भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१६-१७ यदुभयात्मकं पुर्यष्टकं तावत्येव शुद्धे या विश्रान्तिः, तस्यां सत्यां यदहन्तायाः सुषुप्ताया बोधलक्षणं भावरूपं कर्म च क्रियास्वभावं तत् सौषुप्तम् । मलेन हि प्रमाता सुप्तः कलया त्वसुप्त इव, अत्र तन्निमज्जनेन सुष्ठु सुप्रस्तस्य भावः कर्म वा, —इति । तत्र शून्यसौषुप्ते न किञ्चिद्व्यतिरिक्तं वेद्यम्,—इति मायीयमलाभावादपवेद्यं तत्; प्राणसुषुप्ते तु स्पर्शकृतस्य सुखदुःखादेर्भावात् माया- ख्यमस्ति मलम्,—इति सवेद्यं तत् । एवं गाढागाढसुषुप्तद्वितयवत् प्रलयोऽपि मन्तव्यः । स परं देहादिप्रध्वंसानुदयकृतश्चिरतरकालश्च । सुषुप्तं तु देहानादरकृतमचिरकालं च,—इति विशेषः । तत्रापि श्रमकृतं निद्रा, धातुदोषकृतं मूर्च्छा, द्रव्यकृतं मदोन्मादादि, स्वातन्त्र्यकृतं समाधिः,— इत्याद्यवान्तरभेदाः । केचित्तु समाधिरूपं सवेद्यमन्यदपवेद्यम्,—इति प्रपन्नाः ॥ १३-१४-१५ ॥ नन्वेवं स्फुटवेद्यपदविनिर्मुक्ता सुषुप्तावस्थास्तु, स्वप्नजाग्रद्दशयोस्तु स्फुटवेद्यावभासयोगिन्योः को भेदः ? इत्याशङ्क्य श्लोकद्वयेन भेदमाह— मनोमात्रपथेऽध्यक्षविषयत्वेन विभ्रमात् । स्पष्टावभासा भावानां सृष्टिः स्वप्नपदं मतम् ॥ १६ ॥ सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतया स्थिरा । सृष्टिः साधारणी सर्वप्रमातॄणां स जागरः ॥ १७ ॥ इन सबके कार्यरूप इन्द्रियाँ तथा अहङ्कार, बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्व, मन इस प्रकार यह मेरी प्रकृति- शक्ति अष्ट भेद से युक्त है । इस प्रकार ज्ञान और कर्मरूप पुर्यष्टक में विश्रान्ति लेते हुए जो अहन्ता सोई हुई रहती है उस सुषुप्त का बोधरूप भाव कर्म और क्रिया स्वभाव सुषुप्ति है; क्योंकि मल से प्रमाता सुप्त कहा जाता है और कला से असुप्त के जैसा रहता है, उसमें डूब जाने से भली-भाँति सुप्त हो जाता है एवं शून्य सुषुप्त हो जाने पर कोई भिन्न वेद्यभाव नहीं रहता है, मायीय मल के अभाव में अपवेद्य हो जाता है, प्राण सुषुप्त में तो सुख-दुखादि का स्पर्श होने से मायीय मल रहता है अर्थात् मायीक नाम का मल उसमें रहता है इसलिए वह सवेद्य रहता है। इस प्रकार गाढ, अगाढ, सुषुप्ति के समान प्रलय भी समझना चाहिए। वह देहादि प्रध्वंस के उदय न होने से चिरकाल तक रहता है। सुषुप्त तो देहादि के अनादर से होता है इसी कारण वह शीघ्र नष्ट हो जाता है यही दोनों में विशेषता है। उसमें अत्यधिक परिश्रम के करने से निद्रा, धातु के दोष से मूर्च्छा, मद्यपानादि से उन्माद, स्वतन्त्रता से समाधि होती है, इत्यादि सब अवान्तर भेद कहे जाते हैं। किन्तु कुछ लोग तो समाधि को सवेद्य और दूसरे को अपवेद्य मानते हैं ॥ १५ ॥ अब शङ्का करते हैं कि सुषुप्त अवस्था भले ही स्फुटवेद्य पद से शून्य रहित हो, किन्तु जाग्रत् और स्वप्न तो स्फुटरूप से वेद्य को अवभास करनेवाली अवस्था है उसमें कौन सा भेद है ? इस पर आशङ्का करके दो श्लोकों से उत्तर देते हैं— मनोमात्र मार्ग में इन्द्रियों के विषय का प्रत्यक्ष प्रमाण भ्रम से भाव-पदार्थों में स्पष्ट अव- भासपूर्वक सृष्टि का होना स्वप्न कहा जाता है ॥ १६ ॥ सभी प्रमाणों के भासित होने से जो बाहर की स्थिर सृष्टि है वह सभी प्रमाताओं के लिए साधारण सृष्टि है वही जाग्रत अवस्था है ॥ १७ ॥

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