—‘गर्भः ख्यातिर्महामाया तत्र तदात्मके मितसिद्धिप्रपञ्चे यच्चित्तस्य विकासः तावन्मात्रे प्रपञ्चे संतोषः असावेव.........किञ्चिज्ज्ञ- त्वरूपा अशुद्धविद्या...............विकल्पात्मा क्रमः । शिव सूत्रवि० । समस्त योग सिद्धियाँ मायीय उपराजों से उपरञ्जित होने के कारण निम्न श्रेणी की और हेय

अ.-४, आ.-१, का.-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१५ इत्यादि । तां विभाव्य यद्यनिशमाविशति शरीरप्राणबुद्धिशून्येभ्योऽन्यतमं द्वयं सर्वं वा तत्रैव निमज्जयति, अनवरतं तत्तां तां विभूतिं परविभूतिपर्यन्तां लभते । ननु यद्यात्माख्यं वस्तु तदेव र्तार्ह तस्य प्रत्यभिज्ञानाप्रत्यभिज्ञानयोरविशेषः, नहि बीजमप्रत्यभिज्ञातं सति सहकारिसाकल्ये नाङ्कुरं जनयति, तत् क आत्मप्रत्यभिज्ञाने निर्बन्धः ?; उच्यते, —द्विविधार्थक्रियास्ति बाह्या चाङ्कुरादिका प्रमातृविश्रान्तिचमत्कारसारा च प्रीत्यादिरूपा, तत्राद्या सत्यं प्रत्यभिज्ञानं नापेक्षते, द्वितीया तु तदपेक्षते एव; इह च 'अहं महेश्वर' इत्येवंभूतचमत्कारसारा परापरसिद्धिलक्षणा जीवन्मुक्ति- विभूतियोगमर्थक्रिया, —इतीश्वरप्रत्यभिज्ञानमत्रावश्यापेक्षणीयम् ॥ १६ ॥ उस विश्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य को देख कर, जो निरन्तर उसमें समाहित या आविष्ट अपने आपको किया करता है, शरीर, प्राण, बुद्धि और शून्यादि से या इन्हीं में से किसी एक से, व दो से, अथवा सब से उस चिद्रूप में डूब जाता है, ऐसे योगी चिद्रूप में निरन्तर आविष्ट रहने के कारण उन-उन विभूति को प्राप्त करते हुए आत्म-विश्रान्तिरूप विभूति तक पहुँच जाते हैं । अब शङ्का होती है कि यदि आत्मा परम स्वातन्त्र्यरूप है तो उसका प्रत्यभिज्ञान करना और न करना, इसमें कोई अन्तर तो नहीं पड़नेवाला है जब कोई अन्तर ही नहीं पड़ना है तो व्यर्थ का प्रयास क्यों मोल लेगा ? बीज प्रत्यभिज्ञान न होने पर भी सहकारी साकल्य के साथ संयुक्त हो जाने से क्या अङ्कुर उत्पन्न नहीं करता है, तब फिर आत्मा के प्रत्यभिज्ञान करने में कौन सी रुकावट है ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं, —अर्थक्रिया दो प्रकार की होती है एक तो बाह्य, जो अङ्कुरादिरूप से रहती है और दूसरी प्रमातृ-विश्रान्तिरूप चमत्कार सारयुक्त प्रीत्यादि- रूप है । ठीक ही है, इसमें जो पहली अर्थक्रिया बाह्य है उसे तो प्रत्यभिज्ञान की अपेक्षा नहीं पड़ती है और प्रीत्यादिरूप आत्म-विश्रान्तिवाली जो द्वितीय अर्थक्रिया है उसे तो अपेक्षा रहती है; इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा शास्त्र में 'अहं महेश्वरः' मैं ही महेश्वर हूँ, यही आत्म-विश्रान्तिरूप, जीवन्मुक्ति देनेवाली अर्थक्रिया है—इसलिए इस में ईश्वर का प्रत्यभिज्ञान करना आवश्यक समझा जाता है ॥ १६ ॥ समझी जाती है । इसका स्वरूप प्रायः मूढ़लोगों में होनेवाली अल्पतारूप बुद्धि के समान ही रहता है बल्कि इससे बढ़-चढ़कर ही है । इसलिए ये सारी की सारी सिद्धियाँ अल्पकाल में सिद्ध होकर हस्तगत भी हो जाती हैं और बाजीगर की बाजी-मायाजाल के समान विनष्ट भी शीघ्र हो जाती हैं । ये अल्प फल देनेवाली सिद्धियाँ योगिजन को अपने स्वरूप प्राप्ति से बहुत दूर खींचकर ले जाती हैं तथा आत्मविश्रान्ति के मार्ग से विमुख कर देती हैं । न चैतदप्रसन्नेन शङ्करेणोपदिष्यते । कथञ्चिदुपलब्धेऽपि वासना न प्रजायते ॥ वासनामात्रालाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ॥ इस विषय में भगवान् शङ्कर कहते हैं कि अल्प भोगों में आसक्त-संसक्त अल्पज्ञ कभी तो प्रसन्नता के मारे फूल जाते हैं तो कभी-कभार शोकाग्नि में जल कर अपने मानस का संतुलन खो बैठते हैं ऐसे अल्पज्ञ कुछ मित-परिमित सिद्धियाँ अपने हस्तगत कर भी लेते हैं किन्तु वासना उत्तरोत्तर