ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९१ कर्मप्रपञ्चाः । यद्गीतमपि—'अभ्यासेऽप्यसमर्थः सन्मत्कर्मपरमो भव ।' (गी० १२।१०) इति । देहपाते तु परमेश्वर एवैकरसः,—इति कः कुत्र कथं समाविशेत् । तदेतदाह यत् पुनः कर्तृताया मुख्यत्वं तन्नान्तरीय Broadway कश्च शून्यादेर्गुणभावः, तस्मिंश्चाप्यचिद्रूपे गुणीभूते 'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इति मलव्यापारस्यापहस्तनात् चितो योऽपरोऽप्यात्मभागो बोधलक्षणो मलेन न्यक्कृतोऽभूत् तस्यापि अधुनोन्मग्नत्वेन मुख्यत्वम् । यच्च कर्तृताया 'मुख्यत्वम्' उन्मग्नता, इदमेव ज्ञानमज्ञा- नात्मकमलप्रतिपक्षत्वात्; तदेतन्मुख्यत्वं समावेशस्य लक्षणं येन देहस्थितोऽपि 'पतिः' इति 'मुक्त' इति शास्त्रेषूक्तः ॥ ११-१२ ॥ नन्वेवं पत्युः समावेशात्मिका तुर्यतदतीतरूपा भवतु दशा, पशोस्तु कथं सुषुप्तस्वप्न- जाग्रद्दशाभेद आगमेषूक्तः,—इत्याशङ्क्य सुषुप्तस्वरूपमेव तावदाचष्टे श्लोकत्रयेण— शून्ये बुद्ध्याद्यभावात्मन्यहन्ताकर्तृतापदे । अस्फुटारूपसंस्कारमात्रिणि ज्ञेयशून्यता ॥ १३ ॥ साक्षाणामान्तरी वृत्तिः प्राणादिप्रेरिका मता । जीवनाख्याथवा प्राणेऽहन्ता पुर्यष्टकात्मिका ॥ १४ ॥ परमेश्वर को स्तुति-प्रार्थना, प्रणाम, पूजा, ध्यान, समाधि प्रभृति प्रपञ्च बहुत से करने पड़ जाते हैं । जो कि गीता भी यही कहती है 'अभ्यासेऽप्यसमर्थः सन्मत्कर्मपरमो भवः । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि [१२-१०] अभ्यास करने में भी समर्थ न हो, तो मुझे प्रसन्न करनेवाले व्रत, नियम, दान, पूजन, अर्चन, जप, तप, स्तवन, कीर्त्तन, श्रवण इत्यादि कर्म करने में तत्पर हो; इससे भी चित्त की शुद्धि होगी और चित्तशुद्धि के द्वारा मोक्षरूपी सिद्धि को प्राप्त कर लेगा । शरीर के छूट जाने पर तो परमेश्वर में एकता हो ही जाती है, इस प्रकार कौन कहाँ और कैसे संमिलित हो सकता है ? इसका उत्तर देते हैं कि उसमें जो कर्तृत्व की प्रधानता है वह आवश्यक शून्यादि का गौणभाव नहीं है, उसका जडरूप गौण हो जाने पर स्वतन्त्रता का भी बोध नहीं होता है—'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इसी कारण मल के व्यापार दब जाने से चेतन का जो दूसरा ज्ञान लक्षण आत्मांश था, वह भी मल से तिरस्कृत हो जाता है इसलिए उस भाग के भी स्फुटित होने से उसमें मुख्यत्व आ जाता है । जिसको कर्तृता का मुख्य स्फुरण कहते हैं, यही अज्ञानात्मक मल प्रतिपक्षी हो जाने से वह ज्ञान स्वरूप होता है; इसी का नाम मुख्य समावेश है वही देह में रहनेवाला 'पतिः' पशुपतिरूप और मुक्त इत्यादि शब्दों से शास्त्रों में कहा जाता है ॥ ११-१२ ॥ इस पर आशङ्का करते हैं कि पशुपति की तुर्यातीत समावेशरूप अवस्था भले ही हो, किन्तु पशुजीव की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओं का भेद जो शास्त्रों में बताया है वह कैसे होगा ? इस पर आशङ्का कर कहते हैं कि बुद्ध्यादि की अभावरूप शून्यता अहन्ता और कर्तृता के स्थान में अस्फुटरूपता संस्कारमात्र से रहती है और उसी में ज्ञेय की शून्यता भी रहती है ॥ १३ ॥ इन्द्रिय सहित प्रमाताओं की आन्तरी वृत्ति ही प्राणादि की प्रेरिका होती है अथवा प्राण में अहन्ता या पुर्यष्टकरूप से जीवनप्रद होती है ॥ १४ ॥