भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५] विमर्शिनीटीकोपेता [२९३ समवेता प्राणापानसमानोदानव्यानात्मके वायुचक्रे प्रेरणात्मिका शक्तिः, सा च विद्याकलयोः प्रपञ्चभूतौ यौ क्रमेण बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियवर्गौ तयोरान्तरी वृत्तिः। बाह्या हि तयोः शब्दाद्यालोचन- शब्दाभिव्यक्तिस्थानाभिहननादिका वृत्तिः। तदुक्तम् 'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च।' (सां० २९ का०) इति। एवं शून्य एवाहन्ता अक्षचक्रोपोद्वलिता जीवनम्, —इति स शून्य एव जीवः संसरति। यदि वेन्द्रियशक्तीनामेव यान्तरी साधारणप्राणात्मिका प्राणशब्द- वाच्या प्राणादिमारुतविशेषप्रेरणामयी सैव 'अहम्' इत्यधिशयाना जीवनं, तदा प्राण एव जीवः संसारी स एव शून्यः, प्राणश्च पुर्यष्टकशब्दवाच्यः, प्राणादिपञ्चकं बुद्धीन्द्रियवर्गः कर्मेन्द्रियगणो निश्चयात्मिका च यतो धीर्व्यज्यते। तन्मात्रपञ्चकं मनोऽहंबुद्धय, इत्यन्ये 'तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धि०।' (स्व० ४।१९) इति। 'भूमिरापोऽनलो०।' (गी० ७।४) इति च वदन्तः। एवं होता है। शून्य प्रमाता में समवेत प्राण, अपान, समान, उदान, व्यानरूप पाँचों वायु को प्रेरणा करनेवाली शक्ति रहती है और वह विद्या एवं कला के प्रपञ्चरूप जो क्रम से ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय वर्ग हैं उन दोनों के भीतर रहनेवाली वृत्ति होती हैं; क्योंकि उन दोनों की बाह्यवृत्ति शब्दात्मिकारूप, आलोचनरूप, शब्दरूप से अभिव्यक्त होनेवाली वृत्ति है, इस विषय में सांख्य कारिका में कहा भी गया है—'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च।' [सां० २९ का०] इन्द्रियों की सामान्यकरण वृत्ति प्राणादि पाँच वायु है। इस प्रकार शून्य प्रेरणात्मिका शक्तिरूप आन्तरिक वृत्ति ही इन्द्रिय तक प्रकाशित होकर जीवन कहलाता है। वही शून्यरूप होकर जीव संसार में संसरण करता रहता है अथवा इन्द्रिय-शक्तियों में जो भीतरी प्राणात्मिका-शक्ति है उसी का नाम प्राण है; क्योंकि वह प्राणादि श्वास-प्रश्वास को प्रेरणा देती है, वही 'अहम्' में रह कर जीवन कही जाती है, तब प्राण ही जीव संसारी हो जाता है और वही शून्य कहा जाता है, प्राण पुर्यष्टक शब्द का वाच्य है, जिससे प्राणादि पाँच, बुद्धीन्द्रिय समूह, कर्मेन्द्रिय वर्ग एवं निश्चयात्मक अन्तःकरण की वृत्तियाँ और बुद्धिरूप में व्यक्त होता है। कुछ लोग उसको तन्मात्र पञ्चक, मन, बुद्धि और अहंकार कहते हैं—'तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहं बुद्धि०।' (स्प० ४।१९) तथा गीता में कहा है 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकारं इतीयं मे भिन्ना प्रकृति- रष्टधा' (७।४) सूक्ष्म पञ्चभूत सहित पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पञ्च महाभूत; १. वही प्रेरणात्मिका शक्ति वृत्ति है। यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत्स्वयम् । ............प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥ लभते.....................। इत्यत्र सहान्तरेण चक्रेणेति.............। जिसके सामर्थ्य बल से ही, अनन्त-शक्ति चक्र के साथ-साथ उस बाह्य इन्द्रियों को भी चेतन के जैसा सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है जिससे स्वतन्त्र होकर सृष्टि, स्थिति, और संहारादि करने में प्रवृत्त होते हैं। इसलिए उस तत्त्व को जानने के लिए योगी को यत्न करना चाहिए। क्योंकि यह अकृत्रिम स्वभाववाली स्वतन्त्रता रोम-रोम में भरी हुई है। इस रीति से अपने आवेशवशात् उठाती हुई जीव ऐसा कहा जाता है। जो शून्य को उठानेवाली है वही जीवन क्रिया कही जाती है।