ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५ तावन्मात्रस्थितौ प्रोक्तं सौषुप्तं प्रलयोपमम् । संवेद्यमपवेद्यं च मायामलयुतायुतम् ॥ १५ ॥ इह चित्तत्त्वं स्वस्वरूपमाच्छादयत् ज्ञेयरूपेण बुद्ध्यादिना देहान्तेन घटादिना वा भासते । एकमेव चेदं स्वातन्त्र्यविजृम्भितं, न त्वत्र वास्तवः क्रमो वा भेदो वा । तत्रापि तु स्वातन्त्र्यात् क्रमश्च भेदश्चाभासते । तदेवंस्थिते यश्चित्तत्त्वस्य स्वरूपाच्छादनभागः स एवोत्तरभागान्तरा- संकीर्णो यदा विश्राम्यति तदनुदयाद्वा तत्प्रध्वंसाद्वा प्रलय इव तदनादरणाद्रानिद्रासमाधि- मूर्च्छादाविव, तत्रैव चाहन्तारूपं कर्तृतायाः पदं परामर्शोऽस्फुटत्वादरूपात्मना संस्कारेण शुद्धेन वेद्यपदवोमप्राप्तेन युक्तो भवति, तदा सैवावस्था नेत्येवपरामर्शशेषा अनपेक्षितनिषेध्यबुद्ध्यादि- विषयसुस्पष्टपरामर्शसंभेदापि अवश्यंभाविनिषेधयोगात् 'अकिञ्चनोऽहम्' इत्येवंभूतपरामर्शवत् स्वीकृतसामान्याकारनिषेध्या, अत एव संस्कारशेषीकृतज्ञेयरूपा 'शून्य' इत्युच्यते । तथाविधे बुद्ध्यादीनां देहादिनीलान्तानामभावरूपे शून्यत्वमुच्यते, यतस्तत्र ज्ञेयानां 'शून्यता' अभावरूपता संस्कारशेषता । इयमेव हि सर्वत्राभावो न तु सतां सर्वात्मना विनाशः । तत्रैव शून्ये प्रमातरि केवल इतनी स्थिति में ही प्रलय तुल्य सुषुप्त अवस्था कही जाती है। जिसमें वेद्यसहित और वेद्यभावों को छोड़कर मायामल से मिली या नहीं मिली हुई अवस्था रहती है ॥ १५ ॥ चित्तत्त्व अपने स्वरूप प्रकाश को आवृत्त करता हुआ बुद्ध्यादि ज्ञेयरूप से अथवा घटादि देहान्तरूप से भासित होता है और यह एक ही स्वातन्त्र्य का प्रभाव है, वस्तुतः यहाँ कोई क्रम या भेद नही होता है, फिर भी तो स्वातन्त्र्य के कारण क्रम और भेद भासित होता है। ऐसी स्थिति में भी जो चेतनतत्त्व का अपने स्वरूप का आच्छादन भाग है अर्थात् देह बुद्धि से संमिलित होना रूप वही जब अन्य उत्तर भाग से असंकीर्ण होकर विश्राम लेता है तब तो उसके उदय न होने से अथवा ध्वंस हो जाने से प्रलय के समान उसका अनादर कर देने से निद्रा, मूर्च्छा, समाधि के समान रहता है, इस प्रकार उसमें ही अहन्तारूप कर्तृता से परामर्श के दब जाने पर शुद्ध संस्कार से वेद्यपद को प्राप्त होकर रह जाता है, तब वही अवस्था परामर्श के अभावरूप होकर निषेध बुद्ध्यादि से विषयों के स्पष्ट परामर्श न होने के कारण निश्चित होनेवाले निषेध के संपर्क से 'अकिंचनोऽहम्' अर्थात् मैं कुछ भी नहीं हूँ इस प्रकार परामर्श के समान सामान्य निषेध का बोध होता है, इसीलिए संस्कार शेष ज्ञेयरूप 'शून्य' कहा जाता है। उसी प्रकार बुद्ध्यादि से लेकर देहादि नील-पदार्थ पर्यन्त अभावरूप में शून्यत्व कहलाता है; क्योंकि उसमें ज्ञेयों की 'शून्यता' अभावरूपता संस्कार शेषता रहती है। इसी को सर्वत्र दर्शनों में अभाव नाम से प्रतिपादन किया है सद्भूभाव-पदार्थों का सर्वतो भावेन विनाश नहीं १. बोध मात्र ही संकुचित शून्य है, शून्यता में स्फुटता नहीं रहती है— ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः । पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥ जाग्रत एवं स्वप्न अवस्थाओं की अवस्थागत द्विरूपता का आधार ज्ञान और ज्ञेय है। सुषुप्ति और चतुर्थ [ शिवावस्था ] में मात्र अनुभव रहता है, अपने स्वरूप की प्राप्ति चिद्रूप की स्थिति सुषुप्ति एवं चतुर्थावस्था के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं पर भी नहीं रहती है ।